Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515257 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रखडी (राखी) कु त्योहार नजदीक च। जौं कि भैणि या भाई नि ह्वाला, वूं थैं कनु लगदु होलु। --------------------------------------------------

कनू छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भैणी नि देई।।
कनु छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भाई नि द्याई।।

एक भैणी मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
एक भाई मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।

जौं भयों कि भैणि ह्वैलि रखडी पैराला।
बिना भैणि वळा छ्वारा प्यटा प्यटि र्वाला।।
जौं भैण्यू का भाई ह्वाला रखडी पैराली।
बिना भायों वळी छे्वरी प्यटा प्यटी र्वेली।।

त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाला।
आंख्यू का कूणू मा छ्वारा आंसू लुकाला।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाली।
आंख्यू का कूणू मा छ्वेरी आंसू लुकाली।।

दगड्या भग्यान म्यारा रखडी पैराला।
अपणी भैण्यू का हथौं खटी मीठि खाला।।
दगड्या भग्यान मेरी रखडी पैराली।
अपणा भयों थै टीका पिठैई लगाली।।

त्योहार कू भैणी नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
त्योहार कू भाई नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।

निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालि भैणि, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालु भाई, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।

ऐंसु की रखडी,देवी तु ह्वै जैई दैणी।
भैण्यू थै तु भाई देई,भायों थैई भैणी।।
ऐंसु की रखडी, देवी................

सर्वाधिकार
सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई
दिनांक 25/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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~कसूर~

यूं डांडी कान्ठियू क, ब्वाला क्या च कसूर
यूं रीता कूड़ी बाड़ीयू क, ब्वाला क्या च कसूर
किले हुयां छन मनखी, अपरी जलमभूमि से दूर
कूड़ी पुन्गडी अपणा बांजा करीक, बसी गीन दूर

उन्द जेकन उबक बाटू अब क्वी नी दिखदू
कथका धे लगाणू छौं, पर अब क्वी नी सुणदू
भासा ज़रा ज़रा क्वी बचांद, बाकी क्वी नी बिंग्दू
सबी कुमौनी गढ़वली, क्वी उत्तराखंडी नी दिखेंदू

दसा पर मेरी, तुमन कलम अपरी खूब तुडीन
गीत तुमन भी म्यार इने विने भी खूब लगेन
देस विदेस मा मेला खेला तुमन खूब करीन
म्यार नाम पर जगह जगह नोट खूब लुटीन

दीणा कू क्या जी नी दे, ये पहाड़ा न तुमते
बचपन बटी जवनी तक सैंती पाली अर पोसी
कुछ करण कू बगत आई, तुमन बस बोग मारी
मीते यखुली छोडी, परदेस मा करी जमे सारी

अबी कुछ नी बिगड़ी, सोची समझी बौडी आवा
अपरी जन्मभूमि ते देर सुबेर ज़रा देखी जावा
बाळ बच्चो ते लावा, वूं ते मेरी पछाण बतावा
जलमभूमि ब्वै समान हूंद, यू तुम जाणी ल्यावा

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल (१३ दिसंबर,१९०१ - २४ जुलाई,१९४४)

पाली गौ, पौड़ी मा जन्मयू यू हिन्दी कू लाल
केरिक शोध पेली बार हिन्दी मा, दिखये सब्यू ते बाटू
बणी पेळ भारतीय, जौन हिन्दी मा डी लिट् पाई
नाम छयाई ये साहित्यकार कू पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल

हिन्दी काव्य मा निर्गुन्वाद पर केर गीन शोध
संस्कृत, अवधी, बज्रभासा,अरबी फ़ारसी क छयाई वू ते बोध
संत, सिद्ध,नाथ अर भक्ति कू केर वून गूढ़ विश्लेषण
दूर दृष्टी कू परिचायक, निबंधाकर, अर छयाई वू समीक्षक

हिन्दी ते ने आयाम दे ग्याई यू हिन्दी कू सेवक
केर ग्याई दुनिया मा नाम हिन्दी कू यू लेखक
बिद्यार्थी आज भी वूका रचनाओ ते पढिक शोध करदीना
जू बोलिकन गीन वे ते ही छन सबी लोग अपणाना

छ्वाटी उमर मा ही अलविदा बोली ग्याई यू हिन्दी कू नायक
गोरखबाणी अर नाथ सिद्ध रचनाओ की दे ग्याई हमते धरोहर
आज भली ही बिसिर ग्याई वू ते हिन्दी साहित्य कू समाज
आवा हिन्दी क सम्मान करला, कर्रिक याद ये लेखक ते आज

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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~अतुल्य उत्तराखंड~
देवभूमि च जे कू नाम, इन च हमर अपणु अतुल्य उत्तराखंड
संस्कृति अर संस्कार छन विरासत, इन पछाण च उत्तराखंड
गढ़वली, कुमौनी, जौनसारी जन भासा बढेदीन हमरी सान
डांडी - कांठी कू मुल्क, इख क धरती च हमर मान सम्मान

