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Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 10, 2007, 01:13:01 PM

अरुण भंडारी / Arun Bhandari

मेहता जी ये तो अब तभी पता चल पायेगा जब लोगो के हाथो से नैनो चलेगी पहाडो में....

अरुण भंडारी / Arun Bhandari

चीनी मोबाइल हैंडसेट पर लगी रोक

सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे चीनी मोबाइल फोन पर अब सरकार मोबाइल फोन ऑपरेटरों के जरिए शिकंजा कसने जा रही है। सरकार ने सभी मोबाइल फोन ऑपरेटरों से कहा है कि अगर उनका कोई ग्राहक बिना इंटरनैशनल मोबाइल इक्विपमंट आइडंटिटी (आईएमईआई) वाला फोन इस्तेमाल कर रहा है तो यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे उसका फोन तुरंत बंद कर दें। अगर ऑपरेटर ऐसे कनेक्शन बंद नहीं करेंगे तो सरकार उन पर ऐसे हर कनेक्शन के लिए प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाएगी।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक टेलिकॉम डिपार्टमंट ने सभी मोबाइल ऑपरेटरों को इस बारे में अधिसूचना भेज दी है। जुर्माने की शुरुआत 6 जनवरी 2009 से बताई गई है। हर 15 दिन बाद जुर्माना दोगुना कर दिया जाएगा। यह प्रक्रिया 15 अप्रैल 2009 तक चलेगी। अगर इस अवधि में भी मोबाइल ऑपरेटरों ने बिना आईएमईआई मोबाइल सेट वाले कनेक्शन बंद नहीं किए तो फिर 15 अप्रैल के बाद वे एक भी नया कनेक्शन जारी नहीं कर पाएंगे।

उल्लेखनीय है कि सुरक्षा एजंसियां लगातार यह मुद्दा उठा रही हैं कि जो लोग बिना आईएमईआई नंबर वाला चीनी मोबाइल इस्तेमाल कर रहे हैं, उनका कनेक्शन तुरंत काट दिया जाना चाहिए। सुरक्षा एजंसियां ऐसे फोनों को इसलिए सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बता रही हैं, क्योंकि इनका पता लगाना संभव नहीं होता है। चीन में बने हजारों मोबाइल फोनों में या तो आईएमईआई नंबर होता ही नहीं है या फिर हजारों सेटों पर एक ही नंबर होता है।

गृह मंत्रालय ने इस बारे में सभी राज्य सरकारों को भी सतर्क किया था। कुछ राज्यों ने तो चीनी मोबाइल फोन जब्त करना भी शुरू कर दिया था। यूपी ने सबसे पहले शुरुआत की थी। सुरक्षा एजंसियों के मुताबिक चीनी फोनों का इस्तेमाल आतंकी कर रहे हैं। हैदराबाद की मक्का मस्जिद में विस्फोट के लिए ऐसे ही फोन का इस्तेमाल किया गया था। इस मामले में आज तक जांच एजंसियां अभियुक्तों तक नहीं पहुंच पाई है।

टेलिकम्यूनिकेशन उपकरण बनाने वाली चीनी कंपनियों पर सुरक्षा एजंसियों की पैनी नजर है। ऐसी दो प्रमुख कंपनियों के बारे में केंद को सूचित किया गया है कि चीनी कंपनियां अपने उपकरणों के जरिए जासूसी कर रही हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

