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Why Do We Hesitate in Speaking our Language? अपनी भाषा बोलने में क्यों शरमाते हम

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 10, 2009, 10:14:12 AM

hum kyun nahi sikhate apne bacchon ka pahari

सभी को
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मुझे भी
3 (21.4%)

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C.S.Mehta

दरसल हम लोग अपनी भाषा बोलने से क्यों शरमाते  है हम.....?
जी हाँ जब हम आपस में बात चित करते है तो हमें जरुर अपनी भाषा का प्रयोग करना चहिए लेकिन यहाँ पर एक बात है जो हमारी अपनी भाषा है यह  भाषा २ या ४ की.मी. के दुरी प़र कुछ अलग-अलग प्रकार से बोली जाती है जैसे  उदाहरण हैं  कुछ लोग खिड़की शब्द को त्यापैर और कुछ लोग उशी शब्द को छाज का प्रयोग करते है और ले जाने  वाले किसी शब्द को लिझाणु  बोला जाता है है और कही प़र लिघानु  बोला जाता है अनेक ऐसे शब्द है जो काफी लोगु के मेल नहीं खाती है और अलग-अलग प्रकार से  इसे बोलने का अलग अलग तरीका लोगुं ने अपना रखा है इसलिए लोग इस भाषा का प्रयोग कम कर रहे है लेकिन हम लोगु कें अपण भाषा मा बात करुण जरुरी भे 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेहता जी...

बहुत सही बात बोली आपुन.. घाट घाट में पानी बदल जान्छ उसीकी बोली के बदल जै पर आज समय में आपुन बोली के बचून मुस्किल हैगे !

खासकर जो नान-तिन शहरन में पैद हुन रेई ! इजू बाजू के ध्यान दिन चै इस बार में !

Quote from: C.S.Mehta on March 01, 2011, 01:58:41 PM
दरसल हम लोग अपनी भाषा बोलने से क्यों शरमाते  है हम.....?
जी हाँ जब हम आपस में बात चित करते है तो हमें जरुर अपनी भाषा का प्रयोग करना चहिए लेकिन यहाँ पर एक बात है जो हमारी अपनी भाषा है यह  भाषा २ या ४ की.मी. के दुरी प़र कुछ अलग-अलग प्रकार से बोली जाती है जैसे  उदाहरण हैं  कुछ लोग खिड़की शब्द को त्यापैर और कुछ लोग उशी शब्द को छाज का प्रयोग करते है और ले जाने  वाले किसी शब्द को लिझाणु  बोला जाता है है और कही प़र लिघानु  बोला जाता है अनेक ऐसे शब्द है जो काफी लोगु के मेल नहीं खाती है और अलग-अलग प्रकार से  इसे बोलने का अलग अलग तरीका लोगुं ने अपना रखा है इसलिए लोग इस भाषा का प्रयोग कम कर रहे है लेकिन हम लोगु कें अपण भाषा मा बात करुण जरुरी भे 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


My experience has been bitter on language issue.

Yesterday i had gone to meet a Pandit ji who hails from Uttarakhand. I was continusouly speaking in pahadi but the despiting fully conversant in the language, was speaking in hindi.

This clearly shows our people feel hesitation in speaking our mother tonque.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मै आजकल अपने बेटे को पहाड़ी भाषा सिखा रहा हूँ! घर में हम उसे पहाड़ी में ही बात करते है ! धीरे -२ अब वह बोलना भी शुरू कर दिया है !

शायाद - भाषा सिखाने के लिए हमे घर पर भी माहौल बनाना padega !

अपनी भाषा को बचाए रखना जरुरी है !

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा


Bheji.. bhaula. bhuli.

Mera aapu logo te, anurodh chaa.. aapun boli me jarur bola.. Koi bhi samaj ka tab tak vikas ni hai sakdan, jab tak aapun boli vikasit ni chha.

To aawa, koshish kara aapun boli te jarur promote kara.


