Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515311 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Shailendra Joshi
August 31 at 8:58pm ·

लाटी काली माया मेरी नत बिंगी कैन
बिंगै बि नि जानि उमर काट्याली फंडफ़ूका
खिली फूल माया कु जिकुड़ी मेरा बि
न क्वी मांगी न क्वी दे जानी
सुक्खागे झाड़याली फंडफ़ूका
रगरैनी मेरी आँखि बांधू देखी
हैसि कैर कैरी नौ धैर धैरी
बोल्या करियलि फुंड़फूका ......नरेंद्र सिंह नेगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जोड़ – आम-बुबु सुणूँ छी
गदगदानी ऊँ छी
रामनङर पुजूँ छी
कौशिकै की कूँ छी
पिनाथ बै ऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कौशिकै की कूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

क्या रोपै लगूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
क्या स्यारा छजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

घट-कुला रिङू छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कास माछा खऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जतकाला नऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
पितर तरूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

पिनाथ बै ऊँछी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
रामनङर पुजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जोड़ – रामनङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी, – (ऐ छू बात समझ में ? जो चेली पहाड़ बै रामनगर बेवई भै, उ कूँणै यो बात) -
पिनाथ बै ऊँ छी,
रामनगङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी,
मैं मुखड़ि देखूँ छी,
छैल छुटी ऊँ छी,
भै मुखड़ि देखूँ छी,
अब कुचैलि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
तिरङुली जै रै गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
हाई पाँणी-पाणि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

~~~~साभार-- गिरीश चन्द्र तिवारी,"गिर्दा"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mahendra Thakurathi

September 4 at 5:50pm

जब यो मतलबी मनखी.....
धर्तिकि छाति फाड़ि खानौ,
त कैकै दिल नै पसिजनय...!
जब प्रकृति बरपूनी कहर,
त सारि दुनींक दिलम,
पीड़ै पीड़ देखीण फैजाँ...!
एक न एक दिन त आलै,
जब हमूकें.......
आपणि करतूतनक हिसाब,
योई धर्तिक काखिम भैटिबेर,
जरूर चुकूण पड़ल.....!!! frown emoticon
Mahendra Thakurathi's photo.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नरेंद्र सिंह नेगी

परबतु की सांन छै मान अभिमान छै
सैरा मुल्को ताज छै तू
हिमालय जुगराज रै तू
नयु पुराणु समाज देखि बदलता रिवाज देखि
जुगुबटी देखणी छै तू हमुन त्वे आज देखि
थोक्दारु मिजाज देखि जिमदारु को नाज देखि
तिन त बणदा मिटदा कई राजोंको राज देखि
ज्यूँदो इतिहास छै तू
हिमालय जुगराज रै तू ।
(हिमालय दिवस पर)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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DrPritam Apachhyan

उत्तराखंड राज मा

देस बै बौडी आण त छूटी
घरबण छोडी जाण नि छूटी.
अलग राज को मतबल क्या च
खुटि खैंचणा की बाण नि छूटी.
जनु लखनौ तनु देरादूण बी
हमरो मुंडलि कन्याण नि छूटी.
परबत परवश पितम्वोर्यां सी
टक्क अगास उब चाण नि छूटी.
मैदानौं का पेट भ्वगाणा
पाडु का गिचा तिराण नि छूटी.
घूस देणा कू घूस चयेणी
जात थात की ताण नि छूटी.
गिचा म्वलैम अर मन पथराडा
झूठा सुपिन्या दिखाण नि छूटी.
राज कि मन्शा घूल गयां 'यी'
उत्तराखंड कु मसाण नि छूटी

(c) डाॅ. प्रीतम अपछ्यांण

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti
15 hrs

मैं हिमालय बोलणु छऊँ (लम्बी कवितांश )
-
रचना -- भगवती प्रसाद नौटियाल ( जन्म - 1931, गौरी कोट , इडवाल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती

-

मैं हिमालय बोलणु छऊँ
क्य तुम तक म्यरि आवाज
पौंछणी च ?
क्य बोले - बिंगेणू नी च ?
चुचों क्य ह्वे , तुमारि कन्दूड्यों तैं
म्यरि तरौं तुम अज्युं बुड्या नि होयें …
ल्या त हौर जोर करी बोल्दौं (लरै -लरै कि बोल्द )
अरे भै ! मैं हिमालय, हिमालय बोलणु छऊँ
नि बींगि अज्युं बि , तब त
तुम न त उच -कंदुड्या छ्यें न बैरा
औड़ी कीटी तैं बण्या छैं -बैरा
अर वांको कारण ?
कारण मैं बतांदु /गुस्सा नि ह्वेन
म्यरा भूलों , म्यरि भूल्यों /यु कसूर तुम्हारो नी च
कसूर च वीं रीत भौंणो /ज्व तुमन अपणै याले
मि तैं -तुमन भुलै याले
'चल खुट्टि कौथिगै '/तुमतैं आदत पड़गि
मंडा , झंगोरो बाड़ी /अब क्यापि ह्वेगि
म्यरा छा जु /वूं मन्ख्योंन , ऋषि - मुन्योन
म्यरु मान करे , सम्मान करे
वेद अर पुराणों मा /म्यरि स्तुति करे
देव द्यब्तौं न /म्यरि खुगलि खुजाये
शूरबीर , धीर अर पराक्रमी नर नार्यों न
म्यारा अज्वल भाल पर /तिलक लगाये

..........
……

पर ह्वेकि एक रा
अपणि भाषा अर संस्कृति को
मान करा , सम्मान करा
यीं धर्ती को
जैंका माटन
तुम तैं
अ , आ सिखाये
मनिखि बणाये
वीं तैं नमन करा
-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

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Shailendra Joshi
September 4 at 8:48am · Edited ·

मेरी औठंडियो न्युतायलि त्वैकु
बँसुली बणि ऐजा छोरी धोरा
मेरा जिकुडा लुकी माया की धुन
बनबनी अनेक तू ऐजा बस छोरी
गुंजलि बंसुली माया की फिर
चौ दिसू डांडी कांठी तू ऐजा बस छोरी
बँसुली बणि मेरी औठंडियो धोरा
पिरेम भौ बन्यु रौ सदा इन्न
मेरु तेरा परति
समझ कतामती
मी लोला मायादार की तू ऐजा बस .................शैलेन्द्र जोशी

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Shailendra Joshi
August 31 at 8:58pm ·

लाटी काली माया मेरी नत बिंगी कैन
बिंगै बि नि जानि उमर काट्याली फंडफ़ूका
खिली फूल माया कु जिकुड़ी मेरा बि
न क्वी मांगी न क्वी दे जानी
सुक्खागे झाड़याली फंडफ़ूका
रगरैनी मेरी आँखि बांधू देखी
हैसि कैर कैरी नौ धैर धैरी
बोल्या करियलि फुंड़फूका ......नरेंद्र सिंह नेगी

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Dinesh Dhyani wrote on his Timeline.
August 21 at 5:13am

सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो”िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे”ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुनील थपल्याल घंजीर
September 6 at 12:55pm ·

... शिक्षा नीति ...

बस्ता ओवरलोड तवा गरम चस ,
पढै ल्यखै बैठ सलेबस की बस ,
कितबी कौफीयूं कु बेढब संसार ,
छ्वाड़ बटी छवाड़ तक सब्या लंपसार !

सुनील थपल्याल घंजीर

 

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