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Pithoragarh: Kashmir Of Uttarakhand - पिथौरागढ़: उत्तराखण्ड का कश्मीर

Started by पंकज सिंह महर, November 06, 2007, 12:28:14 PM

पंकज सिंह महर

सभ्यता

एक प्राचीन नगर के अनुरूप पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक विरासत समृद्ध है। यह शहर कभी पुस्तक लेखन उद्योग के लिये प्रसिद्ध था। हाथ से लिखे धार्मिक हस्तलिपियों में निपुण कई परिवार इसे उन यात्रियों को बेचा करते थे जो पैदल-कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर इस शहर से गुजरते थे। एक अनुमान के अनुसार आज भी पिथौरागढ़ के आस-पास के गांवों में लगभग 3,000 ऐसी प्राचीन हस्तलिपियां मौजूद हैं। शहर के निकट कुजोली गांव में लौह-अयस्क मिलने के कारण लोगों का लोहे के बर्तनों एवं उपकरणों के उत्पादन में दक्षता प्राप्त करना सुनिश्चित हुआ। पिथौरागढ़ के लोग खुशहाल जीवन जीने के लिये जाने जाते हैं और इसलिये यहां का हर छोटा अवसर भी आनंददायक होता है। चैतोल सामान्य होते हैं, जब स्थानीय देवी-देवताओं को डोलियों या पालकियों में जुलुस में ले जाया जाता है।   

गीत एवं नृत्य

अपने निवास से पहाड़ों की दूरता ने यहां के लोगों को अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा को गीत एवं नृत्य द्वारा संरक्षित रखने में सक्षम बनाया है। अधिकांश नृत्य एवं गीत धार्मिक या लोगों की परंपरागत जीवन-शैली के अनुरूप होते हैं।

प्रत्येक समारोह में लोकगीत एवं लोकनृत्य होते हैं। इस अवसर पर स्थानीय देवी-देवताओं का आह्वान करने के लिये भक्तिपरक गीत एवं जग्गर गान होता है। भीड़ देवों के वशीभूत लोग उन्मादित होकर संगीत की बजती लय पर नाचते हैं। उनमें से कुछ तो आश्चर्यजनक कारनामे कर गुजरते हैं यथा जलते कोयले को खा लेना या गर्म धातु की छड़ों को मोड़ देना। वे लोगों को यह भी बताते हैं कि कैसे हठी एवं कठिन असह्य समस्याओं का समाधान किया जाय।

विवाहों एवं मेलों के अवसर पर किये जाने वाले चोलिया नृत्य में युद्ध कला का प्रदर्शन होता है। इस नृत्य का उद्गम 11वीं सदी में हुआ माना जाता है जब विवाह तलवार की नोंक के बल पर हुआ करता था। दो या इससे अधिक लोग एक हाथ में ढाल तथा दूसरे हाथ में तलवार लेकर विभिन्न आक्रमण तथा बचाव की मुद्राओं को पेश करते हुए ढोल, दामौ, रणसिंघ एवं तुरही की धुन पर थिरकते हैं। पिथौरागढ़ में इस नृत्य को संरक्षित एवं प्रिय बनाये रखने में ललित मोहन कापरी एवं उसके दल का भारी योगदान रहा है।

इसके अलावा एक मनोरंजक नृत्य चांचरी में पुरूष एवं महिलाएं दोनों भाग लेते है जो एक समूह गान एवं नृत्य होता है। जब बच्चा पैदा होता है तो थुल खेल खेला जाता है।

हुरकिया बोल मुख्यत: कृषि कार्यों से संबंधित रहता है। सामूहिक पौधा रोपने एवं धान के खेतों की चौराई के समय एक हुरकिया हूरका बजाते हुए स्थानीय देवी-देवताओं की प्रशंसा में भक्ति संगीत गाता है ताकि वे अच्छी फसल का आशीर्वाद दें जबकि खेतों में कार्य कर रही महिलाएं इस गीत में साथ देती हैं।

