Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 514996 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उठा उठा हे गढवीर भायूं
दयाशंकर भट्ट 'बंदी ' (टिहरी गढ़वाल , 1905 -1982 )

इंटरनेट प्रस्तुति --भीष्म कुकरेती

उठा उठा हे गढ़वीर भायूं
कब तैं चुप बणिक रयेला
' बंदी ' समौ कम इन भि दिखेली
जय बीरता का डंका बजौंला
क्वी नी च भाई ! संगी हमारो
खुटौन अपणा खडु होणु होलो
'बंदी ' बणी गे हे वीर बैखो
संसार मा नाम कमौण होलो
ऐ जा पलेता पक्का कसीक
गढ़वाळ को लाज बचौं ल
'बंदी 'भलो प्राण बलि चढ़ौन्ला
संसार मा राड तुर्री बजौंला

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ऐंसू कि रूड़
रचना -- रत्नाम्बर दत्त चंदोला (थापली , कफोळ स्यूं १९०१-१९७५)
-----------१-------------
ऐंसू कि रूडी मा छन घाम खूब चमक्याँ I
बरखा जरा नि होई , छन इंद्र देवता रूठ्यां I I
पाणी बिना तिसाला , छन गोरु भैंसा भटक्यां I
होवन जाणो कि यूँका, ताळू म प्राण अटक्याँ ई
--------२---------------------
ह्वेगे बरीक देखा, सूखिक पाणी धारा I
गदना गाड नाळा , सुखी गैन सारा II
काफळ कि डाळयूँ मा , बैठिक पंछी प्यारा I
गीतू न अब कंदूड़ s , भरदा नि छन हमारा II
--------------३-------------
डाळो का फौंगा पाता , सुखी गैन डांडियों मा I
लमडी गेन भुइयां , लगुला का सगोड़ीयों मा II
भौंरा निरस 'र' सुख्या , फूलूं कि डाळियूँ मा I
रोना सि चहन विचारा, बैठिक फौंकियों माँ II
-------४------------------
रिक, बाग़, पंछी, बांदर, गाड, गधेरा, जंगळ I
हिसरा खुमानी आरू ; किनगोड़ा बेडु काफळ II
अच्काल ये सबी ही जड़-जीव फूल अर फल I
छन दांत भैर गादी पाणी बगैर केवल II
-----------------५----------

ह्वेगे फसल इबारे की दां उजाड़ सारी I
सुप्पी गणेलि वख तs जख हून्दी कत्ति खारी II
रोगू न साँस लेणो मुस्किल हुयुं छ भारी I
नाना दुखू न ह्वेगे हां दुरदशा हमारि II
------------६----------
केकु अकाळ रुपी विष, दैव घोलणा छन I
ईं देही मां किलै जी हां प्राण रोपणा छन II
देखा जथै उथै इनु लोग बाग बोलणा छन II
निज पापी प्राण सणि हां ! सब जीव कोषणा छन II
( गढ़वाली कवितावली, १९३२ से साभार )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पाठकों मा पाठक ध्रुब तारा ,
दान्यूं मा का दानी , धनियों मा का धनवान
पंछी का पिंयान समुद्र नि घटदो
शेयर करिक मान नि घटदो
प्रतिक्रिया देकि नाम नि घटदो
जै जै पाठक सरकार बड़दो रै कारोबार
साहित्यकारों पर पर कृपा बणी रै
तुमारी प्रजा छंवां सदनी दया बणी रये

----------------हम तो शेयर भूका छंवां जी----------------

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14 mins ·

उत्‍तराखण्‍डी....

नौट कमैक नौट्याल बणिक,
कूड़ी पुंगड़ि छोड़ीं बांजा,
मौज मनौणा सैर बजार मा,
साधन संपन्‍न राजा.....

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 6.8.2015

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
 

उत्‍तराखण्‍डी....

नौट कमैक नौट्याल बणिक,
कूड़ी पुंगड़ि छोड़ीं बांजा,
मौज मनौणा सैर बजार मा,
साधन संपन्‍न राजा.....

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
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Sudesh Bhatt
August 3 at 7:17pm ·

द्वार म्वार हपार
बंद पडयां छन
यी कुडी क मौ दीदों
दिल्ली बंबई बस्यां छन
द्वार म्वार हपार
बंद पडयां छन
कुडी पर तालु लगे
खुश हुयां छन
दयवतों तै भीतर ग्वाडी क
बेफिकर हुयां छन
ईष्ट देव क आलु पर
मकडजल लग्यां छन
देबी दयवता भीतरी भीतर
खुब खुदयाणा छन
बुबा ददों की बिरासत
खंदवार हुणी च
बचपन याद कैरीक मेरी
जिकुडी रमस्याणी च
मेरी पाटी बुलख्या दीदों
युं उबरीयूं मा बंद ह्वाल
चुलख्यंदो मा पैली नीथर
पस्युंण मा धर्यां ह्वाल
द्वार म्वार हपार
बंद पड्यां ...
मेरी बुये क जंदरी दीदों
ईक तरफां पडीं च
छंचल्या अर पर्या मेरी
बुये त खुजणी च
पाणी क बंठों पर
जंक लग्युं च
उरख्यली गंज्यली मेरी
बैण्यूं तै खुजणी च
द्वार म्वार हपार
बंद पड्यां.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

