Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515364 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Bhishma Kukreti
 
शेयर , कंमेंट्स , Like करदारो !!!!

जुगराज रया
खुसी आपक देळि मा रै
आपक दान दक्षिणा की शक्ति बढ़दी रै
रोज नया नया आबत मित्र बढ़दा जैन जी
ज्ञान आपका अग्वाड़ी बैठ्युं रावो जी
विश्लेषण शक्ति आपकी दासी रावो जी
व्याकरण आपका गुलाम रावो जी
पढ़ना लिखणो बिगरौ आपमा सदा रावो जी
आध्यात्म माँ आपकी रूचि सद्यनि रावो जी
भौतिक चिंता आपसे सदा भौत भौत फार ही , दूर ही रावो जी
Like देखिक लेखकौ ज्यु नि भरेंदो
Comments से रचनाकारौ उत्साह बढ़द
Share से भाषा कु मान सम्मान बढ़द
हमको Comments मंगता !!!!!!!!!!!!
हमेको Share मंगता !!!!!!!!!
आपक ----गढ़वाली -कुमाउनी साहित्यकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
 

उदास घिंडुडु

ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।

सर्वाधिकार सुरक्षित @ दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Saroj Upreti
September 12 at 8:39pm

हिमालय
अडिग हिमालय प्रहरी बन , सहता सर्द हवा के वार
गंगा जमुना का उद्गम स्थल,प्राकृतिक संपदा का भंडार
उज्वल, घवल, कन्तीयुत, श्वेत पुष्पों का कर श्रृंगार
गला कर हिम अपनी करता आ रहा मानव का उपकार
आज पर्यावरण से दूषित हो , गल रहे हिम के भंडार
स्वार्थ वशीभूत मानव ने खोखले कर दिए पहाड़
नष्ट करदी प्राकृत संपदा , हिमालय सहता अत्याचार
बचाना होगा अब हिमालय, रोकना होगा अत्याचार
वर्ना उथल पुथल सब होगा , नष्ट हो होगा ये शिव भंडार
सरोज उप्रेती

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Lokesh Singh Negi
September 11 at 11:40am

दोस्तों दो शायर लिख रहा हुँ अपड़ी भाषा मां आप को जैशा लगे आप कमेंट या पसंद कर सकते हैं !

रोज़ गैंणवा की चमक मां , खल-बलि माचदी च !
जोंन पागल च, अंध्यारा मां निकल पड़दि च !!

ओंकी याद आई छ, मेरी सांशु जरा सलए- सलए हिटा !
जिकुड़ी कि नशु मां भी , खल-बलि माचदी च !!

रचना - लोकेश सिंह नेगी
Mo. No. -+917568757481
गाँव- खेतपाली ( रौनद,टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड ,249165)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Dinesh Dhyani
September 10 at 3:30pm

गौं-गळया
दिनेश ध्यानी।
भिण्डया दिनौं बाद
गौं जाणु ह~वै
मिन गौं कु गळ~यौ थै
सेवा लगौ
वो भक्वैरिकि रूण लगि गे।
मिन बोलि हे! क्य ह~वै?
बल, निरसा त्वै थैं बि
मेरि याद नि एै?
अरै बाळपन त त्यारू
मी दगडि हि बीति
यों ही बाटा-घाटौं म
तिन ग्वाय लगैं
यौं ही गाळ~यौ का रस्ता हिटी
इस्गोल आंदु जादु रै।
इनां सूणि परदे”ा जैकि
कतग बदलेग्यां तुम सब्बि
सच्ची पक्का ब्यौपारि ह~वै ग्यो
जै से मतलब वैका वोरा-धोरा
अर जैसे मतलब नीं वै तन्नि फूका।
मिन बोलि न-न सिनि बात नी
बल, चुपरै, म्यारू गिच्चु नि खुलौ
साख्यों बिटि द~यखणौं छौं
जो उंदै गै वो कब्बि बौडिकि नि ऐ
किलै कि ये पाड म
सदानि खैरि-अखरि हि रै,
हूण खाणा बान
सब्यौंन अपणु मुक्क लुकै,
पण यखौ विकास कनौ
कैन बि सांस नि कै।
बल इनी सूणी
वै छिप्वडू का क्य हाल छन?
मिन बोलि भैजी त रिटैर ह~वैगेन
बल, अरै वैकि कि कविता, स्याणि-गाणि बि
मंचौं अर ल्वखौं तकी सुणौण खुणि रैगेन
वैन बि कबि ये पाड़ कि सुध नि ल्हे,
सच्चु जि होंदु त रिटैर होणां बाद
अपणु गौं ता आंदु।
मिन बोलि ह~वैलि क्वी मजबूरी,
बल चुपरै, पक्ष नि ल्हे,
तु बि उन्नि छै
तुमरि कैकि क्वी मजबूरि नी
तुम सब्बि गुणा, घटाणु, नफा, नुकसान
की कला म पारंगत छां
गमलौं म सज्यां मनखि
बनावटी जिन्दगी जीणां छां।
बल
अरै वै वीरेन्दz पवारं भैन
सब्या धाणि देरादूण, होणि खाणि देरादूण
छोडा पाड~यौ घर गांैउ मारा ताणि देरादूण
गीत क्य लेखि तुम जना चकडैतौंन
अपणा घर गौं छोडिकि
सची देरादूण पौछी सांस सै,
हौरि त हौरि जब नरू भै बि
देरादूण वळु हि ह~वैगे त फिर
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।
हौर्रयौं कि बात ही क्या रैगे।।
दिनेश ध्यानी। 10/09/15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी 

