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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

क्या बदली यख

क्या बदली यख बस मन बदली
कूड़ा खपरैल जगा सीमेंट कूड़ा झमकी
सीधु गढ़वासी अहम मा भटकी
कभी भैयाँ चपल मोडमा अटकी
क्या बदली यख बस मन बदली

२००२ को हाल २०१२ मा बेहाल
अधूर छे तू तब भी अधूर रैगे तू अब भी
दुसरा छा तब ठीक अपर मा अब मांगी भीख
बस अब तू बाणगै रै एकदम धीट
क्या बदली यख बस मन बदली

पैल भी दोई भागा बाण लड़े यू पी,उत्तराखंड
अब दोई भागा मा बांटे मैदानी , पहडी
रोजगार योजना रबैकी पल्याँन नी थमे
स्कुल दवाखना जनता सेवा अकाल पड़े
क्या बदली यख बस मन बदली

रास्ता बाणी जंगल अब हरचे
डैम बाणी बल टेहरी जिला कखगै
संस्क्रती को दरोहर बल छुपगै
गढ़ को नरैण देहरादूँण मा सीयुंरेगे
क्या बदली यख बस मन बदली

क्या बदली यख बस मन बदली
कूड़ा खपरैल जगा सीमेंट कूड़ा झमकी
सीधु गढ़वासी अहम मा भटकी
कभी भैयाँ चपल मोडमा अटकी
क्या बदली यख बस मन बदली


बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

छुटगै मेर गढवाला

पौडी भातेक जीमो छुटी
पुहंच गै वो अब कोटद्वार
उंचा निसा डंदीयुं दगड मा
तेड मेडा वा सड़की बाटा
अब मेर दागडी छुटगै मेर गढवाला

कोटद्वार भातेक रेल जाली
सबैर रेल पुहंचली नई दिल्ली दारा
झुख झुक कैकी निघ्ली
मुम्बई मेरा सप्नीयुं का घारा
छुक छुक कैकी छुटगै मेर गढवाला

अपरा सप्नीयुं खोयांचों
मी नया विचार लाएयुं चों
दिल मा डैरच मनमा खुद
घुघूती कभी कबार तू ले मेर सूद
ओं यादों दगडी छुटगै मेर गढवाला

क्या जाँण क्या होलो वख
माया नगरी की मायाच वख
भूल नी जों मेर उत्तराखंड
हे मुम्बा भगवती दे मेरु साथ
अब ई मेरु भाग छुटगै मेर गढवाला

पौडी भातेक जीमो छुटी
पुहंच गै वो अब कोटद्वार
उंचा निसा डंदीयुं दगड मा
तेड मेडा वा सड़की बाटा
अब मेर दागडी छुटगै मेर गढवाला

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
13 hours ago
तू पास है

रूठ मन मेरा ,रूठा तन साथ है
रूठ जग मुझसे , रूठ रब पास है

बैठी अकेली तू , सजना ना सहेली तू
लगती पहेली तू , उलझी अकेली तू

आया ना सावन , आँखों में असवन
गिर गिर सखी आये , झिर झिर ये मौसम

सोचे है क्या तू , समझे है क्या तू
मन है पगला तू , खोजे है क्या आज तू

अंधीयारी रात है , दूर सितारे पास है
चाँद की तलाश है , वो ही गुम आज है

बात है खास तू , खुद को दे आवाज तू
कर यकीन आज तू , टूटा होआ साज तू

यकीन है हमें , अपना कोई पास है
साथ नहीं ना सही यादों में तो तू आज है

रूठ मन मेरा ,रूठा तन साथ है
रूठ जग मुझसे , रूठ रब पास है

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऊथल पुथल

ऊथल पुथल जब होगा
ना तुझको ना मुझको मौका होगा
गुजर जायेगा वो पल
वो ना तेरा था ना मेरा होगा
ऊथल पुथल जब होगा.............