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उठा उठा हे गढवीर भायूं
दयाशंकर भट्ट 'बंदी ' (टिहरी गढ़वाल , 1905 -1982 )

इंटरनेट प्रस्तुति --भीष्म कुकरेती

उठा उठा हे गढ़वीर भायूं
कब तैं चुप बणिक रयेला
' बंदी ' समौ कम इन भि दिखेली
जय बीरता का डंका बजौंला
क्वी नी च भाई ! संगी हमारो
खुटौन अपणा खडु होणु होलो
'बंदी ' बणी गे हे वीर बैखो
संसार मा नाम कमौण होलो
ऐ जा पलेता पक्का कसीक
गढ़वाळ को लाज बचौं ल
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संसार मा राड तुर्री बजौंला

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हैरी हैरी ककडी देखी
गौं की याद यैगे
दुर छौं परदेश
खुद बौडी बौडी यैगे
खुब लगीं होली
झींकडी झालुंद ककडी
जब बिटी ओं परदेश
चाखी नी घर्या ककडी
हैरी हैरी ककडी देखी
गौं की याद....
याद आणा छन दीदों
हैरी हैरी चिरकी
खांद खांद जाण स्कूल
बाकि बस्ता मा धरीकी
गैल्या गैल्याणु गैल
खुब ककडी चुरेन
जब म्वाल पनन लोगु क
ककडी हमन फुचेन
रोज गोरुम जांदी बगत
पलान बणाण
आज मी लों ककडी
भ्वाल तीन लांण
ऊं दीनु की याद यीं
ककडी तै देखी यैगे
दुर छौं परदेश
खुद बौडी बौडी....
सर्वाधिकार सुरक्षित@ लेखक सुदेश भटट(दगडया)की खुदेड कलम से

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Sudesh Bhatt
16 hrs ·

सुरम्य सुंदर गंगा तट पर
देवों ने लिया जहां
मुनियों का भेष
रीषी मूनी जहां
मिलकर हैं धोते
गंगा तट पर अपना केश
वो है मेरा रीषीकेश
वो है मेरा......
सुंदर सुशील नारी यहां की
संवारती गंगा जल से केश
गंगा तट से खत हैं लिखती
पति गये जिनके परदेश
वो है मेरा रीसीकेष
जहां बम बम करते
शिवभक्त आते
कांवडियों का लेकर भेष
प्रभु द्वार से कोई खाली नही जाता
पाता मनईच्छा फल वो बिशेष
वो है मेरा रीसीकेष
वो है मेरा रीसी....
सुबह शाम जहां होती तट पर
मां गंगा की आरती बिशेष
सैलानी भी झूमते भक्ति में
वो है मेरा रीसीकेष
शांत स्वभाव के लोग यहां के
राग नही है कोई द्वैश
सब आपस में मिलकर रहते
नही किसी पर कोई केस
वो है मेरा रीसीकेष
दो पहाडियों के बीच बसा है
रीसी मुनियों का स्थान ये बिशेष
जहां प्रभु रहते है गली गली मे
जोगीयों का लेकर के भेष
वो है मेरा रीसीकेष
खुशहाली हर जगा जहां पर
सबके अपने ठाट बाट
रमणीक त्रिवेणी घाट जहां पर
रौनक आई.डी.पी.एल का हाट
सुरम्य सुंदर गंगा तट पर
देवों ने लिया जहां......
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)
(फोटो उपलब्ध करवाने के लिये प्रदीप बिष्ट जी का आभार)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भग्यान त वा नथुली छ

By -- नवीन डबराल
खितखितैकी
वा हँसदी इनि
दूध माँ उमाळ जनि
भग्यान त वा नथुली छ
पैली वा चखदि छ
बिंडी मी बौग नि सारि सकदु
पिंदारो मी कम नि छौं
कबि मुळ मुळ कैकि
मुस्कान्दी छ वा
मेरी ज्युकड़ी हरिलेंदी
आँखों बिटेन पिलन्दी
मेरा गिच्चा पुटिग
अपणी मिठ्ठी छुयों को
गिंदौड़ा खोशदि छ
दगड़ै हमन बौण जौंण
बन्नी बन्नीक गीत लगोंण
भूली कै बी णी रिसौण
हंसी ख़ुशी माँ दिन बितौण
शायद पिछला जनम का
अच्छा कर्मों का फल छन
ज्यु म्यiरा दगड्या छन
ऊ मेरा सर्वस्व भी छन
( नवीन डबराल ),
12 Aug.2015, Mumbai

 

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