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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

केदार बाबा रात्री

चला भक्तों बाब द्वारी
कैलाश मा बैठ्युं बाबा त्रिशूल धरी

त्रिनेत्र वालो बाबा नीलकंठ मुरारी
सत्यम शिवम् सुंदरम त्रिपुरारी

डम डम डमरू धरी गंगा मस्तक पर विराजत
गले मै माला सर्पोंवाली शम्भु हितकारी

मरघट बाबा मायाल्दु अतिभारी
चन्द्रमा शीश पर सुवै सुतवारी

बमबम भोल्हे बोई पर्वती के स्वामी
दोई बालक गणेश कर्तीकै वे बाबा

भील नाम शिकारी अनजाने दुःख हरी
रात्री भील पता जल शंकर पिंडी अभिषेक चडायु

शंकर महादेव प्रकट भायु कष्ट निवारो
कष्ट निवारो रात्री तब बह्टैक महाशिवरात्री पर्व जन जन मनायु

जय अल्कख बिहारी जय अल्कख बिहारी
हमरी सेवा स्वीकार करू शम्भु दीनदयाला

चला भक्तों बाब द्वारी
कैलाश मा बैठ्युं बाबा त्रिशूल धरी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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सेवमा
सभी भै भैणु
महाशिवरात्री की आप सबको बहुत बहुत शुभ कामनाये . शिव भोले नाथ आप सबको मन की हर मुराद पूरी करे . मेरी केदार बाबा जी से ऐ हाथ जुड़कर पार्थना है . — with प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल and 24 others.Like

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जीकोडी मेरी

किलै वाहलु ...२
धक् धक् ध्क्ध्याट
रग रग राग्याट कणु वाहलु
किलै वाहलु ...२............
सुचणु
गढ़ देश मेरु आज

क्या ये मा दाडी च
सुख दुखा की घड़ी च
यकुली ही लगी च
लगुली जीकोडी भीत्र जमी च
किलै वाहलु ...२............
सुचणु
गढ़ देश मेरु आज

खैरी ऐरै दगडया
झट विपदा दीदी थै बुला
उकालू भुल्हा छुयीं लगाणु
उन्दारू दीदा की कथा सुणाणु
किलै वाहलु ...२............
सुचणु
गढ़ देश मेरु आज

आंखी बच्चाण मा लगी
गढ़ देश की मेर गंगा
अब यख सुख्याण लगी
बाटा पछायाण मा लगी
किलै वाहलु ...२............
सुचणु
गढ़ देश मेरु आज

किलै वाहलु ...२
धक् धक् ध्क्ध्याट
रग रग राग्याट कणु वाहलु
किलै वाहलु ...२............
सुचणु
गढ़ देश मेरु आज

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कल

देख देख का फर्क है
देख रेख का फर्क है

  जो है माध्यम या तेज
  सोच समझ का फर्क है

मेज सेज पर फर्क है
उस पर अक्ल का दरक है

साफ सुथरी क्या परत है
जो दौड़ रही लगी शर्त है

कोई बड़ा कोई छोटा है यंह
समाज के ताज का फर्क है

अंतर का जंतर यंहा
धर्म से छुटा एक धर्म है

गिलास आधा भरा होआ
या फिर आधा वो खाली है

दुर बागा से वो पुष्प टुटा
क्यों दुखी होआ वो माली है

समय की छलनी है खाली
क्या समय अब बीता कल है 

देख देख का फर्क है
देख रेख का फर्क है

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सोया समाज

कविता को खोया पाया
समाज मै उसे सोया पाया

चीखती रही चिलाती रही
दुःख-दर्द से वो  कहराती रही

भुख के फंदे मै झूली सखी
आपनो से ही रूठी कभी

शहरों की राहों मै छुड़ा पाया 
गावों के खेतों मै बोया पाया 

महंगाई संग नाचती रही
गरीबी का मातम बनती रही

देहज के बंधन मै बंधी वो
सती संग चिता चड़ी वो

रही चीखती चिलाती वो
एक आह बस अब गाती वो

कविता को खोया पाया
समाज मै उसे सोया पाया
 
बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरी ये कहानी है
आप के लिये अनजानी है
ये जो रवानी है
दो दिन की जिंदगानी है
मेरी ये कहानी है .............

मै बंदा सीधा साधा हों
अपने परिवार बीना आधा हों
अहम् भाव से मारा हों
गुस्से को ना अभी त्यागा हों
मेरी ये कहानी है .............

कर्म भुमी ये देवभुमी है
पली गाम का रही बासी हों
मै हों उत्तराखंडी गर्व मुझ को
मै पहाड़ मै रहने वाला हों
मेरी ये कहानी है .............

सीधी साधी मीठी बोली मेरी
ना बनी अब तक ये भाषा है
गढ़ को देखकर मुझ को ऐ आशा है
कुछ भी नहीं यंहा गम तो साजा है
मेरी ये कहानी है .............

बंदा यखरा यखरा मै सही
दो टुक खरी खरी मेरी बाणी है
कमी को मेरी हथेली मै गीनवाओ
पीठ पीछे ना उसे तुम सुनाओ
मेरी ये कहानी है .............

