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Live Chat With Parashar Gaur(Father Of Uttrakhand Cinema) On 10 Sep 2008 10:00AM

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, September 07, 2008, 12:54:15 PM

Parashar Gaur

Quote from: मोहन सिंह बिष्ट/THET PAHADI on September 10, 2008, 11:14:59 AM
gaur saab sadar namskaar.. aane mai kuch der ho gaye hai maaf kariye
अरे नही बंधू  केसे बात केर रहे हो  ! देरसे आए आए तो सही .. मै किर्थार्थ होअया 


Parashar Gaur

Quote from: एम् एस मेहता /M S Mehta on September 10, 2008, 10:54:56 AM

Sir,
अब क्या बताऊ  जैसे एक बच्चा अपने माँ को याद करता ठीक वेसी  ही 

How much do u miss Dev Bhoomi Uttarakhand in Canada ?

Mukesh Joshi

नमस्कार गोड़ जी
देरी का वास्ता माफी चंदू आप से आप को स्वागत च मेरा पहाड़ फॉर्म मा
गोड़ जी
आज  का युवा गायक जे प्रकार से हमारी उत्तराखंडी  लोक संगीत को (संस्कृति) प्रचार काना छन
वाको आणा वाली पीडी और हमारा लोक संगीत पर क्या प्रभाव पडलो और ये मा सेंसर बोर्ड की क्या भूमिका च  

lagbhag har mudde per sawal jabab ho chuka hai per hum kaise aur kya kar sakte hai iske liye hame kya karna chahiye .. jaise hum uttarakhand ki film board ki hi baat kare to .. iske liye hame kya karna chahiye.. kya hum isme kuch kadam utha sakte hai ....pichale 8 saalo mai hame o nahi meela jo meelna chahiye tha...ghar ghar gaon gaon mai rajniti hone lag gaye hai......

rana ji ke do sabd hai ... aur kafi had tak ye sahi bhi hai....

त्यर पहाड़, म्यर पहाड़, होय दुखों को ड्यर पहाड़,
बुजुर्गों ले जोड़ पहाड़, राजनीति ले त्वेड़ पहाड़,
ठेकदारों ने फोड़ पहाड़, नान्तिनों ले छोड़ पहाड़।



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Sir,

Apart from a Director and you had also composed several poems and Uttarakhandi songs which were broadcasted in AIR Delhi,

A few lines u please quote here on pahad ?

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In 1967 when he was 20 years old he wrote his first Garhwali Full length Drama called "Aunsi Ki Raat" which was staged on theatre for the first time On 28th February 1969 under the banner "Pushpanjali Rangshala" . Since than he has written more than a dozens plays among them such as Choli, Gaway, Rehershal, Timla ka timla Khtya and were repeated more than 10 times in theatres in and around Delhi.

As a poet he has written more than 60 songs which were broadcast by AIR, Delhi. His has also written more 300 Garhwali poems which have been published in different newspapers and magazines.

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sir ji aap ko uttarakhand ke film ke janak ke naam se jana jaata hai .. per ise hum kaise aur behatar kar sakte hai .. aur jab tak apna ek alag film aur सेंसर बोर्ड  nahi hota isme behatri nahi ho sakti is baare mai aapka kya khayal hai....

पंकज सिंह महर

आंचलिक फिल्मों का महत्व तभी है जब वह क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक धरोहर, पहचान को दर्शकोम को रुबरु कराने में सक्षम हो। आपने कितनी उत्तराखण्डी फिल्मों में किसी घटना विशेष पर आधारित लोकगीत की पंक्तियों को रचते हुये, उन्हें गुनगुनाते हुये और लय में गाते हुये सुना है? कितने निर्देशकों ने छानी, ओबरों के क्लोज अप दिखाये हैं, और किसान के हाथों में बल्द का म्यालू, कंधे पर जू और जू  पर होल-जोल-निसूड़ा, उसकी पत्नी के सिर पर कल्यो की पोटली, कूटलू, दथुड़ो या गैंती, बरसात में सिर पर मालू के पत्तों से बने गोल छतरे को सिर पर रखे महिलाओ को गाय चराते हुये दिखाया है? हमने किसी फिल्म में घसयारियों की कमर में रस्सी बांधे हुये, एक हाथ में दांथी और दूसरे हाथ में रोटी-प्याज-गुड़ की पोटली थामे देखा है? कभी घसयारियो< व गाय  चराने आये ग्वालों को नमक के साथ बुरांस और चीड़ के बीजों का स्वाद चखते देखा है? हाथ में तांबे के बंठे लेकर पानी के धारे की ओर बढ़्ती महिलायें, सिर पर घास और लकड़ी लाती महिलायें, जंदूरु में अन्न पीसती हुई, उरख्यलू? गंजल से अन्न कूटती औरतें, धान मांड़ते लोग, भोजन में छ्छया, फाणू, झंगोरा, बाड़ी, कण्डाली का साग, भवली, गिंजिड़ी, झुंगरियाल, गैथ, भट्ट, घी से लबालब मंडुवे की रोटी.......यह सब हमारी स्संस्कृतिक धरोहरें हैं, और इन्हें फिल्म की पटकथा से जोड़कर सुरक्षित रखा जा सकता है और यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर, हमारी आंचलिक संस्कृति और परम्पराओं के मूल दर्शन से जुड़ी हैं।
     लेकिन दुर्भाग्य है कि आज के हमारे आंचलिक फिल्मकार इन सबको छोड़कर मुंबईया मसालों वाली फिल्में बना रहे हैं, जिसे अधिकाश दर्शक वर्ग अस्वीकार कर देता है......मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आज कल की उत्तराखण्डी वी०सी०डी० फिल्मों को मैं अपने घर में परिवार के साथ बैठकर नहीं देख पाता।  यह फिल्में हमारा सांस्कृतिक अवमूल्यन ही कर रही हैं।
     इसलिये मेरा आप जैसे लोगों से अनुरोध है कि इस फिल्म जगत को आप जैसे लोग ही सुधार सकते हैं, इसलिये नेतृत्व आप अपने हाथ में लीजिये।.......फिर बहुत देर हो जायेगी।
     

Meena Pandey

Gaur ji Namashkar..............apki uplabhdhiyo par ham sabhi pahadi bada garv mahsus karte hai.

पंकज सिंह महर

i repeat my que-

मेरे मत में उत्तराखण्डी फिल्मों के सफल न होने के पीछे उनका पूर्ण व्यवसायिक हो जाना और इसमें सफल होने के लिये मुंबईया मसाले भरने की असफल कोशिश भी है। आपका इस बारे में क्या मत है?