स्कन्द पुराणों मा उदृत च नौ कुर्माचल अर केदारखंड जे क
ऋषि अर मुनियों क च जख धाम, तपोभूमि बुल्दीन नाम वे क
बावन गढ़, चार धाम, पंच प्रयाग यी भूमि ते पावन छन बणाणा
गंगोत्री - जमनोत्री अजी भी छन जनमानस की तीस बुझाणा

कुमाॐ मंडल मा अन्दिन जिला अल्मोड़ा, चम्पावत, बागेश्वर
नैनीताल, पिथोरागढ़ अर दगड मा आंद वेक उधम सिंह नगर
गडवाल मंडल म अन्दिन जख पौड़ी, टिहरी, चमोली, हरिद्वार
रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी अर देहरादून, जख बटी चलदी सरकार

धौली, विष्णु गंगा अर मंदाकिनी छन अलकनंदा ते सजाणा
होंस, गिरी अर आसन नदी छन यमनोत्री की सान बढ़ाणा
राम गंगा, सोंग नदी, कोसी, गोमती गौरी अर पिंडर नयार
बगणा छन बिना रुक्याँ थक्याँ अर छन उत्तराखंड कू शृगार

म्याला थोलो की च या धरती, बारा बरसू मा आँद जख कुम्भ म्याला
दिबता बुलान्दीन जख जागर, डौंर थाली ढोल दमो छन वूका खेला
फूलो क घाटी, औली, चकराता, कोसानी, अर लैंसडौन ते नी भूल्या
ऋषिकेश, मसूरी, भीमताल अर हेमकुंड साहिब कू बाटू छन खुल्या

संस्कृति अर प्रकृति जख हंसदी खिल्दीन, घुघती जख रैबार पहुंचेदीन
कुयेड़ी जख खैरी सुणान्द, बुरांश अर फ्योली हमर पहाड़ ते सजादीन
बेडू, तिम्ला, हिसरा, काफल, झुंगर,बाड़ी कफली गीच मा पाणी लियांदीन
झोडा, छपेली, न्योली त रणसिंग, भेरी, मशुकबाज दगड रंगत मचेदीन

गीत संगीत पहाडा कू, खान्णी पीणी पहाड़ा की, घूमण घुमाण पहाड़ मा
अफ़ी आवा, दगडयो ते लावा, उत्तराखंडे की रौंतेली सान देखि कं जावा
छ पूरो बिस्वास मीते ‘प्रतिबिम्ब’, उत्तराखंड क अच्छू दिन बौडी क आला
भासा साहित्य भी खूब छ्वीं लगाला, खैरी न खुसी क दिन वापस आला
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ठेठ पहाडी

सुबेर साम अद्धी कच्ची पीणू रेंद
बौन्ला बिटे की मी गुराण्नू रेंद
जू नी बोल साक कबी
झांझी बणिक मी बरराणू रेंद

द्वी घूट भीतर जन्दीन त
असली मनखी फिर भेर आन्दू
क्जायान्णी ते कच्याणू रेंद
नौनियालो ते धम्काणो रेंद

गों का मनखी तब बौग मारी लिंदीन
अर मी दिन मा भी तारा गिणनू रेंद
छौं मी ठेठ पहाड़ी, पछाण ल्यावा
बिना खयां [ सिकार] पियाँ [ दारु] रौंस नी आंदी

के बिगरेल मनखी न ब्वालि हवालो कि
सूर्या अस्त त पहाड़ हवे जान्द मस्त
मी त दिन रात करदू खान्णी पीन्णी,
पेली मस्त फिर से जान्दू मी ह्वेकन पस्त

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

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इलमतु दादा

कवि -जया नंद खुकसाल 'बौऴया'(1925 -स्वर्गीय , ऊण्यूँ असवाल स्यूं , पौ .ग. )

इंटरनेट प्रस्तुति -भीष्म कुकरेती

हैळ लगांदा बुखणा बुखांदा,
इलमतु दादा भदोड़ा बांदा।
कुरता चिरीऊँ ट्वप फट्यूं च ,
क्वाटा बौंळो सफाचट नी चा।
घुंड मा सुलार तैको फट्यूं चा;
झपड़म झपड़म हिटणा लग्युं चा।
रकर्याट कैकि पुंगडौ म आंदा , इलमतु दादा भदोड़ा बांदा।
बळद भि वैका ठडगैळ छीना ,
ढमणा दुयुं बैठयांऊ छिना।
रंगू काळा कबरीणा छिना ,
दांत भि ऊंका निखुऴयाउ छिना।
ठेलि ठेलि बि अगनै नि जाँदा , इलमतु दादा भदोड़ा बांदा।
हौळो कु वैकु हथनड़ु ,नी चा ,
निसुड़ा का मुख ऊनि ख्वंड्यू च।
यक सिंग्या ढांगो झिल्लो जुत्युं चा
जिमदार कना को क्वी ढंग नी चा
xx xxx
को छौ घसेर्यो सूणि लियां
घुतडु ब्वे मा इन बोलि दियां।
पल्य ख्वाळ जैकि छांच मांगी लयां ,
मी खुणि जरा सि छंच्या पकैयां।
ढया मा खड़ु ह्वै धाद लागांदा इलमतु दादा भदोड़ा बांदा।