My Gods , Your Gods  and Our Gods           Mrinal Pande

The ugly fracas over the unceremonious removal of traditional Indian priests from the precincts of the Pashupatinath temple  by the Maobadi troops of Pushpkamal Dahal , 'Prachand' , is mercifully over now . And prayers and rituals of worship to Lord Pashupatinath have been resumed after sharp protests both within and outside Nepal . The whole episode has left the devout on both sides of the Indo Nepal border anxious .Lore has it that Adi Shankaracharya , in an attempt to mark the boundaries of the faith and also integrate Hindus under the Satvika tradition (that frowned on animal sacrifices and offering liquor at the temple),  had begun the tradition of appointing  Namboodiri priests from Kerala at the Badrinath temple in the central Himalayas , Maharashtrian priests for Rameswaram temple in the south and  Kannadiga priests for the Pashupatinath temple in Nepal. Ever since (for two and a half centuries) , the Seer at the Sringeri Peeth in Karnataka , has been recruiting suitable  priests for the temple in Nepal after receiving a formal request from the Pashupatinath Development Authority at Kathmandu . The priests are usually selected from among the Bhatt Brahmin families only after their erudition and adherence to the philosophy of Adi Shankaracharya , the founder of the Peeth , have been tested .  Since time immemorial , much before Adi Shankaracharya undertook  his historic march from Kerala to the Himalayas to integrate followers of the Sanatan Dharma , ordinary folk on both sides of the Indo Nepalese border in the central Himalayan region, have been sharing dozens of local and family gods ( Kul Devta ) and demi gods whose temples dot the whole area . Fairs are regularly held , processions are taken out and the pilgrims housed in Dharmshalas  at the temple precincts without any fuss year after year . On Makar Samkranti on 14th January this year , believers will gather to celebrate a fair devoted to lord Chaumu at Pancheswar in the beautiful Champavat valley in Uttarakhand . Chaumu is the divine lord of the entire region and is known as the lord of justice . Each one of Chaumu's  seven brother has a temple of his own . Four of these are in Nepal and three in India . In Tanak pur at the temple of goddess Poornagiri both the Nepalese and the Indians have been making offerings to the Devi who is  their family goddess . During the nine day Navratri festival during Fall , the Indo Nepalese worshippers of the goddess Ransaini  similarly at the gather across the border in Nepal . The Goddess is the family deity ( Kul Devi ) of thousands . The tribes in the region have their own shared gods . Comrade Prachanda , what do we do about that ?   

Dinesh Chandra Pathak

संपादकीय: एलआईसी पर 'आस्था' में ये कैसा खेल?
23 Jan 2009, 0807 hrs IST, इकनॉमिक टाइम्स


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जीवन बीमा निगम की जीवन आस्था योजना को मिली भारी प्रतिक्रिया को किस तरह लिया जाए ? क्या यह एक बेहतरीन उत्पाद तैयार करने के लिए आस्था ने भर दी झोली (रेखांकन-सलाम)
एलआईसी को ग्राहकों द्वारा दिया गया 8000 करोड़ रुपए से ज्यादा का उपहार है ? या फिर कुछ चालाकी से और कम पारदर्शिता से बेची गई एक स्कीम का नतीजा ? हमारा जवाब दोनों में ही है।

कंपेयर करें: अलग अलग बैंक फिक्स्ड डिपोजिट पर कितना इंटरेस्ट दे रहे हैं

एलआईसी ने निश्चित तौर पर एक ऐसा उत्पाद बनाया जो अनिश्चित दौर के लिए सबसे उपयुक्त है और बाजार की नब्ज पकड़ता है- एक ऐसा उत्पाद जो निश्चित रिटर्न का वादा करता है। इसके बावजूद एलआईसी की भारी कामयाबी इस वजह से भी रही कि उसने इस योजना के लाभ के बारे में उतनी पारदर्शिता नहीं बरती है , जितनी उससे उम्मीद की जाती है।

दुर्भाग्य ही कहेंगे कि बीमा नियामक इरडा ने भी ठीक अपनी नाक के नीचे हुई इस योजना की भारी-भरकम खरीद के प्रति अपनी आंखें बंद रखीं। सतह पर देखें तो जीवन आस्था एक सिंगल प्रीमियम अश्योरेंस योजना है जिसमें परिपक्वता या मौत पर लाभ की गारंटी दी गई है। एक ऐसे माहौल में जहां बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरें घटा दी हों , ऐसा लगता है कि यह योजना दोनों ही जरूरतों को पूरी करती थी- एफडी के मुकाबले बेहतर करमुक्त रिटर्न और साथ में बीमा कवर। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इसे इतनी भारी प्रतिक्रिया क्यों मिली , हालांकि सतर्क तरीके से गणना की जाए तो सालाना रिटर्न अधिकतर मामलों में 6.75 फीसदी से 7.25 फीसदी के बीच बैठता है!

