अब भी बड़ा सकूं है
अब भी बड़ा सकूं है
उस मेरे भूले गाँव में
उस पिपल की छांव में
उन कागज की यादों की नाव में
अब भी बड़ा सकूं है ......
याद आते ही वो मैं उस संग झूम जाता हूँ
अपने को कहाँ हूँ मैं ये तुरंत भूल जाता हूँ
गोते खता हूँ उस अविस्मरणीय पल में
सुखद अनुभूति पाता हूँ रोते मेरे दो नयन से
अब भी बड़ा सकूं है ......
हर पल साथ धड़कता है वो मेरे दिल के धड़कन जैसा
स्वास को जब छूती सुगंध उसकी मेरी जिंदगी में लग जाता तड़का
महक उठता है पूरा आलम गुलशन मेरा वो सारा खिल जाता
सौंधी सी मिटटी से लिपे जब कोई मेरा यहां मेरे गले मिल जाता
अब भी बड़ा सकूं है ......
अभी मैं मचल जाता हूँ अब भी मै खूब तड़पता हूँ
अब भी एक अँधेरे से कोने बैठ खुद पर मैं खूब भड़कता हूँ
कौन सा जिंदगी का मोड़ था वो जब छूटा मेरा वो अपना
एक सपने को पाने को मैं रोज यूँ ही जब बिखर जाता हूँ
अब भी बड़ा सकूं है ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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