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Shailesh Matiyani,great Writer - शैलेश मटियानी, उत्तराखंड में जन्मे साहित्यकार

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, September 18, 2010, 09:53:28 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था. उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था तथा आरंभिक वर्षों में वे रमेश मटियानी 'शैलेश' नाम से लिखा करते थे. मटियानी जी जब बारह वर्ष (1943) के ही थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया. उस समय वे पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे थे.

चाचाओं के संरक्षण में परिस्थितियां कुछ ऐसी विलोम हो गई कि उन्हें पढ़ाई छोड़ बूचड़खाने तथा जुए की नाल उघाने का नाम करना पड़ा.  इसी दौरान पांच सालों के बाद वे किसी तरह पढ़ाई शुरू करके मिडिल तक पहुँचे और काफी विकट परिस्थितियों के बावजूद हाईस्कूल पास कर गए.  लेखक बनने की उनकी इच्छा बड़ी जिजीविषापूर्ण थी. अल्मोड़ा के घनघोर आभिजात्य के तिरस्कार से तंग आकर वे 1951 में दिल्ली आ गए और 'अमर कहानी' के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके.  'अमर कहानी' और 'रंगमहल' से उनकी कहानी तब-तक प्रकाशित हो चुकी थी. इसके बाद उन्होंने साहित्य की उर्वर भूमि इलाहाबाद जाने का निश्चय किया.  इसके लिए पैसे की व्यवस्था उन्होंने 'अमर कहानी' के लिए 'शक्ति ही जीवन है' (1951) और 'दोराहा' (1951) नामक लघु उपन्यास लिखकर की.  इलाहाबाद में शमशेर बहादुर खां को छोड़कर क्षितींद्र और सुमित्रानंदन पंत सभी ने उन्हें दुत्कारा. उसके बाद उन्होंने इलाहाबाद छोड़ दिया और मुजफ्फरनगर में एक सेठ के घर घरेलू नौकर का काम किया.  फिर दिल्ली आकर कुछ समय रहने के बाद वे बंबई चले गए.  फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें फुटपाथों पर सोना, फेंके हुए भोजन खाना, खून बेचना, भिखांड़यों की पंगत में बैठना जैसे कई अनुभवों से गुजरना पड़ा. 1956 में श्रीकृष्ण पुरी हाउस में प्लेटें साफ करने का काम मिला और अगले साढ़े तीन साल तक वे वहीं रहे और लिखते रहे. बंबई से फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए वे इलाहाबाद आ गए और फिर कई वर्षों तक यहीं रहे. उन्होंने 'विकल्प' और 'जनपक्ष' पत्रिका भी निकाली.  अपने छोटे बेटे की मृत्यु के बाद (1992) में उनका मानसिक संतुलन डगमगा गया. 1992 में कुमाऊं विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया.  जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गए. विक्षिप्तता की स्थिति में उनकी मृत्यु 24 अप्रैल 2001 को दिल्ली के शहादरा अस्पताल में हो गई .

