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Why Do We Hesitate in Speaking our Language? अपनी भाषा बोलने में क्यों शरमाते हम

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 10, 2009, 10:14:12 AM

hum kyun nahi sikhate apne bacchon ka pahari

सभी को
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मुझे भी
3 (21.4%)

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From: "KUMAR" <hld_99@rediffmail.com>
To: <members@apnauttarakhand.com>
Date: 20 May 2009 11:20:50 -0000
Subject: Re: Re: [Members-Apna-Uttarakhand] [Members-Uttarakhand Community] WhyDo We Hestitate in Speaking Uttarakhandi Language

Dear All,
It seems to be nice discussion of pahadi /kumaoni on this platform. But i would like to ask all of the learned and educated members of this forum, that when we are at our respective native place how much we give importance to all the residents of that place. In fact we are divided in the name of caste and social status out there. If you see we are poles apart there , whereas out from our kumaoun we boast of traditionality, culture and acceptance of sections in the society.
So dont we play a doule standard life. Do we still agree marriage of different cadre in our society (may be very minsicule number )are we not keeping a two face personality .
So better we wipe out these basic differences in our kumaon and try to make and accept each other as part of a extended family and than boast of being arich kumaouni in terms of traditions and culture.
I am not saying all this just for writing but had seen this during initial growing there. I am from army background and hardly stayed in kumaoun for 5-6 yrs at stretch, but the impression of childhood remains till the end. so had to pen down this..
any way all of you can ponder on this and try to change for a better place to LIVE ON this EARTH- "OUR KUMAON"and Gharwal also dear.
take care
panks
On Thu, 14 May 2009 09:26:44 +0530 wrote

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

I think it will take some time to make a envinronment. Some people who have legacy with their culture and motherland, they never hestitate in speaking their language whenever they meet any guy from their mohter-land. On other hand, some people hesitate in speaking the language. 

naveenjoshi

mehta ji

Kumaoni bolna bhi to aana chahiye :( I lived in haldwani even there also no one use to speak in kumaoni other than ladies,

