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नाटक परिभाषा व उद्देश्य

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय १ , पद /गद्य भाग  १११  बिटेन   १२१ तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग - ८७   
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळि  म सर्वाधिक अनुवाद करण वळ अनुवादक   आचार्य  – भीष्म कुकरेती    
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मीन जु नाटक उरयाई  वु लोकुं  क्रिया अर चरित्रौ  प्रतिरूप /नकल च, जु भावों से भरपूर च , अर जु  भिन्न भिन्न स्थितियां  बि दिखांद।  यु  भल मनिखों  बुरा अर  तटस्थ मनिखों संबंधित च  अर सबि  लोकुं  तै साहस ,आनंद , प्रसन्नता अर मंत्रणा दीण वळ च।  १११ , ११२। 
इलै नाटक  सब्युं  कुण   इखमा क्रियाओं से, भावों से युक्त व  बोधप्रद होलु  , अर ये से भाव संचार होला। ११३। 
 यु (नाटक)  निर्भाग्युं तै शान्ति देलु  जु दुःखी  अर  शोकाकुल छन , अर धर्म राह पर लिजंदेर  व प्रसिद्धि दिंदेर , लम्बो जीवन, बुद्धि  दिँदेर, अन्य सकारात्मक अर शिक्षा दायक होलु।  ११४, ११५। 
क्वी इन  प्रसिद्ध कथ्य (कै पणि  बोल ) नी , क्वी इन शिक्षा नी , क्वी इन कला -कौंळ  नी , युक्ति , कार्य नी  जु  नाटक म नि पाए जावो।  ११६। 
इलै , मीन नाटक इन बणाई जैमा  भिन्न भिन्न ज्ञान  , भिन्न कला , अर  विभिन्न कर्म  समाइ जांदन, प्रयोग हूंदन।  इलै  हे दैत्य ! तुम तै दिबतौं प्रति क्रोध की आवश्यकता नी , नाटक म सप्तद्वीप अर संसार की प्रतिकृति होलु , नकल होलु।  ११७, ११८। 
वेद या पुराणों /इतहासों से कथा  लिए गेन ऊं  तैं अलंकृत करे  गे जां  से वो आनंद दे सौकन।  ११९। 
नाटक,  ये जग म  देवों , दैत्यों व मनिखों  अद्भुत कार्यों प्रतिरुपीकरण /अनुकरण /नकल,  कुण  बुले जांद। १२०। 
 अर  जखम जब मानवीय प्रकृति  की  प्रसन्नता या दुःख   भावों , संकेतो या अन्य क्रियाओं (जन शब्द , झुल्ला , गहना  आदि ) से  दिखाए जावन /प्रतिनिधित्व करे जाव तो वै  तै नाटक बुल्दन।१२१।   