मटियानी जी में बचपन से ही एक लेखक बनने की धुन थी जो विकट से विकटतर परिस्थितियों के बावजूद न टूटी. 1950 से ही उन्होंने कविताएं, कहानियां लिखनी शुरू कर दी परंतु अल्मोड़ा में उन्हें उपेक्षा ही मिली. हालांकि मटियानी जी ने आरंभिक वर्षों में कुछ कविताएं भी लिखी परंतु वे मूलत एक कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए. अगर विश्वस्तरीय प्रमुख कहानियों की सूची बनाई जाए तो उनकी दस से ज्यादा कहानियां सूची में शामिल होंगी. उनकी आरंभिक पंद्रह-बीस कहानियां 'रंगमहल' और 'अमर कहानी' पत्रिका में छपी थी. उनका पहला कहानी संग्रह 'मेरी तैंतीस कहानियां'(1961) के नाम से संग्रहित हैं. मटियानी जी की कालजयी कहानियां में 'डब्बू मलंग', 'रहमतुल्ला', 'पोस्टमैन', 'प्यास और पत्थर', 'दो दुखों का एक सुख', 'चील', 'अर्द्धांगिनी', ' जुलूस', 'महाभोज', 'भविष्य', और 'मिट्टी' आदि प्रमुख हैं.  'डब्बू मलंग' एक दीन-हीन व्यक्ति की कथा है जिसे कुछ गुंडे पीर घोषित कर लोगों को ठगते हैं. 'रहमतुल्ला' कहानी सांप्रदायिक स्थितियों पर कठोर व्यंग्य है.  'चील' मटियानी जी की आत्मकथात्मक कहानी है जिसमें भूख की दारूण स्थितियों का चित्रण है. 'दो दुखों का एक सुख' मैले-कुचैले भिखाड़ियों की जीवन की विलक्षण कथा है. 'अर्द्धांगिनी' दांपत्य सुख की बेजोड़ कहानी है. एक कहानीकार के रूप में वे नई कहानी आंदोल के सबसे प्रतिबद्ध कहानीकार हैं. जिन्होंने बजाय किसी विदेशी प्रभाव के अपने मिट्टी की गंध और विशाल जीवन अनुभव पर अपनी कहानी रची है.  'दो दुखों का एक सुख'(1966), 'नाच जमूरे नाच', 'हारा हुआ', 'जंगल में मंगल'(1975), 'महाभोज'(1975), 'चील' (1976), 'प्यास और पत्थर'(1982), एवं 'बर्फ की चट्टानें'(1990) उनके महत्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं. 'सुहागिनी तथा अन्य कहानियां'(1967), 'पाप मुक्ति तथा अन्य कहानियां'(1973), 'माता तथा अन्य कहानियां'(1993), 'अतीत तथा अन्य कहानियां', 'भविष्य तथा अन्य कहानियां', 'अहिंसा तथा अन्य कहानियां', 'भेंड़े और गड़ेरिए' उनके अन्य कहानी संग्रह हैं.
मटियानी जी ने कई उपन्यास भी लिखे हैं.  'हौलदार'(1961), 'चिट्‌ठी रसेन'(1961), 'मुख सरोवर के हंस', 'एक मूठ सरसों'(1962), 'बेला हुई अबेर'(1962), 'गोपुली गफूरन'(1990), 'नागवल्लरी', 'आकाश कितना अनंत है' आदि उपन्यासों में वे उत्तराखंड के जीवन और अनुभव को रचना क्षेत्र के रूप में चुनते हैं. 'बोरीबली से बोरीबंदर', बंबई की वेश्याओं के जीवन पर आधारित एक आर्थिक उपन्यास है.  'भागे हुए लोग' , 'मुठभेड़'(1993), 'चंद औरतों का शहर'(1992) पूरब के व्यापक हिन्दी क्षेत्र पर लिखा उपन्यास है.  गरीबों के दमन-शोषण पर आधारित 'मुठभेड़' के लिए उन्हें हजारीबाग, बिहार के फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार 1984 से सम्मानित किया गया.  'किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई ', 'सावित्री', 'छोटे-छोटे पक्षी' , 'बावन नदियों का संगम', 'बर्फ गिर चुकने के बाद', 'कबूतरखाना'(1960), 'माया सरोवर' (1987) और 'रामकली' उनके अन्य उपन्यास हैं.

आर्थिक और सामाजिक रूप से शोषित-दलित वर्ग उनकी कहानियों के केन्द्रीय पात्र हैं.  लेकिन काफी संख्या में उनके संस्मरण और निबंध संग्रह भी प्रकाशित हैं.  'मुख्य धारा का सवाल' , 'कागज की नाव'(1991), 'राष्ट्रभाषा का सवाल' , 'यदा कदा', 'लेखक की हैसियत से' , 'किसके राम कैसे राम'( 1999), 'जनता और साहित्य' (1976), 'यथा प्रसंग' , 'कभी-कभार'(1993) , 'राष्ट्रीयता की चुनौतियां'(1997) और 'किसे पता है राष्ट्रीय शर्म का मतलब'(1995) उनके संस्मरणों तथा निबंधों के संग्रह हैं. पत्रों का संग्रह 'लेखक और संवेदना'(1983) में संकलित है. मटियानी जी को उत्तर प्रदेश सरकार का संस्थागत सम्मान, शारदा सम्मान, देवरिया केडिया सम्मान, साधना सम्मान और लोहिया सम्मान दिया गया.

उनकी कृतियों के कालजयी महत्व को देखते हुए प्रेमचंद के बाद मटियानी का नाम लिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. खुद पहाड़ सी पीड़ा झेलकर पहाड़ की पीड़ा को दुनिया के सामने लाने वाले महान साहित्यकार शैलेश मटियानी की धर्मपत्नी आज बेबसी में जीने को मजबूर हैं। हमारी पूर्ववर्ती सरकारें उत्तराखंड के प्रेमचंद कहे जाने वाले शैलेश को तो ताउम्र सम्मान न दे सकीं। उनके परिजनों का सम्मान कर शायद इस गलती को सुधारा जा सकता था लेकिन ऐसा भी न हुआ। प्रदेश के तमाम नेताओं के आश्वासनों के बावजूद स्व. मटियानी के परिवार की सुध नहीं ली गई। सरकार ने मदद के नाम पर कभी एक लाख रुपये दिए थे। इससे ही शैलेश की पत्नी नीला मटियानी ने घर बनाने लायक जमीन खरीदी और किसी तरह अपने पल्ले से पैसा लगाकर एक मकान बनवाया। इस मकान की हालत भी अब खस्ता है। इसी जर्जर भवन में नीला अपने पति की कुछ पुरानी किताबों के साथ रहती हैं।

