Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 32041 times)

Bhishma Kukreti

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*********दिव्यदृष्टि *********एक गढ़वाली ननि कथा



                  कथाकार- डॉ नरेन्द्र गौनियाल



[गढ़वाली कथाएँ, आधनिक गढ़वाली कहानियाँ, उत्तर भारतीय भाषाई कथाये, उत्तराखंडी कहानियां , गढ़वाली लघु कथा, आधुनिक गढ़वाली लघु कथा   लेखमाला]


शिवरात्रि कु दिन.सुबेर बिटि ही शिवजी का मंदिर मा पूजा-पाती शुरू ह्वैगे.खूब भीड़-भाड़,चहल-पहल.दिन भर बर्त्वयों कु आणु-जाणु लग्यूं रहे.व्रत धारी शिवलिंग पर बेलपत्र,दूध,गंगाजल ,फूल-पाती चढाणा रहीं. हरिद्वार मा दिल्ली रोड पर छायो यू मंदिर शंकर आश्रम का भितर.कॉलेज टैम पर हम बि यखी रैंदा छाया एक कमरा लेकि.
           आज शिवरात्रि कि छुट्टी छै.मेरो बि व्रत लियों छौ. नहे -धुये कि मंदिर मा चलि गयूं, आश्रम का  भितर ही भजन-कीर्तन चलना छाया.दिन भर भीड़ रहे. देर राति  तक  कार्यक्रम चलनु रहे.ब्यखुनी का टैम पर एक कखि भैर बिटि अयाँ  स्वामीजिन  प्रवचन करे.ऊ आश्रम मा ही एक कमरा मा रैणा छया.स्वामीजिन  शिवजि कि महिमा कु वर्णन करते-करते दिव्य-दृष्टि पर बि प्रकाश डालि अर बोलि कि ,''आध्यात्मिक शक्ति अर योग साधना से प्रभु का साक्षात दर्शन ह्वै जन्दीन.कुण्डलिनी जागृत करि कै दिव्य-दृष्टि प्राप्त ह्वै सकद.ईश्वर कि य कृपा  म्यार ऊपर बि च''.
           सबि श्रोता स्वामीजी का प्रवचन सुणि कै खुश ह्वैगीं.देर राति तक प्रवचन चलना रहीं.आज आश्रम कु गेट बि खुला छोडि दिए गे.राति एक बजी करीब फलाहार कैरि हम त से गयां.भक्तजन बि अपणा घौर चलि गैनी.आश्रमवासी बि से गईं.सर्या दिन भर व्रत अर भजन-कीर्तन से थकान बि ह्वैगे छै..इनि नींद पड़ी कि सुबेर तब उठां जब आश्रम मा गबलाट ह्वै.
            उठी के पता चलि कि  आश्रम का भितर कुछ ब्रह्मचारियों कि चोरी ह्वैगे.एक बक्सा क्वी लीगे,जैम रूप्या,लारा-लत्ता रख्यां छाया .इना-फुना सब देखि पण कखि नि मिलु.ह्वै सकद क्वी भगत करि गे कमाल.राति गेट जु खुला छौ.आश्रम का भितर-भैर सब जगा देखि पण कख मिलणु छौ?तब एक आश्रमवासिंन बोलि कि भै जरा ब्यालि वल़ा स्वामी जि तै पुछला..ऊ जणदा छन.सब बताई द्याला कि कख च  अर कु लीगे.पहुन्च्याँ महात्मा छन.ब्रह्मचारी वै कमरा मा गैनी.हम लोग बि दगड़ मा चलि गयां.स्वामी जि अबी तक सियाँ छाया.द्वार खुला छाया. ऊंतई उठाळी.अर बोलि कि यख त एक बक्सा चोरी ह्वैगे.कुछ बताई द्या..कख होलू..कु लीगु होलू.? स्वामी जिन उठिकै आंखि मेंडी अर सिरवाणा मा नजर मारि त ऊंको एक भगोया झोला जैमाँ रुप्या,अर भागोया वस्त्र आदि छा ,सब गायब.कमरा भितर देखि ,पण नि मिलो. भैर ऐकि देखा त स्वामीजी का जुत्ता अर जुराब बि नि छाया...ब्रह्मचारियोंन  बोलि-स्वामीजी क्य ह्वै ?स्वामीजी कि हालत द्यखन लैक छै..ब्रह्मचारी अपणा कमरा मा चलि गईं अर स्वामी बिचारु कपाल पकड़ी कै पटखाट मा बैठिगे .
                 डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित.



गढ़वाली कथाएँ, आधनिक गढ़वाली कहानियाँ, उत्तर भारतीय भाषाई कथाये, उत्तराखंडी कहानियां,  गढ़वाली लघु कथा, आधुनिक गढ़वाली लघु कथा लेखमाला जारी ... 

Bhishma Kukreti

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चबोड़ इ चबोड़ मा  गंभीर छ्वीं

                                    गढ़वळि संस्कृति क  खोज मा

 

                                                 खुजनेर - भीष्म कुकरेती

 

   पता नि किलै  धौं  अच्काल जै पर बि द्याखो संस्कृति  खुज्याणो खजि लगीं च. मि खामखाँ इ अपण ड़्यार आ णु  थौ कि इ-उत्तराखंड पत्रिका क विपिन पंवार जीक फोन आई बल,"भैजी आप गाँ जाणा  छंवां  त जरा गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू लेक ऐ जैन, अच्काल  गढ़वळि संस्कृति कि बड़ी भारी मांग च."

                जब बिटेन मीडिया वाळु न सूण कि मार्केटिंग कु  नियम च कि अपण ग्राहकुं तै वो इ द्याओ जु ऊं तै चयाणु ह्वाऊ त मीडिया वळा अपण बन्चनेरूं   भौत खयाल करण मिसे गेन। वो अलग बात च कि भारत वासी हिंसा ,  अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार से निजात चाणा छन अर अखबार या  टी.वी वळा यूँइ  खबरों ता जादा महत्व दीन्दन. 

        ग्राहक की मांग देखिक इ विपिन पंवार जीन बोली होलु कि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू ल्हेकी ऐ जयां. मीन बि स्वाच कि उनि बि मि खांमाखां गाँ जाणु   छौ त यीं बौ मा कुछ काम नी त स्या कलोड़ी  काँध  मलासणि च वळ हिसाब से मीन स्वाच कुछ ना से बढिया बेकार को इ सै कुछ त काम मील. चलो ए बाना गढ़वळि संस्कृति से बि मुलाकात ह्व़े जालि अर   म्यार टैम बि पास ह्व़े जालो.   

                      पण सबसे बड़ो सवाल यू छौ कि या गढ़वळि संस्कृति कख रौंदी अर या  होंदी कन च अर यींक रंग रूप क्या च !   

