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Didihat District Uttarakhand डीडीहाट- उत्तराखण्ड का एक सुन्दर हिल स्टेशन।

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, August 24, 2011, 10:45:11 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

डीडीहाट: डीडीहाट जिला घोषित होने पर क्षेत्र में अब भी जश्न का माहौल बना हुआ है। जिला बनने की खुशी में जगह-जगह आतिशबाजी हो रही है । 22 अगस्त को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विशन सिंह चुफाल के डीडीहाट आगमन पर भव्य समारोह होगा।स्वतंत्रता दिवस पर सीमान्त डीडीहाट जिले की घोषणा के बाद डीडीहाट क्षेत्र में खुशी का माहौल बना हुआ है। मौसम खराब होने के बाद भी क्षेत्र में आतिशबाजी और मिष्ठान वितरण हो रहा है। अब लोगों को शीघ्र जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की तैनाती की प्रतीक्षा है। डीडीहाट के विधायक एवं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विशन सिंह चुफाल 22 अगस्त को डीडीहाट पहुंच रहे हैं। जिले की घोषणा से उत्साहित जनता द्वारा श्री चुफाल का जोरदार स्वागत करने तथा इस मौके पर भव्य आयोजन की तैयारी चल रही है।
सीमान्त जिले की घोषणा को क्षेत्र की जनता के संघर्ष की जीत बताया जा रहा है। वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी देव सिंह डसीला ने जिले की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि डीडीहाट सीमान्त जिला बनने से क्षेत्र का विकास होगा।




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डीडीहाट में इस बार भव्य होगा मां नंदा महोत्सव
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खेल, ठुलखेल और चांचरी होंगे मुख्य आकर्षण

चार दिवसीय महोत्सव का चुफाल करेंगे उद्घाटन

जागरण कार्यालय, डीडीहाट: डीडीहाट जिले बनने की खुशी में इस बार मां नंदा महोत्सव का आयोजन भव्य रूप से किया जायेगा। जिसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही है। मेले में खेल, ठुलखेल, चांचरी मुख्य आकर्षण होंगी। 2 सितम्बर से शुरू होने वाले इस महोत्सव का उद्घाटन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विशन सिंह चुफाल और समापन सांसद प्रदीप टम्टा करेंगे।

नंदा महोत्सव मेला समिति के तत्वावधान में आयोजित होने वाले चार दिवसीय महोत्सव का उद्घाटन दो सितम्बर को होगा। महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर शिव तांडव नृत्य और आठूं पर्व की प्रस्तुति दी जायेगी। प्रतिदिन विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा। मालूम हो कि डीडीहाट में नंदा महोत्सव विगत 61 वर्षो से आयोजित हो रहा है।

61 वर्ष पूर्व जोहार घाटी मुनस्यारी के लोग पलायन कर तत्कालीन दिगतड़ और वर्तमान डीडीहाट पहुंचे। मल्ला जोहार में मां नन्दा की पूजा अर्चना की जाती थी। इसके बाद डीडीहाट में भी नंदा देवी मंदिर का निर्माण किया गया और नंदाष्ठमी के दिन मेले का रुप दिया जाने लगा।

तीन दिवसीय इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता ढुस्का और चांचरी नृत्य रहता था। इस मेले से प्रभावित होकर डीडीहाट क्षेत्र की जनता ने इसे वृहद रुप देने का निर्णय लिया गया। बीते वर्षो में यह मेला आकर्षक होता गया।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_8138245.html

Risky Pathak


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पुरातत्व विभाग करेगा सर्वेक्षण


थल। पुरातत्व विभाग के जिला प्रभारी डा. डीएन तिवारी ने नौले का सर्वेक्षण कर संरक्षण करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही बरसायत पहुंच कर प्राचीन बावड़ी का अध्ययन करेंगे। इसकी रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।


थल। थल, बेरीनाग, डीडीहाट और बागेश्वर जिले के कांडा-कमेड़ीदेवी क्षेत्र में कभी नागों का आधिपत्य था। इसके अवशेष अब भी देखने को मिल जाते हैं। थल के नजदीक बरसायत गांव में पिंगलनाग नामक एक सदाबहार नौला है, जिसमें पानी कभी भी कम नहीं होता, लेकिन चट्टानों की तलहटी में बने इस नौले के पानी को उपयोग में नहीं लाया जाता। इस इलाके में पुराण वर्णित नागों के 11 मंदिर हैं।


बात नागों की करें तो धरमघर के नजदीक शिखर पर्वत में मूलनाग का विख्यात मंदिर है। नागिलागांव पांखू के पास बासुकीनाग तो जयनगर की चोटी में पिंगल नाग का मंदिर है। बरसायत, कांडेकिरौली और हीपा नामक स्थान पर पिंगल नाग के उप स्थान हैं।

विजयपुर (कांडा बागेश्वर) की चोटी में धौलीनाग, कमेड़ीदेवी (बागेश्वर) में फेणीनाग, बेरीनाग में बेणीनाग, खपरचूला (डीडीहाट) में धुम्रीनाग, नापड़ (तल्लाजोहार) में सुंदरीनाग, पचार (धरमघर) के पास हरिनाग, खरई (बागेश्वर) में खरहरिनाग के प्राचीन मंदिर स्थापित हैं। थल के पास कालीनाग पर्वत में विषधर कालीनाग का प्राचीन मंदिर है। अन्य नाग मंदिरों की तरह ही इस नाग मंदिर में नाग पंचमी को विशेष पूजा की जाती है।


स्कंद पुराण के मानसखंड में नागों का विस्तार से वर्णन है। पिंगलनाग के पुजारी केदार दत्त पंत (77) बताते हैं कि बरसायत की चोटी में बनी पिंगलनाग की बावड़ी (नौला) 800 साल पुरानी है। वह बताते हैं कि प्राचीन समय में उक्त स्थल पर पिंगलाचार्य नामक ऋषि तपस्या कर रहे थे।

दानवों की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाने के लिए ईश्वर ने उन्हें नाग रूप में परिवर्तित दिया। तब से इस इलाके में नागों की पूजा की जाती है। उन्होंने पिंगलनाग के नौले को संरक्षित करने की जरूरत बताई। पिंगलनाग बावड़ी का जल ग्रहण न करने के संबंध में वह कहते हैं कि नाग का नौला होने की वजह से ही इस जल का प्रयोग नहीं किया जाता। ब्यूरो





Amarujala