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Heart Touching Poems on Uttarakhand- पहाड़ पर लिखी गयी ये भाविक कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 23, 2012, 01:27:04 PM

geetesh singh negi

गढ़वाली कविता : पहाड़

मी पहाड़ छोवं
बिल्कुल  शान्त
म्यार छजिलू  छैल
रंगिलू घाम
और दूर दूर तलक फैलीं
मेरी कुटुंब-दरी
मेरी हैरी डांडी- कांठी
फुलौं  की घाटी
गाड - गधेरा
स्यार -सगोडा
और चुग्लेर चखुला
जौं देखिक तुम
बिसिर जन्दो सब धाणी
सोचिक की मी त स्वर्ग म़ा छौंव
और बुज दिन्दो  आँखा फिर
पट कैरिक
सैद तबही नी दिखेंदी कैथेय
मेरी खैर
मेरी तीस
म्यारू मुंडरु   
म्यारू उक्ताट
और मेरी पीड़ा साखियौं की
जू अब बण ग्याई मी जण
म्यार ही पुटूग
एक ज्वालामुखी सी
जू कबही भी फुट सकद !


रचनाकार :गीतेश सिंह नेगी , सर्वाधिकार सुरक्षित
स्रोत : मेरे अप्रकाशित गढ़वाली काव्य संग्रह " घुर घूघुती घूर " से


Devbhoomi,Uttarakhand

devbhoomi Uttarakhand manin janmen  huye in mahan kavion ne bahut sukhdai kavitaon ki rchana ki hai !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चन्द्रशेखर करगेती कैसे हो बुराँश ....?
तुम तो रोडोडैन्ड्रान हो गए
एन आर आई हुए
या फिर
ग्लोबलाइजेशन का भूत हुआ सवार
भूल गए....
इजर की ढालू जमीन
वो ग्वाले और ग्वालदेवता
फुलद्‌योली पर इठलाना
वो ढाड़गोठ की द्‌योली पर सजना
बैगनी होँठोँ वाले बच्चे
वो गधेरे मेँ बाँज-काफल
वो बिरखम
वो आशीका
और पालौँ के बीच से
तुम्हारा दुनला होकर झाँकना
सब भूल गए ....?
अब तो सुर्खियोँ मेँ ही
ज्यादा सुर्ख रहते हो ।

- बस करो
मैँ खण्डित तरुखंड
रुदित रुगन्वित हूँ
कहीँ पीयर कहीँ रक्तिम
जलप्रपा ही नहीँ
जलावन भी हूँ
हाँ .... बुराँश हूँ मैँ
उत्तरपूर्वी नहीँ
उत्तरजीवी हूँ मैँ
चंद रोज का सफर
नहीँ है मेरा
मैँने देखा है बचपन
सदियोँ का
सभ्यताओँ का
तुम्हारी थोकदारी का
फिरंगियोँ की खोजयात्राओँ का
तुम्ही ने नाम दिए
सार्वभौमिकता के लिए
मेरी डालोँ मेँ पैर रखकर
तुम्ही एन आर आई बने
मुझ पर
गैरजमीनी मुद्‌दे हैँ
विषयवस्तुता है
तुम्हारे लेखोँ की
कविताओँ की
लोकगीतोँ की ....
तुम्हारे कटाक्ष
तुम्हारे धनाड्‌य संगठन
तुम्हारी कुल्हाड़ी का पैनापन
तुम्हारी असीमित उत्कंठाएँ
और इन सब से बढ़कर
तुम्हारी इन्सान होने की सनक
मुझ पर रोज होते व्याख्यान
बहसेँ
वो ए सी चैम्बर
वो शीशम की गोल टेबल
बिसलेरी
एक्वाफिना
कुछ भी तो नहीँ भूला मैँ
और शायद ....
तुम भी नहीँ भूले हो
क्योँ ....?
बहुत मीठा होता है ना....
मेरे आँसुओँ का शर्बत !!!

(लेखक: लोकेश डसीला)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Sandeep Bisht खिला एक फूल फिर इन पहाडों में.
मुरझाने फिर चला delhi की गलियों में.
graduate की डिग्री हाथ में थामे निकल गया.
फिर एक uttrakhandi लड़का जिंदा लांश बन गया.......
खो गया इस भागती भीड़ में वो.
रोज़ मारा बस के धक्कों में वो.
दिन है या रात वो भूल गया.
फिर एक uttrakhandi लड़का जिंदा लांश बन गया......
देर से रात घर आता है पर कोई टोकता नहीं.
भूख लगती है उसे पर माँ अब आवाज लगाती नहीं.
कितने दिन केवल चाय पीकर वो सोता गया.
फिर एक uttrakhandi लड़का जिंदा लांश बन गया......
अब साल में चार दिन घर जाता है वो.
सारी खुशियाँ घर से समेट लाता है वो.
अपने घर में अब वो मेहमान बन गया
फिर एक uttrakhandi लड़का जिंदा लांश बन गया......
मिलजाए कोई गाँव का तो हँसे लेता है वो.
पूरी अनजानी भीड़ में उसे अपना लगता है वो.
गढ़वाली गाने सुने तो उदास होता गया..
फिर एक uttrakhandi लड़का जिंदा लांश बन गया......
न जाने कितने फूल पहाड के यूँ ही मुरझाते हैं..
नौकरी के बाज़ार में वो बिक जाते है.
रोते हैं माली रोता है चमन..
उत्तराखंड का फूल उत्तराखंड में
महकेगा की नहीं........... ....?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Negi
उत्तराखण्ड स्थाई की राजधानी-गैरसैंण बननी चाहिए .......

