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From My Pen : कुछ मेरी कलम से....

Started by Barthwal, April 26, 2010, 02:06:16 AM

हेम पन्त

सुन्दर भाई सुन्दर भावनाओं को कविता में बखूबी गूंथा है आपने... आगे भी बढाइये कविता को, कहानि का रस आ रहा है इसमें..

Barthwal

बहुत सोचि मीला, अर इन जणना की कोशिश करि की हम उत्तराखंडी भै बैणा किलै समाज मा सामूहिक रुप मा छाप नी छोडि सकणा छंवा जब्कि सब एकला चलो की राह पर चलणा छन।

सकारत्मक सोच त सभी रखदिन पर नकरात्मक छवि हमरी ज्यादा प्रमुख च समाज मा। सबसे बडू कारण हम खुद ही छंवा। यीं कविता मा कुछ भाव उभरिक ऎन जूं ते मीला तीन भाग मा ल्याखि -1. उत्तराखंडी किलै छन अलग[नकारात्मक]   2. हम क्या छंवा करणा आज    3. जू प्रशन उठिन वा मा हम क्या करि सकदा  और अंत मा एक आस।

[ कै भी रुप मा यू वक्तिगत या समूह कुण  नी छन या कै पर व्यंग्य नी चा बस एक सकारात्मक सोच ते बढावा दीण कु एक प्रयास च अर सबी भै बैणा अगर एक ह्वे कन सुचला त हम अपणा उत्तराखंड का वास्ता व्यापक रुप मा सह्योग दे सकदा]


~~~~अभी बची च आस ~~~~

1. उत्तराखंडी किलै छन अलग [नकारात्मक] 

पुंगडी - डांडी, गोर - बछरा, नदी - छोया सब बिसरी गैना
पापी पेट अर उज्जवल भविष्य कि खातिर सब छोडी गैना

देव भूमि च  छुट्टु सी हमर उत्तराखंड
फिर भी करणा छंवा हम यांका खंड खंड

क्वी च गढवली अर क्वी च कुमाऊँनी
जग मा बुलद ज्या मा हमते शर्म च औंदी

नामे की रैंदि बस सब्य़ु ते दरकार
नी ल्याओ त सब्यू ते चढदू बुखार

सुचणु रेंदु, कै की मौ कन मा फुकुलू
मवसी अपणी कन मा यां से बणोलू

जख मा ह्वे जैले मेरी खाणी पीणी
वैतेई ही मीना बस अपणू जाणी

2. हम क्या छंवा करणा आज   

अपणी बोलि/भासा मी बोल नी सकदू
फिर भी एक हैका टांग मी खिचणू रेंदू।

राज्यो मा बणेयेनि हमूला अब उत्तराखंड
हर राज्यो मा भी छन कतना उत्तराखंड

विदेश मा भी बण गीन बिज्यां उत्तराखंड
हर देश मा भी छन अब द्वी-द्वी उत्तराखंड

बुल्दिन मी अर म्यार काम च असली
दुसरा छन जु वू सब छन  नकली

संस्कृ्ति का छंवा हम ही केवल पैरेदार
एक दुसरा ते तुडना मा नी लंगादा देर

मी छौ बडू म्यार छी बडा कनेक्शन
लडना रंदिन जन हूणा हवालो ईलेक्शन

3. जू प्रशन उठिन वा मा हम क्या करि सकदा

राजनीति केवल नेताओ ते करणा दयावा
वू ते सबक सिखाणा सब एक ह्वेई जावा

अपनी भासा अर बोलि जरुर तुम जाणा
संस्कृति अपणी की असलियत तुम पछाणा

एक अर एक द्वी ना,बल्कि ग्यारह तुम ह्वे जाओ
उत्तराखंड ते अपणो खंड  - खंड नी हूणी दयाओ

देव भूमि कूं विकासा का विचार  तुम राखा
कन पलायन रुकला यांकि  सोच तुम राखा

अपणा उत्तराखंड क भविष्य की बात जब ह्वेली
शिक्षा बिजली पाणी अर सडक गौं-गौं मा जैली

रैला दगडी दगड्यो अर  करल्या कुछ काम
बुलणु नी प्वाडलो कैतेई फिर अफि होंदु नाम

खाणी पीणी ना केवल,मिलन मा करया तुम खास बात
हर कार्य मा अपणी ना, उत्तराखंड की करयां तुम बात

...अंत मा एक आस

उत्तराखंड मा च  देवी - दिबतो कु वास
खंड नी हूणी दूयला अभी बची च आस

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल , अबु धाबी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
