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Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 08, 2014, 08:15:59 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
8 hours ago
कैकी लागि नजर कैकी

कैकी लागि नजर कैकी
मेरा पाडे थे ये उकाले थे
कैकी लागि नजर कैकी

रीती हुन लगि डंडी कंठी मेरी
रीती रैगे कैगे विंथे अपरा और्री मेर नजर

कैकी लागि नजर कैकी
मेरा पाडे थे ये हिमाले थे
कैकी लागि नजर कैकी

सरया बस्ग्याल सरग बी रुंदु रैंदु अब
सुरंगों और्री डैमों नि खैणु डाम्युं जब

कैकी लागि नजर कैकी
मेरा पाडे थे ये गौंऊ गोठ्यारों थे
कैकी लागि नजर कैकी

देबता कन रूठ्यां मेरा मेसे
मेर भूमि मा कैकु हंत्या दोष लग्यां

कैकी लागि नजर कैकी
मेरा पाडे थे ये देवों की भूमि थे
कैकी लागि नजर कैकी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 15
बस्ग्याल को मैना किले तिल काल रूप धैरा

बस्ग्याल को मैना किले तिल काल रूप धैरा
कंन उथल पुथल मची च ऐबार ये मेर पहाड़ा
किले की उठनी च इनि ये बोई गंगा की धारा

बादल कीले बीरडया किले की इन चिरडया व्हाला
फटना छन बोई किले ऊ ऐकी ये मेर पहाड़ा
किले की उठनी च इनि ये बोई गंगा की धारा

कु जैन कै बगता कब कै कु काल ऐ जैई
नि ठिकाण नि खबर कैथे अब ये मेर पहाड़ा
किले की उठनी च इनि ये बोई गंगा की धारा

डरी डरी जिकोड़ी च सिन्कोली ऐ जा डेरा
डेरा की बी च खैर निच कया व्हैजालु ये मेर पहाड़ा
किले की उठनी च इनि ये बोई गंगा की धारा

बस्ग्याल को मैना किले तिल काल रूप धैरा
कंन उथल पुथल मची च ऐबार ये मेर पहाड़ा
किले की उठनी च इनि ये बोई गंगा की धारा


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 14
ऐगे दिन चली गैनी

कण मेरु भाग
ऐगे दिन चली गैनी कैकु दैन हाक
ये उन्दरु की बाट अ
कण मेरु भाग

कया दिन च कया बार
कु जैनी कु बथालु मी ये भगयान
कु देलू आखर ज्ञान
इन मेरु भाग

बैठी छों मी हेरदी
काली राता का ये गेना घेरदी
कु चढलू उकालु
कण मेरु भाग

अगंवाल भेंटि जा रे
सिन्कोली तू परती की आ रे
कु आलू ये दार अ
इन मेरु भाग

कण मेरु भाग
ऐगे दिन चली गैनी कैकु दैन हाक
ये उन्दरु की बाट अ
कण मेरु भाग

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 13
बिंदी मेरी

बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी
कपला ये हिंवाल पहाड़ मा तू कन दमकी
बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी

बिन्सरी बेला की रीत ये अबोला की
उजाळु ऐंदू जांदू जी अंधेरु छैटू जांदू जी
अदमुख इनि लागि वा बद्री-केदार का घारा जी
बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी
कपला ये हिंवाल पहाड़ मा तू कन दमकी
बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी

फूलों फुलेरा जी गद्नियों बगेरा जी
डंडी कंठी हैरी चमकनी खोलों तक चमकेरा जी
उठी जा जागी जा सियां रे ऐगे सुबेरा देबता जी
बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी
कपला ये हिंवाल पहाड़ मा तू कन दमकी
बिंदी बिंदी बिंदी मेरी चम चमकी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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माँ भगोती

माँ नंदा नंदा माँ माँ भगोती
मेर लाडो झट ऐजा तेरा मैती माँ बाट जोहोती

बारा बरस ते थे हेरदी अांखा माँ
ये हिंवाळु कैलाश छोड़ी दरस दे जा माँ
देक सबुन हात जोडी

माँ नंदा नंदा माँ माँ भगोती
मेर लाडो झट ऐजा तेरा मैती माँ बाट जोहोती

उत्तराखंड पह्ड़ा की बेटी माँ
देक त्यार स्वागत मा सजी गे माँ डंडी कंठी
तू टक ऐजा दौड़ी