     जब मि छ्वटु थौ या जवानी मा गाँ मा रौऊ त में तै कबि बि खयाल नि आई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति दगड मेलमुलाकत रखण चयांद कि कुज्याण  कब काम ऐ जाओ धौं !  ना ही हमन किताबु मा बांच कि गढ़वळि संस्कृति बि क्वी चीज  होंद. हम न त यू. पी बोर्ड क स्कूलूं  मा यि पौड़ कि हमारि संस्कृति माने अयोध्या या मथुरा अर बची ग्याई त इलाहाबाद अर वाराणसी. जब मुंबई मा औं त चालीस साल तलक नौकरी संस्कृति या मार्केटिंग संस्कृति दगड़  पलाबंद कार अर अब तक यूँ द्वी संस्कृत्यूँ छोड़िक कैं  हैकि दगड आँख उठै क बि नि द्याख. कबि इन बि  नि सूझि  कि एकाद चिट्ठी गढ़वळि संस्कृति कुणि भेजि द्यूं जां से कबि गाँ जाण ह्वाओ त गढ़वळि संस्कृति तै पछ्याणण मा दिक्कत नि ह्व्वाऊ. गढ़वळि संस्कृति कुणि चिट्ठी भेजणु रौंद त आज औसंद नि आणि छे. पण अब त संस्कृति  तै अफिक खुज्याण इ च .
 
        मि ब्यणस्यरिक मा बिजि  ग्यों बल सुबेर सुबेर संस्कृति दिखे जालि.   मि अन्ध्यर मा इ गाँ ज़िना ग्यों .  यू बगत जन्दुर पिसणो च त जनानी जंदुर पिसणा होला त सैत च गढ़वळि संस्कृति जंदरो ध्वार  मिल जालि. मि अपण दगड्या  सूनु  काक क  चौक मा ग्यों कि मै तैं ठोकर लगि  गे.  एक अवाज आई ,' हाँ ! हाँ ! लगा रै बुडडि तै ठोकर ! " हैं , इन आवाज त सूनु काक जंदरो छौ." मी टौर्च जळाइ देखिक खौंळे ग्यों सीडी क बगल मा तौळ एक जंदरौ तौळक  पाट भ्युं पड्यू  छौ. मीन पूछ,' हे जंदुर इखम क्या करणि छे?"
 
जंदर क तौळक पाटन कळकळि भौण  म जबाब दे ,"बुड्यान्द  दैक  दिन कटणु छौं"

"हैं ! पण यू बगत त चून-आटो पिसणो च?" मीन पूछ   

जंदरौ न जबाब दे, ' अरे लाटु अब नाज क्वी नि पिसद. अब त फ्लोर मिल या पिस्युं आटो जमानो च ." 
 
मीन दुखी ह्वेक अफु कुण ब्वाल," अब संस्कृति कख मीललि !"

जंदरौ तौळक पाट न बोलि," वींक ले क्या,  बदखोर ह्वेली डीजल  चक्यूँ ध्वार."

मि जाण बिस्यों त जंदरौ  पाट न बोलि, ' ह्यां जरा एक काम करि दे. म्यार बुड्या उख गुज्यर भेळुन्द पड्यू च . भौत बुरी हालत मा च. कथगा दै बुड्याक रैबार  ऐ ग्याई बल  आखिरैं मुख जातरा देखि ले.केदिन ले हम कन एक हैंकाक मीरि  बुकान्दा छ्या (मीरि  बुकाण- किस/चुम्मा  का प्रतीतात्मक शब्द है )." मै समज ग्यों कि जंदरौ तौळक पाट  मथ्यौ पाट तै मिलणो जाण चाणो च . लव, प्यार, माया सब्यूँ मा  जगा इकसनी होंद, चाहे जीव हो या निर्जीव!  मी तौळ क पाट तै कंधा मा उठैक  गुज्यर जिना ग्यों . बाट मा जंदरौ तौळक पाट न भौत सी कथा सुणैन.  गुज्यरो हालात पैलाक जनि इ  छे. हाँ ! पैल लोग रंगुड़ डाल्दा छ्या अब क्वी रंगुड़ नि डालदो. एक जुम्मेवार प्रवासी की असली भूमिका निभांद निभांद मीन वै जंदरौ तौळक पाट तै गुज्यर क भेळउन्द लमडै द्याई अर अब यि द्वी प्रेमी मीलि जाला अर एक हैंकाक मीरि त नि बुकाला पण एक हैंक तै दिखणा राला.  . अब यि जंदुर बि प्रागैतिहासिक काल की वस्तु ह्व़े जाला.

       अब मीन स्वाच की सुबेर हूण इ वाळ च  जनानी पींडौ तौल लेकि संन्यूँ  /छन्यूँ मा आणि ह्वेली . मै लग बल उख सन्यूँ मा गढ़वळि संस्कृति  क दर्शन ह्व़े इ जाला अर मि गढ़वळि संस्कृति क इंटरव्यू उखी छन्यूँ मा ले ल्योलु. अब चूंकि मेरो त सरा मुन्डीत  इ प्रवाशी ह्व़े ग्याई त हमारि गौशाला, सन्नी या छन्न्युं मा गढ़वळि संस्कृति त मिलण से राई. अर उन्नी बि गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणो  काम हम प्रवास्युं थुका च गढ़वळि संस्कृति तै अपनाणों जुमेवारी  गढ़वाळ का बासिन्दौ कि ही हूण चयांद कि ना ? अरे हम प्रवासी गढ़वळि संस्कृति अपणावां कि भैर देसूं संस्कृति  अपणावां ! जख रौला उखाक इ संस्कृति अपनाण इ ठीक च कि ना?

  त मि दुसरो छन्न्युं मा  ग्यो. मि जब छ्वटु छौ त  ये बगत (घाम आणौ  टैम पर) गाँ से जादा चहल पहल सन्न्युं ज़िना होंद छौ. गोर भैर गाडो, मोंळ भैर गाडो, दुधाळ गौड्यू  तै पींड खलाओ, घास खलाओ . ये बगत संन्युं मा  भौत काम हूंद थौ.

मि एकाक सनि/छनि/गौसाला   मा ग्यों त उख सुंताळ लग्यु छौ. सन्नी चौक मा तछिल, कण्डाळि  अर लेंटीना  जम्यु छौ. सन्नि क नाम नि छौ  बस जंगळ इ जंगळ. फिर मी स्ब्युं सन्न्युं मा ग्यों  त सबि जगा इ हाल छौ. सब जगा जंगळ को माहौल. मी अपण सन्नि म ग्यों त मी बेसुध ह्व़े ग्यों .सन्नि गायब छे बस घास अर घास अर द्वी तीन गीन्ठी डाळ बि जम्याँ छ्या. जब सनी  इ जंगळ मा तब्दील ह्व़े गेन त उख संस्कृति ह्वेली ना. मि निरसे ग्यों.
 
