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Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 08, 2014, 08:15:59 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 23 at 5:44am · Edited ·

खुद लगींच च ये घारा की

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

तिबरी डांड्याला की
चौक छनि ग्वैरा स्यारा की
कन के गुजरी हुलु कन व्हालु वों कु हाल
गुजरी गे व्हालु अब बस्ग्याल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

घुघती घूर घुर वो हिलांस उडी आकास की
काफल किन्गोड़ा चख्या बेडू पाको बारा मासा की
कौथिक कु बारा तिज-तियोहरा की
कैल कैल कै हुलु मी याद
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

चैत की ऐगे छैगे वाह्ली ब्यार
स्वामी आणा वहला सब का छूटी मा घार
फागुन मची वाहली हुलयार
मेर गलुडी थे कु रांगाल
ऐ बार बी ऐच ये ख्याल ये पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की
ये कुमो गढ़वाल की
यूँ चलूँ ह्युंद जम्युं पहाड़ की
कब जोंलु भुलु मी घार
खुद लगींच च ये घारा की ......

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 22 at 7:53am ·

संभाली नि सैकी मन

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

खोजी खोजी तिले कख मन
कख कख खोजी तिल यख बथा
बथों दगडी कै अकास उडी
कै संगी तिल यख बगत बिता
संभाली नि सैकी मन......

एक दिनी सबल यख यकलु रै जाणा
तिल संभाली , खोजी की कया पान
सपनियु कु ये जग जंजाल मा
रे मन तिल खौलयूं खौलयूं रै जाण
संभाली नि सैकी मन......

हात पकड़ी कु ये मेरु मन
बथा कै बाटा कै उकाल उन्दार हिटान
मोरी जालु कया पालु मेरु मन
अब त अपरा थे तू खुद समजा दे
संभाली नि सैकी मन......

संभाली नि सैकी मन
किले तिल नि संभाली सकी बथा
जिकडो कु तू इन सरा सर मा
आंसूं किले बगाली बथा
संभाली नि सैकी मन......

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 20 at 9:07am ·

मिल जबै मीथै खोजी

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

रै मी अपरी पास सदनी
अपरा थे भी नि मी जाणा पाई
कमै मिल खुभ ये टक्का
पर वोंको मोल भी नि मी जाणा पाई
मिल जबै मीथै खोजी .........

जीकोडी कण तेर दुकदुकी रे
अपरुँ दगडी भी तू नि रै पाई
रै सदनी ये सरीर भित्रा भितर
एक बेल तू भी कैगे मीथे बिराणि
मिल जबै मीथै खोजी .........

अब मिली त किले मिली मीथै
जब सब ध्यणी व्हैगै हैंक कैकि
जल्म मेरु इनि फुंड तू खती गैई
हाक मारू त मारू अब क्ख्क मी
मिल जबै मीथै खोजी .........

मिल जबै मीथै खोजी
मी नी मिल मीथैई क्ख्क भी
कै बाटा मी हर्ची गयुं
खवैगे मेर लिखे वा पर्ची
मिल जबै मीथै खोजी .........

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
December 18 at 6:31am ·

आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

बिंगणु नि यख क्वी अपरा गै ई
अपरा गै ई क्ख्क हर्ची रे हर्ची गे ये सारी
सुनदा नि पाणि बिसी गै ई
बिस्दा बिस्दा अपरू की खुद नि बिसी गै ई
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

क्द्गा बी तू बोगी पाणी
क्द्गा बी बोगी पाणी कैल नि सुणु नि सुणु तेरु पाणी
संसार ते थे जपै माया जपै माया संसार ते थे
हात तेरी नि ऐई कुच जपै तिल कया पाई माया संसार से
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

आँखों कु पाणी बगदा रे ई
बगदा रे बग्ने से कदी तिन हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई
लाटी ई जवानि दौडी दी रे ई
जिकडो रे ते न दौड़ दौडी की कदी हार नि मानी
आँखों कु पाणी बगदा रे ई

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
19 hrs ·
·

समय रथ का पहिया चलता चल

समय रथ का पहिया चलता चल
सुख दुःख सबके बीनता है बीनता चल
समय रथ का पहिया चलता चल

बहती गंगा की धार कहे निर्मल
आज तेरा ये पल ,पल में हो जायेगा कल
समय रथ का पहिया चलता चल

फिर भी कुछ ना माने ना कहे ये मन
उड़ चला ... २ तू किधर ये नील गगन
समय रथ का पहिया चलता चल

लिख दिया उसने तेरा आज और कल
बावला बन फिरता बन बन तू किस वन
समय रथ का पहिया चलता चल

समय रथ का पहिया चलता चल
सुख दुःख सबके बीनता है बीनता चल
समय रथ का पहिया चलता चल

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26 at 12:08pm · Edited ·

इस उम्र में भी

इस उम्र में भी
दबे जज्बात उभरने ने लगे
देखकर आप को
हम क्यों जाने ऐसे मचलने लगे
इस उम्र में भी

