Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515312 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुनील थपल्याल घंजीर
September 4 at 6:15pm ·

किनमजाद ..क्यनमजाद !

दादा अयूं त् छौ घौर... बूंण
तूभि दगिड़ी खिसग जांदू
किनमजाद ..

ह्वेत् गे दस पास ... छुचा
लैंसीडौन दौड़ी आंदु
किनमजाद ..

दाल भात सदनि त् खांण
माछा ब्वगंणा छीं ताल नयरी ..जरसि पौडर छिड़िकी आंदु
किनमजाद ...

बेकारी शान बागम छै फुकेणु
आटु चौंल खु़णि छै तकणेंणु
रेखा गरीबि की खैंचांदु ...
किनमजाद...

भै भौजा कैका ह्वैन ... ?
कखि कै साबा हत-खुटा दबांदु
किनमजाद...

टक्क ये लौला पहाड़ , क्यांकु तेरी "
खै त् याल अपंण बांठौ लूंण पांणी ...
छोड़ हवा स्यांणी गांणी ,अईं च् गाडी
किनमजाद...।।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Balveer Jethuri and 43 others
September 4 at 10:49am ·

पढ़े लिखे कया पाई तिल

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

मेर जिंदगी कू फाड़ी बिल
दोई घास कू गफा तू गैई गिल

झिलमिल -२ व्हाई झिल
लात खुटे खैई क़मरी हैगे भिर

तेर पढ़े नि मेर घर लड़ै लगे
स्कुल गुरूजी घोर बोई बाबो नि छलै

सच बोल दे ये पहाड़ ल कया पाई बल
तू बिदेश मा मि यख पड़यूँ ठर

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Balveer Jethuri and 43 others
September 4 at 10:49am ·

पढ़े लिखे कया पाई तिल

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

मेर जिंदगी कू फाड़ी बिल
दोई घास कू गफा तू गैई गिल

झिलमिल -२ व्हाई झिल
लात खुटे खैई क़मरी हैगे भिर

तेर पढ़े नि मेर घर लड़ै लगे
स्कुल गुरूजी घोर बोई बाबो नि छलै

सच बोल दे ये पहाड़ ल कया पाई बल
तू बिदेश मा मि यख पड़यूँ ठर

पढ़े लिखे कया पाई तिल
बल जब अनपढ़ ही राई दिल

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी with Madan Mohan and 74 others
10 hrs ·

मेरो पछाण

मेरो कल्पना कू उड़ाना
मेरो पहाड़ मेरो पछाण

नि जाणा कभी छोड़ी ते
मिल ये सात समुदर पार

मिथे च ये मेरु भान
यख रैकी ही येल बण महान

ये मेरो सुंदर घरबार
मेरु उत्तराखंड मेरु प्राण

साफ सुथरु मेरु गढ़देश
रंगीलो कमो छबीलो गढ़वाल

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 10 at 5:29am ·

फिर कै गंगा कू घाट सुमि ?

चल गंगा कू घाट सुमि घुमी ओंला
पानी पूरी कचोरी खूब छके कि खैईं ओंला
चल गंगा कू घाट सुमि

नमामि गंगे हर हर गंगे बल हम चंगे
बेधड़क हमुन करन यख धंधे कन ये बन्दे
चल गंगा कू घाट सुमि

फूल दीप अगरबती सब बोगी ओंला
आस्था कू नौ परी गंगा मा घाण कैरी ओंला
चल गंगा कू घाट सुमि

सैर स्फाटा कू ब्यापार अब यख हुयुंचा
हरकीपौडी कया सबी जगा ये रोग पसरुंचा
चल गंगा कू घाट सुमि

पैठणा कु बेल व्हैगे ऐ सुमि
गंगा कु लुप्त हुना कु बेल करीब ऐगे
फिर कै गंगा कू घाट सुमि घुमी जोंला ?

बालकृष्ण डी ध्यानी
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सुनील थपल्याल घंजीर
17 hrs

... सिनक्वली ...

उमर त् अबि छैं रंई खाजों बुखाणां कु , हैलीं फौंकी सि दंतुड़ी मीथै झुरांणा कु
लार ब्वगदी ग्या ताल ह्वाई गिच्ची बंद
सिनक्वली !

गौंमा रंयां मनिख चार ...
द्वी छीं नामा का द्वी धुत बिना जामा का
बाकी दुधी दांतु का बंण गीं प्रधान सयांणा
सिनक्वली !

बचांणा हिमाल कु लग्यूं प्रदेशी नौं
स्वर्ग बंणलो पाड़ गौं मनिखीयूंल खांण सौं
पोड़ी रूमुक पाख सर् र मनिख ढूंढा धौं हे भंयूं
सिनक्वली !

भात ह्वे कच कुचु ह्वेन दाल लुंणकटु
फरड़ा बरात पौंछी धार गौंमा न आदिम चार ह्वाई ऐड़ू हलुवा टटगार भट्टों कु साग सिनक्वली !
.
.
सुनील थपल्याल घंजीर

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 9 at 12:15pm · Edited ·

राजि‍ खुशी छौं मैं भुलौं,
औलु झट्ट बौडि़,
तुम होला सोचण लग्यां,
कब आलु दौड़ी दौड़ी.......

-तुमारु भैजि अर भुला
कवि जिज्ञासु
9.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 14 at 4:43pm ·

पांच भै कठैत......

श्रीनगर मा जबरि,
जियाजीकनकदेई कू,
राणी राज थौ,
सादर सिंग कठैत का,
पांच बलशाली नौना,
भगोत सिंग, राम सिंग,
उदोत सिंह, सब्‍बल सिंग,
सुजान सिंग सब्‍बि अपणि,
कठैत गर्दी चलौन्‍दा था.........

मेरी पूरी कविता आप मेरा ब्‍लाग फर पढ़ि सकदा छन.......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 13 ·

भौत खूब गुरु जी, कथ्‍गा ऊलार सी झलकणु छ आपकी मयाळु मुखड़ि मा।

जल्‍मबार नरु दा कू,
तुम दाळ पिसणा,
झळ झळ हम देखि,
सिलोटि घिसणा....

सब सिख्‍युं काम,
अब काम औणु,
हुनरवान छन आप,
अहसास होणु......

राजि खुशी चैन्‍दा भैजि,
तुमारु उलारया पराण,
खुश होयुं मन तुमारु,
नरु दा कू जल्‍मबार मनौण........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 13.8.2015

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 7 ·

उत्‍तराखण्‍डी....

नौट कमैक नौट्याल बणिक,
कूड़ी पुंगड़ि छोड़ीं बांजा,
मौज मनौणा सैर बजार मा,
साधन संपन्‍न राजा.....

-कवि जिज्ञासु की अनुभूति
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 6.8.2015

 

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