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Articles & Poem on Uttarakhand By Brijendra Negi-ब्रिजेन्द्र नेगी की कविताये

Started by Brijendra Negi, August 17, 2012, 01:27:49 AM

Brijendra Negi

कच्ची


    (70)

क्वी पासबुक का पन्ना फरकान्द
क्वी कीसा जपकान्द सच्ची,
क्वी अगाल-पगाल, हत्थ-पैछी
दिनभर ख्वजणा रंदी सच्ची,

क्वी कूड़ी-पुंगड़ी बेची पीणू
क्वी कर्ज-पात खुज्याणू रैन्द,
क्वी कज्यणी का गैणा बेची
म्वाल ल्यन्दी पक्की-कच्ची।


    (71)

उन त मीखुण सब्बि लोग
दलित ब्वल्दी यख सच्ची,
दिन मा जो पाणि भ्वरदीं
नल ध्वेकी म्यारु बाद सच्ची,

पाणि पिंदी, प्याज खन्दी
म्यारु घार मा वो सब्बि,
राति लुकि-लुकि अन्दी जब,
पीणा खुण म्यारु घार कच्ची।

क्रमश.......

Brijendra Negi

कच्ची


    (72)

दिन मा बामण, जजमान, दलित
अलग-अलग रन्दी सच्ची,
राति गर्र कट्ठा हुन्दी
पीणा खुण ईं कच्ची,

जाँत-पाँत दूर करान्द
भयात बढ़ान्द य सच्ची,
मिल बैठी पिंदी सब्बि
जब राति मेरि ईं कच्ची।


    (73)

न ईंकि क्वी जुबान चा
न क्वी पछ्याण सच्ची,
फिर्भी ढकणी खुल्दी ईंकि
बिरणा अपणा ह्वे जंदी सच्ची,

न रिस्ता द्यखदी, न नातु
न जाती द्यखदी, न थाती,
एक घूंट मा कना-कन्नो थै
मिला  दीन्द य कच्ची।


    (74)

पलभर मा दोस्त थै दुश्मन
दुश्मन थै दोस्त बणान्द सच्ची,
द्वी बूंद  उतरदी  जिकुड़ी मा
सब-कुछ भुला दीन्द य सच्ची,

कभि स्वसुर-ब्वारि मा घमासान
कभि लड़िक-ब्वारि मा रण-मंडाण,
दिन मा कत्गै दा रिस्तों थै
त्वड्द – ज्वड्द या कच्ची।


क्रमश...

Brijendra Negi

कच्ची


    (75)

पक्की मिलणी सौंगु नी चा
मैंगी भि मिल्द सच्ची,
बक्त पर मीलि नि मीलि
बेजिति ह्वे जान्द सच्ची,

पक्की दारू खुज्याण प्वड़दा
गाँ – गाँ फ़ौज्यूँ मा जाकि,
मिलणा कु भंरोसु नि रैन्दु
हर बक्त हाजिर चा कच्ची।


    (76)

पक्की मिल्द भौत मैंगी
वेमा भि मिलावट सच्ची,
ढकणी खोली पाणि मिलाकि
उन्नी बंद कैर दिन्दी सच्ची,

सर्या बोतल सड़का कैकि,
नशा नि हून्दु जर्रा भि,
ये से अच्छु सस्तु मा
कै गुणा अच्छी या कच्ची।


क्रमश......... 

Brijendra Negi

कच्ची



    (77)

पक्की कु भंरोसु नी चा
कच्ची कु भंरोसु सच्ची,
बड़ी दुकानि कि फीकि मिठै
जन्नि पक्की यख सच्ची,

बड़ी बेशर्म, निर्लज्ज चा,
यख बणण वलि कच्ची,
हर कैकु ब्यूँत  मा
सट्ट समा जान्द य कच्ची।


    (78)

ईं कच्ची मा बड़ा-बड़ा गुण
तुम थै गिणान्दु मि सच्ची,
लाख दुखूँ कि एक दवै चा
सच्ची मेरि य  कच्ची,

घूस-रिस्पत जख काम नि आन्दी
जाण-पछ्याण कि शरम नि हून्दी,
क्वी भि रस्ता जख नि मिल्दु
वख रस्ता खुज्यांद य कच्ची।


क्र्मश .......

Brijendra Negi

कच्ची



    (79)

कंटरी, बोतल, अध्या अर
पव्वा मा भि मिल्द कच्ची,
कत्गै दा छम्वटु लगा कै
पीन्दा मिल्दी यख कच्ची,

अजकाल ब्या-कारिजूँ मा
पंगत मा बैठी मिल्द अफ्वी,
कुछ क्वल्णो खड्या-खड़ी
नीट सड़कंदी कच्ची।


    (80)

बणाण वलु सौ गुण गिणान्द
पीणु वलु दस फैदा सच्ची,
ठ्यकादार पैसा बणान्द
बाकी मड़घट जयां सच्ची,

क्वी अप्णी शान मा पीणु
क्वी शौक मा पीणु सच्ची,
झूठी शान-शौक मा तौंका
खून मा रच ग्या कच्ची।


क्रमश........