यह क्षेत्र लोक साहित्य में काफी समृद्ध है जिसका संबंध स्थानीय/राष्ट्रीय मिथकों, नायकों, नायिकाओं, बहादुरी के कारनामों तथा प्रकृति के विभिन्न पहलुओं से रहता है। गीतों का संबंध पृथ्वी के सृजन, देवी-देवताओं के कारनामों तथा स्थानीय वंशों/नायकों तथा रामायण  एवं महाभारत के पात्रों से होता है। सामान्यत: ये गीत स्थानीय इतिहास की घटनाओं पर आधारित होता है तथा भड़ाऊ सामान्यत: हरकिया बोल जैसे सामूहिक कृषि-कार्यों के दौरान एवं अन्य गीत विभिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्सवों पर गाये जाते हैं।

बोली की भाषाएं
अधिकांश भागों में बोली जाने वाली भाषा अपने भिन्न स्वरूपों में कुमांऊनी ही है। कुमांऊनी देवनागरी लिपि में लिखी एक बोली है जो 10वीं सदी से ही प्रचलित है। इसके अलावा हिंदी तथा थोड़ी-बहुत अंग्रेजी भी बोली जाती है।
वास्तुकला
पिथौरागढ़ के अधिक पुराने घर मोटे पत्थर की दीवारों तथा स्लेट की छत से बने है, जहां उनके रहने की जगह तक पहुंचने के लिये एक संकड़ी लकड़ी का सीढ़ीनुमा ढांचा है। नीचे की मंजिल पर कभी मवेशी रखे जाते थे, पर अब वे भंडार गृह हैं। अब सीमेंट एवं कंक्रीट के ढांचे का ही प्रचलन है जो उत्तर-भारत की तरह ही हैं।

पंकज सिंह महर

समुदाय

पिथौरागढ़ के अधिकांश लोगों के पूर्वज उत्तर-भारतीय मैदानों के हैं जो पीढ़ियों पहले इन पहाड़ियों पर आकर बस गये। उनमें ठाकुर, जिनमें तड़गी, बोहरा, कारकी एवं चौधरी तथा ब्राह्मणों में महाराष्ट्र से आये जोशी तथा राजस्थान के वर्मा प्रमुख हैं। यहां काफी शिल्पकार भी हैं, जिन्हें यहां के मूलवासी कोलों का वंशज माना जाता है। जो यहां के लोगों की प्रमुख आजीविका कृषि एवं पशुपालन ही था और आज भी वही है। चावल, गेहूं, झिंगोरा तथा मडुआ जैसे अन्न यहां के सीढ़ीनूमा खेतों की प्रमुख पैदावार थी तथा खेतों में अधिकांश कार्य महिलायें ही करती हैं क्योंकि पुरूष वर्ग नौकरी की खोज में उत्तर-भारतीय मैदानों में चला जाता है। सीमापार, हिमालयी तराई का व्यापार भी होता था क्योंकि यहां पिथौरागढ़ से तिब्बत जाने के छ: मार्ग थे। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह बंद हो गया।

आज अन्य जिस आजीविका की ओर लोगों का अधिक झुकाव है उनमें सरकारी नौकरी, सेना में भर्ती तथा दूकानें चलाना या पर्यटन संबंधित कार्यों में लग जाना शामिल हैं।

पिथौरागढ़ में धर्मों की लोक कलाओं का परंपरा से पालन किया जाता है। इसमें ऐपन अल्पनाज्यामितिक रूपरेखा की रेखात्मक कला, जिसका इस्तेमाल धार्मिक अवसरों पर या सजावटी उद्देश्य के लिये होता है शामिल हैं। इसमें चावल का पाउडर, लाल छनी-मिट्टी तथा वनस्पति रंगों का उपयोग किया जाता है। अन्य घरेलू हस्तकलाओं में बांस से डोका नामक कलात्मक वस्तु बनाना शामिल है। यह कलात्मक रूप किसी भी शक्ल एवं आकार यथा टोकरियां, सपाट ट्रे या बैलों एवं गायों के लिये मुंह की जाली का हो सकता है। प्राचीन समय में पुस्तक लेखन तथा धातु कार्य एक प्रिय पेशा था। अब वे कार्य नहीं किये जाते। वर्तमान 10वीं सदी का एक प्रिय कवि धरम दास पिथौरागढ़ में रहते थे।

पंकज सिंह महर

पर्यावरण

पिथौरागढ़ को प्राय: लघु कश्मीर कहा जाता है जो इसके प्राकृतिक सुंदरता के कारण ही है। मात्र 5 किलोमीटर लंबा तथा 2 किलोमीटर चौड़ी सौर घाटी में अवस्थित यह शहर त्रिशूल, नंदा देवी एवं पंचुली समूहों के शिखरों का अपूर्व दृश्य प्रस्तुत करता है। पिथौरागढ़ तिब्बत एवं नेपाल के बीच में है तथा यह चार पहाड़ियों– चांडक, ध्वज, थल केदार एव कुंदार– से घिरा है तथा जिनका अपना सौंदर्य अपूर्व है।
 