इथगा मा म्यार बाडा क सनि  बिटेन धै आई., ह्यां जरा इना आवदी  "

मी अपण बाडा क छनि क चौक ज़िना ग्यों त उख भैंस बाँधणो कील मी तै भट्याणु छौ.  कील मा अब जान  त नि छे पण मीन पछ्याणि दे कि यू बड़ो प्रसिद्ध कील छौ. म्यार बूड दिदा न यि सालौ कील घौट  होलु पर अब भसभसो ह्व़े ग्या छौ.
 
मीन ब्वाल , 'कन छे  ये भैंसों कील ?"

कीलन जबाब दे, ' बस दिन बिताणो छौं. आज ना त भोळ . बस एक इ लाळसा बचीं च कि अपण ठाकूरो   (म्यार  बाडा क नौनु) क दर्शन कुरु द्यूं . पोर ऐ बि छ्या नागर्जा पुजणो पण इना नि ऐन . जरा रैबार दे देन कि जब तक उ नि आला मीन नि मरण. मोरी बि ग्याई त इखी रिटणु रौण. कखि हंत्या रूप मा ऐ ग्याई  त फिर तुम लोगुन हंत्या बि पुजण अर दगड मा  गाळि बि दीण" मी कीलो दगड भौत देर तक छ्वीं  लगाणु रौं. मीन कील तै भर्वस दिलाई कि दादा जरुर त्वे तै दिखणो आलु  .

मी तै संन्युं हालत से उथगा दुःख, निरासा नि ह्व़े जथगा दुःख यू ह्वाई कि मै तै गढ़वळि संस्कृति इख नि मील अर मी वींको इंटरव्यू नि ले साको.

अब घाम ऐ गये छ्याओ .

हैं ए म्यारो भूभरड़! तौळ संन्युं से एक रस्ता च . मीन द्याख कि गाँ वाळ परोठी, बोतल लेकी दौड़णा सि छ्या. झाड़ा फिराग जाणो बगत बि च. झाड़ा जाणो गुज्यर त हैकि दिसा मा च त फिर यि गौं का लोग इन किलै इक दगड़ी दौड़णा छन ? अर झाड़ा जाण दै परोठी त क्वी नि लिजांद भै !

मीन स्वाच कि जख यि गाँ वाळ जाणा छन वख जरुर गढ़वळि संस्कृति से भेंट ह्व़े जाली.

 

(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग )
 
Read second part----

Copyright@ Bhishma Kukreti , 7/7/2012

Bhishma Kukreti

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Gaun ka Rista: A Garhwali Love Story with Difference

(Review of Garhwali Story collection ‘Gari’ (1981) by Durga Prasad Ghildiyal)

                                 Bhishma Kukreti

[Notes on Love Stories with Difference; Garhwali Love Stories with Difference; Uttarakhandi Love Stories with Difference; Mid Himalayan Love Stories with Difference; Himalayan Love Stories with Difference; north Indian Love Stories with Difference; Indian Love Stories with Difference; SAARC Countries Love Stories with Difference; South Asian Love Stories with Difference; Asian Love Stories with Difference]
[प्यार की कहानियाँ ; प्यार की आधुनिक गढ़वाली कहानियाँ ;प्यार की उत्तराखंडी कहानियाँ ;प्यार की मध्य हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की उत्तर भारतीय कहानियाँ ;प्यार की भारतीय कहानियाँ ;प्यार की सार्क देशीय कहानियाँ ;प्यार की दक्षिण एशियाई कहानियाँ ;प्यार की एशियाई कहानियाँ लेखमाला] 

               Rukma and Raghuveer are from the same Garhwali village. The village is an average village- a small village. The untold and strict rule is that a girl is sister of a boy -never mind the different caste. The rules are created by society and the rules of our human body are created by god or nature. There is always attraction from a male body towards female body. Rukma and Raghuveer fell in love. However, the village rule won the battle between love and culture. The love between Rukma and Raghuveer finished when both marry to other mates.
    Now, both were parents of well grown children. Is it possible to create a new relationship between two old lovers? The story discusses the point of village rules and new changing aspects of society.
     A story writer foresees the future too. Durga Prasad brings the tedious subject of love between boy and girl of a same village before 1981. The story takes the readers finding differences among three generations. Reader is also tensed in finding the real solution to know the meaning of relationship- relationship of village norms and relationship by emotions. The story writer Ghildiyal expertly portrays romance, love and the meaning of love.  There is space for readers to think after finishing the story.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
Copyright@ Bhishma Kukreti, 7/7/2012
प्यार की कहानियाँ ; प्यार की आधुनिक गढ़वाली कहानियाँ ;प्यार की उत्तराखंडी कहानियाँ ;प्यार की मध्य हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की हिमालयी कहानियाँ ;प्यार की उत्तर भारतीय कहानियाँ ;प्यार की भारतीय कहानियाँ ;प्यार की सार्क देशीय कहानियाँ ;प्यार की दक्षिण एशियाई कहानियाँ ;प्यार की एशियाई कहानियाँ लेखमाला जारी ...
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*********भूख (हल्कार)******** एक गढ़वाली कथा