From Ilmatu Dada (Poetry Collection)
Notes on The Poems Brought Realism in Garhwali Poetry

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परतंत्र नौकरी

रचना -जीवानंद श्रीयाल (जखन्याळी , नैलचामी , टि ग )
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

करीक सत्कर्म अनेक जन्मुं मा
तबैत मिल्दी छ मनुष्य जोनि या
सु सच्चिदानंद स्वतंत्र ह्वेक
सदा खुज्यान्दु परतंत्र नौकरी
कि देवता भी जख स्वर्ग रैक तैं
सदा मनौन्दा जग मा मनुष्य ह्वा
मनुष्य देख जगदीश छोड़ि कै
सदानि जपदु कन पौलु नौकरी !
छुट्या दया , दान ज्ञान गान भी
व पूर्वजों को अनुकर्म सभी
किसाण भूमि पर जन्म ल्हीक भी
भरेन्दु नी पेट बगैर नौकरी।
पढौंद ब्वे बाप भि नौनि नौनु तैं
कि देण यौंनै छ हमू कमै तैं
अनेक डिग्री झट पास कैक तैं
अगाड़ि यौंने भली पौण नौकरी।
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

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नि छौ खयाल कि तू परदेशो ह्वेली

रचना -- दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल (1923 -स्वर्गीय , पंदाऴयू , पौड़ी गढ़वाल ) इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

जु मैं मु धर्युं छौ , त्वे देइ याले
अपणा हड्गौ रस , जु मैं मु बच्युं छौ
खलैकि यख की , बारा रस्याळी
विदेशु रण मा त्वे तैं पठै छौ।
निभैने तिन बल , भला ही काज
रखे तिन म्यरा , दूध कि लाज
नि छौ खयाल कि तू परदेशो ह्वेली
भरोसो छयो कि तु मैं मु ऐली।
छोड़ी पुराणी नई थैं अंग्यौणो
या प्रथा च भौत पुराणी
पर माँ त माँ च , इनो किलै नि सोची
बर्षु बटि च ज्वा त्वे तैं भट्यौणी।
तख रच्येंदी कविता गयेंदा गीत
पर याँन नि ढकेंदी म्यरि नाँग काँग
नि पौंछदि यख त्यरा गित्तु की भौण
सुद्दी -मुद्दी नि लगौणी लांग फांग।
भैरा का औंदन , मि तैं भ्यंटेणू
भितर जाणा छन भैर ढुंढणू
जु होन्दा सुमन सरीखा लाल मैं मू
मिन नि फैलौणा छा हाथ हाथ त्वेमू।
यख आग भभरौंद , लगदन बडूळी
मी दिन भूक नी रात सेणी
त्यरो याद कन्नो , उन्नि सि दिखेंद
सियां भुला की जसि भुक्की पेणी।
सर्वाधिकार @ दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल परिवार

( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

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Shailendra Joshi
August 23 at 3:07am · Edited ·

आबरू लुटे न अब
किसी बहिन की
अब गली बाजार मे
तभी मतलब है राखी
पहनने का भाईयों
नहीं तो राखी शर्मशार है.......................शैलेन्द्र जोशी

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Shailendra Joshi
 
नदियों कु अपणु एक संगीत च
सर सर सुर सुर स्वीस्याट कु
कखी गंग्लोड़ो टकरी बणदू क्वी गीत
पाणी मा कखी मांछा तैरी लगाणा गीत
कखी चखुली उड़ी फिर आणि पाणी मा
लगाणी नदी धुन मा मीठा गीत
कखी लहर च कखी भंवर
नदी पाणी मा लुक्यु च
कत्गा किस्मो गीत संगीत
हर पहर मा हर किस्मो संगीत
सुणादी नदी अपणा स्वीस्याट कु
चल छोरी देख नदी पवन कत्गा भलु
गीत गाणा चखुला भि इन्नु हाल मा
ढौल पुरौणा मिस्से मिस्सेकी
तू भी ऐजा फिर किश्ती मा बैठीकी
नदी सुर मा तू भी गीत लगैजा
मी सुणलू नदी का संगीत मा तेरु गीत....................शैलेन्द्र जोशी

 

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