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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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धूम्रपान विधि व चिलम नळिका लम्बाई विधान 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत)
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंचौं  अध्याय ,  ४४   बिटेन  - ५०  तक
  अनुवाद भाग -   ४५
गढ़वाली म सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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धूम /धुंवां कन पीण  चयेंद -
विरक्तादि से भिन्न, बारा वर्ष से उब, नयाणो समय आदि म नासिका दोष वळ या आँख म आश्रित हूण पर नासिका /नाक से धूम्रपान कारो।  कंठ या गौळ  दोष म मुख से धूम्रपान करण  चयेंद। जु धुंवा नाक से लिए गे हो वै तै मुख से भैर गडण  चयेंद अर नाक से ना।  किन्तु मुख से धुंवा पीण पर धुंवा नाक से भैर  नि गडण।  मुख से लियुं  धुंवा मुख से ही भैर  गडण  किलैकि  नाक से भैर गडणम आंखों पर हानि हूंद।  ४४ -४५। 
 धूम्रपानौ  आसन -
अकुटिल सरैल  आंख , हथ पाँव सर, पीठ , ग्रीवा , सीध रखिक , धूम्रपानम मनोयोग  करि  भल प्रकार से , शांत बैठिक तीन तीन सुट्टा /दम  एक दगड़ी मरण  चयेंद।  कुल नौ समय  पीण  चयेंद , पींद समय नाकौ एक दुंळ बंद कर लीण , ये प्रकार से द्वी नासिकौं  से  हीन  से हीन  समय  धुंवा लीण  चयेंद।४६।   
धूम्रपान नळिका / नळी -
वैरेचनिक  धूम्रपान म  नेत्र नळी  २४ अंगुळ  हूण  चयेंद।   स्नेहिक धूम्रपान  कुण  नळी  ३२ अंगुळ की हूण  चयेंद।  प्रायोगिक धूम्रपान की नळी ३६ अंगुळ की हूण  चयेंद।  ४७। 
नळिका  की संरचना -
पर्व गाँठ गिरह सीधे तीन सीधी गिरह वळि गिरहों  पर ठीक प्रकार से मिलीं हो , अर अगनै   मुख पर बेर सामान नळिका हूण  चयेंद।  नळिका  बणाण  वळो  द्रव्य बि वस्ति की नळिका  जन ही हो।  ४८
चौबीस या छतीस अंगुळ लम्बी नळिका  म दूर से आणौ कारण तीन गिरह गांठ  हूणौ  कारण धूम्र को तीक्ष्णता /कटास  हीन  ह्वे जांद अर  बेर जन मुख से धुंवा एकदम वेग से नि आंदो।  अर उचित समय व मात्रा म लियुं  धुंवा इन्द्रियों तै हानि नि पंहुचांदो। 
उत्तम प्रकार  का धूम्रपान का लक्षण -
जब उरस्थल (छाती ), गौळ म ,सरम हळ्को पन  आयी जावो व कफ पतळु  ह्वे जावो तो धामंडपाण तै उचित समजण  चयेंद।  ४९, ५०।   
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita   

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Defence Budget of a Country in Tough Economic Times cannot be drastically curtailed 

Strategies for Chief Executive Officer for creating the wealth and defending the wealth -9
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 261
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 261       
     s= आधी अ                       
By: Bhishma Kukreti (Management Acharya)
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दंडभूभागशुल्कानामाधिक्यात् कोष वर्धनम् I
अनापदि च कुर्वीत तीर्थ देवकर ग्रहात् II9II
  यदा शत्रु विनाशार्थ बल संरक्षणोद्यत: I
   विशिष्ठ दंडशुल्कादि धनं लोकात्तदा  हरेत् II10II
In regular times, the King should not upsurge capital punishment, land tax and other taxes and by taking taxes from holy places. However, for the defence budget (punishing or bargaining with the enemy countries), the king should take money from people as special grants, fines or additional taxes.
Shukraneeti, Chapter 5, Kosha Nirupan, 9, 10)
  In normal days, the country should not increase the taxes on the people. However, there should be provision for the defence budget and for the proper defence budget; the country should be ready for levying taxes on its citizens by taking them into confidence. In old days, the king was least bothered for social causes. However, these days the state has to spend a sizable amount of money on public utilities. Therefore, there is a requirement of revenue through taxes. However, the government should always take people into confidence in increasing the particular types of taxes.
References
1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page -191
Copyright@ Bhishma Kukreti, 202

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 जाखनी  (     पिथौरागढ़    ) में उप्रेती परिवार के  भवन में  काष्ठ कला

