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Articles By Mera Pahad Members - मेरापहाड़ के सदस्यों के द्वारा लिखे लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 30, 2009, 03:16:25 PM

C.P. Nautiyal



"पहाड़ में भू-माफियाओं के बढते कदम"

पहाड़ की भूमि अधिग्रहण एक चिंता का विषय  बन चूका है जिस पर शीघ्र ध्यान देने की जरुरत है. जिस तरह से बाहर के ब्यक्ति लगातार पहाड़ की भूमि को खरीद रहे है उससे यहाँ की आतंरिक सुरक्षा, पर्यावरण के खतरे, कृषि भूमि के पतन एवं अतिक्रमण के बड़ने (land grabing) की समस्या बड़ने का अंदेशा प्रतीत होता है.  उदाहरण के तौर पर टिहरी गढ़वाल के छेत्र को ही लिया जाय तो मसूरी से सुवाखोली और धनोल्टी तक अधिकांश बंजर भूमि / चारागाह वाले पहाड़ बाहर के लोग खरीद चुके है. और अब इनके बड़ते कदम हमारे गाँव तक ही नहीं बल्कि हमारे छानियों (Dando) तक भी पहुँच चुके है.  जिसका उदाहरण  मौर्याना पर्वत चोटी में देखने को मिलता है. मौर्याना मार्ग ऊँचे पर्वत से होकर उत्तरकाशी के लिए जाता है जिसे राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया जा चूका है. इस पर्वत चोटी में जो गाँव के लोगों के बगीचे तथा जमीन थी उसे प्रलोभन देकर बाहर के लोग  खरीद चुके है.
इसी क्रम में अगला कदम इनका देवलसारी एवं नागटिब्बा पर्वत चोटी के लिए प्रसस्त है, क्योंकि जौनपुर छेत्र में स्थित  नागटिब्बा  पहाड़ की सबसे ऊँची पर्वत चोटी है तथा घने जंगल से सरोबार है. इस पर्वत चोटी की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग  ६६०० मीटर है.

आकर्षण का मुख्य कारण:-

1) जौनपुर छेत्र में स्थित   नागटिब्बा पहाड़ कि  सबसे ऊँची पर्वत चोटी है  तथा समीप में ही देवलसारी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है.

2) देवलसारी, घने देवदार के वृक्षों से हरा भरा जंगल है साथ ही Govt. का टूरिस्ट बंगलो की सुविधा भी उपलब्ध है.  साथ में भगवान नागदेवता का प्राचीन मंदिर इस पवित्र देवभूमि की शोभा पर चार चाँद लगाता है.

3) प्राकृतिक शौन्दर्यता से ओतप्रोत घाटी तथा बीच में निरंतर कल कल बहती नदी, देवदार के वृक्षों से रोमांचित देवलसारी तथा ऊँची ऊँची गगनचुम्बी पर्वत चोटियां यहाँ मुख्य आकर्षण का केंद्र है. इस शौन्दर्यता का परचम देश ही नहीं विदेशों तक लहरा रहा है जिसके चलते यहाँ विदेशी पर्यटकों का ताँता लगा रहता है. ये टूरिस्ट यहाँ अपने तंबुओ में रहते है. इन पर्यटकों से बिजनेस का स्कोप को देखते हुए  यहाँ बाहरी हस्तक्षेप होने लगा है. स्कोप को देखते हुए क्षेत्र से बाहर के व्यक्ति यहाँ पर होटल एवं गेस्ट हॉउस खोलने के उदेश्य से जमीन खरीद रहे है.

