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Exclusive Photos of Tehri Dam, Uttarakhand-टिहरी गढ़वाल और डाम की कुछ तस्वीरें

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, July 22, 2009, 07:31:18 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देवभूमि का 200 साल पुराना शहर जो है झील के अंदर
वर्ष 1815 से पहले धुनारों की बस्ती में जब 28 दिसंबर 1815 को टिहरी बसाई गई थी तो तत्कालीन राजपुरोहित ने इस शहर की उम्र दो सौ वर्ष से कम बताई थी। तब किसी को शायद ही यकीन आया होगा कि वास्तव में यह शहर दो सौ वर्ष से पहले ही जल समाधि लेकर हमेशा-हमेशा के लिए डूब जाएगा। अपने स्थापना के 90 वर्ष बाद 29 अक्तूबर 2005 को उत्तराखंड में बसा खूबसूरत टिहरी शहर डूब गया। हालांकि इस शहर में पले-बढ़े और पैदा हुए लोग टिहरी को किसी न किसी रूप में जिंदा रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं। वे टिहरी के डूबने को एक भूगोल भर का डूबना मानते हैं। कहते हैं टिहरी लोगों के दिलों में धड़कता रहेगा। जहां कहीं भी टिहरी के लोग होंगे, उनमें टिहरी मौजूद रहेगा। टिहरी के राजाओं की लंबे समय तक टिहरी शहर राजधानी रहा। बाद के वर्षों में प्रताप शाह ने ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में प्रतापनगर और कीर्तिशाह ने कीर्तिनगर बसाया। जबकि ज्योतिषियों के कहने पर 1919 में नरेंद्र शाह ने नरेंद्रनगर बसाकर पूरी तरह राजधानी वहां शिफ्ट की। हालांकि टिहरी शहर सांस्कृतिक, साहित्यिक गतिविधियों के साथ ही जिले के राजनीतिक और आर्थिक क्रियाकलापों के रूप में आगे बढ़ता रहा। यह शहर श्रीदेव सुमन की शहादत का गवाह रहा।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

स्वामी विवेकानंद भी यहां आए तो स्वामी रामतीर्थ ने तो तो इसी शहर से देश-दुनिया को आध्यात्म की नई राह दिखाई। आजादी के बाद जब देश में ऊर्जा जरूरतों के लिए बांधों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई तो साठ के दशक में टिहरी का भी सर्वे हुआ। समर्थन और आंदोलनों के बीच आखिरकार टिहरी बांध का निर्माण पूरा हुआ और वर्ष 2005 में पूरा शहर जल समाधिस्थ हो गया। ज्योतिषी की भविष्यवाणी सही साबित हुआ। टिहरी शहर दो सौ वर्ष पूरे नहीं कर पाया। वह 190 वें वर्ष जल समाधिस्थ हो गया। यह केवल टिहरी का डूबना भर नहीं था। टिहरी के साथ ही आम के बागवान डूबे। ऐतिहासिक घंटाघर डूबा। बदरीनाथ सहित कई छोटे-बड़े मंदिर डूबे। लोगों की साझा संस्कृति डूबी। भले ही टिहरी के एवज में नई टिहरी बसाया गया। मास्टर प्लान से बसे उस शहर में भले ही सब कुछ है, लेकिन टिहरी जैसी गहमागहमी और रिश्तों की मधुरता वहां नहीं है। बीच-बीच में किसी न किसी आयोजन के बहाने लोग टिहरी को याद तो करते हैं, लेकिन वह नई टिहरी में अपनी टिहरी को नहीं पाते हैं।

(amar ujala)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

टिहरी 1815 में तब चर्चा में तब आई जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह ने 28 दिसंबर 1815 को टिहरी को रियासत की राजधानी घोषित किया। 1859 में सुदर्शन शाह का निधन होने के बाद उनके पुत्र भवानी शाह टिहरी रियासत की राजगद्दी पर पर बैठे। उन्होंने 12 साल तक राजपाठ संभाला। उनके कार्यकाल में हाथ से कागज बनाने का कारोबार शुरू हुआ। 1871 में भवानी शाह के निधन के बाद उनके पुत्र प्रताप शाह को टिहरी रियासत का राजा बनाया गया। प्रताप शाह के कार्याकाल में पुराना दरबार से रानीबाग तक सड़क निर्माण, कोर्ट भवन और प्रताप इंटर कालेज की स्थापना हुई। इसी दौरान प्रतापनगर भी बसाया गया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

1887 में प्रताप शाह के मृत्यु के बाद उनके पुत्र कीर्ति शाह गद्दी पर बैठे। उन्होंने कौशल दरबार का निर्माण, प्रताप इंटर कालेज का उच्चीकरण, चीफ कोर्ट भवन व ऐतिहासिक घंटाघर का निर्माण करवाया। कीर्ति शाह के कार्यकाल में ही टिहरी के सार्वजनिक स्थानों तक पहली बार बिजली� पहुंची। कीर्ति शाह ने अपने नाम से कीर्तिनगर भी बसाया। उनके शासन में टिहरी में सरकारी प्रेस स्थापित हुई। जिसमें रियासत का राजपत्र व अन्य सरकारी कागजात छपते थे। 1902 में स्वामी रामतीर्थ जब टिहरी आए तो राजा ने उनके लिए सिमलासू में गोलकोटी बनाई। यह कोटी शिल्प कला का अनुपम उदाहरण थी। 1913 में कीर्ति शाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र नरेंद्र शाह राजगद्दी पर बैठे। उन्होंने 1920 में टिहरी में पहला कृषि बैंक स्थापित किया तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन ने टिहरी पहुंच कर कालेज का शुभारंभ किया। 1963 में टिहरी बांध निर्माण की घोषणा हुई।