कथा --डा. नरेंद्र गौनियाल





द्वीई झण चार बीसी से जादा ह्वैगे छा पण इना-फुना खूब चलदा-फिरदा छाया.नौना-ब्वारि अर नाती-नातिणो का दगड़ भलि कटिनी छै जिंदगी. एक दिन अचणचक राति मा मंगल सिंह कि जिकुड़ी सियाँ मा ही बुजि गे.राति बुढडी तै कुछ पता नि चलि.बुढयन राति पाणि तक नि मांगु.सुबेर जब ब्वारि च्या लेकिगै त ससुर जि पर बाच न सांस.बुढडी झंपा,नौनु उदेसिंह,नाती-नतीन सब्यों हलोळी पण कुछ बि ना.हड़क ना मड़क.उदेसिंहन चिम्चा से पाणि डाळी पर घुटेणा का बजाय भैर जिकुड़ीउन्द खतिगे.ये ब्वे ! क्य ह्वै त्यार बाबा तै ?इनु बोलि कै बूडन ह्यळी मरणि शुरू करि दीं.किलकारी मारि कै बोलि-ये बुड्या कनु गै तू,मीं छोडीकै....मिन कनकै रैण..मी बि लीजा अफु दगड़...ये ब्वे..ब्यालि राति त खिरबोजा सागा दगड़ी द्वी घुसळी खएं अर एक गिलास दूध बि पे.अर यू राति मा ही क्य ह्वै  ? ब्वारी,नाती-नातिन बि रूण लगी गईं.किलकिलाट  सूणि कै गौं का बैख-  जनाना सबि ऐगीं.सब यी छवीं लगाणा रैं कि स्वां चलि गे बिचारो.म्वरंद दा क्वी परेशानी नि ह्वै.
                 घाम आणा का बाद शैय्या तैयार ह्वैगे.मर्द लोग तिथाण मा चलि गईं बुड्या तै फुक्णो अर बेटुला ऊंका घार मा बैठ्याँ रैनी. दिन मा पड़ोस बिटि च्या बणी कि ऐ. सब्योंन पे पण बुढडीन नि पे.नाती-नातिनो तै पड़ोसियोंन ही रोटी-सब्जी खिलाई दे.शोक मनाणो तै अपणो घार मा कुछ नि बणायीं.इन मा कैकु ज्यू ब्वल्द अर कुछ रस्म-रिवाज बि द्यखण पडदीं.
                 ब्यखुनी चार बजि करीब रौल बिटि लोग वापस ऐनी. ब्वारिन ओबरा मा च्या बणे.च्या पीकी सब लोग हर्बी अपणा घौर चलि गैनी.राति कुछ लोग फिर ऐनी बैठणो.पड़ोस कि एक बेटुलिन रसोड़ा मा जैकि रोटी-साग बनै दे.नाती-नातिनो तै खिलाई कि वींन बोलि कि तुम लोग बि खै लिया.सब लोग बाद मा अपणा घौर सीणों चलि गिन.बाद मा उमेदु बि खैकी सेगे.
                ब्वारिन सासु तै बोलि कि रोटी बणी छन,खैल्या..बुढड़ीन बोलि कि ना. ना .मीं से त नि खयेणु,तू खैले.दिन भर का नि खयान भूख त लगीं छै पण...कुछ देर मा सासुन फिर ब्वारी तै बोलि कि तू खैले.मीखुणि च्या बणे दे.भूख-प्यास से बुढडी कु गिच्चू सुखणू छौ..ब्वारिन च्या बणेकी दे .अर फिर बोलि कि ..एक रोटी खैल्या च्या का ही दगड़. लदोड़ी मा हल्कार त  भौत हुईं छै पण...फिर बि बूडन बोलि कि  ना ना मीतै भूख नी..तू खैले . ब्वारिन बोलि कि तुम नि खांदा त मि बि नि खांदु..भुकी से जांदू.इन बोलि कि व अपणो कमरा मा ऐगे.कुछ देर  बाद रसोड़ा मा गै अर चार रोटी सल् कैकि टुप्प सेगे.हैंका भितर बूड तै निंद नि ऐ.राति भर उनि रै हरकणी-फरकणी.
          सुबेर ब्वारिन च्या बणाई.च्या का बाद कल्यो रोटी पकै.आलू कु साग बि दगड़ मा छौ.सासु तै देकी बोलि कि अब त खै ल्या तुम.सासुन बोलि कि क्य कन तब खाणु त च.,निथर तिन बि रैंण भुकी.बूडन चार रोटी उनि सळकै दीं बिन चपयाँ.कुटमदरिन बि कल्यो रोटी खै अर लगी गईं अपणा काम-धंधा पर.आखिर पेट कि भूख कैन सहे सक.जै दिन य भूख मिटि जाली,वै दिन दुन्य ख़तम ह्वै जाली.                     

Bhishma Kukreti

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School: A Garhwali Story Portraying Weakening of Cooperative Institutions by States 

(Review of Garhwali story collection ‘Bwari’ by Durga Prasad Ghildiyal)
                                              Bhishma Kukreti

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[राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी गढ़वाली कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तराखंडी कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं सम्बन्धी मध्य हिमालयी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तर भारतीय कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी भारतीय कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी दक्षिण एशियाई कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी एशियाई कथाये लेखमाला ]
 

    The village needs a school. Villagers form a cooperative organization. The villagers built a school through Shramdan( cooperation). The villagers are very much enthusiastic in building a school for their children.  The cooperative organization runs the school. However, when the states takes over the organization the cooperation among villagers diminishes.
  The story deals many facets of cooperation and non cooperation moods of people.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 7/7/2012
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राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी गढ़वाली कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तराखंडी कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं सम्बन्धी मध्य हिमालयी कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी उत्तर भारतीय कथाये; राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी भारतीय कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी दक्षिण एशियाई कथाये;राजकीय सहकारी संस्थाएं  सम्बन्धी एशियाई कथाये लेखमाला जारी ...

Bhishma Kukreti

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चबोड़ इ चबोड़ मा गंभीर छ्वीं                                   

                  गढ़वळि संस्कृति क खोज मा -२



                                                  खुजनेर - भीष्म कुकरेती

 

 (ब्याळि आपन बांच बल लिख्वार गढ़वळि संस्कृति दगड मुखाभेंट करणो अपण गाँ गे अर उख वैक भेंट एक जंदरौ तौळअ  पाट से ह्व़े. फिर लिख्वार संन्युं ज़िना गे )

 

             मीन तौळ नजर मारी त  सनै सनै   लोगुक तादात बडणि छे . सैत च दुसर गाँव क लोग बि परोठी-बोतल लेकी ये बाटो बिटेन कखि जाणा छया.

मीन कील तै पूछ," ये म्यार बाडा जी बांठौ  कील यि लोग परोठी-बोतल लेकि  कख जाणा छन ?"

 

कील न मेरो जाबाब क जगा पर ब्वाल,' ओ त अबि बि तुमारि टक मै तै हथियाणो नि ग्याई? तबी त म्यार बाडा जी बांठौ कील क नाम से मि तै भट्याणि छे."

मीन ब्वाल," हाँ या बात सै च बल बिगळयाणो परांत  बि म्यार बुबा जी अर बाडा जी मा प्यार मा कमी नि ऐ पण म्यार बुबा जी ये कील तै कील ना अपण ददा जी क समळौण  माणदा छया."

 

कील न बोली," जन त्यार बाडा जी अपण ददा क लगायुं गदनौ आमौ   डाळ तै बुल्दा छा, 'भाई क बांठौ   आम '  "

मीन ब्वाल," हाँ ! उन त  हम वै आम क एकेक हड्यल  तै द्वी हिस्सों मा बंटद छ्या.पण फिर बि बुले जांद छौ कि म्यार बुबा जीक बांठौ आम. यू आम बल म्यार दादा जीक ददा जी न लगै छौ .अर म्यार बडा जी बिगळयाणो बाद बि ये आम की देख भाळ बच्चो जां करदा छा." मि अब भावुक हूण बिसे गौं.



कील न पूछ," त क्या तेरी या त्यार बुबा क टक मोरद मोरद तक ड़्यारम म त्यार  बूड ददा क बणयूँ  चौंतरा पर  नि छे."

