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Poems By Vikam Negi 'Boond"- विक्रम नेगी "बूंद" की कवितायें तथा लेख

Started by पंकज सिंह महर, June 11, 2012, 06:31:35 AM

विक्रम नेगी

ये अंतहीन बहस
किस मुकाम पर जाकर खत्म होगी
वक्त और वस्त्र की रेखाएं खींचकर
वजह को छुपाने का खेल बेहद खतरनाक है.
और उतना ही खतरनाक है
यह कहना कि
"समाज में महिलायें महफूज़ नहीं नहीं हैं...."

यह गुवाहाटी नहीं है,
और न ही मणिपुर,
न यह मध्य प्रदेश है,
न झारखण्ड, छत्तीसगढ़
और न ही दिल्ली.....!

यह बहस
किसी आदिवासी छात्रा को
सड़क पर नंगा करके दौडाने से नहीं उपजी,
और न ही गुवाहाटी की गलियों में हुई
सामूहिक बलात्कार की घटना से.....
न यह बहस भारतीय सेना द्वारा
मणिपुर की महिलाओं के साथ किए गए
बलात्कार तक सीमित है.
यह मुंबई की लोकल ट्रेनों में होने वाली
घटनाओं तक भी सीमित नहीं है.
यह बहस डी.टी.सी. की बसों में सवारी नहीं करती.
यह बहस तस्लीमा नसरीन के उपन्यासों में दर्ज होने के लिए बेचैन नहीं है.

क़ानून, न्याय, और सजा के लिए नहीं होती हैं ऐसी घटनाएं,
बल्कि जन्म लेती हैं ऐसी घटनाएं-
समाज के मुंह पर तमाचा मरने के लिए,
और होती हैं इसलिए भी-
ताकि स्त्री विमर्श जारी रह सके....!
समता की लड़ाई अक्सर स्त्री विमर्श के शोर में गुम हो जाती है.

ये अंतहीन बहस,
होती है इसलिए भी-
ताकि संवेदनशील अपनी संवेदना प्रकट कर सकें..!
समाज पुलिसिया फितरत में ढल गया है.
आधी रात को पास के घर में
शराबी पति द्वारा पत्नी की पिटाई पर कुछ नहीं बोलता.
बोलता है समाज-
सुबह पड़ोस में हुई हत्या पर...!

ये अंतहीन
बहस इसलिए भी होती है
ताकि 
समाचार चैनल, पुलिस, अदालत और संसद की तरह.
समाज भी विभिन्न भूमिकाओं को अदा कर सके..!

देह के विभेद ने
मन को अछूत बना दिया है.
वो मर गई थी बहुत पहले
जबकि देह के अवसान पर रोता रहा पूरा देश...!

उसका कोई भी नाम हो,
क्या फर्क पड़ता है.
नाम न भी हो,
तो रख दिया जाता है..."दामिनी" जैसा ही कुछ.
अखबार में छपने वाली ऐसी किसी भी खबर में जरुरी है काल्पनिक नाम का...!
ताकि कहानी पर बहस बेहतर तरीके से हो सके...!

ये दर्दनाक कहानियां खत्म हों,
चाहते सभी हैं.
पर कहानियों को खत्म करने की कोशिश में,
हम भी हज़ारों पन्ने काले कर देते हैं..
अंतहीन बहस इंतज़ार करती है.
किसी नई कहानी का...!
इस इंतज़ार का सहभागी मैं भी रहा हूँ,
आप चाहें तो मेरे इस काले कथन पर
कालिख पोत सकते हैं...!
मुझे अफ़सोस इस बात का नहीं होगा कि ऐसा हुआ
बल्कि अफ़सोस इस बात का होगा
कि ये अफ़सोस इतना सब होने के बावज़ूद भी क्यों है...?

...
"बूँद"
पिथौरागढ़

विक्रम नेगी

सूरदास लिख रहे हैं अब कबीर चाहिए.
खून खत्म हो रहा है अब अबीर चाहिए.

आँख, कान, होंठ तो चुपचाप लौट आ गए.
घर की दीवारों को कलम और तीर चाहिए.

होंठ में ताकत कहाँ जो बात सच्ची कह सके,
मूक-बघीरों को तो काली लकीर चाहिए.

गली में जलती हुई इक झोपड़ी की आंच में,
पकने वाली भावना को शब्द खीर चाहिए.

...
"बूँद"
०२-०२-२०१३
०२:०९ अपरान्ह.
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