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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ सपना

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

दूर खडी इमारतों मै
एक अकेलापन दीखता है
साथ जुडी है जिस तरह हम
दिल क दिल से रिश्ता लगता है
एक सपना पलता है .........

सुख से जुडे हम  इस तरह
हर गम अब हल्का लगता है
गरीबी की रेखा के नीचे है हम
पर  हमारा कद अब ऊँचा लगता है
एक सपना पलता है .........

देश की रीढ़ है हम
क्या तुम्हे सब सपना लगता है ?
छुटे घर हैं पर दिल है बड़ा
अब सब कुछ अपना लगता है 
एक सपना पलता है .........

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

Bhishma Kukreti

Dear Dhyani Jee
You have potentiality for writing good peoms
You should find new subjects as palayan etc are old ones
Kedarnath ... Har keepaidi is good example for bringing newness in the Garhwali poems
I request you to think new subjects tahn the subjects which are already in garhwali poetry worls
No doubt,  poems are good

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ

सपना

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

दूर खडी इमारतों मै
एक अकेलापन दीखता है
साथ जुडी है जिस तरह हम
दिल क दिल से रिश्ता लगता है
एक सपना पलता है .........

सुख से जुडे हम इस तरह
हर गम अब हल्का लगता है
गरीबी की रेखा के नीचे है हम
पर हमारा कद अब ऊँचा लगता है
एक सपना पलता है .........

देश की रीढ़ है हम
क्या तुम्हे सब सपना लगता है ?
छुटे घर हैं पर दिल है बड़ा
अब सब कुछ अपना लगता है
एक सपना पलता है .........

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ चल आज

चल आज गढ़ लोंटी जओंला
रीटा डाणड़ रीटा गों मा बुओडी जओंला
दाणी आंखी बाट हेरणी वहाली
तो आंखी मा धीर बंधी दयुन्ला
आज पहाडा जओंला .........

उजाड़ पडी हमरी भुमी
कणड़ पडी हमरी खुठी
हीटाद हीटाद ईत्गा हीटगयुं
जीकोडी की भैर या भीतर
अब बल मी सोचता रैह्गु   
आज पहाडा जओंला .........

माया  का पीछा भगदा भगदा
मण ड़ोर कूल्हण लोकिंग्युं
बिरला कुकर सी जात ये मणस
ओंक बिरादरी से मी भैर हुग्युं
जब चैत आयी मी थै अब बुओडी जओंला
आज पहाडा जओंला .........

चल आज गढ़ लोंटी जओंला
रीटा डाणड़ रीटा गों मा बुओडी जओंला
दाणी आंखी बाट हेरणी वहाली
तो आंखी मा धीर बंधी दयुन्ला
आज पहाडा जओंला .........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ सपना

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

दूर खडी इमारतों मै
एक अकेलापन दीखता है
साथ जुडी है जिस तरह हम
दिल क दिल से रिश्ता लगता है
एक सपना पलता है .........

सुख से जुडे हम  इस तरह
हर गम अब हल्का लगता है
गरीबी की रेखा के नीचे है हम
पर  हमारा कद अब ऊँचा लगता है
एक सपना पलता है .........

देश की रीढ़ है हम
क्या तुम्हे सब सपना लगता है ?
छुटे घर हैं पर दिल है बड़ा
अब सब कुछ अपना लगता है 
एक सपना पलता है .........

एक सपना पलता है
गुल वो अपना खिलता है
रहते झुगी बस्ती मै पर
हमसे ही देश चलता है
एक सपना पलता है ........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ चल आज

चल आज गढ़ लोंटी जओंला
रीटा डाणड़ रीटा गों मा बुओडी जओंला
दाणी आंखी बाट हेरणी वहाली
तो आंखी मा धीर बंधी दयुन्ला
आज पहाडा जओंला .........

उजाड़ पडी हमरी भुमी
कणड़ पडी हमरी खुठी
हीटाद हीटाद ईत्गा हीटगयुं
जीकोडी की भैर या भीतर
अब बल मी सोचता रैह्गु   
आज पहाडा जओंला .........

माया  का पीछा भगदा भगदा
मण ड़ोर कूल्हण लोकिंग्युं
बिरला कुकर सी जात ये मणस
ओंक बिरादरी से मी भैर हुग्युं
जब चैत आयी मी थै अब बुओडी जओंला
आज पहाडा जओंला .........

चल आज गढ़ लोंटी जओंला
रीटा डाणड़ रीटा गों मा बुओडी जओंला
दाणी आंखी बाट हेरणी वहाली
तो आंखी मा धीर बंधी दयुन्ला
आज पहाडा जओंला .........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ पहाडा की दाणी

देखा पहाडा की दाणी....२
कदग रौतेली स्वाणी 
टोपला धरैकी  मुंडमा बाड़ा
क्या पीड़ा तु छुपाणी 
देखा पहाडा की दाणी....२

अंखी तेरी छुयीं लगाणी
गीचडी हंसैकी क्या जाताणी
उमली बदला फिरणा वाला
जीकोड़ी भीतरी गडगडणा वाला
देखा पहाडा की दाणी....२

कपाली रेघ क्या बताण आजा
खैरी विपदा कुच ये भाग
बोये उजाडु महीनु कु साथ
बाबा कब आलु ये गढ़ प्रभात
देखा पहाडा की दाणी....२