मेरी ये कहानी है
आप के लिये अनजानी है
ये जो रवानी है
दो दिन की जिंदगानी है
मेरी ये कहानी है .............

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काया

ये काया
तिल क्या लाया
तेर पीछणे पीछणे
ऐगै  ये माया
ये निर्भगी काया................

सुख दुखा की
कैसी रीत च
जीकोड़ी ल फिर
गै ये गीत च
ये निर्भगी काया................

अन्ख्युं मा दीखै
माथा मा सजै
नाका दगडी लगै
कनुअड़ी मा बल झुलै
ये निर्भगी काया................

गीचुडी छुंयीं लगै
हाथों दगडी बचै
खुठी दगडी तु हीठे
अपरा दगडी कभी बचै
ये निर्भगी काया................

खुद सोचदा रैगै तु
आपरों की णी सोच तैंन
रमता रैगे ये काया दगडी
गढ़ देश की णी सोच तैंण
ये निर्भगी काया................

बोई ये मातभुमी
बणी ना कर्म भुमी
देवभुमी हे गढ़वाल
व्यर्थ मेरी ये काया 
ये निर्भगी काया................

ये काया
तिल क्या लाया
तेर पीछणे पीछणे
ऐगै  ये माया
ये निर्भगी काया................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मोमबत्ती
जलती रही
पिघलती रही
माध्यम कभी
कभी वो तेज
हवा के झोकों
से लडती रही
मोमबत्ती
जलती रही .........................

चुप चाप
अपना गम
वो सहती रही
बीते पलों को
वो याद करती रही
मोमबत्ती
जलती रही .............................

अंधेरे से वह
अकेले लडती रही
लौ से जल जलकर
रोशनी फैलती रही
अपने उस अंधेरे मै
खुद को खोजती रही
मोमबत्ती
जलती रही

मोमबत्ती
जलती रही
पिघलती रही
माध्यम कभी
कभी वो तेज
हवा के झोकों
से लडती रही
मोमबत्ती
जलती रही .........................

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गुनाह या मजबुरी ?

बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?
सुली पर चढ़ा खुदा है पर
कानुन कैसे जुदा है पर
घर का चूल्हा बुझा है पर
आंखें रोती रहती है
दर्द क्यों जुदा है पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

भुख है ऐ पेट पर
अमीरों से कोशों दुर पर
दो शब्द उसके पास पर
गरीबी के नीचे दबा है पर
आँखों से दर्द छलकता पर
कीसी को नजर नहीं आता पर
दिये की रोशनी जलता पर
अँधेरा अब भी साथ  पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

गुनाह है या मजबुरी पर
काम करना जरुरी पर
गर एक दिन छुटा पर
दाना पानी से रिश्ता टूट पर
किस को है ना इसकी परवाह पर
समाज मेर सोया सोया सा पर
क्यों करैं मेरी फ़िक्र पर
लगा हो अपनी मजदुरी पर
दुनीया बनाये दुरी पर
ना जाने मेरी यूँ मजबुरी पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

 
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गुनाह या मजबुरी ?

बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?
सुली पर चढ़ा खुदा है पर
कानुन कैसे जुदा है पर
घर का चूल्हा बुझा है पर
आंखें रोती रहती है
दर्द क्यों जुदा है पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

भुख है ऐ पेट पर
अमीरों से कोशों दुर पर
दो शब्द उसके पास पर
गरीबी के नीचे दबा है पर
आँखों से दर्द छलकता पर
कीसी को नजर नहीं आता पर
दिये की रोशनी जलता पर
अँधेरा अब भी साथ  पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

गुनाह है या मजबुरी पर
काम करना जरुरी पर
गर एक दिन छुटा पर
दाना पानी से रिश्ता टूट पर
किस को है ना इसकी परवाह पर
समाज मेर सोया सोया सा पर
क्यों करैं मेरी फ़िक्र पर
लगा हो अपनी मजदुरी पर
दुनीया बनाये दुरी पर
ना जाने मेरी यूँ मजबुरी पर
बाल मजदुरी
एक गुन्हा है पर ?..........

 
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आजा कु गढ़

तिशु व्हागे टिहरी डैम
तिसलु व्हागे सरू गाम
अब भी हिटणा छिण   
दूर दूर भटैक मैटण छिण
तिसु रहैगे सारु गढ़ .....................

आज ये योजना ठप   
भोह्ल वो योजना ठप
काखक मीलै लाल पाणी   
काखक फटै ऐ पुरणु पाईप
आब ऐ रोजा की कहाणी
तिसु रहैगे सारु गढ़ .....................

लोड सैडिंग की मार
सैणु अब अपरू खंड
नेता जी सीयाँ छीण
उनकी बिजली चलणी
अब भी सबेर शाम
अंधेरु मा रहैगे सारु गढ़ .....................

तिशु व्हागे टिहरी डैम
तिसलु व्हागे सरू गाम
अब भी हिटणा छिण   
दूर दूर भटैक मैटण छिण
तिसु रहैगे सारु गढ़ .....................

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