सोये थे कहाँ क्या पता अब तक वो
दिल के किस कोने में उन्हें मार रखा था
आँखें लड़ी थी बीते बरसों लकड़पन में
उन आँखों की यादों को संभल रखा था
इस उम्र में भी

अहसास वो ही है ,वो पहला प्यार वो ही है
गिरी थी प्रेम की बारिश,वो बूंदों की बौछार वो ही है
मै भी तू भी वो ही है और ये समा भी वो ही है
उसी राह पर मोड़े थे कभी कदम हमने अब भी खड़े वहीँ है
इस उम्र में भी

कुछ ना रह जाता ये जाना हमने अब है
बूढी सांसें कह रही है तेरा इन्तजार अब है
रिश्तों के बंदिशों की वो बंधी लगाम हम पर अब भी है
इस उम्र में भी तेरे हिस्से का बचा रखा वो प्यार अब भी है
इस उम्र में भी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26 ·
·

ऐ भी जा

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

मेरु , तेरु जिकोड कु ,बौल्या रे अपरी सीमा कया च
ये त ये च तेरु , और्री मेरु और्री ऐ कु कया च
जाण ले जाण जा रे ऐ अपरू नातू पहाड़ कु
सैर थे कर बिदा

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

देक ले जै थे बी यख , तेरु जणी देख्णु किले
जाण ले पछाँण ले अपरुँ थे अब तू पछाँण ले
कनी बोलुं, ते बिगेर कनि च मेरु पहाड़
भुला रे चल परती फिर

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Geeta Chandola and 125 others
December 30, 2014 at 4:47am ·

मेरु पहाड़ मेरु संगे

मेरु पहाड़ मेरु संगे
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन कांडा पौड़ी यख
तू बी क्ख्क रौडी गे गंगे
यूँ ह्यूं चलूँ थे यकलू
तू बी क्ख्क छोड़ी गे गंगे
अपरू झोळू अपरू संगे
भगा अपरू ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

इन जली हम यकुला ही
क्वी हम थे ठंडो करी ना पैई ना
घुम्या दोई यकुलाई ये
अपरा क्वी यख छेई ना
जनी ये घाम जनि छाया
एक साथ जनि कबी ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन जुनि ये कन जुनि मी
कै बाटा मा हम हिटण ना लग्यां
ना मिली मी ना मिली ये हम थे
जो बाटा कबि हुम्लु थे बनया
क्ख्क बिरदी व्हाली वा माया
ये जिकोडी हम थी मिलली ना
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

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क्ख्क लुकी गयं तुम

ऐ रे गेल्या ......
क्ख्क लुकी गयं तुम
मेरी जिकोड़ी चुरेकी
बुरडी व्हैग्युं मि यख
तुमरि बाटा हेर हेरी की
ऐ रे गेल्या ......

कन के हर्ची ऐ मेर जिकोड़ी
तुम दगडी नजरि मिलेकी
अब नि रे ये मेर दुक दुकी
अब त व्हैग्याई बस जी तेरी

ऐ रे गेल्या ......
क्ख्क लुकी गयं तुम
मेरी जिकोड़ी चुरेकी
बुरडी व्हैग्युं मि यख
तुमरि बाटा हेर हेरी की
ऐ रे गेल्या ......

कन जादू के तैन
ये मेर निर्भगी काया पर
में पास व्हैकि बी
नि रैगे औ अब मेरी

ऐ रे गेल्या ......
क्ख्क लुकी गयं तुम
मेरी जिकोड़ी चुरेकी
बुरडी व्हैग्युं मि यख
तुमरि बाटा हेर हेरी की
ऐ रे गेल्या ......

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मेरु पहाड़ मेरु संगे

मेरु पहाड़ मेरु संगे
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन कांडा पौड़ी यख
तू बी क्ख्क रौडी गे गंगे
यूँ ह्यूं चलूँ थे यकलू
तू बी क्ख्क छोड़ी गे गंगे
अपरू झोळू अपरू संगे
भगा अपरू ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

इन जली हम यकुला ही
क्वी हम थे ठंडो करी ना पैई ना
घुम्या दोई यकुलाई ये
अपरा क्वी यख छेई ना
जनी ये घाम जनि छाया
एक साथ जनि कबी ना मिलने
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

कन जुनि ये कन जुनि मी
कै बाटा मा हम हिटण ना लग्यां
ना मिली मी ना मिली ये हम थे
जो बाटा कबि हुम्लु थे बनया
क्ख्क बिरदी व्हाली वा माया
ये जिकोडी हम थी मिलली ना
दुकी पण क्वी नि संगे
सुक ना देकि यक कबि हमने
मेरु पहाड़ मेरु संगे
यकलु यो यकलू मी
ना क्वी हम थे मिलने

एक उत्तराखंडी
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