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Manglesh Dabral Poems - मंगलेश डबराल जी की कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 17, 2013, 10:44:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

परछाईं / मंगलेश डबराल

परछाईं उतनी ही जीवित है
जितने तुम

तुम्हारे आगे-पीछे
या तुम्हारे भीतर छिपी हुई
या वहाँ जहाँ से तुम चले गये हो ।

(रचनाकाल :1975)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मकान / मंगलेश डबराल
यह मकान सारा कुछ छिपाये हुए है
अपने अंधकार में औरत
औरत का स्वप्न
औरत का बच्चा
औरत की मौत ।

(रचनाकाल : 1975)