मीन हुन्गरी पूज ,"  हाँ बाबा जी तै वै  चौंतरा से बड़ो प्यार छौ. बडा जी अर म्यार बुबा जी जडु मा दगड़ी घाम तापदा छया अर रुड्यू  रात वेई चौंतरा मा सीन्दा छया . बिगळयाण से बि दुयुंक प्यार मा फ़रक नि पोड़."

 

कील न ब्वाल,' हाँ जब बि त्यार बुबा उन्ना देसन (परदेस न ) ड़्यार आन्द छयो त मि तै प्यार से मलासदो छौ. "

मीन ब्वाल," अर जब बुबा जी उन्ना देसन ड़्यार आन्द छ्या त एक राति खुणि अपण भैजी याने म्यार बडा जी क दगड डाँडो कूड़ मा सीणो जरूरर जांदा छा."

 

कील न बोली," अच्छा अच्छा तू भद्वाड़ो डांडौ बात करणि छे. जख त्यार बडा अर बुबा न द्वी कुठड्यू  कूड़ लगै छौ."

मीन उलार मा ब्वाल,"  हाँ. उख पांच दूणो भद्वाड़ छौ त उख रात दिन काम करण पोड़द छौ त दुयूं न साजो कूड़ चीण बल  खेती टैम पर हम कामगती उखी से जंवां. बुबा जी जब बि उन्ना देस बिटेन आन्द छया त म्यार बडा खुण अलग से मिठाई लांदा छया अर फिर एक दिन उख डांडो कूड़ म दगड़ी खाणक  बणान्दा छ्या, उखी एक रात बितान्दा छया  . बुबा जी क लईं चीजुं मजा लीन्दा छया. सारा  अडगै  (इलाका ) मा म्यार बडा जी अर म्यार बुबा जी खुणि  लोकर राम लक्ष्मण बुल्दा छया."

 

कील न पूछ," ये त्यार कथगा भै भुला छन ?"

मीन जबाब दे," तीन इ छन भै."

"औ ! त दगड़ी इ रौंदा ह्वेला नी ?" कील अ सवाल छौ.

मीन अणमण ह्वेक जबाब दे,; ना '

 

कील न ब्वाल,ना अ ?"

"ना हम दगड़ी नि रौन्दां ."  मेरो खड़खड़ो  जबाब छौ

कील न फिर पूछ," क्या हाल छन हौरी भायुं क ?"

'कुज्याण ठीकि होला " म्यरो उदासीन जबाब छौ.

 

कील न खौंळे  क ब्वाल," कुज्याण मतबल ?"

' कुज्याण मतलब मै पता नी च कि ऊंका क्या हाल छन .' मीन बोल

" हैं ! क्या बुनी छे ?" कील न पूछ

मीन  अणमणो ह्वेक जबाब दे,' हाँ सैत च हम चारेक साल बिटेन नि मील होलां "

 

' पण तुम लोग त एकी शहर मा छन वां ना ?" कीलो सवाल छौ

मीन ब्वाल," हाँ. पण हम तिन्यु मा कथगा सालुं से बातचीत  नी च ."

कील न ब्वाल," ये झूट  नि बोल हाँ !"

मीन ब्वाल," हाँ हम क्वी बि एक हैंक से नि बचळयान्दवां ."

 

कील क सवाल छौ  ," क्यांक बान  झगड़ा  ह्व़े ?"

" पैल त भौत सालू तक बुबा जीक कमायिं  जायजादो बान झगड़ा राई  फिर हमार बूड खूडू क  एक भगवती क भाग्यशाली खुन्करी छे. वींक बान त इथगा झगड़ा ह्व़े कि आज तक हम एक हैंकाक मुख बि नि दिखण चाँदवां " मीन भेद ख्वाल



कील न ब्वाल,' त ...?"

मीन मुंड हलाई.

कील न पूछ , त जग्गी जुग्गी मा ?"

मीन बताई ," ना .हम एक तै देखिक मुख फरकै दीन्दा "

कील न ब्वाल,' बड़ो खराब ह्व़े भै,"

 

अब मीन बात घुमाणो बान पूछ , " ह्यां ! सी लोग परोठी-बोतल लेक कख जाणा छ्या ?"

इथगा मा एक अवाज आई," ये ठाकुर जरा इना आदि ."

मी चचरै ग्यों कि या अवाज  कैकी च

कील न बताई,' तुमर सनि पैथर  ज्वा सनि च वा भट्याणि च ."

 

फिर से अवाज आई," ह्यां जरा देरो खुणि इना ऐन जरा."

कील न बोल, "जा जयादी . जब तू छ्वटो छौ त वीन सनी म जान्दो इ छौ "

मीन ब्वाल, " हाँ पण यि लोक परोठी-बोतल लेक कख जाणा छन ?"

 

कील न ब्वाल" वीं तै इ पूछी लेन ."

मी अपण सनी पैथरा  सनि क तरफ जाण लगी ग्यों

 

 

(गांका लोग कख अर किलै भागणा छया? वीं सनि ण क्या ब्वाल? क्या मै तै संस्कृति क दर्शन ह्व़ेन ? अर ह्वाई च त संस्कृति क्या ब्वाल ? यांक बान अगलो भाग..३  )

Read second part----

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Bansuli: Garhwali Story about Love for sister
 
(Review of Garhwali Story Collection ‘Bwari’ by Durga Prasad Ghildiyal)

                           Bhishma Kukreti
               You cannot write history of Garhwali Story without mentioning Durga Prasad Ghildiyal. Durga Prasad was a famous name in Garhwali fiction world before Ghildiyal published three story collection and a novel.
                        ‘Bansuli’ story is about love for sister. A boy runs away from his house due to bad behavior for him from Sauteli mother and father. The boy returned home after many years due to love for his sister. The story is having many dramatic instances.

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

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Mwari: A Story about observing Garhwali Women from various angles

(Review of Garhwali Story Collection ‘Mwari’ (1986) by Durga Prasad Ghildiyal)

                              Bhishma Kukreti
   The story of ‘Mwari’ from Garhwali Story collection ‘Mwari’ is narrated in telling events styles and there are a couple of stories or events in the story. The events talk about admiration, pride, affection, struggles, conduct of women, the content of women and the behavior of male especially negative behavior towards women.
 The story has many stories and the writer could not justify various events in the story. The story has various raptures in it. The stories observes Garhwali women from many angles

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

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*********फर्शी *********एक गढ़वाली कथा.