हमने हमेशा निवेशकों के तईं ज्यादा वित्तीय साक्षरता और कंपनियों के स्तर पर अधिक पारदर्शिता की वकालत की है। इसके बावजूद इसमें शक पैदा होता है कि ठीक-ठाक जानकारी रखने वाले निवेशक भी आखिर क्यों नहीं उस परदे के पीछे झांक सके जिस पर एलआईसी ने लाभ की मुहर लगा रखी थी। मसलन , यदि किसी बीमा योजना पर देय प्रीमियम तय राशि के 20 फीसदी से ज्यादा होता है , तो बीमा की प्रक्रिया करारोपण के योग्य हो जाती है। जीवन आस्था के मामले में एकल प्रीमियम परिपक्वता राशि से कई मामलों में 20 फीसदी से ज्यादा बैठता है और इस तरह परिपक्वता राशि पर कर लगना लाजिमी हो जाता है।

एलआईसी ने यही बात छुपाए रखी। यह समय की दरकार है कि बाजार के खिलाड़ी निवेशकों के साथ चूहा-बिल्ली की दौड़ खेल कर पैसे बनाना छोड़ें। यदि ऐसा नहीं होता है , तो नियामक संस्थाओं को तत्काल दखल देना चाहिए और उन्हें ऐसा करने को बाध्य करना चाहिए।



अरुण भंडारी / Arun Bhandari

डीयू: कॉलिजों में नहीं होगा बीकॉम पास कोर्स

डीयू तैयारी कर रही है कि कॉलिजों में सिर्फ बीकॉम (ऑनर्स) कोर्स चले और बीकॉम (पास) को केवल स्कूल ऑफ ओपन लर्निन्ग (कॉरिसपॉन्डंस) में ही चलाया जाए। जिस बीकॉम (पूर्व में बीकॉम पास) कोर्स की एक-एक सीट के लिए मारामारी होती है, अगर उस कोर्स को कॉलिजों से रुखसत करने की तैयारी हो तो यह अपने आप में बहुत ही बड़ा और अनोखा कदम है।

वाइस चांसलर प्रोफेसर दीपक पेंटल ने मंगलवार को कॉमर्स डिपार्टमेंट के सभी प्रोफेसरों, रीडरों और लेक्चररों की मीटिंग बुलाई थी। मीटिंग में उन्होंने इस योजना के बारे में बताया और इसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी करने को कहा गया। मीटिंग में प्रो-वाइस चांसलर और डीन ऑफ कॉलिजेज़ भी मौजूद थी। इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी पूर्व डीन ऑफ कॉलिजेज़ प्रोफेसर शिरीन राठौर को सौंपी गई है। खास बात यह है कि कॉमर्स डिपार्टमेंट में चलने वाले एमकॉम कोर्स को भी कॉरिसपॉन्डंस में शिफ्ट करने की योजना बनाई जा रही है। डिपार्टमेंट में इसके बदले पीजी लेवल पर प्रफेशनल कोर्सेज़ को लाने की तैयारी है।

डीयू के 55 से अधिक कॉलिजों में बीकॉम पास कोर्स चलता है और यह कोर्स स्टूडेंट्स के बीच काफी पॉप्युलर भी है। यह कोर्स करने वाले स्टूडेंट्स की संख्या 30 हजार है। लेकिन अब यूनिवर्सिटी का प्लान है कि कॉलिजों में केवल बीकॉम ऑनर्स ही चले। बहुत से स्टूडेंट्स बीकॉम ऑनर्स नहीं बल्कि पास कोर्स करना चाहते हैं, ऐसे में अगर यह प्लान लागू हो जाता है तो सबसे ज्यादा परेशानी स्टूडेंट्स को ही होगी। दूसरी ओर जिन छात्रों को कॉलेजों में बीकॉम ऑनर्स में ऐडमिशन नहीं मिलता, वे छात्र स्कूल ऑफ ओपन लर्निन्ग से यह कोर्स कर लेते हैं।