जागो जागने का वक्त आ गया है
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
भ्रष्टाचार हर हालत मे समाप्त होना चाहिय

करनी है तो भाषण नही बात कर
समय से साक्षात्कार कर
और कुछ नही सुनना हमें
बात छिड़ी है गैरसैंण की,
उसकी बात कर।

तुम्हारे अपने सरोकार
तुम्हारी अपनी सरकार
हमारी गैरसैंण की बात
जनता को गैरसैंण की दरकार।

गैरसैंण हमारा सपना है
ये पहाड़ हमारा अपना है
तुम्हें शायद पता नही
अब पहाड़ सोया नही
जाग रहा है और
अपने अधिकार के लिए ललकार रहा है।
जरा कान देकर देख
आरजू नही शेर की दहाड़ सुन।

बात नही सुलझेगी अब
बात और फरियाद से
जानते हैं हम
फिर एक बार तैयार हैं
हम आर-पार के लिए।

अब नही चलेगी राजनीति बिसात
अब होगी पहाड़ में
हमारी मर्जी से दिन और रात
अगर तुम सोचते हो
तुम जीत गये हो
तो देख नीलकंठ में
उगते सूरज की गरमाहट को
अहसास का जमीन की गर्मी को
जमीन से जुड़कर।

गैरसैंण हमारा सपना नहीं
गैरसैंण हमारा अधिकार है
अब नही मांगना हमें
अब तो हमें राजधानी
बनानी है गैरसैंण
गर मादा है तुझमें
बरगला मत,
बात छिड़ी है गैरसैंण की तो
गैरसैंण की बात कर
गैरसैंण की बात कर।।

गैरसैण राजधानी हर हालत मे बनना चाहिए !!
जय भारत जय उत्तराखंड

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Vikram Negi
आओ
पहाड़ आओ,
अपने कैमरे साथ ले आना
झोड़ा-चांचरी, छोलिया नृत्य,
सातूं-आठूं, जागर,
सब कैद कर ले जाओ,
दो-चार बूढ़ी हड्डियां तुम्हें हर गांव में मिल जाएँगी,
जिनके साथ तुम थोड़ी देर हुक्का गुडगुडा सकते हो,
दो-चार मडुवे की रोटियां तोड़कर उनके साथ
तुम वो सब उगलवा सकते हो
जो तुम्हें अपनी किताबों में लिखने के लिए चाहिए

आओ,
मंचों पर अपनी बेबसी की गाथा सुनाते
लोककलाकार तुम्हारे कानों को तरस रहे हैं.
और वो भी
बैठे हैं तुम्हारे इंतज़ार में
जिन्हें भ्रम है कि वो लोककलाओं को बचाने का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं...

आओ
पहाड़ की आखिरी पारंपरिक शादी को कैद कर ले जाओ,
डोली में बैठकर ससुराल जाती आखिरी दुल्हन की तस्वीर समेट लो
तुम्हारी किताबों के मुख्य पृष्ठ पर
बहुत सुन्दर लगेगी वो तस्वीर....

आओ
पहाड़ आओ
बूढ़ी हड्डियां अब गलने लगी हैं,
मकड़ियों के जाल तुमसे पहले पहुच गए हैं,
पहाड़ के पुराने घरों की दीवारों में,
जल्दी आओ,
वरना तुम्हें निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलेगा,
दौडाओ अपने गणों को
पूछो-
कौन, कहाँ, किस गाँव में अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है,
आने से पहले
अपने कैमरे की वोईस क्लीयरिटी चेक कर लेना
मसकबीन पुरानी हो तो आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं देती....

आओ
खत्म होती साँसें तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं...!
......

(विक्रम)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रवासी
             - बृजेन्द्र नेगी (सहारनपुर)

मि प्रवासी सबसे ख़ास
ल्हेके अंयु नै-नै आश
सबसे पैलि नौकरी पाई
द्वी उबरयूँ  कि कोठी बणाई
शैर से दूर एक कूण ग्याई
सड़क, न नाली, न पाणी पाई
बिन्सरी वक्त जब बिजली आई
सिंयु नौनु भी झस्के ग्याई .