·    इसी क्षेत्र के आस पास की भूमि कुछ बहरी व्यक्तियों ने खरीद भी ली है. और यहाँ पर यह कहने की आवश्यकता नहीं है की इस प्रकार के क़दमों से न केवल यहाँ की शौदर्यता प्रभावित होगी बल्कि यहाँ का पर्यावरण भी दूषित होगा. उदाहरण के तौर पर हाल ही में अमरनाथ में होलिकप्टर सेवा से हिम शिवलिंग तेजी से पिघलने लगा था. 
तथ्य के आधार पर देखें तो :-
=> उत्तराखंड का कुल छेत्रफल है                        = 53, 483 Sq KM
=> जिसमे जंगल (वन) चारागाह को मिलाकर है   = 54%
=> और कुल कृषि योग्य भूमि है                       = 46%
=> तथा शिक्षित वर्ग है                                    = 71.62%


अर्थात कृषि  भूमि  पहले  ही  जंगल  की  अपेक्षा कम  है. बढती जनसँख्या और  घटते  संसाधनों  के  चलते एवं  बहरी हस्तक्षेप  से वनों  को खतरा एक गहन  चिंता  का बिषय  है 

इसके दुष्परिणाम:

1)  पर्यावरण पर इसका दुष्प्रभाव
2)  कृषि भूमि उत्पादन में गिरावट
3)  भुमिहर किसानों की बढोतरी के आशार
4)  पशुपालन में गिरावट के खतरे, क्योंकि जब चारागाह ही समाप्त हो जायेंगे तो पशुपालन प्रभावित   होना स्वाभाविक ही है.
5)  चारागाह की कमी- बंजर भूमि एवं चारागाह पर होटल्स तथा गेस्ट हाउस निर्माण से चारागाह की कमी के कारन स्वभावतः पशुपालन में कमी आएगी.
6)  बेगारी तथा बेरोजगारी की समस्या और प्रबल हो जायेगी.
7)  गावों से शहर पलायन बढेगा.
8)  कृषि भूमि के कोमेर्सिअल यूज़ से प्राकृतिक शौन्दर्यता छिन्न होगी. और इसे यदि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की संज्ञा भी दी जाये  तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.
9)  वाहय हस्तछेप से पहाड़ की संस्कृति तथा सभ्यता के विलुप्त होने का खतरा प्रतीत होता है.
11)  बढती जनसंख्या और घटती जमीन, लिहाज़ा लोग अतिक्रमण को मजबूर होंगे जिससे वनों के छति होने का  खतरा प्रतीत होता है.


भूमि को बेचने से बचाने के कुछ सुझाव :

1) भूमि का उपयोग कृषि में हो जैसे- खेतीबाड़ी, फल उत्पादन, उद्योगों के लिए कच्चे मॉल का उत्पादन लघु उद्योग, हस्तकला, पशुपालन इत्यादी.

2) इस भूमि का ब्यावसायिक उपयोग ना हो अर्थात होटल्स, रेस्टोरेंट्स गेस्टहाउस आदि के निर्माण का बाहिस्कार किया जाये.

3) यदि कोई क्षेत्र से बहार का ब्यक्ति इस भूमि को कृषि भूमि  में प्रयोग करता है और तकनीकी सुविधाओं का प्रयोग करके कम समय में अधिक उत्पादन करके कृषि के  छेत्र  में क्रांति लाता है और किसानो को लाभान्वित करता है तो ऐसे सकारात्मक कार्यों का हमें स्वागत करना चाहिए.  और इस प्रकार के कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए.

4) पहाड़ छेत्र में करीब करीब सड़कों का जाल बिछ चुका है और ऐसे में सरकार को इस प्रकार के कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे छेत्र के लोगो को रोजगार भी मिल जाये और पर्यटन को बढ़ावा भी  जैसे कि, पहाड़ छेत्र के सड़क मार्ग में हर 2-3 KM. कि दूरी पर पर्यटकों के लिए जलपान कि ब्यवस्था होनी चाहिए और इस प्रकार की ब्यवस्था के लिए 4-5 दुकानों का प्रावधान होना चाहिए. और साथ ही इन दुकानों में छेत्रिय उपज के भोजन, एवं खान-पान की ब्यवस्था  हो ताकि पर्यटकों के लिए यह आकर्षण की चीज हो. इस प्रकार के सकारात्मक कदमों से न केवल पर्यटन को बढावा मिलेगा बल्कि किसानों का कृषि में ज्यादा रुझान होगा और छेत्र में ही बेहतर लाभ से शहर पलायन को रोकने में सहायक सिद्ध होगा. 

