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Poems by Dr Narendra Gauniyal - डॉ नरेन्द्र गौनियाल की कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 12, 2012, 12:01:35 AM

Bhishma Kukreti

****** केका बाना फ्वडी हमन घुंडा मुंड *****?


-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

केका बाना फ्वडी हमन घुंडा-मुंड
केका बाना करी छै हमन रैली
केका बाना करी छौ हमन धरना-प्रदर्शन
केका बाना गै छाया दिल्ली
केका बाना खैनी हमन गोळी

गौं खाली
कूड़ी उजडी
पुंगडी बांजी
गौ बिटि
भाजि गैनी लोग
एक हैंका सिकासेरी
एक हैंका देखा देखी

गौ मा रैगेनी
कुछ बीमार
कुछ बेरोजगार
कुछ कूड़ी जग्वल्दा
दाना-दीवना लाचार

पहाड़ों मा
विकास कि बात पर
मांगी छौ अलग राज
न्यार ह्वैकि बि
क्य पै
राज्य लेकी बि
क्य ह्वै

शहरों मा
झर फर
गौं की दशा
जर जर
मैदानों मा
चक्रचाळ
पहाड़ों मा
सुनताळ।

डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित narendragauniyal@gmail.com

Bhishma Kukreti

******जनता बिचारी बलि बेदी चढ़ी*****



                      कवि- डॉ नरेन्द्र गौनियाल

स्वार्थ कि रीति मा,राजकि नीति मा।
जनता बिचारी, बलि बेदी चढ़ी।।

ढोल कि पोल खुली कि खुली।
आंखि उघाड़ी तू बी देख भुली।।

भाड़ मा जाये जनता फनता।
मुराद हो पूरी यूँका मन की।।

अफु पेट भर्री गळदम सळदम।
भूख मिटे न मिटे जन की।

विकास-विकास की बड़ी बात करीं।
आंख्युं देखि सब नाश करीं।।

काम कबी क्वी करीं न करीं।
खीसौं माँ राशि धरीं ही धरीं।।

चांठों अर चेलों की,कैम्प अर मेलों की।
देखो जख बी भरमार पड़ी।

मिले न मिले सुविधा कबी क्वी।
रैगे जनता फिर हाथ ज्वड़ी।

आंख्युं कु खैड़ सी बाखरो बैड़ सी।
रिपु ह्वैगे तुम्हारो,पाणि मा गैड़ सी।।

लागद शूल सी तुम्हारी जिकुड़ी।
जैन नि करी तुम्हारा मन की।।

माल़ा हो गालुंद ट्वपलि हो डालुंद।
तुमारा तरपां देश जाव भ्यालुंद।।

डॉ नरेन्द्र गौनियाल सर्वाधिकार सुरक्षित ..narendragauniyal@gmailcom                                           

Bhishma Kukreti

ये घुन्ती की ब्वै !

    डॉ नरेन्द्र गौनियाल

ये घुन्ती की ब्वै
गौं का  हाल देखि
आंदी च रोई
अधा से जादा
चलि गीं स्वां
बाकि बि हर्बि
  लगाणा  छन ग्वै

एक तु रैगे
एक मि रैग्युं
हम जना
क्वी क्वी  घुसिणा छन 
ये पहाड़ मा
जेँ  पुंगड़ी
जेँ कूड़ी
सेरी घेरी मा
लगै 
अपणि ल्वै
ईं धरती  तै 
  बांजि देखि
आन्दि च रोई

अरे हमन बि क्य कन
हम पर बि
जबतक 
सामर्थ्य  रैलि 
ये पहाड़ मा
इनि घुसिणा रौंला
गूणि,बांदर,सुंगर
  हकाणा रौंला