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Vikram Negi

पहाड़ एक ही था,
तुमने दो कर दिए,
सीधे-सादे पहाड़ के ऊपर तुमने
अपना पहाड़ खड़ा कर लिया,
हमारे पहाड़ के कपड़े उतारकर
तुमने अपने पहाड़ को पहना दिए,
तुम्हारा पहाड़ मोटा होता गया
हमारा पहाड़ सिर्फ हाड़ रह गया
तुम्हारे पहाड़ के बोझ से
हमारे पहाड़ ज़मीन में धंस रहा है
तुमने खूब मजे किए
हमारे पहाड़ की बेचैनी को रिकॉर्ड करके
तुमने खूब मोटी-मोटी किताबें लिखी
हमारे पहाड़ के आंसुओं पर

याद रखना
हमारा पहाड़ अभी मरा नहीं है
वो जिंदा है...
हमारा पहाड़ पलटकर तुम्हें जवाब देगा....
इंतज़ार करो...

Bhishma Kukreti

वीरेन्द्र पंवार की गंजेळी कविता (गजल)



[गढवाली गजल, उत्तराखंडी भाषाई गजल, मध्य हिमालयी गजल, हिमालयी गजल, उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषाई गजल , भारतीय क्षेत्रीय भाषाई गजल , दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय भाषाई गजल , एशियाई क्षेत्रीय भाषाई गजल , लेखमाला ]



क्वी हाल नी दिखेणा चुचौं कुछ करा

पौड़ छन  पिछेणा चुचौं कुछ करा



नांगो छौ त नंगी ही रेगी नांग

तिमला छन खत्येणा चुचौं कुछ करा



अज्युं तलक बी मैर कखी त बांग देंद

कखि नि ऐ बियेण्या चुचौं कुछ करा



छाडिकी फटगीक  बीं बुखो इ पै

चौंळ छन बुस्येणा चुचौं कुछ करा



रड़दा  पौड़ टुटदा डांडौ   देख्यकी

ढुंगा छन खुदेणा चुचौं कुछ करा



द्व्वता सब्बि पोड्या छन बौंहड़

झणि कब होला दैणा चुचौं कुछ करा



Copyright@ Virendra Panwar, Paudi, 10/7/2012

गढवाली गजल, उत्तराखंडी भाषाई गजल, मध्य हिमालयी गजल, हिमालयी गजल, उत्तर भारतीय क्षेत्रीय भाषाई गजल , भारतीय क्षेत्रीय भाषाई गजल , दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय भाषाई गजल , एशियाई क्षेत्रीय भाषाई गजल , लेखमाला जारी 

Bhishma Kukreti

Havai jaaj si uddan: Examples of new symbols in Garhwali poetry

                         Bhishma Kukreti
(Notes on new symbols in modern poetries; new symbols in modern Garhwali poetries; new symbols in modern Uttarakhandi poetries; new symbols in modern Mid Himalayan poetries; new symbols in modern Himalayan poetries; new symbols in modern North Indian poetries; new symbols in modern Indian poetries; new symbols in modern South Asian poetries; new symbols in modern Asian poetries]
When Krishna says in Geeta that 'I was there when xyz were there or this was told by Surya to xyz "that means conscious was there when this galaxy or elements were formed in hidden form.
  Same thing is applied in poetry that conscious or emotions were same from the beginning of poetry creation as they are in today's poetry creation. Poets have been changing symbols for creating same emotions that Krishna is talking about.
  Madan Duklan is important signature in Garhwali poetry not that he created volumes but readers and critics admire Madan that he brings new symbols for describing emotions and creating enjoyable images.
  He perfectly bends old common phrases and newer symbols for creating the desired images into mind. 
   The following poem is an illustration for critics admiring Madan Duklan.
हवैजाज सि उड़दन सुख
कवि- मदन डुकलाण
कबि घाम छन कबि छैल छन
येत जिन्दगी का खेल छन
रोज होन्दन इम्त्यान यख
पास हूणा कवी फेल छन
सूनु छक्वे यख नाक नी छ
जोग का ये खेल छन
बं जौं देखी रूणा बल्द
हळया नदारद गैल छन
हवै जाज सि उड़दन सुख
दुखून की रेल छन
The above poem is one of the representative poems of modern Garhwali poetry.

Copyright@ Bhishma Kukreti, 12/7/2012
Notes on new symbols in modern poetries; new symbols in modern Garhwali poetries; new symbols in modern Uttarakhandi poetries; new symbols in modern Mid Himalayan poetries; new symbols in modern Himalayan poetries; new symbols in modern North Indian poetries; new symbols in modern Indian poetries; new symbols in modern South Asian poetries; new symbols in modern Asian poetries to be continued...