5) हमें चिप्स में हवा भरने की कला को सीखने की जरुरत है. कहने का अर्थ यह है की बेहतर से बेहतर आलू का उत्पादन हमारे पहाड़ में होता है परन्तु हमें तकनिकी जानकारियों के आभाव में उसे नीलामी के भाव बाज़ार में बेचना पड़ता है और यही आलू शहर में चिप्स बनकर तथा पैकेट में हवा भरकर वापस हमें ५० ग्राम करीब २० रुपये में बेचा जाता है. तो निष्कर्ष यह है की हमें जरुरत है हवा भरने की कला सीखने की.   यहाँ पर हवा भरने की की कला से मेरा अर्थ तकनिकी जानकारियों से है.

6) पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए और पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए छेत्र के शौन्दर्यीकरण के लिए सकारात्मक कार्यों को कार्यान्वित करना चाहिए नाकि कोमर्सिअल यूज़ को.

·        मै अपने पहाड़ के बारे में  यह सोचता हूँ आप क्या सोचतें है ?  जरुर लिखियेगा मुझे आपके सुझाओं का इंतजार रहेगा.

धन्यवाद
चंडी प्रसाद नौटियाल
सम्पर्क सूत्र : 9811573182
Email: nautiyal.cp@gmail.com

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Bahut hi achha likha hai Nautiyal ji aapne. Apne baare main thodi jaankaari jara introduction wali thread main bhi dijiye.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 

कहाँ से करू शुरू इस राज्य की व्यथा-------------------------------------------- उत्तराखंड राज्य का निर्माण ०९ नवम्बर २००० हो हुवा था! इस राज्य के निर्माण के लिए कई लोगो ने अपने प्राण की आहुति दी! राज्य आन्दोलन के समय लगता था पूरा उत्तराखंड जल रहा हो! जगह -२ पर आन्दोलन, धरने आदि! इन सब के पीछे उद्देश्य एक ही था, उत्तराखंड राज्य बने और यहाँ का तीव्र गति से विकास हो और और पहाड़ के प्रमुख समस्या जैसे :-         - बेरोजगारी         -  पलायन          -  स्वस्थ्य          -  पर्यटन को बदावा          -  आदि का समाधान हो! लेकिन राज्य के बनते ही धोखे की राजनीती शुरू! राजधानी देहरादून और मुख्य मंत्री बहार का थोपा गया! चलो जो भी कुछ तो राज्य विकास की पटरी पर आये! लेकिन अब एक दशक का समय होने को है लेकिन राज्य का विकास में कोई तीव्रता नहीं! इन १० सालो में हमने कोई विशेष विकास किया है तो वह है सिर्फ ०४ मुख्य मंत्रिया का बनना! कहाँ है हमारे मूल भूत समस्यावो का समाधान ?       अ)   क्यों पलायन की दर बढ रही है पहाड़ में ?      २)    कहाँ है रोजगार के साधन       ३)    क्यों नहीं विकसित हो पा रहा है उत्तराखंड का पर्यटन       ४)   क्यों नहीं पहुच पा रही है पहाड़ के दूर के ग्रामो में विजली और पानी ?       ५)  क्यों नहीं लौट रहे है प्रवासी उत्तराखंडी अपने राज्य में?        ६)  kahan गए स्थानीय मुद्दे ?        ७)  क्यों आ रहे है उत्तराखंड के भ्रष्टाचार दिन प्रति दिन खबरे ? क्या हो गया इस राज्य का ?    भगवान् जाने ?