           कथाकार- डा. नरेंद्र गौनियाल


सफ़ेद धोती,सफ़ेद कुर्ता,कबरिणी-डबरिणी फतुगी अर कांधी मा लाल गमछा पंडजी पर खूब खिल्दु छौ.कपाल मा लगीं चन्दन की लाल-पीली पिठे त 'सून मा सुहागा'.खानदानी पंडित का साथ, इलाका का नामी-गिरामी मन्खी.कर्मकांडी होणा का कारण जात-पात को कुछ जादा ही ख्याल करदा छाया.उंकी अपणी एक अलग फर्शी छै.वै पर तम्बाकू कै हैंका तै नि खाणि दीन्दा छाया.मेहमानों का वास्त एक हैंकि फर्शी,अर एक चिलम-सजुडा  छौ.गस्त मा बि अपणि एक छवटि चिलमणि धरीं रैंदी छै.जजमान लोग,कामी-काजी सब्बि ऊंको भौत मान-सम्मान करदा छाया,पण जरा ऊंका च्व्ख्यापन से डरदा छाया.
           एकदा धन्नू लोहार कु नौनु घंतू छवटा नौन्यालोँ का दगड़ पिट्ठू खेलदा-खेलदा गिन्दू ल्य़ाणा का वास्त गलती से उंकी तिबारी मा चलि गे.वैका खुटन पंडजी  की फर्शी भुयां लट्गीगे.छवटा नौन्यालोंन हल्ला मचे दे अर य बात सरि गौंमा फैलिगे.पंडजी जब गश्त बिटि घार ऐनी  त य बात ऊंका कंदुणों मा चलिगे.ऊंतई भौत गुस्सा ऐ अर ऊंन धन्नू लोहार तै अपणा घार बुलाए.धन्नू बिचरु डरदु-डरदु ऐ अर वैन हाथ जोड़ी कै माफ़ी मांगी.वैन अपणु काल़ू टुपला पंडजी की खुट्यूं मा धरि कै बोलि,''ननु छवारा से गलती ह्वैगे.'' पण पंडजी नि माना अर बोले,''ईं फर्शी तै तू ही लीजा.अर एकी कीमत द्वी सौ तीस रुप्या दे दे.मि हैंकि ले औंलू.अब य फर्शी म्यार काम की नि रैगे.धन्नू बोले,''तुमारा ही लूण-गुड से पल्याँ   छौ.माफ़ करि द्या.'' पण पंडजी टस से मस नि ह्वाया अर ऊंन फर्शी धन्नू का तरफ चुटे दे..आंख्यूं मा डब्ब-डब्ब अयाँ आंसू फुंजदा-फुंजदा धन्नू फर्शी लेकि अपणा घौर चलिगे.द्वी सौ तीस रुप्या कख बिटि ल्यूं अचनचक... स्वच्दा-स्वच्दा वैकु ध्यान लुवनी कि हंसूळी पर चलि गे.घार ऐकि वैन हंसूळी सुनार मा बेचिकै पंडजी का रुप्या दे दीं.घंतू तै पकड़ी कै खूब चट्गे दे.अर बोले,''निकळ जा तू घार बिटि.तिन आज सरि गौंमा मेरी नाक कटै दे''. घंतू राति रूंदा-रूंदा बिन खाणु खयां ही सेगे.वैकि निंद बार-बार टुटी जाणी छै.ऊ यु ही स्वचणु रहे कि अब क्य करलू,कख जौंलू?
           रतबियन्य मा जनि धन्नू उठिकै दिसा-फरागत गै,घंतुन वैकी फतुगी का खीसा जपगे अर डेढ़ सौ रूप्या खसगे दीं..यु वैकी ब्वैकी हंसूळी बेची कै पंडजी का रूप्या देकी बच्यां छाया.जब तक धन्नू हाथ-मुख ध्वेकी कि ऐ तब तक घंतू चम्पत ह्वैगे.ऊ सुबेर जडाऊखांद बिटि छै बजी वळी बस से रामनगर चलिगे.पुछदा-पुछदा दिल्ली वळी बस मा बैठिकी ब्यखुन्या पांच बजी आनंदविहार बस अड्डा पहुँचीगे.वख जैकि वैकि आंखि रकरे गीं.वैकी समझ मा नि आई कि कै रास्ता भैर निकलूँ. आखिर कुछ मुसाफिरों का पिछ्नैं -पिछ्नैं ऊ भैर ऐगे.एक प्राईवेट बस वल़ो बुनू छौ,''सेवानगर,लोदी रोड,प्रेमनगर.'' वैन सूणि अर चट बस मा बैठिगे.कंडक्टरन पूछे,''कहाँ जाना है ?  घंतुन बोलि,''सेवानगर जाण,माधु भैजी का क्वाटर मा.'' कंडक्टर तै ख़ित्त हैंसी ऐगे. वैन घन्तु कु गिचु देखि अर वैन पांच रूप्या कु टिकट दे दे.
           सेवानगर मा उतरी कै ऊ फिर रिंगण बैठिगे इना-फुना,पण माधु दा कु क्वाटर नि मिलो.माधु वैकु ठुलू मामा कु नौनु छा जु एक सरकारी दफ्तर मा चपडसी लग्यूं.घर बिटि आन्द दा मारामारी मा ऊ माधु कु क्वाटर नंबर ल्य़ाणु बिसरिगे.रिंगदा-रिंगदा द्वी घंटा ह्वैगीं.हर्बी रुमुक पड़नि शुरू ह्वैगे.चरि तरफ चमाचम लाइट जळणी छै.वैन चलदा-फिरदा लोगोँ तै पूछी पण सब्युंन यी बोलि कि कै ब्लॉक मा,कतगा नंबर च ? आखिर घुमदा-घुमदा ऊ सेवानगर सब्जी मंडी मा पहुँचीगे.वख वैन देखि कि गढ़वळी भौत छन.वैते कुछ सहारो मिलगे.इना-फुना द्यखदा अचणचक वैते धनुली बौ टिमाटर बिरांद दिखेगे. ऊ चट वींका समणी ऐ अर बोलि,''सिमनी बौ.'' धनुली हकचक रैगे कि यु कु ऐगे.वींन वैतै नि पछ्याणि अर द्यखणि रै. वा स्वचणि रै कि कु होलू यु जलांगण.घंतुन बोले,''मि घंतराम छौं बौजी,गनधार  गौं कु.तुमरु द्यूरू'.'धनुली तै तब कुछ याद ऐ.वींन बोले,''हाँ रे तू तो तब भौत छोटा था,जब हम एकदा घार आये थे.अब तो तू जवान ह्वै गया है''.फिर वींन साग-पात ले अर घन्तु तै दगड़ मा लेकि क्वाटर मा ऐगे.भैजी तै सेवा लगौणा बाद वैन अपणि आप-बीती सुणाई अर बोले,''अब त मिन कतई घौर नि जाणु,मै तै अपणा दगड़ ही रखा अर कखि नौकरी पर लगाई द्या.माधुन बोले,'तू अबी छवतू छै.' पढ़ी-लिखी ले.घार चलि जा अर बाद मा ऐ जैलू''.घंतुन बोले,''भैजी अब त मि घौर कतई नि जण्या''. वैन ह्यळी लगाई दीं.धनुलिन वैते समझाईकि चुप कराइ दे.राति खाणु खैकी ऊ सेगे..आधा-राति मा स्वीणो मा ऊ बबणाणों छायो,''हमारू पिट्ठू बणिगे.मिन कुछ नि कारो,मै तै नि मारा.'' माधु अर धनुली कि निंद खुली त देखि कि घन्तु बबडान्दा हाथ-खुटा बि झट्गाणू छौ.माधुन वैतई हैंका हैड पडाळी दे.
           माधु की द्वी नौनि छै.दिन भर ऊ उंकी देखभा ळ करदू छौ.हर्बी ऊ धनुली का दगड़ काम-धंधा बि सीखी गे.धनुली चार-पांच महीना बाद फिरि हुण्या छै.कुछ दिन बाद त खाणु -पीणु,लत्ता-कपडा,झाड़ू-पोंछा सब कुछ घन्तु ही करदू छौ.पैली त वती गैस जा ल़ा नि बि नि आंदी छै,पा न अब ऊ एक्सपर्ट ह्वैगे.खुशकिस्मती से यींदा धनुली कु नौनु ह्वैगे.माधु अर धनुली कि ख़ुशी जनु कि घन्तु ही लेकि आई.घंतुन स्वीली कि सेवा-पाणि से लेकि पुरु घर समाळी दे.
             कुछ दिन बाद घंतुन बोलि कि भैजी मि तै कखि नौकरी मा लगाई द्या.माधुन बोले,''भुला घंतराम तू कुल आठ पास छै.जादा पध्यूं हूंदू,य फिर आई टि आई करीं हून्दी त नौकरी चट लगी जांदी,पण इनि हालत मा क्य होलू ?फिरबी तू फिकर नि कैर.मि कोशिश करदू.तीन साल तक घन्तु भाई-बौजी कि ही सेवा मा लग्युं रहे.तब माधुन घन्तु तै एक साब कि कोठी मा लगाई दे.यख वै तै खायी-पेकि पांच सौ रूप्या मिलणा शुरू ह्वैं.वै तै कोठी मा ही एक सर्वेंट क्वाटर मिलि गे.अब घन्तु का भला दिन शुरू ह्वैगीं.