रीटा रीटा  हेर हेर
डाणडी कणडी मा डैर डैर
को भग्याण आलों
चकोली बणकी बाणम   
गढ़ छुडीकी सब उड़गै भैर भैर
देखा पहाडा की दाणी....२

चिंता चिंता अब घैर घैर
शाम सबेर भीतर भैर
कभी मैला सैर कभी तैल सैर 
कभी पुंगडा कभी डाणड़ घैल
यणी फिरणु मी मैल मैल   
देखा पहाडा की दाणी....२

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ हीटले

हीटले हीटले
दागड़या दागडी दागडी हीटले
हाक दे दे म्यार बातों मा
घसा को बण्डल मोंडमा मा धरी
इन ऊँचा निशा डाणड़युं  मा
हीटले हीटले .....२

गढ़वाली गीत लगे दे
इन उकला उन्दारू बाटों मा
मेर स्वामी थै याद दिला ये 
ये घुघूती हीलंसा तों डालीयुं
प्युंली बुरंस खीलां ये अन्ख्न्युं मा   
हीटले हीटले .....२

सर सर सरले ये सरला
इन्ण णा  पैजाण बजा बाटों मा
ब्योखनी को घाम सरेण लगे
चों डाणडा पोर गदनीयुं सरीयुं मा   
सारा लाग्यां वाला सब आयी कीले णा घरमा
हीटले हीटले .....२

दागड़या दागडी दागडी हीटले
हाक दे दे म्यार बातों मा
घसा को बण्डल मोंडमा मा धरी
इन ऊँचा निशा डाणड़युं  मा
हीटले हीटले .....२

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ दो छोर

नदी के दो छोर संग संग
कितने अलग कितने दुर
बांधे एक दुजे को पतली डोर
एक इस ओर दूजा उस ओर
नदी के दो छोर....................

सागर पर मै मची हलचल
लहरें आती मचल मचलकर
पल पल बदल बदल कर
अटखेली लेती उछाल उछालकर
सागर के दो छोर....................

सूरज चाँद के देहली पर
हर पल एक नयी पहेली
उजाले अंधरे मै ही छिपी
दोनों संग हैं पर बिछाडी सहेली 
प्रक्रति के दो छोर ....................

प्यार ओर बेवफाई का
हर दिन एक नया दस्तूर
ना मेरा कसूर ना तेरा कसूर
ये तु मोहब्बत का सरुर
प्रेम के दो छोर ..........................

जीवन मै देखो कैसा आया मोड़
एक छोर छुड़ने के बाद ही आता है दूसरा मोड़
काठनाईयुं और दुःख छुड़तै आयी सुख की भोर
हो ना जाओं मै भवह विभोर हे आत्म
जीवन और मरण की थी वो डोर............

नदी के दो छोर संग संग
कितने अलग कितने दुर
बांधे एक दुजे को पतली डोर
एक इस ओर दूजा उस ओर
नदी के दो छोर....................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ ये गढ़वाल

दादा दादी
बैठ छन घार
तिबारी दार
सनघुला ताला
माथा कूड़ा देखा
देखा तुम ताल
पूरा गढ़ देश का एक ही हाल
पलायन काण लग्युं इन यान
पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम

बतवा मी थै दीख्वा इन गाम
जख नी पुन्ह्न्छु ये शैतान ण
गव्हाई दिला ये बाटा ये कूड़ा
हकीकत बयां करला ये बोहज्याँ चुलह
कबैर जल्दी छे इन मा भी आगा
कंण फुटयूँ मेर इन भाग्य
देवभूमी छुडी मी भी भागा 
पलायन काण लग्युं इन यान
पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम

रीटा कूड़ा उजड़ा पडू ये  ड़णड़ 
बंजा पड़ा पुंगडा सरयागढ़ धाम
कमधणी नीच बस ध्याड़ी की बात
कण के विपदा को उकल चढ़लू ये गढ़ धाम
खैरी खैरी च यखा और सीयीं छ सरकार
विचार गोष्टी कै की बस बाणगया बात
शीलन्यास करै की  कम चलो होलो परबत
इन मा दीण दिण चली गैनी  कब आलू ओ प्रभात
पलायन  मुक्त होलू मेरु गढ़ धाम
पलायन काण लग्युं इन यान
पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम

भैर भटैक आयां व्यापारी कामदी यख रुपया हजार
यखा का नोजवान बुल्दी हमकोंण दुई चार
उंदर बाट बाट जाकी जब णी बाणी माया बात
वाख जाके तब आयी मेरी भांडी  याद
चुना की रोटी ल्ह्शोंनै  की चटनी को स्वाद
जेकोड़ी मा तब लगी दण मण बरसात 
रहे रहे कीले वहाली याणी बात मेर गढ़ धाम
छुडी जाण तुंम सात समुदर पार
पलायन यो समस्या को नीच समधान
विचार कर ये बात जब तुम जब छुडीला गढ़ताज 
पलायन काण लग्युं इन यान
पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम   

दादा दादी
बैठ छन घार
तिबारी दार
सनघुला ताला
माथा कूड़ा देखा
देखा तुम ताल
पूरा गढ़ देश का एक ही हाल
पलायन काण लग्युं इन यान
पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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