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Etymology Of Various Places - कैसे पड़ा उत्तराखंड के विभिन्न जगहों का नाम

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 20, 2009, 12:59:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



चमोली में स्थित यह मंदिर चमोली के ग्राम देवता को समर्पित है। कहा जाता है कि देवता के नाम पर ही चमोली का नाम पड़ा जो इस स्थल पर सदियों पहले भूमि से उदित हुए। 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


JOHAAR (PITHORAGARH)

उत्तराखंड के जोहार (पिथोरागढ़) पर यह कहावत :

आधे में तो परमात्मा ने मुन्सार या जोहार में ग्राम बसाये है और आधे में शेष जगत! गोरी नदी के दाहिने तरफ वर्फ का दका पहाड़ है ! उसका नाम पुरानो में जीवर है, इसी से इस परगने का नाम जोहार भी पड़ा है !


Devbhoomi,Uttarakhand

कैसे पड़ा रानी खेत का नाम "रानीखेत"

प्राचीन कहानियों के मुताबिक स्थानीय शासक राजा सुखरदेव की रानी पद्मिनी यहां की अद्भुत सुदंरता को देख यहीं रुक गईं जिसके बाद इस जगह को रानीखेत नाम दिया गया। रानी ने यहां रुककर एक महल भी बनवाया जो अब रानीखेत क्लब के नाम से जाना जाता है।

पहले ये जगह कुमायनी शासकों के अधीन थी जो बाद में अंग्रेजों ने उनसे छीन ली। 1869 में अंग्रेजी सल्तनत ने इस जगह को पयर्टन स्थल के रूप में विकसित किया।

प्रधानमंत्री नेहरू जब यहां आए तो उन्होंने कहा - मैं चाहूंगा ज्यादा से ज्यादा लोग इस जगह को आकर देखें, यहां वे फूलों की महक और वृक्षों की ताजगी महसूस करें, खुली हवा में सांस लें और प्रकृति को करीब से देखें। हिल स्टेशन को लेकर आम धारणा होती है कि यहां केवल गर्मी के मौसम में आया जाता है, लेकिन रानीखेत की खूबसूरती साल के बारह महीने लोगों को अपनी ओर खींचती रहती है।



Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on July 02, 2009, 09:47:23 PM

RANIKHET IS NAMED AFTER QUEEN PADMANI

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According to popular belief, Ranikhet got its name when Rani Padmini, queen of Raja Sukherdev, the local ruler, saw this place and was struck by its beauty. She was so captivated by the place that she decided to stay there, and the place came to be known as Ranikhet (literally, queen' s field). The region around Ranikhet was ruled by local Kumaoni rulers and later came under British rule.
A quaint little hill station conceived by the British tucked away in the Kumaon Himalayas. An old army cantonment from British time. Charmingly unspoilt natural beauty�. Screne and quiet. This is Ranikhet.

Discovered by Lord Mayo in 1869 and developed as a cantonment for the Imperial Soldiers, Ranikhet is perched at an altitude of 1829 meters. Even today it boasts as the home of the Kumaon regiment. Here, time stands still.

All the four seasons have something special to offer at Ranikhet. Therefore, it can be visited at any time of the year. Winters are cold and the entire region experiences snowfalls during the months of December and JanuaryAccording to popular belief, Ranikhet got its name when Rani Padmini, queen of Raja Sukherdev, the local ruler, saw this place and was struck by its beauty. She was so captivated by the place that she decided to stay there, and the place came to be known as Ranikhet (literally, queen' s field). The region around Ranikhet was ruled by local Kumaoni rulers and later came under British rule.
A quaint little hill station conceived by the British tucked away in the Kumaon Himalayas. An old army cantonment from British time. Charmingly unspoilt natural beauty�. Screne and quiet. This is Ranikhet.

Discovered by Lord Mayo in 1869 and developed as a cantonment for the Imperial Soldiers, Ranikhet is perched at an altitude of 1829 meters. Even today it boasts as the home of the Kumaon regiment. Here, time stands still.

All the four seasons have something special to offer at Ranikhet. Therefore, it can be visited at any time of the year. Winters are cold and the entire region experiences snowfalls during the months of December and January

Devbhoomi,Uttarakhand

                          लक्ष्‍मी आश्रम,कौसानी उत्तराखंड कैसे पड़ा इस आश्रम का नाम
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यह आश्रम सरला आश्रम के नाम से भी प्रसिद्ध है। सरलाबेन ने 1964 में इस आश्रम की स्‍थापना की थी। सरलाबेल का असली नाम कैथरीन हिलमेन था और बाद में वे गांधी जी की अनुयायी बन गई थी।