डीयू के यूनिवर्सिटी कोर्ट के सदस्य डॉ. एस. एस. राठी का कहना है कि स्कूल ऑफ ओपन लर्निन्ग से बीकॉम ऑनर्स कोर्स को हटाने की बात अव्यावहारिक है और इससे हजारों स्टूडेंट्स का नुकसान होगा। वह कहते हैं कि सीए करने वाले हजारों स्टूडेंट्स ओपन लर्निन्ग में बीकॉम ऑनर्स में ऐडमिशन लेते हैं क्योंकि इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ने पिछले साल से एक शर्त लगा दी है कि रेग्युलर ग्रैजुएशन कोर्स करने वाले सीए में ऐडमिशन नहीं ले सकते। अगर ऐसे स्टूडेंट्स को सीए के साथ-साथ बीकॉम करना है, तो उन्हें प्रिंसिपल से यह लिखवाना होता है कि वे 11 बजे तक फ्री हो जाएंगे। लेकिन प्रिंसिपल से यह सर्टिफिकेट नहीं मिल पाता। ऐसे में इन स्टूडेंट्स को कॉरिसपॉन्डंस कोर्स का सहारा लेना पड़ता है। ओपन लर्निन्ग से बीकॉम ऑनर्स कोर्स हटा दिया जाता है तो यह भी स्टूडेंट्स के लिए बड़ा आघात साबित होगा। क्योंकि सीए और ओपन लर्निन्ग से बी. कॉम. ऑनर्स करने वाले स्टूडेंट्स हाई पर्सेन्ट लाने वाले होते हैं।

जानकारों का कहना है कि बीकॉम पास और ऑनर्स कोर्स की डिमांड हर साल बढ़ रही है और यूनिवर्सिटी में ऐडमिशन प्रोसेस में सबसे अधिक कट ऑफ इन कोर्सेज़ की जाती है। ऐसे में इन दोनों कोर्सेज़ के साथ यह छेड़छाड़ की जा रही है। हालांकि कॉमर्स डिपार्टमेंट के सूत्रों का कहना है कि कॉलिजों में बीकॉम ऑनर्स कोर्स की सीटें बढ़ा दी जाएंगी और छात्र इस बेहतर कोर्स को कर सकेंगे। लेकिन यहां सवाल उठता है कि काफी स्टूडेंट्स को बीकॉम ऑनर्स कोर्स मुश्किल लगता है और इसलिए वे रेग्युलर बीकॉम पास कोर्स करते हैं।

