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Prof S S Bisht Great Writer of Uttarakhand- प्रो० शेरसिंह बिष्ट जी की रचनाये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 10, 2012, 02:37:05 PM







एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




Prof. Sher Singh Bisht
Kumauni/Kumauni Scholar, author, poet [size=0]"The goal of mankind is knowledge ... Now this knowledge is inherent in man. No knowledge comes from outside: it is all inside. What we say a man 'knows', should, in strict psychological language, be what he 'discovers' or 'unveils'; what man 'learns' is really what he discovers by taking the cover off his own soul, which is a mine of infinite knowledge."[/size]
[size=0]                             -Swami

https://sites.google.com/site/shersinghbisht/
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रोफेस्सर शेर सिंह बिष्ट जी यह कविता उनकी किताब भारत माता से लिया गया है!

जय हात


भो यादोक उज्याव जब बै

नौ त्यरै कान पडै
बिद बादै त्यरै नामक
धूप बाती तेरी करै!

छया छवाई कुलंकारी

'हरज्यु' कैला दुड़ा,
दुंगाराका बुड़ा देवा
मंदिर त्यरै देखै!

बैसी छः मासी जब लै

नौताड त्यरै देखै,
चौरगाई का पुछे लै,
आई बाई त्वैल झाडे!

ढाव् णई रेई आंसू!

नौ त्यरै जपै
डुबण नौ मेरी
पार तवील करै!

छतीस रौतान, बतीस पौरुड़ी

संग त्यारै हिटनी
सैम गोरिया देवा
नौ त्यार जपनी!

यो छु मेरी गौक पूजी

तयार नाम चडै,
जौ हात, त्वेही खुटौ पड़ी
दुःख सब हरै

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रोफेस्सर एस एस बिष्ट द्वारा रचित यह कुमाउनी  कविता  'बाट'

बाट

चौबट्टी में  ठाड़
कौंक छे बटोवा!
कां जाणी छे!
इथके  चावा,
भाभरकि चारि
भभरी जै रौछे!
चक्रब्यू में]
रिड़ोली जै रौछे !


बाटे बाट यो 
चौतरफ जौ,
मली के बाट !
कैलाश हिमाल
इड़ा पिंगलाक
ठाड़ उकाव
महायात्रा में
योगमाया साथ
बहम सरोवर
शिव बरोबर!

तली के बाट 
मनाक गद्यार
चचोड़ी रवाल
बैतरनी नाल

हाव में घोलानी जस 
अन्यारली चयापीण जस
मनकी चंचल कुठडि पण
चिताइण खुसुके उन जस!

का हराणों हात में 
वरदानी शिव जै
कौ बिलाणों एतिपण
चमकनी ओस जै !
चिताइणों हितण जै!
ने देखींण बजाव जै!

मनखियेकी डर
मंखियेकी भीतर
झीलारवांण में जस बंद!
पडनई कलजुगी डंड!

जब ले चाणो भेर के 
रैवेबेर चाबुकोकी मार
फ़रकीणी  ल्वे तौराने
भराण जै भीतर कै!

च्यापीनौ  कभे!
भुखाक पात्रो में
बगनौ खूनकी गाड़
आसुक तोड़ाड़ में !

फिरि लगे, कभे कभे
संसारकी कच्यार पण
उनै अणकसी  खुशबु जै
कैलाशाकि दि धूपकी जै!

रववे ढके जाणो
भूख नाग्डी लाशो कै
दिणों सहार कभे
बुड खान हातो के !

पर डरलि कैकी 
छाती ताणी सामणि
शेव में साकार
हूँ किले न रै!

नौताड में अवतार 
लौटूण है बसंत
राजकुमार क्वे
उण किले न  रै !



   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


शेर दा अनपड़ यह एक बहुत अछी कविता है जिसे बिष्ट साब ने आपनी किताब शेर दा अनपड़ संचयन में लिखा है! कविता शीर्षक है तुम और हम

तुम और हम

तुम भया ग्वाव गुसै
हम भयां निगाव गुसै!

तुम सुख में लोटी रैया
हम दुःख में पोती रैया!

तुमि हरी काकाड जास!
हम सुकी लकाड़ जास !

तुम आज़ाद छोड़ी जत्ती (भैसा)  जास
हम गोठाई बाकर जास!

तुम स्वर्ग, हम नरक
धरती में, धरती आसमान क फरक!

तुमार थाइन सुनुक रुवाट
हमरी था इन टुवाट टुवाट !

तुम धुकवे चार खुश!
हम जिबाई भितेर मुस!

तुम तड़क भड़क में
हम बीच सड़क में !


तुम सिहासन भै रैया
हम घर घाट है भै रैया!