              डॉ नरेन्द्र गौनियाल copyrigh..narendragauniyal@gmail.com

Bhishma Kukreti

रीक्षा --एक ननि कथा

                डॉ नरेन्द्र गौनियाल

धनसिंह सौकार यीं बात मा टेंसन करदू छौ कि तीन नौना छन।कै तै कख भ्यजूं। एकदिन वैन ऊंकि परीक्षा  लीणे सोचि।रस्वड़ा का भितर एक ठ्वपरा मा एक दर्जन क्याल़ा धैरिकि सबसे पैलि ठुलू नौनु तै भेजिकि बोलि कि जा भितर क्याल़ा धर्याँ छन।एक क्याल़ा  खैले।ऊ भितर गै अर एक क्याल़ा खैकि छिल्का वै ठ्वपरा मा ही धैरि दे।सौकार भितर जैकि सब देखिकि ऐगे। फिर दुसरो नौनु तै भेजि।वै तै बि बोलि कि भितर जैकि एक क्याल़ा खैले।ऊ भितर गै अर वैन  एक का जगा तीन क्याल़ा खै दीं।द्वी छिल्का भितर ही लुकै दीं अर एक छिल्का भैर ल्याकि बुबाजी तै दिखैकि खैति दे। सबसे बाद मा निकणसू नौनु तै भितर भेजि।ऊ बिचारो बिन क्याल़ा खयां ही भैर ऐगे अर बोलि कि मिन त नि द्याखा क्याल़ा।कख धर्याँ छन?
        बस सौकार जी कि परीक्षा पूरी ह्वैगे।वैन सबसे ठुलो नौनु तै दुकानदार बणे दे।इनु सोचिकि कि दुकान मा बैठिकि  हिसाब लगैकि खै  ल्यालु।बीच वल़ो बदमाश च।इनु सोचिकि वैतै नेतागिरि मा भेजि दे।अर तिसरो निकणसू,निकज्जू,निखट्टू नौनु तै सरकरि नौकरी पर लगै दे। 

Bhishma Kukreti

कनु असगुनी बसगाळ

कविता : नरेन्द्र गौनियाल

हे विधाता यु कनु असगुनी बसगाळ,
बद्री केदार मा  यु कनु  आई काळ.
हजारों लोगों कि चलि गेई जान,
लाखों बेघर, बिन खान पान.
हिमालै की धरती मा कनु प्रलय ऐगे,
बोगि गीं मनखि कनु  रगड़ पड़ी गे .
ज्यूंदा मनखी बि गाड मा बोगि गीं.
रूंदा किलांदा माट मा दबि गीं
कबि नि देखि  इनु प्रलय भयंकारी,
इनि आफत य महा विनाशकारी .
हे नारायण हे शिव भोलेनाथ,
  रक्षा करो हम सब छां अनाथ .


      सर्वाधिकार  @नरेन्द्र गौनियाल

Bhishma Kukreti

 प्रलय क्या होता है, ये हमने जाना है
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   प्रलय क्या होता है ये हमने जाना है
   आपदा क्या होती है ये हमने भोगा है

   पहाड़  टूटकर हमें दफ़न करने चले
    नदियाँ  उफनकर हमें बहाने चली

     हजारों दब गए,बह गए,मरखप गए
     हम अभी जिन्दा हैं मगर लाशों की तरह

       क्यों आया ये प्रलय यह नहीं मालूम
      मगर देवभूमि में राक्षसों का राज लगता है

     जो फंसे थे मेहमान वे निकाले जा चुके
     सुध हमारी लेने वाला यहाँ अभी कोई नहीं

     श्मशान जैसा पड़ा सूना है हमारे गाँव में
     हम थपेड़े खा रहे हैं भूखे प्यासे दर बदर

     चले गए जो हमारे बीच से लौटकर न आयेंगे
     अब हम करें भी क्या बस याद करते रो रहे हैं

     इस गमगीनी में चाह जीने की कहाँ गुम हो गई
     फिर भी आश में विश्वास प्रभु का हम कर रहे

     हर थपेड़े को सहते हुए कष्ट में आज तक हम तपे
     सब भूलकर फिर से कोशिश बसने बसाने की कर रहे

             नरेन्द्रगौनियालcopyright.narendragauniyal@gmail.com