              घन्तु अब अपणा ब्वे-बाब तै मन्योडर भ्यजण लगी गे.घन्तु का गौं का दगडया दस-बार मा फेल ह्वैकी सुद्दी लट्गीणा रैगीं अर ऊ गौं बिटि भज्युं छवारा मन्योडर भ्यजण लगी गे.जब-जब धन्नू लोहार मन्योडर फॉरम मा अंगुठो लगैकी रूप्या अपणि खीसी मा धर्दु छौ,तब-तब वैकि आंख्युं मा पाणि ऐ जांदू छौ.अपणा हाथों तै ऐथर कैरिकै ऊ द्यख्दु छौ कि यूंली ही मिन अपणो बाल़ो नौनु तै थींचु छौ.हस भरिकै वैकि आंख्युं मा पाणि ऐ जांदू छौ.वैन घन्तु का वास्त एक चिट्ठी भेजवाई,''तेरि ब्वे बुनी च कि मै तै अपणा घन्तु कि खुद लगीं.टक लगेकि  कुछ दिनौ वास्त घार ऐजा.''चिट्ठी पढ़ी कै घन्तु तै बि खुद लगी गे,पा ण गौं कु नौ सु णि कै जनि फर्शी कि याद ऐ , वैका बदन पर झर कांडा बबरी गीं.वैन जबाब भेजि कि मितै अबी छुट्टी नि मिलणी छन.
            कुछ दिनों का बाद घंत राम कि सेवा से खुश ह्वैकी साबन वै तै अपणी फैक्ट्री मा चौकीदार लगे दे.एक कमरा -कीचन वा ल़ो क्वाटर बि मिलि गे.अब त घन्तु  असली घंत राम बा णी गे.ऊ फैक्ट्री कि बर्दी मा भौत बढ़िया दिखेंदु छौ.हर्बी ऊ खूबसूरत जवान ह्वैगे.बैशाख का मैना वै तै इक्कीस साल पूरा ह्वैगे छाया.जात-बिरादरी का लोग अब वैका क्वाटर मा घुसी ण लगी गीं.ऊ स्ब्यों कि इज्जत-खातिर करदू छौ.जब भी माधु का क्वाटर मा जांदू छौ,वैका नौनूं का वास्त टॉफी,चौकलेट,सेब-संतरा जरूर लिजांदु छौ.माधु का पास अब घन्तु का बाना कतगे रिश्ता आणा शुरू ह्वैगीं.पण ऊ सब्यों तै टळणु रहे.दरअसल वैकि अपणी एक स्याळी छै,जेंका का  दगड़ ऊ घन्तु कु जंकजोड़ कन छंदु छौ.माधु कि ब्वारी धनुली कि जिद्द छै कि घन्तु कु ब्यो मेरी भुली चंपा का दगड़ ही कन..माधुन अपणी स्याळी सिलायी-बुनाई  सिखणा बहाना से दिल्ली अपणा पास बुलै दे.
           चंपा घार बिटि त सुद्दी आईं छै त्यूरण्या ह्वैकी,पण दिल्ली मा चार दिन मा ही वीं पर चल्क्वार ऐगे..गौंकि कळपट्ट छोरी का कुछ दिन मा ही गल्वडा लाल ह्वैगीं.वींतै ये साल सत्रह साल पूरा ह्वैगे छाया.ये बीच ऐतवार का दिन घंतु सेवानगर ऐगे.वैकि बौजिन बोलि कि मेरी ताब्यात कुछ ख़राब च.तू जरा सब्जी मंडी चलि जा ,साग-पात ले आ.मीत-माछी बि लेलु त ले ऐ.चंपा तै बि दगड़ लीजा.घूमी कि ऐ जाली वा बि.दीदी का बुन पर चंपा नयो सूत पैनी कि सेंत चिद्की कै दगड़ मा चलिगे.द्वी गप शाप लगन्दा चलि गीं.एक जगा मा घंतुन वींतै दूध-जलेबी खिलै.सब्जी लेकि आन्द दा चौकलेट बि खिलै. राति चंपा ही खाणु  बणाण लगी गे.बीच-बीच मा घंतु बि कीचन मा घुसेणु रहे.धनुली जाणि-बुझिकै बौगि ह्वैगे.खांद बगत माधुन मजाक करे कि आज त घंतु रे ! खाणु कुछ जादा ही स्वादिस्ट हुयूं.घंतु बात समझी गे अर चंपा बि शर्मैकी किचन मा चलिगे.खाणु खैकी कुछ देर बाद घंतु अपणा घौर चलि गे.राति बड़ी देर तक वैतै निंद नि आई. वैकि आंख्युं मा रात भर चंपा ही रिंगणी रहे.अर यख चंपा का हाल बि कुछ  इनि छाया.राति बड़ी देर तक वल्या-पल्य हैड पलटणी रहे.सुबेर बिन सियाँ वींकी आंखि कुछ लाल सि हुईं छै.
             अब त घंतराम हर इतवार चंपा तै मिलणा बाना माधु का घौर चलि जांदू छौ.कब्बि त बीच मा बि ऐ जांदू छौ.चंपा तै बि हर इतवार कि इंतजारी रैंदी छै.माधु अर धनुली ईं बात से खुश ह्वैगीं कि घंतु अर चंपा एक दूसरा तै पसंद करदीं.कुछ दिन बाद माधुन घंतु का बूबाजी तै बुलैकी द्वीयोंकु रिश्ता पक्कू करि दे अर दशहरा का दिन दिल्ली मा ही ब्यो बि ह्वैगे.घंतु घर-गृहस्थी मा रमी गे.चंपा वै तै मनपसंद ब्वारी मिलिगे.द्वी साल बाद वैकु नौनु ह्वैगे.हर्बी तनखा बि भलि ह्वैगे.अब ऊ एक इज्जतदार आदिम बणीगे.
           दिल्ली मा गौं का प्रवासी बंधुओं कि संस्था''विकास समिति लमधार''को वै तै उपमंत्री बणये गे.महीना कि हर मीटिंग मा ऊ जांदू छौ.एक दिन जब ऊ मीटिंग मा गए,तब वै पता चलि कि गौं बिटि पंडितजी एक जजमान का घौर अयाँ छाया.दूसरा जजमान का क्वाटर मा जांद बगत बस से उतरंद दा भुयां पडिगीं अर कपाळ मा भौत चोट लगीगे.ल्वे-खाळ हालत मा अस्पताळ भर्ती कर्यूं.अब्बी ऊ सफदरजंग मा इमरजेंसी मा छन.ल्वे भौत गिरण से हालत खराब च.डाक्टर खून कि व्यवस्था का बान बुना छन.मीटिंग बंद करि कै सब लोग ऊंतई द्यखणो चलि गीं.पंडत जी अबी बेहोश पड्यां छाया.खून दीणकि बात सूणी कि कुछ लोग खिसगी गीं. अपणो बौंल़ू उब कैरि घंतुन डाक्टर से बोलि,''मेरी खून निकाल़ा,जतगा चएणी''.देखा -देखि कुछ हौरि बि तैयार ह्वैगीं,पण बाकी लोगोँ कु खून मेल नि कारो,सिर्फ घंतु कु खून मैच करि.घंतु कि एक यूनिट खून पन्डतजी तै चढ़ीगे.वैका बाद घंतु अपणा क्वाटर मा चलिगे.
           कुछ दिन बाद पंडितजी ठीक ह्वैकी अपणा एक जजमान का घर आर के पुरम ऐगीं.जब ऊं तै पता चलि कि घंतु  का खून से उंकी जान बचि त ऊंका आंख्युं मा डब्ब-डब्ब पाणि ऐगे.भौत साल पैली करीं अपणि गलती पर ऊंतई खुद से नफरत सि ह्वैगे.ऊ तुरंत शाम दा घंतु का क्वाटर मा एक डब्बा मिठाई लेकि पहुँची गीं.क्वाटर मा पहुँची कि घंतू तै भट्ट अंग्वाळ डाळी दे.घंतू अर पंडितजी द्वीयों कि आन्ख्यों मा पाणिकि धार ऐगे.पंडित    जिन बोलि,''बेटा मि तै माफ़ करि दे.' तेरो यु एहसान मि....'' घंतुन बोलि,''इन ना बोला.आप हमारा पूज्य छन.मिन क्वी एहसान नि करि.यु त मेरो फर्ज छा.मि आज जु कुछ बि छौं सिर्फ आप कि कृपा से छौं.'' पंडितजिन बोलि,'' ना ना ब्यटा मि तै अब जादा शर्मिंदा नि कैर..तेरो यु एहसान मि कबी पुरु नि करि सकदु.'' घंतुन बोलि,''एहसान त आपन करि मी पर.तुम फर्शी का बाना बबंडर नि करदा त मेरो बुबन मीतै नि मरणू छौ, तब मिन भाजि कै दिल्ली नि औणु छौ.अपण बुबा का दगड़ अनस्यळ मा ही घैण लगाणु छौ.भाजि कै ऐग्युं त एक गफ्फा ठीक से खाणू छौं.
            कुछ दिन बाद पंडित जि गौंमा वापस ऐगीं.ऊ एक डब्बा मिठाई कु धन्नू लोहार का घर बि लेकि गैनी अर बोलि कि, ''धन्नू मेरि फर्शी मी तै दे दे.मेरी आंखि खुलि गैनी..मी अपणि गलती पर भौत शर्मिंदा छौं''.ऊंन एक हजार रूप्या धन्नू का खीसा मा धरीं अर खटुली मूड़ धरीं फर्शी तै लेकि अपणा घौर चलिगीं.अब पंडितजि रोज तिबारी मा बैठि कै खुटी मा खुटी धरि गुड़-गुड़-गुड़ लग्यां रंदीन.
             डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित...     

