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Harish Chandra Pandey's Poem- हरीश चन्द्र पाण्डेय की कविताये एव कृतिया

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 01, 2012, 02:57:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नाम / हरीशचन्द्र पाण्डे

चूँकि झाड़ी की ओट में नहीं छुपाई जा सकती थी आवाज़
एक किलकारी उसका वहाँ होना बता ही गई

झाड़ी न होती तो कोई नाला होता या ताल

मिल ही जाता है ऎसे नवजातों को अपना कोई लहरतारा

क्रंदन करते

टुकुर-टुकुर ताकते
और कभी निष्पंद...

कयास ही लगाए जा सकते हैं ऎसे में केवल

जैसे लगाए जते रहे हैं समय अनंत से
अवैध आवेग की देन होगा
कुँवारे मातॄत्व का फूल
किसी अमावस पल में रख गया होगा कोई चुपचाप यहाँ

होगा... होगा... होगा...


जो होता कोई बड़ा तो पूछ लिया जाता

कौन बिरादर हो भाई
कौन गाँव जवार के
कैसे पड़े हो यहाँ असहाय

बता देती उसकी बोली-बानी कुछ

कुछ केश बता देते कुछ पहनावा
होने को तो त्वचा तक में मिल जाती है पहचान

अब इस अबोध

लुकमान!
बचा लो यह चीख़...

एक गोद में एक फल आ गिरा है

एक गिरा फूल एक सूखी टहनी से जा लगा है।

०००


चार-पाँच घंटे एक शिशु को

दूध देने से पहले दे दिया गया है एक नाम

नाम- जैसे कोई उर्वर बीज

एक बीज को नम ज़मीन मिल गई है
धँस रहा है वह
अंकुरा रहा है वह

इस नाम को सुनते-सुनते वह समझ जाएगा यह मेरे लिए है

इस नाम को सुनते ही वह मुड़ पड़ेगा उधर
जिधर से आवाज़ आ रही है

अपने नाम के साथ एक बच्चा सयाना हो रहा है

और सयाना होगा और समझदार
इतना कि वह नफ़रत कर सकेगा दूसरे नामों से

नाम को सुनकर

आज उसने कई घर जलाए हैं
नाम को सुनकर आज उसने कई घर छोड़ दिए हैं

धुआँ है नाम

वह आग तक पहुँच रहा है

कोई है

जो नाम के पीछे चौबीसों घंटे पगलाए इस आदमी को
झाड़ी के पीछे के
अनाम-अगोत्र पाँच घंटों की याद दिला दे...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भाई-बहन / हरीशचन्द्र पाण्डे

भाई की शादी में ये फुर्र-फुर्र नाचती बहनें
जैसे सारी कायनात फूलों से लद गई हो

हवा में तैर रही हैं हँसी की अनगिनत लड़ियाँ

केशर की क्यारियाँ महक रही हैं

याद आ गई वह बहन

जो होती तो सारी दिशाओं को नचाती अपने साथ

जिसका पता नहीं चला

गंगा समेत सारी गहराईयाँ छानने के बाद भी...

और बहन की शादी में यह भाई

भीतर-भीतर पुलकता
मगर मेंड़ पर संभलता, चलता-सा भी

कुछ-कुछ निर्भार

मगर बगल का फूल तोड़े जाने के बाद पत्ते-सा
श्रीहीन...।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हिजड़े / हरीशचन्द्र पाण्डे           

ये अभी अभी एक घर से बाहर निकले हैं
टूट गए रंगीन गुच्छे की तरह
काजल लिपस्टिक और सस्ती खुशबुओं का एक सोता फूट पड़ा है

एक औरत होने के लिए कपडे की छातियां उभारे
ये औरतों की तरह चलने लगे हैं
और औरत नहीं हो पा रहे हैं

ये मर्द होने के लिए गालियाँ दे रहे हैं
औरतों से चुहल कर रहे हैं अपने सारे पुन्सत्व के साथ
और मर्द नहीं हो पा रहे हैं
मर्द और औरतें इन पर हंस रहे हैं

सारी नदियों का रुख मोड़ दिया जाए इनकी ओर
तब भी ये फसल न हो सकेंगें
ऋतू बसंत का ताज पहना दिया जाए इन्हें
तब भी एक अन्कुवा नहीं फूटेगा इनके
इनके लिए तो होनी थी ये दुनिया एक महासिफर
लेकिन
लेकिन ये हैं की
अपने व्यक्तित्व के सारे बेसुरेपन के साथ गा रहे हैं
जीवन में अन्कुवाने के गीत
ये अपने एकांत के लिए किलकारियों की अनुगूंजें इकठ्ठा कर रहे हैं

विद्रूप हारमोनों और उदास वल्दियत के साथ
ये दुनिया के हर मेले में शामिल हो रहे हैं समूहों में