अरुण भंडारी / Arun Bhandari

कम्प्यूटर शिक्षकों की नियुक्ति का प्रस्ताव अधर में

Jan 28, देहरादून। प्रदेश के शासकीय और अशासकीय विद्यालयों में प्रशिक्षित कम्प्यूटर शिक्षकों की नियुक्ति का प्रस्ताव अधर में है। डेढ़ वर्ष पूर्व 120 शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर शिक्षा निदेशालय से शासन को प्रस्ताव प्रेषित किया गया था, लेकिन आज तक इसे शासन की मंजूरी नहीं मिल पाई है। उधर, बीसीए, एमसीए प्रशिक्षित पदों का सृजन होने तक संविदा पर कम्प्यूटर शिक्षक तैनात करने की मांग कर रहे हैं।
विद्यार्थियों को कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षा विभाग ने शासकीय और अशासकीय स्कूलों में कम्प्यूटर तो उपलब्ध करा दिए, लेकिन इस विषय को पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक तैनात नहीं किये। स्कूलों में अन्य विषय पढ़ा रहे शिक्षकों को दो चरणों में कम्प्यूटर प्रशिक्षण दिया गया। परंतु ये शिक्षक कम्प्यूटर को विषय के रूप में पढ़ाने में सक्षम नहीं हैं। यहीं नहीं वे अपना विषय पढ़ाने में व्यस्त होते हैं। ऐसे में कम्प्यूटर पढ़ाने के लिए भी ऐसे शिक्षक अधिक समय भी नहीं दे पाते। इसने भी स्कूलों में कम्प्यूटर को बतौर विषय के रूप में पढ़ाने में दिक्कतें बढ़ाई हैं। जिन स्कूलों ने हाईस्कूल और इंटर में कम्प्यूटर को बतौर विषय पढ़ाना शुरू किया है उनमें से अधिकांश ने कम्प्यूटर पढ़ाने के लिए पीटीए के तहत शिक्षक नियुक्त किए हैं। उत्तरांचल प्रधानाचार्य परिषद के अध्यक्ष केडी भारद्वाज का कहना है कि स्कूलों में कम्प्यूटर विषय को पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की तैनाती की जानी चाहिए। अन्यथा स्कूलों में दी जाने वाली कम्प्यूटर शिक्षा केवल खानापूर्ती बनकर रह जाएगी। कम्प्यूटर प्रशिक्षित डिग्री धारक बेरोजगार संगठन के अध्यक्ष किरन सिंह चौहान और महासचिव विनोद नौटियाल का कहना है कि जब तक शासन कम्प्यूटर शिक्षकों के पदों के सृजन को लेकर स्वीकृति प्रदान करता है तब तक स्कूलों में संविदा पर कम्प्यूटर प्रशिक्षितों को संविदा पर तैनात किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अभी तक यह विषय केवल वैकल्पिक विषय के रूप में ही पढ़ाया जा रहा है और प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव में छात्र-छात्राओं को इसका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। उधर, शिक्षा उप निदेशक सीमा जौनसारी ने बताया कि शासन को पूर्णकालिक कम्प्यूटर शिक्षकों की नियुक्ति के संबंध में प्रस्ताव प्रेषित किया जा चुका है। शासन से मंजूरी मिलने के बाद ही प्रशिक्षित कम्प्यूटर शिक्षकों की नियुक्तियां की प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी।

अरुण भंडारी / Arun Bhandari

सस्ता कंप्यूटर
हमारे देश को सस्ते कंप्यूटर चाहिए और कहा जा रहा है कि यह मांग अब महज 500 रुपये में पूरी होने जा रही है। सरकार छह महीने के अंदर घर-घर में
ऐसा सस्ता लैपटॉप पहुंचाना चाहती है, जो वाई-फाई सुविधा से लैस हो, जिसकी ममॉरी जरूरत के मुताबिक बढ़ाई जा सके और जिसे लोकल एरिया नेटवर्क से भी जोड़ा जा सके। बेंगलुरु स्थित टेक्नॉलजी इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस और आईआईटी, मद्रास ने इसका प्रोटोटाइप डिजाइन कर लिया है। कुछ साल पहले सरकार ने प्रत्येक छात्र को एक लैपटॉप देने की योजना बनाई थी। उस प्रोजेक्ट में अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के निकोलस नेग्रोपोंटे के बनाए 100 डॉलर कीमत वाले लैपटॉप देने की बात थी। पर बाद में पाया गया कि छिपे खर्च मिलाकर वह लैपटॉप हमें 200 डॉलर यानी करीब दस हजार रुपयों का पड़ता। इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी।

अब पांच सौ रुपये के जिस लैपटॉप की बात हो रही है, संभव है कि आरंभ में उसकी कीमत हजार या दो हजार रुपये हो जाए, पर बड़े पैमाने पर उत्पादन होने से इसकी लागत और कीमत में कमी आ सकती है। दो राय नहीं है कि गरीब देश में कंप्यूटर साक्षरता बढ़ाने के काम में इतना सस्ता और उपयोगी कंप्यूटर क्रांति ला सकता है। मंदी के मौजूदा दौर में देश में हजारों कंप्यूटर संस्थानों से शिक्षा व ट्रेनिंग पाकर निकल रहे नौजवानों को इस अभियान से जोड़कर बेरोजगारी की समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है। उन वैज्ञानिक संगठनों में भी नई हलचल पैदा की जा सकती है, जो लाखों-करोड़ों का सरकारी अनुदान पाते हैं और उसके बदले देश को कुछ ठोस देने का अवसर खोज रहे हैं।