    बर्थवाल भेजि .. बहुत सुन्दर कविता लिखी छा तुमिल!      मी आपुन लिखी बात त पूर तरह सहमत छियों!

                       "जम्बु बोले य गत भई,तु क्या बोले कागा"

ये कहानी एक औरत के भाग्य की है। होता यह है की एक बार एक औरत नदी किनारे घास काटने गई होती है उसे कइ तरहै के पशु पक्षियो की भाषा का ज्ञान भी होता है जब वह नदी के आस पास घास काट रही होती है तभी एक पुरूष नदी मे बहकर आ रहा होता है जिस पर एक जम्बु (लोमणी) की नजर पड जाती है और वह जम्बु अपनी भाषा मे कुछ महत्वपुर्ण जानकारी देता है। दरअसल वह जम्बु कहता है कि इस पुरूष ने अपनी जांघ काटकर उसमे हिरा छुपा रख्खा है यदि कोई इसे नदी से बाहर निकाल देता तो मे हीरा उसे दे देता और इस आदमी को मे खा लेता.  वह औरत उस जम्बु की भाषा समझ जाती है और उस बहते हुवे पुरूष को नदी से बाहर निकालने की कोशिस करने लगती है और उसे बाहर निकालने मे सफल हो जाती है और उसकी जांघ को जम्बु से फडवाने के बजाय अपने दांतो से काटकर उसमे से हिरा निकाल लेती है।

तभी कुछ लोगो की नजर उस पर पडती है और वह यह सब देख घबरा जाते है और आपस मे मनत्रणा करने लग जाते है कि अरे ये तो आदमखोर औरत है कही ये इसी तरहै हम सब को भी खा देगी तो क्या होगा। फैसला करते है कि यह बात इसके घर वालो (ससुराल) को बता दी जाय तकी इसके ससुराल वाले इसको विचार विर्मश के बाद वापस इसके मायके छोड दे। आखिरकार बात घर तर पहुच जाती है और विचार विर्मश सुरु हो जाते है कि आखिर यह आदमखोर क्यो है, कैसे है।

तब तक औरत भी घर पहुच जाती है और तभी उसके घर वाले उससे पुछ ताछ सुरू करते है लेकिन उसके घबराये हुवे मन और वहा इक्कठे लोगो को देखकर वह कुछ भी बताने से डरती है. उसको लगता है कि कही मेने यहा इन सबके सामने सच बता दिया तो हीरे का क्या होगा। दरअसल वह हीरा चुप-चाप अपने सास को देना चाहती थी लेकिन वहा का माहौल देखकर उसने वह हीरा चुच-चाप गुसलखाने की नाली मे छुपा दिया ताकी अगर तलासी की बात चले तो हीरा किसी के पकड मे न आने पाय।

आखिरकार औरत की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न मिलने के बाद सभी यह मान लेते है कि यह आदमखोर औरत है.
आखिरकार फैसला कीया जाता है कि इसे कल सुबह होते ही इसके मायके पहुचा दिया जाय। सब की रजा मन्दी के बाद आखिरकार उस औरत को मायके जाने को कह दिया जाता है और ससुर जी को मायके तक छोड आने की जिम्मेदारी दी जाती है। अगली सुबह होते ही ससुर जी बहु को मायके चलने के लिए कहते है और दोनो मायके के लिए प्रस्थान करते है। जाते-जाते रास्ते मे एक जगह पर एक पेड के निचे बौठते है तभी ससुर जी को पेड़ की ठन्डी छांव मे नीद आ जाती है और बहु बेचैन मन मे अपने पती और अपने ससुरालियों के बारे मे सोच विचार कर रही होती है कि अब मेरे पति का क्या होगा कोंन उनके लिए खाना बनायेगा कोंन उनके कपडे धोयेगा और भी बहुत कुछ।
तभी एक कौवां (काक)कही से उडकर उस पेड़ की डाल पर बैठता है और कुछ अपनी भाषा मे बोलने लगता है। वह स्त्री उसकी भी भाषा समझ जाती है और सब कुछ जान जाने के बाद कहती है,