नहीं सुनने में आ रही आत्महत्याएं हिजडों की
दंगों में शामिल होने के समाचार नहीं आ रहे

मर्द और औरतों से अटी पड़ी इस दुनिया में
इनका पखेरुओं की तरह चुपचाप विदा हो जाना
कोई नहीं जानता !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 थाती   
हरीश  चन्द्र पाण्डे
हरीश चन्द्र पाण्डे हमारे समय के ऐसे महत्वपूर्ण कवि हैं जिनके बिना आज की कविता का कोई वितान नहीं बन सकता. वे बड़े सधे अंदाज में जिन्दगी के विविध  पहलुओं को अपनी कविता में  रूपायित करते हैं. पाण्डे जी की कविता दृश्य की निर्मिती करती है कुछ इस तरह के दृश्य की जिसमें कोई कांट-छांट नहीं की जा सकती.

दिसंबर १९५२ में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के सदीगाँव में जन्मे पाण्डे जी के  अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. 'कुछ भी मिथ्या नहीं है', 'एक बुरुंश कहीं खिलता है' और 'भूमिकाये ख़त्म नहीं होती'.          पाण्डे  जी  का एक कहानी संकलन जल्दी ही आने वाला है.
सम्पर्क-  अ/ ११४, गोविंदपुर कोलोनी, इलाहाबाद, २११००४
मोबाइल - 09455623176

(Source -http://pahleebar.blogspot.com/2011/07/blog-post_06.html)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पानी

देह अपना समय लेती ही है
निपटाने वाले चाहे जितनी जल्दी में हों

भीतर का पानी लड़  रहा है बाहरी आग से 

घी जौ चन्दन आदि साथ दे रहे हैं आग का
पानी देह का साथ दे रहा है

यह वही पानी था जो अंजुरी में रखते ही
खुद  ब खुद छीर जाता था              बूंद बूंद

यह देह की दीर्घ संगत का आंतरिक सखा भाव था
जो देर तक लड़ रहा था देह के पक्ष में

बाहर नदियाँ हैं भीतर लहू है
लेकिन केवल ढलान की तरफ भागता हुआ नहीं
बाहर समुद्र है नमकीन
भीतर आँखें हैं
जहाँ गिरती नहीं नदियाँ, जहाँ से निकलती हैं

अलग-अलग रूपाकारों में दौड़ रहा है पानी

बाहर लाल-लाल सेब झूम रहे हैं बगीचों में
गुलाब खिले हुए हैं
कोपलों की खेपें फूटी हुई हैं 
वसंत दिख रहा है पुरमपुर

जो नहीं दिख रहा इन सबके पीछे का
जड़ से शिराओं तक फैला हुआ है भीतर ही भीतर
उसी में बह रहे हैं रंग रूप स्वाद आकार

उसके न होने का मतलब ही
पतझड़ है
रेगिस्तान है
उसी को सबसे किफायती ढंग से बरतने का नाम हो सकता है
वूज़ू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बैठक का कमरा[/b]
चली आ रही है गर्म-गर्म चाय भीतर से
लजीज खाना चला आ रहा है     भाप उठाता   
धुल के चली आ रही हैं चादरें पर्दें
पेंटिंग    पूरी हो कर चली आ रही है
संवर के आ रही है लड़की
जा रहे हैं भीतर जूठे प्याले और बर्तन
गन्दी चादरें जा रही हैं     परदे जा रहे हैं
मुंह लटकाए लड़की जा रही है
पढ़ लिया गया अखबार भी
खिला हुआ है  कमल-सा बाहर का कमरा
अपने भीतर के कमरों की कीमत पर ही खिलता है कोई
बैठक का कमरा
साफ़ सुथरा       संभ्रांत
जिसे रोना है भीतर जा कर रोये
जिसे हँसने की तमीज नहीं वो भी जाये भीतर 
जो आये बाहर आंसू पोंछ के आये
हंसी दबा के
अदब से
जिसे छींकना है वही जाए भीतर
खांसी वही जुकाम वहीँ
हंसी ठटठा  मार पीट वहीँ
वही जलेगा भात
बूढी चारपाई के पायों को पकड़ कर वहीँ रोयेगा पूरा घर
वहीँ से आएगी गगनभेदी किलकारी और सठोरों की ख़ुशबू
अभी अभी ये आया गेहूं का बोरा भी सीधे जाएगा भीतर
स्कूल से लौटा ये लड़का भी भीतर ही जा कर आसमान सर पर उठाएगा
निष्प्राण मुस्कराहट लिए अपनी जगह बैठा रहेगा
बाहर का कमरा
जो भी जाएगा  घर से बाहर      कभी, कहीं
भीतर का कमरा साथ-साथ जाएगा