पंकज सिंह महर

जनपक्ष आजकल के नवीन अंक में हमारे वरिष्ठ सदस्य श्री हेम पन्त जी का लेख


पंकज सिंह महर

मानसून की दस्तक जहां सारे देश-दुनिया को खुश होने और कजरी गाने का मौका देती है। वहीं मेरे उत्तराखण्ड के लोगों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें खिंचवाने लगती है। बादल की गर्जन हम लोगों को सुखद नहीं डरावनी लगने लगती है, बारिश की तेज बौछार में हमारा भीगने का मन नहीं कर पाता, हम सहम जाते हैं। जब बादल घुमड़ने लगते हैं तो हम घनन-घनन नहीं गा पाते...मन एक शंका से भर जाता है, हम दौड़ पड़ते हैं अपने घर के चारों ओर की नालियो को ठीक करने, गोठ में बंधे जानवरों की रस्सी ढीली करने, ताकि कुछ अनिष्ट होने पर ये मूक भी अपनी जान बचा सकें। बारिश शुरु होते ही हम मस्त मगन होकर इसका लुत्फ नहीं उठा पाते, हमें दौड़ना पड़ता है, अपनी एक-दो हली जमीन की नाली ठीक करने, पानी के धारे को ठीक करने। रात भर बारिश हो जाय तो हम पंखा बन्द कर सुकून में नहीं सो पाते, हमें जागना पड़ता है, पकृति की किसी भी मार से बचने के लिये।   प्रकृति ने हमें अनमोल तोहफे दिये हैं, अपने साथ रहने का मौका दिया है, लेकिन बदलते जलवायु चक्र और विकास के नाम पर अवैज्ञानिक तरीके से होते अनियोजित विकास तथा प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त उत्तराखण्ड के लिये यह मौसम बरसात का लुत्फ लेने के बजाय रडने-बगने या उससे बचने-बचाने के तरीके सोचने वाला हो जाता है। देहरादून में रहते हुये भी भारी बारिश या बादलों की गर्जन मुझे कई बार डरा देती है। यहां से टिहरी की तरफ काले बादल देखकर मन अनजानी आशंका से कई बार घिर उठता है, सुबह अखबार पढ़कर ही चैन मिलता है कि चलो ला-झेकला, बिरही, बूढ़ाकेदार की कोई सूचना नहीं छपी।  बरसात में जब चारों ओर वादियां साफ हो जाती हैं, तो ऐसे सुहाने मौसम में घर जाने का बड़ा मन करता है, लेकिन मैं चाहकर भी नहीं जा पाता। क्या पता कहां पर मलबा आया हो और रोड साफ होने में कितने दिन लग जांये? पिछली बार दशहरे से पहले ही घर जाने की सोची थी तो हल्द्वानी से पिथौरागढ़ जाने से पहले अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी कार्यालय में फोन मिलाता रहा। पता चला कि भीमताल वाली सड़क बन्द है, दन्या वाली सड़क बन्द है, शेराघाट होकर वाया बेरीनाग घर पहुंच तो गया। लेकिन बरसात के तुरन्त बाद की सड़कों में मेरा और मेरी गाड़ी का क्या हाल हुआ, हम दोनों ही जानते हैं।
मानसून हमारे   लिये सुखद एहसास के बजाय डरावना ज्यादा है।

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

                              राजनीति से परहेज क्यों
प्रजातंत्र में प्रजा का प्रजा पर प्रजा के लिए शाशन होता है यानी सम्पूर्ण आजादी एक पड़े लिखे साकारात्मक सोच रखने वाले युवा से जब हम राजनीती में जाने की बात करते हैं तो एक प्रतिशत भी रूचि नहीं दीखाता है उसका कहना होता है की राजनीती तो गुंडा प्रवृत्ति के लोग करते हैं यहाँ तक की माता-पिता भी अपने बच्चे को राजनीती से दूर रखना चाहते हैं क्या यह देश ऐसे ही चलेगा? क्या हमेशा ही एक इमानदार राजनीती से परहेज करेगा? यदि मौजूदा जन प्रति निधि के प्रोफाइल को देखें तो ८०प्रतिशत ऐसे हैं जिनके या तो मुकदमे चल रहे हैं या फिर सजा याप्ता हैं या कही न कही वो अवैधानिक कार्यों में लिप्त हैं
आज का प्रजातंत्र बहुत चिंता का विषय है एक पड़े-लिखे युवा जो सकारात्मक सोच रखता है उसे राजनीती से तनिक भी परहेज नहीं रखना चाहिए जरा सोचें यदि हमारे सारे जनप्रतिनिधि इमानदार और सकारात्मक हो जायें तो देश कहाँ पहुच सकता है भष्टाचार और उस पर कारवाही और फिर सेत्तेल्मेंट सिर्फ समय और धन की बर्बादी है राजनीती में सेवा भाव से आयें कमाई के भाव से नहीं,     

KAILASH PANDEY/THET PAHADI

Daju 100% agree with you ki Rajneeti se parhej nahi hona chahiye.... lekin 1 pade likhe Sakaratmak soch wale insaan ko Rajneeti me jaane ki jarurat bhi kyon hai (Agar wo nahi jaana chahta hai to)?