"जम्बु बोले यह गत भई तु क्यो बोले कागा"

अर्थात लोमणी के बोलने से तो मेरी ये गत (हालात) हो गई है, अब तेरे बोलने के बाद न जाने मेरी क्या गत हो जायेगी अर्थात वह सोचती है कि कही मे मायके के लायक भी न रह जाउ।

अब आप यह जानने के लिए उत्तेजित होंगे की उस कौवे ने अपनी भाषा मे क्या कहा होगा। चलो आपको यह भी बता देते है कि उस कौवे ने क्या कहा। दरअसल वह कौवा भुखा पेट होता है और उस कौवे को पता  होता है कि इस पेड के निचे पहले किसी ने धन दबा कर रख्खा है और उसकी रक्षा एक मणी वाला साप करता है। तो उसने उस स्त्री से अपनी भाषा मे कहा की इस पेड़ के नीचे पहले किसी ने धन दबा रख्खा है तु यहा पर खोद और साप मार कर मुझे दे और धन तु रख लेना। कौवा और उस स्त्री के संवाद की भनक जब सोये हुवे ससुर के कान मे गुजी तभी ससुर जाग उठा और बहु से पुछने लगा कि तु किससे बात कर रही थी।

यहा कोंन तेरे साथ है मुझे तो कोई भी नही दिखाई दे रहा है तब बहु ने सोचा अब तो जो होगा देखी जायेगी या तो मायका या तो ससुराल या दोनो मे से कोई भी नही उसने ससुर जी को रहस्य बताना ही आर पार समझ लिया और बता डाली सारी कहानी ससुर जी को ससुर जी कहानी सुनकर हैरान हो गये तब ससुर जी ने बहु को कहा?
अरे बहु तु तो महान ज्ञानी है अगर तु इन सब पशु पक्षियो की बोली समझती है तो तुने ये सब हमे पहले क्यो नही बताया तुने तो चुप रहकर अपनी भली जिन्दगी को गर्त मे धकेल दिया था।

अब चल तु कहती है कि यह कौवा सच कह रहा है तो चल खोदकर देख लेते है. दोनो ने पेड़ की जड़ पर थोडा ही गहरा खोदा था की मणी धारी सांप ने अपना रूप दिखा दिया किसी तरहै उस सांप को ससुर बहु ने मारा और मार कर उस डाल पर बैठे कौवे को दे दिया और कौवा खुशी खुशी साप को उठाकर डाल पर ले जा कर अपनी भुख मिटाने लगा और ससुर बहु सारा धन लेकर मायके के बजाय वापस ससुराल को चलने लगे तब बहु ने ससुर जी को ससुराल जाने को मना किया लेकिन ससुर जी ने बहु से माफी माग कर अपनी डब-डबाती हुई आंखो से और फफकते हुवे किसी तरहै बहु को मना कर वापस उसके ससुराल ले गये.

बहु को वापस ससुराल आते देख सब गांव पडोस के लोग फिर भयभीत हो गये
जब असल बात का रहस्य मालुम पडी तो सबने उस स्त्री से माफी मांगकर अपना कसुर कबुल किया और एक बहुत बडा आयोजन कर उस स्त्री का फूल मालाओ से मान सम्मान किया और खुशियां बाट कर जय-जयकार करने लगे।

sunder singh negi
26/05/2010

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

भाई कहानी तो समझ मैं पूरी तरह से नहीं आई :)

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

अरे अनुभव जी इसनें नहीं समझाने वाला क्या है इसका मतलब है की बिना जांच पड़ताल किये कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए नहीं तो फिर बाद मैं पस्ताना पड़ता है

दिल हि दिल मे गम सहना सीख लिया।
अब तो दर्द मे भी चुप रहना सीख लिया।

नही छलकती आंखे अब किसी के सामने।
इन आंखो ने भी अकेले मे बहना सीख लिया।

सुन्दर सिंह नेगी
18/05/2010


                "पुरूष कुछ भी नही"

माना कि पुरूष कुछ भी नही, फिर भी बहुत कुछ है।