Bhishma Kukreti

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Marjad:  A Garhwali Story about Protecting Village Pride 

(Review of Garhwali story collection ‘Mwari (1986) by Durga Prasad Ghildiyal)

                                    Bhishma Kukreti

[Notes on Story about protecting village Pride; Garhwali Story about protecting village Pride; Uttarakhandi Story about protecting village Pride; Mid Himalayan Story about protecting village Pride; Himalayan Story about protecting village Pride; North Indian Story about protecting village Pride; Indian Story about protecting village Pride; Indian subcontinent Story about protecting village Pride; South Asian Story about protecting village Pride; Asian Story about protecting village Pride]
[लाज रखने सम्बन्धी कहानियां; लाज रखने सम्बन्धी गढ़वाली की कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी उत्तराखंड की कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी मध्य हिमालय की कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी हिमालय की कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी उत्तर भारतीय कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी भारतीय कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी दक्षिण एशियाई कहानियां;लाज रखने सम्बन्धी एशियाई कहानियां लेखमाला ]


      ‘Marjad’ has three aspects. First the folk games being played by teen aged girls as putting plant ornaments Nath and Bulak. There is very effective search by fiction writer about the worries of a father for his daughter’s marriage. Third aspect of story is protection of village pride by a girl. These three aspects or events are part of story and compel the readers to finish the story at one sitting. The story writer pays attention of character building and portraying the emotion that language style takes back seat.

Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan

Copyright@ Bhishma Kukreti, 6/7/2012
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