I WANT TO LEARN KUMAONI, but regret I did not pay importance in my childhood

Devbhoomi,Uttarakhand


भाषा के बिना कितना भी विकसित माना जाया एक अतिशयोक्ति ही माना जाएगा, संस्कृति की पहचान भाषा के पश्चात ही होती है, जहाँ भी संकृति शब्द का प्रयोग होता किया जाता है, उसके साथ यदि भाषा शब्द उसके अग्रज शब्द के साथ न जोड़ा जाय तो वह हमेशा अपूर्ण रहेगा, समाज में केवल संकृति की बात करना फूहड़पन ही कहा जाएगा, क्यूं की संस्कृति की ध्वज्बाहक भाषा ही मानी जाती है, आज के उत्तराखंडी समाज दो भागों में बांटता नजर आ रहा है, इन दोनों के बिच की दूरी चेतना के अभाव में कम होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढती जा रही है,
यह दूरी क्यों बढ़ रही है यह हम बखूबी से जानते है, हम इस दूरी को कम करने की हर सम्बभा कोशिश में हैं परन्तु हमें इस प्रकार का सशक्त माध्यम नहीं मिल रहा है, जिसके अंतर्गत हम इस दूरी को पता सके,
उत्तराखंडी समाज उत्तराखंड के अलावा देश के कोने कोने में अपनी उपस्तिथि दर्ज करने के साथ साथ विदेशों में अपनी कीर्ति फैला रहा है, देश विदेश में बसे उत्तराखंडियों के मन में कही न कही एक डर अवश्य होता है की जिस गढ़वाली कुमौनी को आज हम लोग बोल रहे है, क्या उसे हमारी आने वाली पीडी इसी प्रकार बोल पायेगी, इस और देश विदेश में बसने वाले उत्तराखंडियों का ध्यान ही नहीं है,
अपितु उत्तराखंड के अंदर रहनेवाले विद्वानों ने भी इसे गहरे से लिया है, कई लोगों ने इसे बेकार की बात मानकर एक किनारे कर दिया, क्योंकि उन्हें केवल वर्तमान दिखाई दे रहा है, उनमे वर्तमान की सोच और आने वाली पीढी को दियेजाने वाले सरोकारों की सूजबूझ ही नहीं है,
उदहारण के रूप में विदेश में होने वाले कार्य कर्म का का जिक्र करना आवशक होगो, जब मंच से विदेशी भाषा तथा राष्ट्र भाषा हिन्दी के कर्म के संबोधन को तोड़ते हुए एक गायक की आवाज अपनी स्थानीय भाषा के लोकगीत के रूप में आती है, तो सभी का ध्यान अकग्र्चित होकर उस और एकटक हो जाता है, *आमा की दी माँ घुघती न बंसा* गीत के सुरताल में वासताबिक रूप में क्या था, *मेरो गधों कु देश बावन गरहों कु देश* गीत ने आख़िर में सात समुद्र पर बसे उत्तराखंडियों को क्या संदेश दिया, *चम् चमकू घाम कान्थियोंमा हिवाळी डंडी अचंदी की बनी गेना* इन गीतों में आख़िर क्या है, क्या यह कबी की कल्पना है,
या अपनी धरती से रू व रू होने का साक्षात्कार, बहुत कम लोगों का इसकी मूल भावना की और ध्यान गया होगा, क्यों की केवल तीन घंटे का कार्यकर्म जिसमे केवल आधा घंटा ही बमुश्किल से इस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने अपनी धरती से साक्षात्कार होने का मोका मिला उस आधे घंटे ने पूरे तीन घंटे वसूल कर दिए, ऐ जो तीन गीत गढ़वाली कुमौनी भाषा के मूल ध्वनियों के साथ सुरताल में प्रस्तुत किए गए यह वास्ताबिक रूप में यहाँ की भाषा का ही कमल है, जिसने हजारों मील दूर बैठे उत्तराखंडियों को झुमने के लिए मजबूर कर दिया, यह भी भाषा का ही कमल है, जो आज के समय में प्रतीक मात्र बनती जा रही है,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I am in agreement with you sir..

As we have been emphasizing that alteast we must start speaking our languages with our children and with community members etc.