Brijendra Negi

कच्ची



    (81)

खून मा रचा-बसा कै
नशा कु गुलाम हवेगीं सच्ची,
बिना नशा का ये शरब्बी
अपाहिज ह्वे ग्यीन सच्ची,

हत्थ-खुट्टा तंगत्याट कर्दी
बिना नशा कर्यां यूंका,
राति सिंदी पेकी कच्ची,
निन्द खुल्दी चैन्द कच्ची।


    (82)

सेवा-सौंलि मा कच्ची यख
सौं-करार मा कच्ची,
तड़क-भड़क मा कच्ची यख
दैल-फैल मा  कच्ची,

झर-फर कु झरोखा कच्ची
अतै-बितै मा आर-सार कच्ची,
उदेल-उखेल कु रस्ता कच्ची,
छोरा-छपार कि जननि कच्ची।


क्रमश.......... 

Brijendra Negi

कच्ची



    (83)

निर्भगि, निरस्सा, निकज्जू
पिंदी दिन-रात कच्ची,
कुटमदारी थै बेलि प्वड़ी छीं
निखणी करीं यूंकी  सच्ची,

निठुरा, निगुरा, नकटंटा, नक्कट्टा
इक्खु ढाल पुजदी  सब्बि,
निमटणा छीं एक-एक कैकि
बक्त से पैलि पेकि कच्ची।


    (84)

पक्की पेकि भि जिकुड़ी फुकेन्द
जिकुड़ी फुकेन्द पेकि कच्ची,
पक्की भौत मैंगी चा यख
वेका चौथाई मा  कच्ची,

द्विया पेकि टिकट कटेन्द
पक्की ह्वा चाहे  कच्ची,
परलोक जाणकु यक्खु रस्ता
फिर टिकट ल्हे पेकि कच्ची।


क्रमश...........   

Brijendra Negi

कच्ची



    (85)

भूख-तीस लग्दि नीचा
हर बक्त चैन्द कच्ची,
दिनभर भतका-भतकी खन्दी
राति कज्यणि थिच्दी सच्ची,

कैका ल्वाड़ा ल भट्यूड़ टूटीं
कैका मुंगरा ल कमर थिच्ची,
क्वी लत्ती - लत्यूँल लत्या
फिर्भी नि छुटी य कच्ची।


    (86)

टी.बी. बिमरी ल म्वार क्वी
क्वी जैर – बुखार मा तच्ची,
किडनी फेल ह्वीन कैकि
अधाधुन्द पेकि कच्ची,

क्वी भ्यटक लमड कै म्वार
कैकु हाडफेल ह्वे ग्याई सच्ची,
क्वी सियूँ कु सियूँ रै ग्याई
दिन-रात यख पेकि कच्ची।


क्रमश........

Brijendra Negi

कच्ची


    (87)

फिर्भि अकल नि आणी चा
ऐथर-पैथर वलों थै सच्ची,
सिक्कासैर कना छीं निर्भगि
पीणा खुण ईं निर्लज्ज कच्ची,

खंड-मंड ह्वेगीं घर-बार
नौन्याल छ्वारा ह्वेगीं कतगै,
क्ज्यण्यू थै भरी ज्वनी मा
बिधवा बणाणी य कच्ची।


    (88)

न कैर सिक्कासैर वूँकि
जौमा बेमानी कु पैसा सच्ची,
किद्वलु गुर्रा कि सिक्कासैर मा
तकणे–तकणे कि म्वार सच्ची,

बक्त-कुबक्त पुछदी त्वेथै
अध्या-पव्वा कीसन्द रड़ाकि,
खुद छप्पन पक्वान खाणा छीं
तु लूण चाटी पीन्दि कच्ची।


क्रमश...........

Brijendra Negi

कच्ची



    (89)

अपणू भूला, अफ्वी धूला
हैंका थै क्य गर्ज सच्ची,
जिकुड़ी तेरि अप्णि फुकेन्द
निखाणि-निलाणी भि तेरि सच्ची,

तेरि कज्याण हत्थ पसरनी
नौन्याल भूखा तिसला रिंगणा,
खुद ट्वटुकु मुंड प्वड्यू रैन्दी
दिन-रात पेकि पक्की-कच्ची।


    (90)

शरमदारूँ खुण शरम भौत चा
बेशर्मू कु क्य पखड़न सच्ची,
वूंकी सिक्कासैर न कैर छुछा
जौंल ईमान भि बेच द्या सच्ची,

जत्गा डडे ग्ये क्वी बात नीचा
बाकि त फुण्ड गाड़ छुछा,
मौ बारा अर कुकर अठारा
जन्नि हालत तेरि पेकि कच्ची।

क्रमश ..........