कुछ भी नही तो, सामाज का एक हिस्सा तो है ही।

कुछ भी नही तो सृष्टि रचना मे नारि का साथी तो है ही।
कुछ भी नही तो खुद के लिए खुद का हमसफर तो है ही।

माना कि भगवान ने पुरूष को शारीरिक्ता से मजबुत बनाया।
पर पुरूष इतना भी मजबुत नही कि चोट लगे और दर्द न हो।

कुछ भी नही तो "नारि" मोह मे मोहित होने के लिए तो है ही।
कुछ भी नही तो दुनियां मे आकर मर जाने के लिए तो है ही।

माना कि पुरूष लाज के घुंघट मे चेहरा नही छुपाता।
मगर शर्म लाज के परदे पर चेहरा छुपाता तो है ही।

माना कि पुरूष कुछ भी नही, फिर भी बहुत कुछ है।
कुछ भी नही तो, सामाज का एक हिस्सा तो है ही।

स्वरचित
सुन्दर सिंह नेगी 17/04/2010.


                      "जन्म भुमी दूर हु तुझसे"

तनहा चलता हु सफर मे, सफर तेरी यादो मे थम जाता है.
दूर हु दो वक्त की रोटी के लिए तुझसे, ये सोच के मन भर आता है.

तेरी ठंडी छाँव मे सकुन था मुझे, मेरी किसमत ने मुझे शहर पहुचाया है.
तुझसे बिछडने की न बात करते है हम किसी से, हर घडी़ तुझे दिल मे समाये रखते है.

तेरी गोद मे जब खेला करता था बचपन मेरा,
तेरे प्यार ने हर गम से मुझको दुर रखा था.

तब लगी थी रोटी मे आग उस वक्त,
जब आखो मे घने बादलो का अन्धेरा छाया था,

जब खुली शहर की भीड़ भाड मे आँख मेरी,
तब से और गहरा हो गया है तुझसे नाता मेरा,

आखरी सांस तक जुडा रहेगा, अब तुझसे यह नाता मेरा,
मांफ कर देना मुझे उस वक्त, जब जुड जाये नाता किसी और माँ से मेरा.

सुनदर सिंह नेगी
12/06/2007

                          "हमारा पहाड"
भगवान की सुन्दरता है हमारा पहाड।
हमारे पहाड मे भगवान का निवास सदियो पुराना है और आज भी कायम है।
यही कारण है कि उत्तरांचल को देव भुमी या देवआँचल के नाम से भी जाना जाता है।
भगवान ने हमारे पहाडो को जीतना खुबसुरत बनाया वो वास्तव मे देखने लायक है.
उचे पहाडो से गीरते हुवे झरने, बहती हुई नदियां, हरे भरे पेड़ और हिमालय की अदभुत हिम शोभा,
मन को अपनी ओर हर वक्त खीचती रहती है एक घाटी से दुसरी घाटी की सुन्दरता मन को जोडने की प्रेणा देती है,
क्या नही दिया भगवान ने हमारे पहाड़ को सबकुछ उपहार के रूप मे दिया,
लेकिन दुख कि बात यह है कि हमने इस उपहार को उपहार नही समझा,
पेड पौधे काट कर हमने पयॉवरण को नुकसान तो पहुचाया साथ हि जलाशयो पर भी उसका असर देखने को मिला,
यही नही पेड को काटकर उनके कोयले बनाये और बेच डाले और उसका सीधा असर पडा हमारा जीवन और जलवायु पर.
जीसका असर आज साफ देखने को मिल रहा है।
पानी कि किल्लत, नदियो का सुखना, प्रमुख नदियो का जल स्तर कम होना,
पानी के स्रोतो का सुख जाना, पयॉवरण का दुषित होना.
और भी न जाने कितने नुकसान हमे भविष्य मे होने वाले है,
यह आकलन आने वाला भविष्य खुद बतायेगा।
आज का उत्तरांचल अपने पुवॅजो के घरो पर ताला लगाकर शहरो का रुख करने लगा है
यह एक और दुखद बात लेखक को पिडा़ देती है ऐसा लगता है मानो कि देव भुमी से उनहे नफरत हो गई हो।

दोसतो अब अपनी कलम को यही पर विराम देते हुवे मे यही कहता हु कि

जगह और हैसियत रोटी की किमत बदल देती है।

सुनदर एस नेगी
दिनांक  19/02/07