जाखनी  (गंगोलीहाट ,   पिथौरागढ़ ) उप्रेती परिवार के  पारम्परिक भवन में  कुमाऊं शैली की  'काठ  कुर्याणौ  ब्यूंत' की  काष्ठ कला अलंकरण, काष्ठ उत्कीर्णन अंकन
   Traditional House Wood Carving Art  of   Jakhani ,  Gangolihat  Pithoragarh
गढ़वाल,कुमाऊँ,के भवनों ( बाखली,तिबारी , निमदारी,छाजो, खोली स्तम्भ) में कुमाऊं शैली की  'काठ  कुर्याणौ  ब्यूंत' की  काष्ठ कला अलंकरण, काष्ठ उत्कीर्णन अंकन - 421
(प्रयत्न है कि ईरानी , इराकी व अरबी  शब्दों  की वर्जना हो )   
 संकलन - भीष्म कुकरेती 
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पारम्परिक भवनों में कुमाऊं शैली की काष्ठ उत्कीर्णन  संदर्भ में आज  जाखनी  (गंगोलीहाट ,  पिथौरागढ़  ) में उप्रेती परिवार के  पारम्परिक भवन में में कुमाऊं शैली की  'काठ  कुर्याणौ  ब्यूंत' की  काष्ठ कला अलंकरण, काष्ठ उत्कीर्णन अंकन पर चर्चा होगी।
प्रस्तुत  जाखनी  (गंगोलीहाट , पिथौरागढ़  ) में उप्रेती परिवार का   पारम्परिक भवन तिपुर (तीन तल floors  वळ )  है व दुखंड /दुघर/तिभित्या  है।  भवन बाखली /सामूहिक वसाहत  वाला पारम्परिक भवन है। 
  जाखनी  (गंगोलीहाट , पिथौरागढ़) में उप्रेती परिवार के  पारम्परिक भवन/ बाखली में काष्ठ कला दृष्टि से निम्न स्थल महत्वपूर्ण हैं -
१- भ्यूं तल /ground floor में  काष्ठ कला -
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भ्यूं तल /ground floor  के कक्षों के द्वारों, द्वार के  सिंगाड़ों, मुरिन्ड /header में व ऊपरी तलों के  कुछ झरोखों /छाजों  के निम्न तल के पटिलों  में ज्यामिति कटान से निर्मित सपाट पन  है।
२- कमल दल उत्कीर्णन कला -
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 खोली , सभी छाजों /ढुड्यारों /झरोखों/ग्वाख /वातायनम्   के सिंगाड़ों /स्तम्भों या उप सिंगाड़ /स्तम्भों  में  अधोगामी (उल्टे ) पद्म  पुष्प दल अंकन, ड्यूल उत्कीर्णन , उर्घ्वगामी  (सीधे ) पद्म पुष्प दल उत्कीर्णन  से कुम्भियाँ /घुंडियां या घटपेट निर्मित हैं।  कुछ सिंगाड़ों में कुम्भी निर्माण का दुहराव है कुछ में नहीं है।   खोली , ढुड्यारों, गवाक्षों में अधिसंख्य सिंगाड़ों /columns  में कुम्भी  उपरांत स्तम्भों /सिंगाड़ों  के उपरांत स्तम्भों /सिंगाड़ों  में प्राकृतिक कला उत्कीर्णन (लता नुमा या गुंथी लताएं )
तोरणम में काष्ठ कला -
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खोली व प्रत्येक ढुड्यार /छाज/गवाक्ष के ऊपरी   भाग  में अंदर की ओर तोरणम / arch निर्मित हुए हैं।  तोरणम स्कन्धों में या तो प्राकृतिक कला उत्कीर्णन हुआ है या सपाट  दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
खोली के मुरिन्ड /header ऊपर के चौखट में काष्ठ कला उत्कीर्णन -
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 खोली के मुरिन्ड /header के ऊपर छपरिका  के नीचे एक आयताकार काष्ठ आकर है जिसमे  ६   वर्गाकार चौखट  के अंदर ६ भिन्न भिन्न चतुर्भुज डिवॉन की प्रतिमाएं स्थापित हैं।  ये देव सुरक्षा (जैसे हनुमान ) , सुख के प्रतीक हैं। 
 बौळी / शहतीर में काष्ठ कला -
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पहले तल के छाज /गवाक्ष /ढुड्यार  शक्तिशाली चौखट , आयाताकार  काष्ठ कड़ी  /बौळी   पर स्थित  हैं।  इस तरह की दो बौळियां  हैं।  बौळि  के अंदर आयातकार अंडाकार रूप में  गुंथे लता लड़ियों  का आकर उत्कीर्णन हुआ है व लकीरों का भी उत्कीर्णन हुआ है।  बौळी /girder  के किनारे दो दो लघु स्तम्भ भी स्थापित हुए हैं जिन पर  कमल पुष्प दल उत्कीर्णन  से कुम्भी निर्मित हुयी हैं। 
छाज /ढुड्यार /गवाक्षों के निम्न ढक्क्नों में कला -
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पहले तल के छाज /ढुड्यार /गवाक्षों के निम्न ढक्क्नों में सपाट कला है। 
दूसरे तल के छाज /ढुड्यार /गवाक्षों के निम्न ढक्क्नों में भिन्न भिन्न प्रकार की कला उत्कीर्णन हुआ है।  एक ढक्क्न में  चार हृदयाकार पीपल पत्तियों जैसी आकृतियां अंकित हुयी हैं।  दूसरे ढक्क्न में घड़े के अंदर पत्तियों का जैसा अंकन हुआ है व बाहर लम्बी पत्तियां दृष्टिगोचर हो रही हैं।  तीसरे ढक्क्न में ज्यामितीय आकृतियां अंकित हई हैं संभवतया आकर्षण हेतु।  चौथे ढक्क्न में  लघु पत्तियों का सुंदर अंकन हुआ है। 
पहले व दूसरे तल की मोरियों /खिड़कियों के स्तम्भ सपाट  ही दृष्टिगोचर हो रहे हैं। 
 निष्कर्ष निकलता है प्रस्तुत  जाखणी , गंगोलीहाट के उप्रेती परिवार का  भवन /बाखली भव्य है व भवन में भव्य , आकर्षक काश्त कला उत्कीर्णन हुआ है जिसमे ज्यामितीय , प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण  प्रयोग हुआ है।   
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सूचना व फोटो आभार: जगदीश चंद्र
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . भौगोलिक मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021 
 कैलाश यात्रा मार्ग   पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  अंकन -उत्कीर्णन , बाखली कला   ;  धारचूला  पिथोरागढ़  के बाखली वाले  मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  अंकन उत्कीर्णन   ;  डीडीहाट   पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त   अंकन -उत्कीर्णन ;   गोंगोलीहाट  पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  उत्कीर्णन   ;  बेरीनाग  पिथोरागढ़  के बाखली वाले मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त   अंकन  ;  House wood Carving  of Bakhali art in Pithoragarh  to be continued