यहां करीब 70 अनाथ और गरीब लड़कियां रहती है और पढ़ती हैं। ये लड़कियां पढ़ने के साथ-साथ स‍ब्‍जी उगाना, जानवर पालना, खाना बनाना और अन्‍य काम भी सीखती हैं। यहां एक वर्कशॉप है जहां ये लड़कियां स्‍वेटर, दस्‍ताने, बैग और छोटी चटाइयां आदि बनाती हैं।

Devbhoomi,Uttarakhand

                     कैसे पडा राणीबाग़ का नाम --राणीबाग़ काठगोदाम उत्तराखंड
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काठगोदाम से तीन किलोमीटर नैनीताल की ओर बढ़ने पर रानीबाग नामक अत्यन्त रमणीय स्थल है। कहते हैं यहाँ पर मार्कण्डेय ॠषि ने तपस्या की थी।रानीबाग के समीप ही पुष्पभद्रा और गगार्ंचल नामक दो छोटी नदियों का संगम होता है। इस संगम के बाद ही यह नदी 'गौला' के नाम से जानी जाती है। गौला नदी के दाहिने तट पर चित्रेश्वर महादेव का मन्दिर है। यहाँ पर मकर संक्रान्ति के दिन बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है।

'रानीबाग' से पहले इस स्थान का नाम चित्रशिला था। कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। रुहेला सरदार उसपर आसक्त था। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही रुहेलों की सेना ने घेरा डाल दिया।

रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी। उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। रुहेलों ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में#ं ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - नानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था

और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने गात पर रुहेलों का हाथ नहीं लगन् दिया था। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।

आज रानीबाग कुमाऊँ का औद्योगिक स्थान भी हो गया है। यहाँ पर घड़ी उद्योग लग चुका है। यह उद्योग हिन्दुस्तान मशीन दूल्स (एच. एम. टी.) का पाँचवा उद्योग है। रानीबाग में सेना (पुलिस) का चेकपोस्ट भी है। यह अत्यन्त रमणीय स्थान है।

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मान्यतानुसार यहां देवशर्मा नामक एक तपस्वी ने कड़ी तपस्या की थी, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम देवप्रयाग पड़ा। प्रयाग किसी भी संगम को कहा जाता है।

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Kotdwar - (Kotdwar Ka Nam Kaise Pada)

पूर्वकाल में इस तीर्थ में कौमुद यानि कार्तिक की पूर्णिमा को चन्द्रमा ने भगवान शंकर को तपकर प्रसन्न किया था. इसलिए इस स्थान का नाम कौमुद पड़ा. शाएद कोटद्वार कस्बे को तीर्थ कौमुद द्वार होने के कारण ही कोटद्वार नाम पड़ा. क्योंकी प्रचलन के रूप में स्थानीय लोग इस कौमुद द्वार को कोद्वार कहने लगे, जिसे अंग्रजो के शासन काल में अंग्रजो के सही उच्चारण न कर पाने के कारण उनके द्वारा कोड्वार कहा जाने लगा. जिसे उन्होंने सरकारी अभिलेखों में कोद्वार ही दर्ज किया. और इस तरह इसका अपभ्रंश रूप कोटद्वार नाम प्रसिद्द हुआ. परन्तु वर्तमान में इस स्थान को सिद्धबाबा के नाम से ही पूजा जाता है. कहते है की सिद्धबाबा न इस स्थान पर कई वर्षो तक तप किया. श्री सिद्धबाबा को लोक मान्यता के अनुसार साक्षात गोरखनाथ माना जाता है जो की कलयुग में शिव के अवतार माने जाते है.

(Source- sidhibali.org)


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कौमुद से बना कोटद्वार
क्षेत्र का नाम पहले कौमुद था। कौमुद का अर्थ कार्तिक और बबूल का पेड़ भी होता है। महारात्रि के समय यहां पर बबूल (कौमुद) के पुष्प की खुशबू फैली रहती है।

कहा जाता है कि पौराणिक काल में कौमुद (कार्तिक) की पूर्णिमा को चंद्रमा ने भगवान शंकर को तपस्या कर प्रसन्न किया था।

इसलिए इसका नाम कौमुद पड़ा। पहले स्थानीय लोग इसे कौमुद द्वार के नाम से पुकारते थे। जब अंग्रेज यहां आए तो वे इसका सही उच्चारण नहीं कर पा रहे थे। जिसको उन्होंने पहले कौड्वार कहा। अभिलेखों में भी इसे ही दर्ज किया जाने लगा। बाद में यह कोटद्वार नाम से कहा जाने लगा।


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खोह नदी भी पड़ा नाम

जिस प्रकार कौमुद से कोटद्वार बना उसी तरह अंग्रेजों के सही उच्चारण नहीं होने से कौमुद नदी को खोह नदी कहा जाने लगा। जो वर्तमान में खोह नदी के नाम से ही जानी जाती है। सिद्धबली मंदिर खोह नदी किनारे पर ही बना है।