जिस तरह सस्ते मोबाइल और सस्ती कारों ने उपभोक्ताओं का नया बाजार बनाया और रोजगारों का सृजन किया है, वैसा ही काम सस्ते कंप्यूटर भी कर सकते हैं। खास तौर से घुमंतू सेवाओं, जन संपर्क, एजुकेशन और ई-गवर्नंस में सस्ते लैपटॉप बहुत लाभदायक हो सकते हैं। ये उन ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी पलट सकते हैं, जो डाटा एंट्री जैसे काम करना चाहती हैं। इनसे रोजगार की तलाश में ग्रामीण युवाओं का शहरों को पलायन रुक सकता है। पर योजना बनना एक बात है, उसे वास्तविकता में बदलना दूसरी।

देश में करीब डेढ़ दशक से लगातार सस्ता कंप्यूटर लाने की बात चल रही है। एक बार सिंप्यूटर के नाम से ऐसा ही शोर मचा था और चार साल पहले जेनिटिस के 'अपना पीसी' और सीएसआईआर की मदद से डिवेलप किए गए 'सॉफ्टकॉम' को लेकर ऐसी ही आशाएं जगाई गई थीं। पर ये योजनाएं और घोषणाएं हकीकत में सामने नहीं आ सकीं। ऐसा भी न हो कि यह घोषणा सस्ते कंप्यूटर की बात चलाकर अनुदान पाने तक ही सीमित रह जाए? उम्मीद करें कि इस बार ये बातें सिर्फ हवाई नहीं होंगी।

Rajen

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अरुण भंडारी / Arun Bhandari


अरुण भंडारी / Arun Bhandari

अब लाइलाज नहीं है कैंसर

कैंसर लाइलाज है, यह बात अब पुरानी हो गई है। आज कैंसर का इलाज भी संभव है, बशर्ते वक्त पर डॉक्टर की
सलाह ली जाए। डॉक्टरों का मानना है कि अडवांस मेडिकल टेक्नॉलजी की मदद से 50 फीसदी मामलों में कैंसर का कामयाब इलाज मुमकिन हो गया है। कई तरह के कैंसर का तो 90 फीसदी मामलों में इलाज संभव है। मगर जागरूकता के अभाव में अब भी ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि कैंसर ठीक नहीं हो सकता है। 80 फीसदी से ज्यादा मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब दर्द असहनीय हो जाता है।

गैलेक्सी कैंसर इंस्टिट्यूट के डाइरेक्टर डॉ. अरुण कुमार गोयल कहते हैं कि अब अपने देश में भी कैंसर की जांच और इलाज की ऐसी तकनीकें आ गई हैं कि न सिर्फ शुरुआती दौर में बीमारी का पता लगाना आसान हो गया है, बल्कि उनका इलाज भी संभव हो गया है। साथ ही, नई तकनीक और दवाओं से साइड इफेक्ट्स के चांसेज़ भी 50 फीसदी तक कम हो गए हैं। यही वजह है कि फर्स्ट स्टेज में कैंसर का क्योर रेट 90 फीसदी तक, तो सेकंड स्टेज में 70-75 फीसदी तक पहुंच गया है। डॉ. गोयल कहते हैं कि पहले शुरुआती स्टेज में बीमारी का पता नहीं चलता था, मगर अब 'पेट सीटी स्कैन' के जरिए चार साल बाद डिवेलप होने वाली बीमारी भी पकड़ में आ जाती है।

सीनियर अंकॉलजी कंसलटेंट डॉ. सुदर्शन डे कहते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में कैंसर इलाज की वे सभी मॉडर्न सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो अमेरिका के भी 20 फीसदी हॉस्पिटल में ही मौजूद हैं। लेकिन इसके बावजूद कम ही लोगों को इसका फायदा मिल पा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आज भी कैंसर को मौत की सजा जैसा समझ लिया जाता है। इस सोच को बदलने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। आज भी इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने वाले 80 फीसदी मरीज अंतिम स्टेज में होते हैं। ऐसे में, उन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है।