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नाटकों लक्षण , लाभ
भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय १ , पद /गद्य भाग   ९८  बिटेन  ११०  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ८६
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळि  म सर्वाधिक अनुवाद करण वळ अनुवादक   आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
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इथगाम  शरीर मध्य देवोंन बह्मा श्री से बोलि - तुम तै विघ्न तै समझायी बुझैक शांत करण  चयेंद।  ये शाम  विधि बाद दाम (प्रलोभन आदि )  अपनाये जांद ।  अर यदि यि  विधि असफल होवन तो दंड विधि अपनाये जांद। ९८, ९९। 
दिबतैं सलाह सूणि  ब्रह्मा श्रीन  दुष्ट आत्मा बुलैन अर पूछ बल -तुम नाट्य मंचन तै नष्ट किलै करणा  छा ? १००। 
ब्रह्मा बथ सूणि विरिपक्षा, दैत्य अर विध्न दगड़ी बुलण मिसे गेन - तुमन जु नाट्य कला  देवों  क बुलण  पर पैलो  बार परिचय कराई वे नाट्य कलान हम तै असहज स्थिति म लै दे।  अर यु तुमन देवों  बान कार जबकि तुम पितामह छा  डिवॉन अर हमर बि।  १०१ , १०३
विरिपक्ष  द्वारा यी शब्द बुलण पर ब्रह्मा श्रीन बोली - भौत  ह्वे गे रोष , हे दैत्यों ! अपण परिवेदना /शिकैत  छ्वाड़ो, यु नाट्यवेद देवों कुण  ही ना भाग्यशाली होलु अपितु दैत्यों कुण बि उनी होलु।  १०४, १०५।
ये मा (नाट्य ) अकेला देवों  या दैत्यों विषय नी अपितु तीन संस्कारों अभिव्यक्ति च।  १०६।
ये मा  कुछ म  कर्तव्य वोध च , कुछम खेल छन , कबि धन , कबि शान्ति छ्वीं , तो कबि हौंस /खौंकळ्याट , कबि   द्वन्द ,-युद्ध , कबि प्यार तो कबि हत्त्या दिखाए जांद।  १०७।
यु (नाट्यवेद ) कर्तव्य वोध सिखांदु , जु प्रेम करण  चांदन प्रेम (विधि ) सिखांद , अर वूंको विरोध /दंड दीणो प्रवाधान बि सिखांद  जो  असत्य वाचन /विधि से अनुशं विरोधी या सत्य विरोधी छन।  कायरों तै शक्ति दिंदेर , वीरों तै उर्जा देंदेर च, हीनबुद्धि वलों तै आत्म प्रकाशितकरद, अर बुद्धिमता लांदो/सिखांदो ।  १०८ , १०९। 
यु राजा तै विविधता दीन्दो, जु दुखी  छन ऊँ तैं  मानसिक स्थिरता दींदो।  जौ तै धन चयेणु  च , जौंक मन उच्चाट  हुयुं  च उख  शान्ति दींदो।  ११०। 


