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Poems,Songs Lyric,Articles by Vinod Jethuri - विनोद जेठुडी जी की कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 13, 2011, 02:30:27 PM

Vinod Jethuri

वापस मुझे मेरी खुशी दे देना


ना रही और लडने की  हिम्मत,
ना रही कुछ पाने की तम्मना...
जो भी पाया उसमे ही खुश था,
जादा खुशी का मुझे क्या है करना ?
दी हुयी चिजो को वापस लेना,
ये कंहा का है दस्तूर तेरा ????
भगवान तेरे दर पे आया हूं,
वापस मुझे मेरी खुशी दे देना...!

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी, 10 सितम्बर  2010 @ 11:24 AM

Vinod Jethuri

               मुक्कदर


पाने को इनाम अपना, कुछ भी कर लेन्गे...
कभी सोचा ना था मैने, येसे भी दिन देखने पडेन्गे.
कि मन्जिल पा चुका था मै अपनी लेकिन....
मुक्कदर हमसे हमारा इनाम, वापस छीन लेन्गे..

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी, 10 सितम्बर 2010 @ 10:57 AM

Vinod Jethuri

        गमो का सागर


गमो के सागर मे गोते खाये जा रहा हूं
दुखो की लहरो से टकराये जा रहा हूं
उफ़्फ़ कितना दर्दभरा है ये सफ़र..
फिर भी मन्जिल पाने की आस मे... 
आघे बढा जा रहा हूं.......॥

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी, 10 सितम्बर 2010 @ 10:32 AM

Vinod Jethuri

              प्रेम दिवस के दोहे


प्रेम दिवस के प्रेम पर्व पर, प्रेम का बस करें गुणगान ।
सच्चे मन से हों समर्पित, सदा सबका करें सम्मान ।।

ईर्श्या क्रोध ना कभी पनपे मनमे, किसी का कभी ना करें अपमान ।
प्रेम का दिलो मे दीप जले जंहा, वंहा बसते है भगवान ।।

परोपकार मे बनो धनी इतना कि, तुम से बडा ना कोइ धनवान ।
दया हर प्राणी से करें और, बढे  सतकर्मो से स्वाभिमान ।।


सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी, २०११
13 फ़रवरी 2011 @ 23:45

Vinod Jethuri

   दिपावली की हार्दिक सुभकामनायें


सुख  शान्ति और सम्रधी की करता हूं कामना
पुरी हो आपकी सभी मनोकामना..
दीपो के इस पावन पर्व पर आप सभी को..
सपरिवार दिवाली की हार्दिक सुभकामना..
                                 
विनोद जेठुडी, ४  नवम्बर २०१० @ २३:३३ 

Vinod Jethuri

मै तडप रहा हूँ रो रहा हूँ


वह भी खुश थी....
मै भी खुश था....!
एक दुसरे को पाके.....
जो भी मांगा था रब से..
वह पाया था उसमे....
बडे-बडे सपने देखे थे..
साथ जिन्दगी बिताने के
उड गये सारे सपने...
एक हवा के झोके से..!
हवा का झोँका कुछ यों आया...
कि अन्धविस्वासो की लहर मे,
मेरी सारी खुशीया ले गया....
मै तडप रहा हूँ, रो रहा हूँ...!
किसे अपनी सुनाँऊ... ?
जिसे सुनाना भी चाहुँ पर
उसे निन्द से कैसे उठाऊ ?
अर्धरात्री हो चुकी है...
नीन्द मुझे क्यों न आती ?
उसको भूलना तो चाँहु पर..
उसकी यांदे दिल से ना जाती..
कुछ सोचता हूँ, समझता समझता हूँ..
यो ही अपने दिल को, 
मनाये जा रहा हूँ.....
अगर ओ ना मिली जो तो..!
उसके बिना कैसे जी पाऊ ?

8 सितम्बर 2010 @ 23:38 PM
सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी

Vinod Jethuri

     सच्ची प्रेमी

प्रेम पुजारी प्रेम  दिवानी........
प्रेम की एक छोटी सी कहानी...!
इन्तजारी मे, बैठी है किसी की..
पास मे नदी का, बहता पानी....!!

गया था कोइ उसे छोडकर..
फिर न देखा पिछे मुडकर...!
अन्त मिलन कि जगह येही है...
पार गया ओ, सात समुन्दर....!!