सुधीर चतुर्वेदी

Pahadi bhas bolnay mai u sharmacha ju aafu kay pahadi na kun chan , garv kar ki ham pahadi cha , uttarakhandi cha ................ jab aaj ham apni bhas bolna
tab hamri bhas bachali (Kumaoni - Garhwali) aur ham apni agga wal pidi kay dijuyan .


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
Inso Seekho.
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  ढोल दमाऊं का प्यार लाया सात समंदर पार     Jul 27, 01:10 am   बताएं       अनिल चंदोला, श्रीनगर गढ़वाल
फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला सात समंदर पार का कोई गोरा अगर गढ़वाली बोले, गढ़वाली गीत गाए और ढोल-दमाऊं बजाए तो हर कोई आश्चर्यचकित होगा ही। टिहरी के पुजार गांव में इन दिनों यह नजारा देखा जा रहा है। अमेरिका का एक प्रोफेसर गांव वालों के बीच रहकर न सिर्फ उनकी बोली बोलता है, बल्कि गायन और वादन से उनका मनोरंजन भी करता है। ढोल-दमाऊं का प्यार ही उसे सात समंदर पार से भारत खींच लाता है।
हम बात कर रहे हैं अमेरिका की सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के एथनोम्युजिकोलजी विभाग के प्रोफेसर स्टीफन फियोल की। विवि का यह विभाग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोक संगीत का मानव विज्ञान की दृष्टि से अध्ययन करता है। स्टीफन भी उत्तराखंड के लोक संगीत का यहां के लोगों पर प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। वर्ष 2000 में पहली बार वह घूमने के उद्देश्य से एक साल के लिए भारत आया। इस दौरान उन्होंने वाराणसी में सितार सीखने के साथ ही मसूरी में दो माह हिंदी बोलने का प्रशिक्षण भी लिया। 2003 में दो माह के लिए भारत आने पर वह पहली बार उत्तराखंड पहुंचे। यहां की प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति, संगीत व लोक कलाओं को देखकर वह अंत्यंत प्रभावित हुए।
2005 में यूनिवर्सिटी ऑफ इलेनऑय के अपने रिसर्च के संबंध में वह फिर एक साल के लिए उत्तराखंड पहुंचे। इस दौरान उसकी मुलाकात संस्कृति प्रेमी व गढ़वाल विवि के प्रो. डीआर पुरोहित से हुई। प्रो. पुरोहित के साथ रहकर ही उसने कई तरह की लोक कलाओं, संगीत, नृत्य, परंपराओं इत्यादि का अध्ययन किया। ढोल वादक सोहन लाल व सुकारु दास से भी इसी दौरान उसकी मुलाकात हुई, जिनके साथ रहकर उसने ढोल-दमाऊं, मश्कबीन, मोछंग आदि वाद्य यंत्र बजाने का अभ्यास किया। 2007 में एक साल के लिए वह फिर उत्तराखंड पहुंचे और पुजार गांव में रहकर लोक संगीत की बारीकियां सीखीं। इसी दौरान उन्होंने गढ़वाली बोली व गीत भी सीखे। स्टीफन के अनुसार भारत के कई राज्य घूमने के बाद लगा कि उत्तराखंड के लोक संगीत में यहां के समाज की परंपराएं, मेले, रीति रिवाज, संस्कृति व सभ्यता मिली हुई हैं। इसलिए इस लोक संगीत के अध्ययन में रुचि जागृत हुई। स्टीफन 2005 में छह ढोल-दमाऊं बनाकर अपने साथ अमेरिका भी ले गए। उन्होंने बताया कि अपने विभाग के छात्रों को वह उन्हीं वाद्य यंत्रों की मदद से उत्तराखंड के संगीत का अभ्यास कराते हैं।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_8076302.html

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा


aapun Boli.. aapun Bhasha ma baat karna ka alag baat choo.


Dada .. bhula .. aapun boli me jarur baat kara.


Devbhoomi,Uttarakhand