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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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    धूम्रपान कब कब वर्जित च

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत )
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंचौं  अध्याय ,  ३७  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -   ४४
गढ़वाली म सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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बिंडि  धूम्रपान से उत्प्न्न   बिकारों चिकित्सा
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बिंडी  धूमपरपानै  स्थिति म घी पिलाण अच्छा च।  नाक म नतस्य , आँखोंम अंजन लगाण  चयेंद अर संतर्पण करण वळ स्निग्ध्द कर्म करण  चएंदन।  पित्तक कारण जख रक्त दोष ह्वावो उख शीतल चिकित्सा, शीतल स्पर्श , शीत शक्ति से बण्या द्रव्यों  से बणी औषधि, नकसीर /नस्य,अंजन , आदि  कार्य करे जाण चयेंद।  श्लेष्म प्रधान (सींप प्रधान ) पित्ते  अवस्था म रुक्ष गुण वळ द्रव्यों से नस्य व अंजन करण  चयेंद।  ३७-३८ । 
कौं कौं  पुरुषों कुण  धूम्रपान निषेध च
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 विरक्त विरेचन लियूं  हो , रूखो  या स्नेह वस्ति कर्म लियुं हो , रक्त दोष वळ, विषन पीड़ित हो , शोकातुर मनिख, गर्भणी, थक्यूं, नशा म हो , जु अजीर्णवस्था हो ,  जै रातम निंद नि आंद हो , बेहोश हो , जै तै रिंग लगणी हो , तिस्या, धातु क्षय कारण हीन  हो , क्षत रोगी , शराब पियूं हो , दूध पियूं हो , घी तेल पियूं  हो , शहद खायुं हो , दै दगड़  चौंळ खयां  होवन , रोष म हो , गौळ सुख्युं हो , आंखम  तिमिर रोग हो ,  सर पर चोट हो , शंखक रोग हो , रोहणी रोग (डिप्थेरिया ) हो , प्रमेह , मद्यपान, आदि अवस्थाओं म धूम्रपान नि करण चयेंद।   जु   क्वी अज्ञान वश धूम्रपान कारो तो धूम्रपान से कुपित वात दोष अर रोग बढ़ जांदन।  दगड़म मथ्याक रोग हौर  बढ़ जांदन अर अकाळ  म इ रोगी ह्वे जांद ।  ३९ - ४३। 