Quote from: devbhoomi on August 19, 2009, 09:06:18 PM

भाषा के बिना कितना भी विकसित माना जाया एक अतिशयोक्ति ही माना जाएगा, संस्कृति की पहचान भाषा के पश्चात ही होती है, जहाँ भी संकृति शब्द का प्रयोग होता किया जाता है, उसके साथ यदि भाषा शब्द उसके अग्रज शब्द के साथ न जोड़ा जाय तो वह हमेशा अपूर्ण रहेगा, समाज में केवल संकृति की बात करना फूहड़पन ही कहा जाएगा, क्यूं की संस्कृति की ध्वज्बाहक भाषा ही मानी जाती है, आज के उत्तराखंडी समाज दो भागों में बांटता नजर आ रहा है, इन दोनों के बिच की दूरी चेतना के अभाव में कम होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढती जा रही है,
यह दूरी क्यों बढ़ रही है यह हम बखूबी से जानते है, हम इस दूरी को कम करने की हर सम्बभा कोशिश में हैं परन्तु हमें इस प्रकार का सशक्त माध्यम नहीं मिल रहा है, जिसके अंतर्गत हम इस दूरी को पता सके,
उत्तराखंडी समाज उत्तराखंड के अलावा देश के कोने कोने में अपनी उपस्तिथि दर्ज करने के साथ साथ विदेशों में अपनी कीर्ति फैला रहा है, देश विदेश में बसे उत्तराखंडियों के मन में कही न कही एक डर अवश्य होता है की जिस गढ़वाली कुमौनी को आज हम लोग बोल रहे है, क्या उसे हमारी आने वाली पीडी इसी प्रकार बोल पायेगी, इस और देश विदेश में बसने वाले उत्तराखंडियों का ध्यान ही नहीं है,
अपितु उत्तराखंड के अंदर रहनेवाले विद्वानों ने भी इसे गहरे से लिया है, कई लोगों ने इसे बेकार की बात मानकर एक किनारे कर दिया, क्योंकि उन्हें केवल वर्तमान दिखाई दे रहा है, उनमे वर्तमान की सोच और आने वाली पीढी को दियेजाने वाले सरोकारों की सूजबूझ ही नहीं है,
उदहारण के रूप में विदेश में होने वाले कार्य कर्म का का जिक्र करना आवशक होगो, जब मंच से विदेशी भाषा तथा राष्ट्र भाषा हिन्दी के कर्म के संबोधन को तोड़ते हुए एक गायक की आवाज अपनी स्थानीय भाषा के लोकगीत के रूप में आती है, तो सभी का ध्यान अकग्र्चित होकर उस और एकटक हो जाता है, *आमा की दी माँ घुघती न बंसा* गीत के सुरताल में वासताबिक रूप में क्या था, *मेरो गधों कु देश बावन गरहों कु देश* गीत ने आख़िर में सात समुद्र पर बसे उत्तराखंडियों को क्या संदेश दिया, *चम् चमकू घाम कान्थियोंमा हिवाळी डंडी अचंदी की बनी गेना* इन गीतों में आख़िर क्या है, क्या यह कबी की कल्पना है,
या अपनी धरती से रू व रू होने का साक्षात्कार, बहुत कम लोगों का इसकी मूल भावना की और ध्यान गया होगा, क्यों की केवल तीन घंटे का कार्यकर्म जिसमे केवल आधा घंटा ही बमुश्किल से इस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने अपनी धरती से साक्षात्कार होने का मोका मिला उस आधे घंटे ने पूरे तीन घंटे वसूल कर दिए, ऐ जो तीन गीत गढ़वाली कुमौनी भाषा के मूल ध्वनियों के साथ सुरताल में प्रस्तुत किए गए यह वास्ताबिक रूप में यहाँ की भाषा का ही कमल है, जिसने हजारों मील दूर बैठे उत्तराखंडियों को झुमने के लिए मजबूर कर दिया, यह भी भाषा का ही कमल है, जो आज के समय में प्रतीक मात्र बनती जा रही है,

Devbhoomi,Uttarakhand

हमारी भाषा ही, हमारी पहचान है!हमारी ही क्या पूरे देश मैं बिदेश मैं, अपने मात्र भाषा और उसके बाद राष्ट्र ही इन्शान की पहचान है, उसके बाद तो,अंतर्राट्रीय भाषा भी जाननी बहुत ही जरूरी है,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Fully agree with Gaur JI.

No culture can florish until unless its language is not promoted.

Quote from: parashargaur on May 16, 2009, 05:23:06 AM

    apne Bolee/Vaasha ke liye  kahne ko bahut hai ,   filhaal,  lakin itnaa hi bahut


                  मेरी एक कविता ..  ........         


                    ढूध अर बोली


                    मिनख का वास्ता
                    सबसे पवित्र अर सबसे उत्तम होंद
                     बोई को ढूध ....
                             उतगे पवित्र अर उत्तम होंद  वा
                     गेयूं की बलडी............
                             जैसे पैदा हुन्द एक ताकत
                     जैसे बण्द बोली /भाषा 
                     वीका  बोली अर वी भाषा बान तुम
                     अप्णो ब्रह्मांड नि  कटै सकदा
                     अर सीना पर गोली नि खे सकदा त
                      धिक्कार  च  तुमको  ! 

                                                                पराशर गौड़ 
"
                                         






Devbhoomi,Uttarakhand

ये  भै  बन्धो 
म्यारा  पर्वतीय नौनिहालों

ये भूलौ ....ये बेटो .... , ...

अपना आपस माँ  जब भी वार्तालाप  करदां  ता  अप्नि भाषा बोली कु प्रयोग कारा  रे...