मुख के सरोवर, आकाश कितना अनंत है, बावन नदियों का संगम, मुठभेड़ जैसे उपन्यास लिखने वाले मटियानी शायद देश के अकेले ऐसे साहित्यकार होंगे जिसने जो जीया वही लिखा। अल्मोड़ा के छोटे से गांव बाड़ेछीना से निकलने वाले इस शख्स ने जिन संवेदनाओं के साथ पहाड़ की पीड़ा को साहित्य में बुना वहीं दर्द मुंबई के मामले में भी उनके साहित्य में दिखता है। इसके बावजूद ये महान साहित्यकार हमेशा मुफलिसी में जीया। शैलेश चले गए लेकिन परिवार के हालात नहीं बदले। शैलेश की दुख-सुख की साथी रही नीला हल्द्वानी की श्याम विहार कालोनी में ऐसे जर्जर मकान में रहती हैं जहां हल्की सी बारिश में घर तालाब बन जाता है और नीला को हर बरसात में अपने पति की यादों को बचाने के लिए एक संघर्ष करना पड़ता है। घर में पड़ी दरारें बताती हैं कि हम अपनी विभूतियों को लेकर कितने संवेदनशील हैं। अब नीला मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई है। उन्होंने स्व. मटियानी की साहित्य सामग्री को स्कूल कालेजों और महाविद्यालयों में लगवाने की भी मांग की है। मकान की मरम्मत कर उसमें दोमंजिला बनाने की दरकार की है ताकि वह एक हिस्से को किराए पर देकर अपना भरण पोषण कर सकें ।

(स्रोत -संगीता कुमारी एवं अमर उजाला )

Risky Pathak

कुमाऊं के प्रेम चंद कहे जाने वाले महान साहित्यकार स्व. शैलेश मटियानी को उनकी ग्यारहवीं पुण्यतिथि पर साहित्यकारों ने भी भुला दिया। पिछले 10 वर्षों तक आठ-दस लोग बैठकर उनके नाम पर बैठक कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते थे लेकिन इस बार उन्हें याद करने की जहमत किसी साहित्यिक संगठन ने नहीं उठाई।
शैलेश मटियानी ने अपने साहित्य में पहाड़ की पीड़ा को दुनिया के सामने रखा। देश के महान साहित्यकारों में शुमार स्व. मटियानी की पत्नी सरकारी उपेक्षा के चलते बेबसी का जीवन जीने को मजबूर हैं लेकिन उनको सहारा देने के लिए भी साहित्यकार आगे नहीं आए। साहित्यकारों को चाहिए था कि शैलेश के साहित्य को उत्तराखंड में प्रकाशित कर उसे विद्यालयों, महाविद्यालयों में लगाने की पहल की जाती ताकि उनकी पत्नी को भरण पोषण का एक आधार तो मिल जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बाड़ेछीना के एक छोटे से कस्बे से निकले इस साहित्यकार ने देश के महान साहित्यकारों में स्वयं को स्थापित किया। इसके बावजूद वह हमेशा मुफलिसी में जिये। उनको किसी भी सरकार ने तवज्जो नहीं दी। साहित्य सृजन के क्षेत्र में काम करने वाले मटियानी के नाम पर शुरू किया गया पुरस्कार भी शिक्षा के क्षेत्र में दिया जा रहा है जबकि इसे साहित्य के क्षेत्र में दिया किया जाना चाहिए था।
स्थानीय साहित्यकार दिवाकर भट्ट, दिनेश कर्नाटक और प्रयाग जोशी स्व. मटियानी के नाम पर कोष शुरू कर उनके परिवार की माली हालत को बचाने की बात तो करते हैं लेकिन वह स्वयं पहल करने के बजाए सरकार से इसकी पहल करने की बात कहते हैं। आज मंगलवार को उनकी ग्यारहवीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए किसी भी साहित्यकार ने पहल नहीं की।

Source: Amar Ujala

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

होंठ हँसते हैं,
मगर मन तो दहा जाता है
सत्य को इस तरह
सपनों से कहा जाता है ।

खुद ही सहने की जब
सामर्थ्य नहीं रह जाती
दर्द उस रोज़ ही
अपनों से कहा जाता है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Shailesh Matiyani

खंडित हुआ
ख़ुद ही सपन,
तो नयन आधार क्या दें
नक्षत्र टूटा स्वयं,
तो फिर गगन आधार क्या दे

जब स्वयं माता तुम्हारी ही
डस गई ज्यों सर्प-सी
तब कौन
तपते भाल पर
चंदन–तिलक-सा प्यार दो !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गीत को
उगते हुए
सूरज-सरीखे छंद दो
शौर्य को फिर
शत्रु की
हुंकार का अनुबंध दो ।

प्राण रहते
तो न देंगे
भूमि तिल-भर देश की
फिर
भुजाओं को नए
संकल्प-रक्षाबंध दो !

By Shailesh Matiyani.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लेखनी धर्म / शैलेश मटियानी

शांति से
रक्षा न हो,
तो युद्ध में
अनुरक्ति दे

लेखनी का
धर्म है,
युग-सत्य को
अभिव्यक्ति दे !

छंद-भाषा-भावना
माध्यम बने
उद्घोष का

संकटों से
प्राण-पण से
जूझने की शक्ति दे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नया इतिहास / शैलेश मटियानी
अभय होकर
बहे गंगा,
हमें विश्वास देना है
हिमालय को
शहादत से
धुला आकाश देना है !

हमारी
शांतिप्रियता का
नहीं है अर्थ कायरता-
हमें फिर
ख़ून से लिखकर
नया इतिहास देना है !