Quote from: dayal pandey/ दयाल पाण्डे on July 09, 2010, 11:31:16 AM
                              राजनीति से परहेज क्यों
प्रजातंत्र में प्रजा का प्रजा पर प्रजा के लिए शाशन होता है यानी सम्पूर्ण आजादी एक पड़े लिखे साकारात्मक सोच रखने वाले युवा से जब हम राजनीती में जाने की बात करते हैं तो एक प्रतिशत भी रूचि नहीं दीखाता है उसका कहना होता है की राजनीती तो गुंडा प्रवृत्ति के लोग करते हैं यहाँ तक की माता-पिता भी अपने बच्चे को राजनीती से दूर रखना चाहते हैं क्या यह देश ऐसे ही चलेगा? क्या हमेशा ही एक इमानदार राजनीती से परहेज करेगा? यदि मौजूदा जन प्रति निधि के प्रोफाइल को देखें तो ८०प्रतिशत ऐसे हैं जिनके या तो मुकदमे चल रहे हैं या फिर सजा याप्ता हैं या कही न कही वो अवैधानिक कार्यों में लिप्त हैं
आज का प्रजातंत्र बहुत चिंता का विषय है एक पड़े-लिखे युवा जो सकारात्मक सोच रखता है उसे राजनीती से तनिक भी परहेज नहीं रखना चाहिए जरा सोचें यदि हमारे सारे जनप्रतिनिधि इमानदार और सकारात्मक हो जायें तो देश कहाँ पहुच सकता है भष्टाचार और उस पर कारवाही और फिर सेत्तेल्मेंट सिर्फ समय और धन की बर्बादी है राजनीती में सेवा भाव से आयें कमाई के भाव से नहीं,     

kundan singh kulyal

बदली गो म्यार गौं.....
मन मैं खुशिक ठिकान न छ्यु किलाकी मी ६ साल बाद अपन गौं जन्नौछू, मी हल्द्वानी बठी यक गाड़ी मिल्छ जू म्यार गौं तक जन्छी मी उमें बैठ गयु  काठगोदाम बठी जब हमर पहाड़ मैं गाड़ी चलन लगये त मी येती ख़ुशी छ्यु की मी रुन पड्यु म्यार संग मैं और ले लोग उ गाड़ी मैं बैठ रौछी सब बोलने लगे अरे बेटा क्या...हुवा अरे भय क्या हो गया...घर मैं सब ठीक तो हैं ना....मिल कौ होई घर मैं त सब ठीक छान तब ओ  लोग बोलने लगे फिर क्यों रो रहा हैं मिल कौं अपन पहाड़ कै तमन दिनौ बठी देख्नायुं तब्ये रवे एगे,उन मैं से कई लोग बोलने लगे कैसा लड़का है कोई इन पहाड़ों को देखकर रोता हैं क्या...अरे एसा ही ठहरा हो कही बहार रहता होगा यहाँ रहेगा तो इन पहाड़ों की मुसीबतों को देखकर रोयेगा...ओ लोग बहुत देर तक इसी बारे मैं बातें करते रहे, सोचअन लग गयु की देखीं तो हमरे जो इलाक रौं पर इन लोग त सब हिंदी मैं बोल्नायी फिर मैली गाड़ी वाल थै पुछ्यो की गाड़ी त कुल्याल गौं जानने ना...गाड़ी वाला बोला हाँ भाई एक बार बताने से समझ मैं नहीं आया क्या मैं चुपचाप बैठा बैठा देख रहा था जगह जगह लोग उतरते रहे कई नए लोग भी बैठे पर मैंने किसी को अपनी बोली मैं बात करते नहीं देखा, यक चची ली मैथा पुछ्यो तू कुंदन छाई मिली उ खै पच्यन ले फिर मिली उ कै ढोग दे उ मेरी गौं की छि फिर हम बात करनी करनी अपन गौं पुज ग्याँ, अपन गौं देखि बेरी मी तमन ख़ुशी हैगयु सब लोग मिलगे संग साथ वाल नाना ठुला फिर उने अपन पूरण दिन आगी|
लेकिन मी कै अपन गौं बदल्ल्यो झौं लाग्यो गौं मैं जनानी और बुजर्गौ कै छोड़ी ज्यातर लोग हिंदी मैं बात करनी,  यक दिन म्यार संग वाव म्यार दगड़ मायर घर मैं बैठ रौछी उ मै एकैली म्यार दादी दगड़ हिंदी मैं बात करी जब की म्यार दादी कै हिंदी समझ ली ना सकनी मी सोच मैं पड गयु की हमर गौं येती बदली गों......मी जब पैली गौं मैं रौछ्यु त येती समझ ना छि की हमर गौं ले बद्लिनौ पर आज येती बदलाव येती कम समय मैं|
मी कै अपन बचपन का उन दिन याद आग़ी आज खली यादे रै गयी..... उ प्रथा ना रै गै ना उन tyar रै गै ना ही ऊं रिवाज रै गै ना अपनी बोली रै गै ना अपन pairav रै गों ना mayalu लोग रै गै...........