ये बेटो ... हमारी बोली कु लोप होन्दा जाणु च रे

ये  नौनो ... हमारी बोली कु लोप होन्दा जाणु च रे

ये संसार माँ  क्वी  भी "जाती" अपनी बोली का  भरोसा  ही  जिन्दा रै  सकदी ....

बिना बोली का  मनिख्यों की पछ्याण नि च  और अप्नि पछ्याण का वास्ता  "बोली" कु जिंदु रेणु ज़रूरी च

आप्णि  बोली थैं जिंदु रख्णु  पोढ़दू.. ....

जै  की  बोली भाषा माँ  जतना  भी मिठास ह्वेइली  वीं बोली का लोगु की उतना ही इज्ज़त  हवेली
हमारू  यु प्रयास...हर दिन..  हर पल.. रेणु  चैयंदु  की हम वार्तालाप अपनी सीधी सरल बोली माँ  करां..
गद्वोली आदिम गद्वोली माँ  और  कुमाओं  आदिम कुमाओं बोली माँ बोल्यां..   

हमारी द्वि भाषा गड्वाली अर्र कुमैयाँ   सब्बी   लोगो की समझ माँ आसानी से  एई  जांदी थोडा  बहुत  प्रयास कर्ना से बोलाणु  भी एई जालू

यु द्वि बोली उत्तराँचल की ही ता छीन और  यु माँ  मामूली    फर्क  च..
शुरू शुर माँ थोड़ा सी दिक्कत महसूस जरूर  होली लेकिन एक द्वि बगत बोलान  चालान से  वू भी   जरूर आसानी  ह्वेई जाली

यु मेरु विश्वास च..

ता भूलों और नौनियालो आज बीटी.... ना ना  अब्बी  बीटी....यु भलु काम शुरू कैरी दीयो

और हाँ एक बात  और विशेष च की हमारी भाषा माँ जख एक मिठास च  ताखी  वेई माँ अपना विचार की सरलता,  सौम्यता  और साथ ही साथ गोपनीयता भी ...
जरा  एक   बोला  ता  सही  ..फ़िर   देखो  कतना   मिठास महसूस होंदी कत्गा अछू लगदु  और कत्गा  आनंद औंदु


Devbhoomi,Uttarakhand

मित्रो.... एक वरिष्ट   नागरिक   होणा का नाता से     आप लोगो तैं  सलाह दीं चंदू  की  आप  लोग अपना आपस माँ   हमेशा अपनी अपनी      बोली  माँ  ही. बात करीं ...

और  मेल  आदि  भी अपनी ही. बोली भाषा माँ ही लिखीँ..
हमारा उत्तराँचल की पुरानी संस्कृतं च की  हम लोग  दीदा, दीदी,   भुला भूली    काका    बोडा     भैजी   शब्दों  कु इस्तेमाल करां
किलै की ,  यों  शब्दों  माँ  एक  विशेष किस्म की मिठास च
जू की दुश्मन तैं भी   अपणों   बनै देन्दी
क्रोध वाला तैं भी शांत  कैरि देन्दी   ...
और   आदर की भावना  भी    स्वतः ही मन माँ  ए जान्दी

विनती  एक और च   ...

उत्तरांचली गीतों की   और  वीडियो  की  CD  घोर माँ जरूर  रखीं  और अधिक से अधिक वेकु इतेमाल करीं    ......
ताकि हमारी  नयी संतान का  दिल मा भी आदर  सत्कार और स्वदेश प्रेम  बण्यू रो
उत्तराँचल का बारा माँ  बच्चों तैं  भी  चेतना दीं

बच्चों   की    जिज्ञासा  कु उत्तर प्रेमपूर्वक और तुँरंत   दीं

और वुऊंकी  शंका शमाधन कु जवाब दीं बच्चों तैं प्रोत्साहन दीं ताकि वू  अपनी थाती   (culture)    तैं पछ्यान्कुल करीं
हम सब्यों कु यही कर्त्तव्य  च की हम  हमारी भाषा बोली और हमारी सभ्यता तैं धरोहर का रूप माँ  लगातार  इस्तेमाल करीं   और  

जन जागरण  करीं