ले जायेगा वो तुझको उड़ा
हवा का वो बवंडर होगा
ना सोचने देगा तुझको श्रणिक भी
उसका वेग अति भारी होगा
ऊथल पुथल जब होगा.............

तहस नहस कर देगा
खड़ा श्रण जब अकेला होगा
ना होगा संग कोई जब ऐ खेला होगा
तेरा रकीब ही संग बंदे बस तेरा होगा
ऊथल पुथल जब होगा.............

ऊथल पुथल जब होगा
ना तुझको ना मुझको मौका होगा
गुजर जायेगा वो पल
वो ना तेरा था ना मेरा होगा
ऊथल पुथल जब होगा.............

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 11
दिले नादाँ

दिले नादाँ तुझे होआ क्या है
लुटा होआ आज बीच बाजार क्या है
क्या हाल है तेरा क्या दिखा रहा है
बीमार सा तू आज नजर आ रहा है
दिले नादाँ तुझे होआ क्या है ......................

लगता है तू अकेला सा,अकेला क्यों है
दिल के संग गम का मेला,ठेला क्यों है
कैसा रेला सुख दुःख का झंट झमेला है
आँखों संग बहा दर्द मेरा वो मेरा क्यों है
दिले नादाँ तुझे होआ क्या है ......................

धक धक चलता,साँसों का कारवाँ मेरा
बंजर धरती पर,अब भी बसेरा तेरा
प्यार की गगरी ,संग सावन तेरा
फिर एक बार,भीगा तन मन मेरा
दिले नादाँ तुझे होआ क्या है ......................

दिले नादाँ तुझे होआ क्या है
लुटा होआ आज बीच बाजार क्या है
क्या हाल है तेरा क्या दिखा रहा है
बीमार सा तू आज नजर आ रहा है
दिले नादाँ तुझे होआ क्या है ......................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 10
मै भी एक पागल हूँ

पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ
हँसते सब मुझ पे , मै भी खुद पे हंसता हूँ
देख मुझको वो अपने को ही देखते हैं
सुख दुःख क्या है अपने आप से कहते हैं
पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ .................

किसी को नशा इश्क का किसी को दौलत का
ना मीला मुझको खुदा,क्यों बना मै सबसे जुदा
पहचान मेरी मुझसे ही गुम है कैसा ऐ सितम
सितमगर राहों के रही हम में ही है कुछ कम है
पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ .................

लहराता ही फिरों बलखाता ही फिरों निकलों
निकलों जंहा से मै बस अब इतराता ही फिरों
देखा मेरा दम ख़म ना निकले तुम्हरा भी दम
ना कर गम ना आसूं गिरा पागल कहके तू भी बोला
पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ .................

अंदर झांक अपने तू भी तो अधूरा है
कीस बात का है घमंड तू तो बस भैजे से ही पूरा है
अलग थलग ही सही मै ना कोई मुझसा दूजा है
आंखें छलकती है मेरी दिल बस अपने पर हंसता है
पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ .................

पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ
हँसते सब मुझ पे , मै भी खुद पे हंसता हूँ
देख मुझको वो अपने को ही देखते हैं
सुख दुःख क्या है अपने आप से कहते हैं
पागलों की नगरी में मै भी एक पागल हूँ .................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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तस्वीरें

तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें
याद छुपी है बात छुपी है
प्यार का वो अहसास छुपा है
तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ..............

नम हैं कभी तो कभी वो खुशी
जींदगी की छुटी होयी वो कड़ी है
टंगी रहती दिवारों पर , दिल के मकानो पर
उससे जुडी कई सपनों की लड़ी है
तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ..............

ले जाती मुझको वो आज कंहा पर
खींची जंहा मैने उसे उस गुलशन के गुलजारों पर
छत पर कभी, कभी मीनरों पर बाग़ ओर गलियारों पर
उस पल के हुस्नखारों पर अकेले इन आँखों पर
तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ..............

दबी दबी ही रही हमेशा अपने विचारों पर
देख उसे वो खिली धुप उस रोशनदानो पर
नजर पडी जब भी हमारी उन तस्वीरों पर
याद आयी तुम बहुँत हमें उस दीवारों पर
तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ..............

तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें
याद छुपी है बात छुपी है
प्यार का वो अहसास छुपा है
तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ...... तस्वीरें
जीना सिखाती साथ ले जाती है तस्वीरें तस्वीरें तस्वीरें ..............

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मै

देख गिरा इस तरंह
उठना सकूं गिरने पर
झोंका उड़ा ले गया
आपना मुझको कहकर
देख गिरा इस तरंह .........

उड़ता उड़ता गया
आकाश उस नभ पर
कभी जल कभी थल
कभी बादलों से घिरकर
देख गिरा इस तरंह .........

मचल मचल कर
उत्साहीत पल पर
घुलमील चला किस पथ पर
बरखा गिरी तन पर
देख गिरा इस तरंह .........

बूंदों की बूंदा बांदी में
उड़ गया हों उस आँधी में
छुटा डाल से इस तरंह
खो गया हो उस रवानी में
देख गिरा इस तरंह .........

देख गिरा इस तरंह
उठना सकूं गिरने पर
झोंका उड़ा ले गया
आपना मुझको कहकर
देख गिरा इस तरंह .........

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
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भैर रैग्युं दाज्युं

भैर रैग्युं भैर
खैर थै करेकी गैर
सैर सैर करदा रैग्युं दाज्युं
मी भैर रैग्युं भैर

बोल्दो रैग्युं बोल्दो
मनखी भेद मनखी दगड़
जिकोड़ी सिलैगी माया मा
दोई आखर पड़ी देश छुटेगी दाज्युं
मी भैर रैग्युं भैर

अंत कल्ह गरीबी भल्ह
लाटू सी मी दौड़ी दौड़ी गेंयूँ
टक्काल चोरल मीथै दाज्युं
कंण ऐ मुंड थै मी खोज्युं
मी भैर रैग्युं भैर

रैगै याद मा ईजा बाबा
रैगै खोंयुं गढ़ देश मयारू
बैठ्युंचों समुद्र पार दाज्युं
कभी कभी ज्यू मरू फेरा
मी भैर रैग्युं भैर

भैर रैग्युं भैर
खैर थै करेकी गैर
सैर सैर करदा रैग्युं दाज्युं
मी भैर रैग्युं भैर

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
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अबकी बार

अबकी बार जीकोडी मा
ह्युंद पड़यूँ चा, ह्युंद पड़यूँ चा
कै बाटा ऐला घार जी
ह्युंद पड़यूँ चा, ह्युंद पड़यूँ चा
अबकी बार जीकोडी मा.......

गरठी गैन गों गोंठ्यार
घरदार सिमलधर पंच प्रयाग
जीकोडी यकुली गरठी मेर
बस तेरु आणा की लगीच बाट
अबकी बार जीकोडी मा
ह्युंद पड़यूँ चा, ह्युंद पड़यूँ चा

अबकी बार जीकोडी मा
घाम ल्ग्युंचा घाम ल्ग्युंचा
कै रास्ता आला जी सार ल्ग्युंचा
घाम ल्ग्युंचा घाम ल्ग्युंचा

सुखी गैनी सरू गढ़ देश
तीसा रैगेनी पंतेदारा गद्न्या
जीकोडी मा ऐगे उमल
रोरो कैकी बिस्ग्या वो भी ऐबार
अबकी बार जीकोडी मा
घाम ल्ग्युंचा घाम ल्ग्युंचा

अबकी बार जीकोडी मा
बरखा लगीचां बरखा लगीचां
कै छाता भैन्याँ बैठ्युं मी
बरखा लगीचां बरखा लगीचां

गढ़ हरालू छेगै बण उल्यारु छेगै
मोल्यार बणी हे जीकोडी मेरी
तेरु हरयालू क्ख्क जी लुकीगै
मन का धीर अब सब बोगीगै
अबकी बार जीकोडी मा
बरखा लगीचां बरखा लगीचां

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