वर्ष 1841 में इस क्षेत्र में आने वाला प्रथम अंग्रेज बैरोन लिखता है, "पिथौरागढ़ की प्रथम दर्शन ही स्तब्ध कर देता है तथा आप जब चांडक मार्ग के शिखर पर जाते हैं तो एक चौड़ी घाटी सामने आती है जहां एक साफ एवं छोटी सैनिक छावनी, एक किला तथा फैले गांव तथा नीचे उतरते झरने हैं, जो हजारों-हजार जुते खेतों को उर्वरता शक्ति प्रदान करते हैं।.... मैं मानता था कि नैनीताल का सौंदर्य अब समाप्त हो गया है पर मुझे अब पता चला कि मैंने अपने जीवन में इससे ज्यादा बड़ी भूल कभी नहीं की है।"


वनस्पतियां

पिथौरागढ़ हरी पहाड़ियों से घिरा है जहां घने देवदार तथा सदाबहार पेड़ों के जंगल हैं। पास के क्षेत्रों में आडू, नाशपाती, सेव, बेर तथा खूबानी फलों के पेड़ प्रचुर हैं। उर्वर भूमि का इस्तेमाल धान की चबूतरी खेती में होता है। इस मनोहर शहर के इर्द-गिर्द की पहाड़ियों पर बीच-बीच में स्ट्रॉबेरी, येलोबेरी तथा ब्लेक बेरी की झाड़ियां हैं।

जीव-जन्तु
तेंदुए, हिरण, बंदर तथा लंगूर आस-पास के जंगली इलाकों में देखे जाते हैं। तीतर, गौरेये, स्विफ्ट, सारिकाएं एवं शिकारी पक्षी, ड्रोगो कक्कू तथा कोयल पक्षी जीवन के अंग हैं।

पंकज सिंह महर

महाराजा पार्क एवं शहीद वाटिका

पिथौरागढ़ की छावनी की सुंदर भूमि पर यह पार्क उन बहादुर सैनिकों की स्मृति को समर्पित है जिन्होंने देश के लिये अपने प्राण न्योछावर कर दिये। यह आस-पास के पर्वतों का मनोरम दृश्य भी दिखाता है।

साहसिक खेल

अगर आपकी रूचि बाह्य खेलों में हो तो पिथौरागढ़ से हैंग ग्लाईडिंग, पैराग्लाईडिंग, ट्रेकिंग, स्कीईंग, कैनोईंग, रीवर राफ्टिंग एवं फीशिंग (मछली पकड़ना) की जा सकती हैं। प्रकृति-प्रेमियों तथा वन्य-जीवन उत्साहियों के लिये पिथौरागढ़ के घने जंगलों के बीच विचरण करना सहज है, जहां आप तेंदुए, कस्तूरी मृग, मोरनी आदि देख पायेंगे।

पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर

प्रसिद्द कवि श्री गिरीश तिवारी "गिर्दा" की नजर से पिथौरागढ़
http://www.youtube.com/watch?v=Y6gfqY32JZo

पंकज सिंह महर

Mostamanu :   

Some six Km. by  bus and  then 2 Km. on  foot  to  the north of Pithoragarh  is situated  the temple dedicated  to  Mosta God. The
temple premises are a center of a big lively fair held in August  - September every year.


http://www.youtube.com/watch?v=JCNdSF6SuQE

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



I was discussing about Pithogargh withsome yesterday. It is said that in view of location, Pithogarh is simliar to Sringar (Kashmir).


पंकज सिंह महर

Quote from: M S Mehta on November 13, 2007, 01:34:42 PM


I was discussing about Pithogargh withsome yesterday. It is said that in view of location, Pithogarh is simliar to Sringar (Kashmir).



मेहता जी, इस लिंक को देखें आपको पता लग जायेगा कि इसे कश्मीर क्यों कहा जाता है
http://www.wikimapia.org/#lat=29.576144&lon=80.221653&z=13&l=0&m=a&v=2

enjoy.......

पंकज सिंह महर