 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


पहाड़ का दर्द कहाँ से शुरू करू!

उत्तराखंड राज्य के लोग ही अपनी पीड़ा से रुबुरु नहीं है... हम मेरापहाड़ साईट के माध्यम से देश विदेश में वसे कई उत्तराखंड के लोगो से बाते करते है और मिलते है लेकिने कई बार दुःख होता है जब लोगो को अपनी जनम भूमि के बारे में बहुत ही कम ज्ञान होता है!  शायद दिल्ली उत्तराखंड से मुश्किल से ५०० किलोमीटर होगा लेकिन.... लोगो १०.. १५ सालो में घर जाते है! पहाड़ से एक बार निकले  जैसे है.. सदा के लिए पहाड़ को छोड़ दिया..! ठीक है आर्थिक रूप से पहाड़ मजबूत  नहीं है, नौकरी की तलाश में लोग राज्य से देश के कई हिस्सों में जाते है पर जरा आध्यात्मिक से भी उत्तराखंड को जाने!

यह वही.... पावन, देवभूमि है जहां से गंगा, यमुना जैसे पर्वित्र नदिया निकलती है और सारे देश को सीचते है! यह वही देवभूमि है जहाँ पर हजारो ऋषि मुनियों ने ताप किया और सिद्धि अर्जित की! भगवान् विष्णु ने ... सुरदर्शन चक्र यही.. प्राप्त किया था...... सीता माता धरती में यही समाई थी,... त्रिलोकी नाथ ,...भोले नाथ की शादी त्रियुगी नारायणा में यही हुयी ठीक,  महाभारत जैसी..... महान ग्रन्थ यही लिखा गया था..

हजारो एसे पौराणिक तथ्य है इस देवभूमि से जुड़े.. प्रकर्ति ने इस देवभूमि को अपने. सुंदर अभूष्ण से सजाया है... यहाँ एक और हजारो वर्षो से हिमालय पहाड़ एक पहरी बन कर हमारी रक्षा कर रहा है, तो दूसरी तरफ से... फूलो की घाटी..... औली, नैनीताल, कौसानी, बुग्याल आदि इस पावन धरती में है!

लेकिन दुःख इस बात है... जो लोग प्रवासी है... अपने बच्चो को अपने ही देवभूमि के बारे में जानकारी नहीं दे पाते!

लोग एक paar पहाड़ chhodne पर dubaara wapas नहीं aate! यह एक gambhir mamala है.. aaj... इस दुःख को samjhne को smajhne की jarurat है एक jut hokar पहाड़ के vikas में अपनी bhagidaari dena है/

Devbhoomi,Uttarakhand