जब में जनि तुम थे इन से परित व्है जालि

जब में जनि तुम थे इन से परित व्है जालि
मेर ढुंगों गारों कि और्री शोभा बढ़ी जालि

बौल्या बनि की तुम इनि यख फिरदी रौंला
रोलो खोलों तब तुम दगडी बी भेंट व्है जालि

बौरांसा खिल्दी यख फ्योंली मिळेल हस्दी
काफल किन्गोड़ा अखरोट सेब की ये बस्ती

इन अन्जाडू डंडा कांडों मा कण ऐ दिस आला
मेरा पहाड़ मा तुम आला त रंगमत ऐ जलि

जब में जनि तुम थे इन से परित व्है जालि
मेर ढुंगों गारों कि और्री शोभा बढ़ी जालि

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी 
September 18 at 2:36pm ·

मेरी बोली मेरो मुख

मेरी बोली मेरो मुख
किले हुली तू देखणी जख तख
कैर सुरुवात तो अपरी से ही
देख पल मा बदल जालो ये जग

भांड्या तू इन भाना ना लगा
सकेसरी छोड़ छुछा ऐथे तू फुंड चूला
आलस से देदे अपरी अब तू तिलंजाली
तेर गली छे छुछा बस ऐ पहाड़ वाली

अपरू नि ही इन सब करयूं धर्युं
कैल नि अणा यख ये कैर उकेरनु कुन
तू भी अब इना ना ऐकि कथा लगा
झठ ये कैर उकेर पट साफ़ कैदे जरा

मेरी बोली मेरो मुख
किले हुली तू देखणी जख तख
कैर सुरुवात तो अपरी से ही
देख पल मा बदल जालो ये जग

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 17 at 10:36am ·

गोल गोल रुपया कि देख रे रिंगण

गोल गोल रुपया कि देख रे रिंगण
गिर गिर ग्याई वेमा मेरो उत्तराखंड

देख कनि लम्बी ये रांग लगिचा
किरमोलों जनि ये रुपया मा लपकी चा

दादा बोबा बेटा सब एक पिछने प्ल्यां छन
छन छन बजनि एंकि कन कनुडी घन-घन

अब दिन रात जपा ये दोई रूटा को ग़फ़ा
यूँ लपक छपक मा तू बी झपाक गै रे भुल्हा

पोट्गी कू आग देख इन यख कन ब्लीच
जंगलात कु नाश व्हाई पुंगड़ी बांज पडिचा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी 
September 16 at 5:07pm ·

जाने कया सोच्नु छे

जाने कया सोच्नु छे
यकुली यकुली कैथे खोज्नु छे
जिकोड़ो मेरो बोलदे तू
भेद अपरू सारो खोलदे तू

बल एक एक दिस ग्याई
परती कि यख क्वी ना ऐई
छों घंगतोल मा दीदा
सब कख लुकी ग्याई

नि रैगे क्वी संगती साथी
नि रैगे क्वी दियू बाती
आज छन सब यखरा यखरा
भौल क्या कं तिल रे बाछी

समा सुम छ्या यख पसरयूं
ईं देबों पितरों की घाटी
नि रैगे क्वी पूजणा वाल
कण कै बची रैली ये पाटी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 15 at 7:36am ·

नथुली नथुली नाक की नथुली

नथुली नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
सोना की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

चम चमकी नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
गोल गोल नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

कण बेगरेली नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
मेर भूली नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

सब कामधनि कैदी नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
अल्मोड़ा बजार घूमदी नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

मेरु पितृ की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
कैन बने भगयान नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

मेरु गढ़ देशा की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
कण रिंगा लगानि नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

सासु ब्वारी नाक की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
ढोल दामू नचदी नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

कवि यकुलांस की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये
मेरु मान अभिमान की नथुली नाक की नथुली, नाक की नथुली ये नाक की नथुली ये

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22