माँ नंदा नंदा माँ माँ भगोती
मेर लाडो झट ऐजा तेरा मैती माँ बाट जोहोती

देक भेंटि जा अपरा मैती बोई बाब
दादा भुलु अपरू ये समाज थे ये बोई माँ
खेली जा यक हैंसी खेली

माँ नंदा नंदा माँ माँ भगोती
मेर लाडो झट ऐजा तेरा मैती माँ बाट जोहोती

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 22
कैना सपोड़ा सपोड़ी

ऐ जावा ...२
कैना सपोड़ा सपोड़ी
ढुंगु खुटु कपाल थे फोडी

किले की झट खानु वहलू
कै उछेदी काम रैगे व्हालु

दाल भात घीयु की जोडी
कैरयाल मिन लपोड़ा सपोडी

ककुर जात बनि की घोड़ो
उंबरा कन सज आनि ऐ बौडी

बालपण की देक ले खोडी
गीची को गफा ओरे बोबा की याद ऐगे तेथे

ऐ जावा ...२
कैना सपोड़ा सपोड़ी
ढुंगु खुटु कपाल थे फोडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
August 21
रुनु रेंदु मी

रुनु रेंदु मी
सदनी कु मेरु भाग्य
कैन कैल हंसेंन मी
बस देखेंदु दूर जांदू बाटू तेरु

तिमला का पाता ...अ अ
ये तिमला का पाता
तिल दिनी साथा ये तिमला का पाता
तू भ्राता तू भूकी पौटी कु मेरु अन्नदाता
ये तिमला का पाता

कंडली कु सागा ...अ अ
ये कंडली कु सागा
मार भी खैल खुभ कंडली मिल झम झम
तू मेर गरीबी कु गेल्या तू मेर छैलया
ये कंडली कु सागा

आलू का झोल ...अ अ
ये आलू का झोल
गोल गोल खुभ मेरु माटु को ढोल
तू च मेरु जोश तू च मेरु होश
ये आलू का झोल

रुनु रेंदु मी
सदनी कु मेरु भाग्य
कैन कैल हंसेंन मी
बस देखेंदु दूर जांदू बाटू तेरु

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जोंला पल्या डंडा पार मा

बोबा मेरु क्ख्क छे तू
ऐजा घार मा
बोगान लग्युं अपरू पाडा
ये बगदी न्यार मा

बादल फ़टी
रौड़ी ले गैयाँ गौं गोठ्यार थे
बोई की जिकोड़ी धक व्हाई
ये बात व्हाई पल्या डंडा पार मा

कन आपदा विपदा छे या धरा
थमना को नौउ नि लेणी
अपरा खुठी अपणा ही हिटण
कैल नि आण हत लगाण मा

दोई आंस दोई बोल ही
भैर भ्तेक बल ऊं गिच फुटण
हरी बारी ये उकाल बार मा
क़मरी मेर कस ले जोंला पल्या डंडा पार मा

बोबा मेरु क्ख्क छे तू
ऐजा घार मा
बोगान लग्युं अपरू पाडा
ये बगदी न्यार मा

एक उत्तराखंडी

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August 19
कैकी लागि नजर कैकी

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कैकी लागि नजर कैकी

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कैकी लागि नजर कैकी
मेरा पाडे थे ये गौंऊ गोठ्यारों थे
कैकी लागि नजर कैकी

देबता कन रूठ्यां मेरा मेसे
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तू देके ना ना देके तू

तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च
कन कै धैरुँ सम्भली की ये माया
तू ऐ की बथे जा तू
तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च..................

धड धड कैन्दी रैन्दी च
ईं की आसा तेर खैलू मा
ऐजा छुईं लगे जा मै से
ऐकी ईं जीयु की डंडा धारु मा
तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च..................

तैसे बोलूं कन के गिची खुलूँ
तू ई ऐकि ईं की छुईं बिंग ले ना
जिकोड़ो कन कैकी तू बोलली
चार लोकों की समण मा
तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च..................

तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च
कन कै धैरुँ सम्भली की ये माया
तू ऐ की बथे जा तू
तू देके ना ना देके तू
ईं जिकोड़ी मा कया हुंदु च..................

एक उत्तराखंडी

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