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Darchula- A Cultural Confluence

Started by Uttarakhandi, October 24, 2007, 09:01:26 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

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Devbhoomi,Uttarakhand


Pawan Pathak

व्यास घाटी में बडानी पूजा की धूम
परिवार के बड़े पुत्र को देवदर्शन को ले जाने की परंपरा
भगवान व्यास ने की थी तपस्या
कहते हैं कि व्यास घाटी में भगवान वेदव्यास ने तपस्या की थी और कुछ वेदों की रचना उन्होंने यहीं बैठकर की थी। इसीलिए इसे व्यास घाटी कहा जाता है। कुटी में पांडवों ने स्वर्गारोहण के समय विश्राम किया था। वहां पर माता कुंती के लिए कुटिया बनाई थी। इसीलिए इस स्थान को कुटी कहा जाता है।
धारचूला (पिथौरागढ़)। व्यास घाटी के गांवों में बडानी पूजा शुरू हो गई है। लोग पूजा के दौरान शिवरूपी लोकदेवता नमज्यूं की पूजा करते हैं। पूजा के लिए देवदार का करीब 50 फीट लंबा पेड़ लाया जा चुका है। इस पेड़ को दर्च्यो कहा जाता है। मान्यता है कि लोकदेवता नमज्यूं ने अपने लिए देवदार की ही छड़ी बनाई थी। यह पवित्र छड़ी हर गांव में नमज्यूं के मंदिर के आगे रख दी गई है।
बडानी पूजा का व्यास घाटी में बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि कैलास मानसरोवर के प्रवेश द्वार में नमज्यूं की उपासना करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। इस मौके पर परिवार के सबसे बड़े पुत्र को देवदर्शन के लिए ले जाया जाता है। बहनें अपने भाइयों के दीर्घजीवन के लिए मंगलकामना करती हैं। भादौ माह की पूर्णिमा तक चलने वाले कार्यक्रम के दौरान रोज भगवान के मंदिर में विशेष प्रकार का प्रसाद जिसे दलंग कहा जाता है, चढ़ाया जाता है। दलंग को आटे और दूध से तैयार किया जाता है। बडानी पूजा के समय प्रवास में रहने वाले सभी लोग अपने अपने घरों में पहुंच गए हैं।
नमज्यूं के मुख्य देवडांगर आनंद सिंह गर्ब्याल और कृष्ण सिंह गर्ब्याल ने बताया कि पूजा से गांवों में सुख और समृद्धि आती है।


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