 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita   

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Creating Wealth through the Wrong Means goes in vain

Strategies for Chief Executive Officer for creating wealth and defending the wealth -8
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 260
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 260         
     s= आधी अ                         
By: Bhishma Kukreti (Management Acharya)
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 त्यक्त्वा नीतिबलं  स्वीयप्रजापीडनतो धनम I
संचितं येन तत्स्य सराज्यं शत्रुसाभ्दवेत् II
The wealth that is created by the wrong means or by oppressing the subjects, this wealth including the kingdom is robbed by an enemy kingdom. That means that the wealth created by the wrong means goes in vain. 
(Shukraneeti, Chapter 5, Kosha Nirupan, 8)
   We have many examples of very recent that prove that the wealth earned or created by wrong means fetch wrong results for the wealth creators. Examples are –Lalu Prasad Yadava, Neerav Modi, Lalit Modi, Vijay Malaya, etc. Famous Stock Market Hero influential man his time Harshad Mehta died in jail in very
References
1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page -191
Copyright@ Bhishma Kukreti, 202
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धूम्रपानौ आठ काल , लक्षण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत )
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंचौं  अध्याय , ३१   बिटेन  - ३६  तक
  अनुवाद भाग -   ४३
गढ़वाली म सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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मुख से धुंवापान  का समय  ब्रह्मा  श्रीन  बुल्यां  छन किलैकि यूं समौ  वात  अर  कफ प्रकोप दिखे जांद।  हौर समौ इथगा प्रकोप नि  दिखे जांद -
नयाणो उपरान्त, भोजन करणो उपरान्त , छिंकणो उपरान्त नाक , जीब साफ़ करणो परान्त, नस्य नसावर ) लेका , अंजन लीणो उपरान्त , मन जब पुळ्याणु हो , बिजण पर धूम्र पान लीण चयेंद।  ये प्रकार से  गौळ  से मथि वातजन्य अर कफजन्य रोग नि हूंदन। 
शीत गुणो कारण वायु कुपित हो त वातजन्य व्याधि  हूंदन।  इन अवस्था म स्नेहिक (घी जन मुलैम  ) धुंवा लीण  चयेंद  . जब सरैल रखो हो तो  रुखो हर्ता    स्नेहिक धुंवा लीण  चयेंद।  कफ तब हूंद जब सरैल म रुखा का आभाव हूंद।  इलै कफ नाशौ  बान वैरेचनिक  धुंवा लीण  चयेंद।  तीन प्रकारौ  धूम्रपान म नौ   घूँट सीमित करे गेन  अर्थात धूम्रपान म  नौ घूंट  से अधिक घूंट  नि  लीण  चयेंद। ३१-३३ । 
 उन त  धूम्र पान समय आठ बताये  गेन, तथापि बुद्धिमान तै अपण स्राईलो दोष वृद्धि, क्षय आदि विचार कौरिक  द्वी समय ही धूम्र पान लीण चयेंद।  स्नेहिक धुंवा दिनम एक समय, वैरेचिक धूम्रपान  तीन या चार दैं  इ लीण चयेंद बिंदी ना।  ३४। 
  सम्य धूम्रपाना  लक्छ्ण   -
हृदय /छाती , गौळ ,गौळौ मथ्या भाग , इन्द्रियां (आंख , नाक , कंदूड़ ) म स्वछता कु आभास हूण , मुंड हळको लगण , , दोष- वात , पित्त , कफ जनित दोषों शान्ति कुण यी सम्यक प्रकार से पियों धुंवा का लक्षण छन।  ३५। 
 बिंडी धूम्रपानौ लक्छण -
बैरो हूण , काणों या हीन दिखेण , गूंगापन , स्वर भेद वृद्धि या जीब से नि बुलेण , रक्तपित्त  विकार ,भरम ,  रिंग उठण  , यी उचित समय पर धूम्रपान नि करण  या बिंडी मात्रा म धूम्रपान लीण से हूंदन।  ३६। 


*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita   
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नाट्य मंचन हेतु नाट्यमंडपै  स्थापनाs  अर  रक्षा आवश्यकता

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय १ , पद /गद्य भाग   ७६  बिटेन    ९५   तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ८५
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळि  म सर्वाधिक अनुवाद करण वळ अनुवादक   आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
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तब  इंद्र महोत्सव / ध्वज महोत्सव का अवसर पर  दुबर  नाट्य प्रयोग का अवसर पर वो बिघ्नी पुनः बिधन डाळण  अर  मेरी हत्त्या करणों ध्येय से त्रास दीण मिसे गेन।  तब वूं  दैत्यों कार्य तै बिघ्नकारी जाणी  मि  बरमा श्री म ग्यों।  ७६-७७।
तब मीन ब्रह्मा श्री कुण  बोलि -भगवन ! यी बिघ्नी  नाट्य बिणास  करण पर लग्यां छन।   इलै हे भगवन तुम रक्षा प्रबंध करणै कृपा कारो। ७८ । 
( तब मेरी प्रार्थना सूणि ) बरमा श्रीन  विश्वकर्मा से बोली - हे महामते ! तुम सबि लक्षणों से युक्त एक नाट्यशाला निर्माण कारो। तब विश्वकर्मा न थुड़ा समौ म यि शुभ , महाविस्तृत अच्छा लक्षण वळ नाट्यग्रिग रची अर वो बरमा श्री क सभा म उपस्थित ह्वे हथ जोड़ि  बुलण लगिन - हे देव ! नाट्य ग्रह तैयार च , तुम वै  तै देखि ल्यावो। ७९ -८१ । 
तब बरमा श्री , इंद्र अर  हौर  सबि देव गण नाट्यमंडप दिखणो शीघ्र से शीघ्र उना  ऐना।   तब तै नवा नाट्यगृह देखि बरमा  श्री  डिवॉन से बुलण लगिन - तुम सब तै अपण अपण  अंशों से ये नाट्यमंडपौ  रक्छा करण चयेंद। ८२, ८३ । 
अर  नाट्यमंडपौ रक्छा  बान  जूनि (चन्द्रमा ) विशेष रूप से नियुक्त करे गे।  चर्री दिशाओं रक्छा कुण वीं दिशा का लोकपालों  अर विदिशाओं (कोण दिशाओं ) रक्छा कुण मरुद्गणुं  तै नियुक्र कार।  नेपथ्य भूमि रक्षा कुण मित्र अर शून्य /खाली स्थान  रक्छा कुण  वरुण नियुक्त कार । वेदिका (रंगभूमि ) रक्षा कुण अग्नि,अर  वाद्य यंत्रों रक्षा कुण सबि दिबता नियुक्त करे  गेन।  स्तम्भों निकट का वास्ता  सबि चतुर्वर्ण (ब्रह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व छुद्र ) तै विशेष रूप से नियुक्त करे गे। स्तम्भों मध्यवर्ती भागों  रक्षा बान आदित्य अर  रूद्र देव स्थापित ह्वेन।  बैठकों रक्छा कुण भूतगण , मथ्या अटारी कुण अप्सरा अर शेष स्थलों की रक्छा कुण यक्षणियूं , अर  भ्यूंतल  (floor ) की रक्छा कुण  सागर तै नियुक्ति कार।   नाट्यसालों रक्छा कुण कृतांत काल अर पैथरा  द्वारों कुण अनंत अर  वासुकि की नियुनाट्य प्रारम्भ म रंगमंच मध्य क्ति करे गे।  देळी  पर यमदण्ड की नियुक्ति करे गे अर वांको ंथी शूल स्थापित करे गे।  नियति अर मृत्यु द्वी देवता द्वारपाल का रूप म नियुक्त ह्वेन। रंगपीठ रक्षार्थ महेंद्र  अफु स्थित ह्वेन।    मताचरणी म दैत्य नाशी विद्युतै  स्थापना ह्वे , अर मताचरणी  क  चर्री स्तम्भों  की रक्षार्थ भूत , यक्ष , पिशाच अर गुह्यकों नियुक्ति ह्वे।  जर्जरम दैत्य नाशी बज्र स्थापित करे गे अर वैक खुट्टों म अपरिमित शक्तिसंपन देवगण  की स्थापना ह्वे। जर्जरै  पैलो शीर्षम बरमा की , दुसरम शिव की , तिसरम विष्णु की , चौथ म स्कंध अर पंचों म शेष ,  वासुकि अर तक्षक  जन महासर्प स्थापित करे गेन।  ये प्रकार विघ्न नाशौ  बान विभिन्न भागों म देवगण की स्थापना करे गे. ८४-९४ । 
रंगमनवः का मध्यम स्वयं बरमा स्थित ह्वेन।  इलै नाट्य शुरुवात म रंगमंच मध्य (बरमा  की पूजा बान ) पुष्प चढ़ाये जांदन।  ९५ । 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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Strategies for Increasing Wealth, Market Share, or Vote Share

Strategies for Chief Executive Officer for creating wealth and defending the wealth -7
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer – 259
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 259       
     s= आधी अ                         
By: Bhishma Kukreti (Management Acharya)
-अधर्मशील नृपते: सर्वत:  संहरेत् धनम् I
छलाद् बलात् दस्युवृत्ता परराष्ट्राद्धरेत्तथा II 7II
 The king should take away the wealth from the king those are engaged in immoral means by crafts or force or by robbing and also from another kingdom.
(Shukraneeti, Chapter 5, Kosha Nirupan, 7)
  CEO must know the strategies of increasing Wealth, Market Share, or Vote Shares for the organization-
 The modern CEO ca not attack on opponents by old methods for increasing wealth, market share or vote share for the organization. However, there are means of increasing wealth, market share or vote share –
Taking market share from weak brands or diminishing brands (diminishing due to applying illegal methods) as Samsung, LG should fill the gap by grabbing the market share of Videocon. Summit invented Mixer Grinder in India and had been the strongest market leader for decades. However, due to family problems among stakeholders, Summit started diminishing. Preeti a mixer from South India emerged and filled the gap that happened due to absences from Summit.
  In Bengal, the leading political party Bhartiya Janta party did not have takers as a political party by 2014. However, by 20121, the Bhartiya Janta party became the running political party in the state after Trina Moll Congress (TMC).  Bhartiya Janta party took the following strategically steps for increasing its vote share and for becoming the main opposition party of TMC-
  Bhartiya Janta party lured the active workers of Congress and Communists parties as both Parties became weak due to thumping win by TMC.
Bhartiya Janta Party took active leaders from TMC and took them into its fold.
 When Akai brand diminished (because it was found that the brand owner Moolchandani cheating the government on excise duty front and sales tax too) , many Indian brands tried to grab the market share of Akai TV.
  When ex-Chief Minister and Janta Dal secular Laloo Yadav was sent to Jail in Chara /Fodder scam, Bhartiya Janta party took advantage by taking Vote Share of Janta Dal (secular in Bihar.
 The conclusion is that Political Parties should be ready to grab the Vote Share of weakening political parties and the commercial organizations should be active enough for grabbing the market share of a diminishing brand or weakening brand.
References
1-Shukra Niti, Manoj Pocket Books Delhi, page -191
Copyright@ Bhishma Kukreti, 202
Strategies for -  taking market share of diminishing brand or increasing vote share by political parties by filling the vacuum created due to weak or diminishing political parties.

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