हर दिन ओ यंहा है आती..
कुछ समय अपना बिताती..!
मन का बोझ हल्का होता..
शायद अपने मन को बहलाती..!!

हाय ये कैसी प्रेम मजबुरी ?
फुट-फुट कर कभी ओ रोती..!
प्रेम के रन्ग का पी गयी पानी
जैसे क्रिष्ण के रंग मे राधा दिवानी..!!

प्रेम पुजारी प्रेम दिवानी
प्रेमी कोई ना देखी येसी..!
तडप रही है, झुलस रही है
फिर भी उसको ना भुल पाती..!!

"प्रेम की पुजारी, प्रेम की दिवानी
प्रेम की एक  सच्ची कहानी........
ईन्तजारी मे, बैठी है किसी की..
पास मे नदी का, बहता पानी...."

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी

Vinod Jethuri

काश एक समान हर कोई होता..


काश जो दुनिया मे येसा होता.!
एक समान हर कोई होता....
रोड पे ना कोई भुखा मरता!...
पैसे कि क्या होती किमत ??
क्या जाने ओ.........
जो कोई महलो मे है रहता..
और कोई......!!!!
बिन खाये शाम कि रोटी
खुले आशमान के निचे सोता....
काश जो दुनिया मे येसा होता.!
एक समान हर कोई होता...
सोचो फिर दुनिया कैसे होता ?
एक समान हर कोई होता...

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी

Vinod Jethuri

जिन्दगी का क्या भरोशा ?

शनिवार २२ मई २०१० की सुबह मैन्गलोर मे ईयर ईन्डिया येक्सप्रेश के विमान दुर्घटना मे अपनी जान गवाने वाली यात्रियो के प्रति श्रधान्जली व उनके परिवार के प्रति सवेदना, भगवान उनके परिवार को ईस दुख: को सहने कि शक्ति प्रदान करें ।

परिवार मे खुशी मना रहे थे
तीन साल बाद ओ आ रहे थे
बहन की शादी के कपडे भी
यही से लेके जा रहे थे....!
उपर से खुबसुरत नजारे..
उन्होने जब देखे होन्गे..!
क्या सोचा होगा मन मे...
हम अपने देश जो पहुन्चें...
आते आते मुड गयी राहें...
कहां जाना था कहां जा पहुचें ?
लेने आये थे उनको कोई....!
उनकी राहें देखते रह गये..
धुं-धुं कर जल रहे थे.....
जोर जोर से चिख-चिल्लाते
पर कौन उन्हे बचाने आते
कैसां मंजर रहा होगा ओ..?
जब जल रहे थे उसमे सारे

"क्या पता कब क्या हो जाये...
जिन्दगी का क्या भरोशा ?????
प्यार-प्रेम से हम सब रहें.........
अति लोभ-ईर्श्या करें ना गुस्सा..! "

Vinod Jethuri

            जिन्दगी एक गाडी


एक दिन औफिस जाते हुये मै रास्ते मे रुक गया और गाडियो को देखने लगा.. देखते ही देखते मेरे मन मे एक ख्याल आया.. और ओ ख्याल कविता के रुप मे आपके सम्मुख प्रस्तुत है:-

तेज दौडती गाडी को देखा...
तो जिन्दगी का ख्याल आया...!
जिन्दगी भी तो एक गाडी है दोस्तो..
जिसे मैने बहुत तेजी से दौडते पाया....

चलती गाडी से पिछे, मुडके जब मैने देखा..
मोह माया की दौड मे, सबको दौडते पाया.....!
क्या पता कब रुक जाय, सफ़र ईस गाडी का..?
क्योकि कब किसपे से हटा दे, ओ मालिक अपनी साया..

पुन्य, दया, धर्म के रास्तो को, सदा खाली पाया....
कोर्ध,ईर्श्या,लोभ,माया के रास्तो पर, बडा जाम पाया..!
खाली रास्तो पर होगा कठिन, भीड मे आसान चलना.
न भर्मित हों हम रास्तो से, सभी को वही है जाना....

दुख: सुख: के पहियों पे, गाडी को है चलना...
कभी सर्दी तो कभी गर्मी, कभी मौसम बेगाना..
क्या लेके थे आये, क्या लेके है जाना....?
दया धर्म का मुल है, यही सबसे बडा खजाना

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी