Author Topic: Strugle Story Of Making Uttarakhand State - उत्तराखंड राज्य बनने की संघर्ष कहानी  (Read 24619 times)

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Great work Mehta ji and Pankaj bhai keep it up.

हेम पन्त

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उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान लिखी गयी नागेन्द्र जगूडी की एक कविता

दूध का जग्वाला बिराला बण्यां छन
तेरंडी का चोर, सरवाला बण्यां छन
जनता का राज मां, कानून सड्यूं छ
खोला जरा आंखां, अंदयारू पड्यू छ

बाघ यख बाखरों का रखवाला बण्यां छन
बांजा घट की रीख, भग्वाला बण्यां छन

जनता की लाश पर झण्डा गडीग्या
नेता का भाषण और बैनर तनीग्या
नेता मगरमच्छ, मनखी गाला बण्यां छन

पुलिस और पीएसी बटमारा बण्यां छन
मंत्री, मुख्यमंत्री हत्यारा बण्यां छन
घूस भ्रष्टाचार पर पारा चढ्या छन
पहाड का नौजवान अंगारा बण्यां छन


हेम पन्त

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उत्तराखंड आंदोलन पर कामिक्स बनाई

खटीमा(ऊधमसिंहनगर)। थारु राजकीय इंटर कालेज में पढ़ने वाले बारहवीं कक्षा के छात्र देवेंद्र ओझा ने उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं पर आधारित कामिक्स तैयार की है। करीब बीस पेज की इस किताब में आंदोलन की उग्रता, पुलिस उत्पीड़न आदि को बखूबी प्रस्तुत किया गया है।

निकटवर्ती भुड़ाई गांव के रहने वाले देवेंद्र ने भले ही राज्य आंदोलन में भागीदारी न की हो, मगर वह पूरे आंदोलन से बेहतर ढंग से वाकिफ है। इसके लिए उन्होंने आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल रहे लोगों से जानकारियां जुटाई। इसके अलावा विभिन्न समाचार पत्रों की खबरों को भी पढ़ा। तभी से उन्होंने पूरे आंदोलन को सिलसिलेवार ढंग से एक पुस्तक के रूप में लिपिबद्ध करने की ठानीं। देवेंद्र के मुताबिक पिछले वर्ष विद्यालय में एक संस्था की ओर से पांच दिन की कार्यशाला आयोजित की गई। जिसमें कार्टून बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। तब से उन्होंने आंदोलन की स्मृतियों को लिपिबद्ध करने के बजाए उन्हे कामिक्स के रूप में प्रस्तुत करने का मन बनाया। एक महीने की मेहनत के बाद उन्होंने इसे पूरा कर लिया। इस कामिक्स में खटीमा एवं मंसूरी गोलीकांड के साथ ही मुजफ्फर नगर कांड की घटनाओं को भी उन्होंने अपनी कल्पना शक्ति से चित्रित किया है। वह जल्द ही इस कामिक्स को प्रकाशित कराना चाहते है। उन्हे इसके लिए प्रकाशक की तलाश है। इसके अलावा देवेंद्र को कविताएं लिखने का भी शौक है। उनके पिता जगजीवन ओझा सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त है।


Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Hem bhai iski copy available ho sakti hai kya?

उत्तराखंड आंदोलन पर कामिक्स बनाई

खटीमा(ऊधमसिंहनगर)। थारु राजकीय इंटर कालेज में पढ़ने वाले बारहवीं कक्षा के छात्र देवेंद्र ओझा ने उत्तराखंड आंदोलन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं पर आधारित कामिक्स तैयार की है। करीब बीस पेज की इस किताब में आंदोलन की उग्रता, पुलिस उत्पीड़न आदि को बखूबी प्रस्तुत किया गया है।

निकटवर्ती भुड़ाई गांव के रहने वाले देवेंद्र ने भले ही राज्य आंदोलन में भागीदारी न की हो, मगर वह पूरे आंदोलन से बेहतर ढंग से वाकिफ है। इसके लिए उन्होंने आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल रहे लोगों से जानकारियां जुटाई। इसके अलावा विभिन्न समाचार पत्रों की खबरों को भी पढ़ा। तभी से उन्होंने पूरे आंदोलन को सिलसिलेवार ढंग से एक पुस्तक के रूप में लिपिबद्ध करने की ठानीं। देवेंद्र के मुताबिक पिछले वर्ष विद्यालय में एक संस्था की ओर से पांच दिन की कार्यशाला आयोजित की गई। जिसमें कार्टून बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। तब से उन्होंने आंदोलन की स्मृतियों को लिपिबद्ध करने के बजाए उन्हे कामिक्स के रूप में प्रस्तुत करने का मन बनाया। एक महीने की मेहनत के बाद उन्होंने इसे पूरा कर लिया। इस कामिक्स में खटीमा एवं मंसूरी गोलीकांड के साथ ही मुजफ्फर नगर कांड की घटनाओं को भी उन्होंने अपनी कल्पना शक्ति से चित्रित किया है। वह जल्द ही इस कामिक्स को प्रकाशित कराना चाहते है। उन्हे इसके लिए प्रकाशक की तलाश है। इसके अलावा देवेंद्र को कविताएं लिखने का भी शौक है। उनके पिता जगजीवन ओझा सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त है।




एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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1924 The first demand for Statehood raised by Kumaon Parishad

1931 Kumaon Commissioner Evitson submitted report on economic backwardness of the region to Government of United Province

1938 The All India Congress at its Srinagar (Garhwal) convention chaired by Jawahar Lal Nehru moots Statehood to the region

1946 Haldwani convention of the All India Congress chaired by Badri Dutt Pandey demands separate administrative unit for hills. Demand rejected by United Province Premier G.B. Pant

1952 Communist Party of India General Secretary P.C. Joshi submits a memorandum to Government of India for Statehood to the hills

1953 Three-member States Reorganisation Commission formed by Central Government under Fazal Ali does not consider demand for Uttarakhand though one member, K.M. Panicker, supports it.

1965 The Communist Party moots proposal for an Autonomous Hill State.

1973 Uttarakhand Parvatiya Rajya Parishad gives `Dilli Chalo' call to press for Statehood

1974 Congress MP Pratap Singh Negi presents a proposal in Parliament for creation of Uttarakhand

1979 Uttarakhand Rajya Parishad constituted by Janata Party MP Trepan Singh Negi holds a rally in Delhi on July 28, 1980. Jaswant Singh Bisht of the first regional party, the Uttarakhand Kranti Dal (UKD), wins assembly election from Ranikhet.

1986 Demonstrations protesting delay in formation of Uttarakhand mark Prime Minister Rajiv Gandhi's Pauri and Nainital visit

1987 Demonstration and rally organised at Boat Club on November 231988 Jail Bharo agitation launched by the UKD at district headquarters

1989 Two UKD members, Kashi Singh Airi and Jaswant Singh Bisht, win their respective Assembly seats

1990 Uttarakhand Kranti March is organised by the UKD. UP Assembly adopts a unanimous resolution to form Uttarakhand

1991 The UKD supports Mulayam, loses all assembly seats in Uttarakhand. The Janata Dal demands Hardwar be made part of Uttarakhand. The CPI's memorandum to prime minister too demands Hardwar's merger in Uttarakhand

1992 The UP Assembly adopts another unanimous resolution to be sent to the Centre demanding statehood to `Uttaranchal'

1994 Mulayam's decision to enforce 27-per cent quota for OBCs in the hills, evokes large-scale protests. Police fire on agitators at Mussoorie, Khatima, Srinagar and Muzaffarnagar

1995 Anti-quota protests taken over by the demand for a separate State, agitation dies a natural death due to vested interests of leaders

1996 Prime Minister H.D. Deve Gowda during Independence Day speech lists formation of Uttarakhand among his priorities. Again, promises on the eve of assembly elections to bring Uttarakhand into existence by March 31, 1997.

1997 The BSP-BJP Government passes another resolution demanding Statehood for Uttaranchal. The Centre prepares draft bill which is awaiting the approval of the Union Cabinet.

पंकज सिंह महर

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1897- अल्मोड़ा के राजकीय हाईस्कूल में हुई बैठक में लिये गये निर्णय के बाद महारानी विक्टोरिया को भेजे पत्र से पर्वतीय क्षेत्र की पृथक राजनैतिक व सांस्कृतिक पहचान को मान्यता दिलाने का पहला प्रयास हुआ। इस बैठक में पं० गोपाल दत्त जोशी, राय बहादुर दुर्गा दत्त जोशी, पं० हरिराम पांडे व राय बहादुर बद्रीदत्त जोशी मौजूद थे।

१९२३- 27 नवम्बर, धार्मिक, सांस्कृतिक, ऎतिहासिक और राजनैतिक आधार पर उत्तराखण्ड को संयुक्त प्रांत से अलग करवाने की मंशा से राजा आनन्द सिंह, जिम कार्बेट, भैरव द्त्त, जंगबहादुर विष्ट, लच्छी राम शाह, ऎनी बिल्कनसन, हाजी नियाज अहमद, गंगाधर पांडे, आदि लोगों ने संयुक्त प्रांत के गवर्नर को एक ग्यापन भेजा गया, जिसमें मांग की गयी कि "सरकार को चाहिये कि कुमाऊं को शेष भारत से पृथक करने के लिये जल्द कदम उठाये।" {कुमाऊं से अभिप्राय टिहरी रियासत को छोड़कर सम्पूर्ण उत्तराखण्ड से था, जो तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नरी थी}

१९२८- साइमन कमीशन के भारत आने की खबर से पहाड़ के लोगों ने उत्तराखण्ड को विशेष दर्जा दिये जाने की मांग के आशय से "कुमाऊं एक पृथक प्रांत" शीर्षक से लिखा स्मृति पत्र आगरा, अवध के गवर्नर के मार्फत ब्रिटिश सरकार को दिया।

१९२९- पहाड़ के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने गवर्नर से मुलाकात कर कुमाऊं के लिये अलग से संविधान निर्धारण के कार्य हेतु एक संसदीय समिति के गठन की मांग के आशय से उन्हें ग्यापन दिया।

१९३८ से पहले गोरखो के आक्रमण व उनके द्वारा किये अत्याचरो से अन्ग्रेजी शासन द्वारा मुक्ति देने व बाद मे अन्ग्रेजो द्वारा भी किये गये शोषण से आहत हो कर उत्तराखण्ड के बुद्धिजीवियो मे इस क्षेत्र के लिये एक प्रथक राजनैतिक व प्रशासनिक इकाई गठित करने पर गम्भीरता से सहमति घर बना रही थी. समय-समय पर वे इसकी मांग भी प्रशासन से करते रहे.

१९३८ = ५-६ मई, को कांग्रेस के श्रीनगर गढ्वाल सम्मेलन मे क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये एक प्रथक प्रशासनिक व्यवस्था की भी मांग की गई. इस सम्मेलन मे माननीय प्रताप सिह नेगी, जवाहर लाल नेहरू व विजयलक्षमी पन्डित भी उपस्थित थे.

पंकज सिंह महर

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१९४६: हल्द्वानी सम्मेलन मे कुर्मान्चल केशरी माननीय बद्रीदत्त पान्डेय, पुर्णचन्द्र तिवारी, व गढ्वाल केशरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा द्वारा पर्वतीय क्षेत्र के लिये प्रथक प्रशासनिक इकाई गठित करने की माग की किन्तु इसे उत्तराखण्ड के निवासी एवं तात्कालिक सन्युक्त प्रान्त के मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अस्वीकार कर दिया.
१९५२: देश की प्रमुख राजनैतिक दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम महासचिव, पी.सी. जोशी ने भारत सरकार से प्रथक उत्तराखण्ड राज्य गठन करने का एक ग्यापन भारत सरकार को सोपा. पेशावर काण्ड के नायक व प्रसिद्द स्वतन्त्रता सेनानी चन्द्र सिह गढ्वाली ने भी प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के समक्ष प्रथक पर्वतीय राज्य की माग क एक ग्यापन दिया.
१९५५: २२ मई नई दिल्ली मे पर्वतीय जनविकास समिति की आम सभा सम्पन्न. उत्तराखण्ड क्षेत्र को प्रस्तावित हिमाचल प्रदेश में मिला कर वृहद हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग.
१९५६: पृथक हिमाचल प्रदेश बनाने की मांग राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा ठुकराने के बाबजूद गृह मन्त्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने अपने बिशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुये हिमाचल प्रदेश की मांग को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया. किन्तु उत्तराखण्ड के बारे में कुछ नहीं किया.
१९६६: अगस्त माह में उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने प्रधानमन्त्री को ग्यापन भेज कर पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग की.
१९६७: (१० - ११ जून) : जगमोहन सिंह नेगी एवम चन्द्र भानु गुप्त की अगुवाई में रामनगर कांग्रेस सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिये पृथक प्रशासनिक आयोग का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा.
२४-२५ जून, पृथक पर्वतीय राज्य प्राप्ति के लिये आठ पर्वतीय जिलों की एक "पर्वतीय राज्य परिषद" का गठन नैनीताल में किया गया जिसमें दयाकृष्ण पान्डेय अध्यक्ष एवम ऋशिबल्लभ सुन्दरियाल, गोविन्द सिहं मेहरा आदि शामिल थे.
१४-१५ अक्टूबर: दिल्ली में उत्तराखण्ड विकास संगोष्टी का उदघाटन तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्री अशोक मेहता द्वारा दिया गया जिसमें सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह ने क्षेत्र के पिछडेपन को दूर करने के लिये केन्द्र शासित प्रदेश की मांग की.
१९६८: लोकसभा में सांसद एवम टिहरी नरेश मान्वेन्द्र शाह के प्रस्ताव के आधार पर योजना आयोग ने पर्वतीय नियोजन प्रकोष्ठ खोला.

पंकज सिंह महर

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१९७०: (१२ मई) तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान प्राथमिकता से करने की घोषणा की.
१९७१: मा० मान्वेन्द्र शाह, नरेन्द्र सिंह बिष्ट, इन्द्रमणि बडोनी और लक्षमण सिंह जी ने अलग राज्य के लिये कई जगह आन्दोलन किये.
१९७२: श्री रिषिबल्लभ सुन्दरियाल एवम पूरण सिंह डंगवाल सहित २१ लोगों ने अलग राज्य की मांग को लेकर बोट क्लब पर गिरफ़्तारी दी.
१९७३: पर्वतीय राज्य परिषद का नाम उत्तराखण्ड राज्य परिषद किया गया. सांसद प्रताप सिंह बिष्ट अध्यक्ष, मोहन उप्रेती, नारायण सुंदरियाल सदस्य बने.
१९७८: चमोली से विधायक प्रताप सिंह की अगुवाई में बदरीनाथ से दिल्ली बोट क्लब तक पदयात्रा और संसद का घेराव का प्रयास. दिसम्बर में राष्ट्रपति को ग्यापन देते समय १९ महिलाओं सहित ७१ लोगों को तिहाड भेजा गया जिन्हें १२ दिसम्बर को रिहा किया गया.
१९७९: सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेत्रत्व में उत्तराखण्ड राज्य परिषद का गठन. ३१ जनवरी को भारी वर्षा एवम कडाके की ठंड के बाबजूद दिल्ली में १५ हजार से भी अधिक लोगों ने पृथक राज्य के लिये मार्च किया.
१९७९: (२४-२५ जुलाई) मंसूरी में पत्रकार द्वारिका प्रसाद उनियाल के नेत्रत्व में पर्वतीय जन विकास सम्मेलन का आयोजन. इसी में उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना. सर्व श्री नित्यानन्द भट्ट, डी.डी. पंत, जगदीश कापडी, के. एन. उनियाल, ललित किशोर पांडे, बीर सिंह ठाकुर, हुकम सिंह पंवार, इन्द्रमणि बडोनी और देवेन्द्र सनवाल ने भाग लिया. सम्मेलन में यह राय बनी कि जब तक उत्तराखण्ड के लोग राजनीतिक संगठन के रूप एकजुट नहीं हो जाते, तब तक उत्तराखण्ड राज्य नहीं बन सकता अर्थात उनका शोषण जारी रहेगा. इसकी परिणिति उत्तराखण्ड क्रांति दल की स्थापना में हुई.

पंकज सिंह महर

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१९८०: उत्तराखण्ड क्रांति दल ने घोषणा की कि उत्तराखण्ड भारतीय संघ का एक शोषण विहीन, वर्ग विहीनऔर धर्म निरपेक्ष राज्य होगा.
१९८२: प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने मई में बद्रीनाथ मे उत्तराखण्ड क्रांति दल के प्रतिनिधि मंडल के साथ ४५ मिनट तक बातचीत की.
१९८३: २० जून को राजधानी दिल्ली में चौधरी चरण सिंह ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उत्तराखण्ड राज्य की मांग राष्ट्र हित में नही है.
१९८४: भा.क.पा. की सहयोगी छात्र संगठन, आल इन्डिया स्टूडेंट्स फ़ैडरेशन ने सितम्बर, अक्टूबर में पर्वतीय राज्य के मांग को लेकर गढवाल क्षेत्र मे ९०० कि.मी. लम्बी साईकिल यात्रा की. २३ अप्रैल को नैनीताल में उक्रांद ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नैनीताल आगमन पर पृथक राज्य के समर्थन में प्रदर्शन किया.
१९८७: अटल बिहारी वाजपेयी, भा.ज.पा. अध्यक्ष ने, उत्तराखण्ड राज्य मांग को पृथकतावादी नाम दिया. ९ अगस्त को बोट क्लब पर अखिल भारतीय प्रवासी उक्रांद द्वारा सांकेतिक भूख हडताल और प्रधानमंत्री को ग्यापन दिया. इसी दिन आल इन्डिया मुस्लिम यूथ कांन्वेन्सन ने उत्तराखण्ड आन्दोलन को समर्थन दिया.
२३ नबम्बर को युवा नेता धीरेन्द्र प्रताप भदोला ने लोकसभा मे दर्शक दीर्घा में उत्तरखण्ड राज्य निर्माण के समर्थन में नारेबाजी की.
१९८८: २३ फ़रवरी : राज्य आन्दोलन के दूसरे चरण में उक्रांद द्वारा असहयोग आन्दोलन एवम गिरफ़्तारियां दी.
२१ जून: अल्मोडा में ’नये भारत में नया उत्तराखण्ड’ नारे के साथ ’उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ का गठन.
२३ अक्टूबर: जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली में हिमालयन कार रैली का उत्तराखण्ड समर्थकों द्वारा विरोध. पुलिस द्वारा लाठी चार्ज.
१७ नबम्बर: पिथौरागढ़ मे नारायण आश्रम से देहारादून तक पैदल यात्रा.
१९८९: मु.मं. मुलायम सिह यादव द्वारा उत्तराखण्ड को उ.प्र. का ताज बता कर अलग राज्य बनाने से साफ़ इन्कार.
१९९०: १० अप्रैल: बोट क्लब पर उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के तत्वाधान में भा.ज.पा. ने रैली आयोजित की.

 

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