Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515364 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 13 at 2:29pm ·

गिनती दारू की

पैली दारू म्यार नौउ कि
दूजी दारू सऱ्या गौंउ कि

तिजी दारू पल्य मौ कि
चौथी दारू डंडियों धौर कि

पाँचि दारु पचम शोर कि
छथी दारू हर्ची वे सोर कि

सति दारू सत्म जोर कि
आठि दारू अठम छोर कि

नवि दारू नशम भोर कि
दसम दारू अंतिम घौर कि

पैली गिनती शरू व्हाई
दशम गिनती म संपे ग्याई

ले पिळो जमैकि और्री दारू
मेरो बाप दादों की कया ग्याई

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 11 at 9:45pm ·

मेरो पछाण

मेरो कल्पना कू उड़ाना
मेरो पहाड़ मेरो पछाण

नि जाणा कभी छोड़ी ते
मिल ये सात समुदर पार

मिथे च ये मेरु भान
यख रैकी ही येल बण महान

ये मेरो सुंदर घरबार
मेरु उत्तराखंड मेरु प्राण

साफ सुथरु मेरु गढ़देश
रंगीलो कमो छबीलो गढ़वाल

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

एक एक मुख से वो सुहाता
मुझे बीते दिनों और उन पलों में ले जाता
कभी मिलकर रहते थे हम साथ साथ में
दुःख सुख बांटते थे मिल के सब प्यार से

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

अब तो बस वो बची हुयी शेष याद है
जो मैंने अब तक संभले रखा आपने दिल के पास है
वो गांव घर पहाड़ पल पल खंडहर हो रहा
मैंने बस दूर बैठा बीते पलों को ले रो रहा

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

यूँ दूर बैठे बैठे रोना मेरा क्या बेकार है
सच्चे हैं तेरे ये आँसूं तो तुझको ही ये अधिकार है
अब दूर नहीं वो दिन जब खुद कहेंगे ये पल छिन
तेरे बिना मेरा यूँ जीना दुश्वार है

बात फिर छिड़ी है मेरे पहाड़ की
मेरे बिछड़े गाँव घरबार की

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
भेना: स्याली मेरी भरणा डलु फोड़ी बल रोड़ी,
छोड़ ते गंगाड़ ओ मेरी रोतेली अखोड़ी,
सयाली:भेना मेरा अखोड़ियाल, डांडू चरि बल भेरू,
लावर्ति मनवर्ति म करिय इंतझार मेरु,
भेना:स्याली मेरी भरणा ,काटी जालू बल घास, तेरी दीदी एकलुरसिया छ लगी रैंदी सास,
स्याली: भेना मेरा अखोड़ियाल लुआ गाढ़ी बल पाण,
दीदी मेरी एकलुसिया,तुमन परदेश छोड़िक नी जाण्,

रचित भगवान् सिंहः रावत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
आज उतराखंडी फिल्म तरीका कुसुम चौहान जी और भगवान चंद जी लघु फिल्म देखी हिमालयन न्यूज़ पर उनके शानदार अभिनय और मार्मिक विषय को देख ये कविता तैयार हो गयी है
घाम मा जनानो की छु लगणी च हे दीदी
दिल्ली ब्वारी दिल्ली मा खप सक्दीन
अगर मजबूरी मा उत्तराखंड ऐगिन त
दिल्ली का ही गीत गांदीन
वी फर कैकु अड़ायु नि लगदु
बस गिच्चा एक छवी चा
मम्मीजी iam वर्किंग वोमन
मि आप जनु बैकवर्ड नि छो
अपणा अगने पिछने
सब्भु तै गवाणया समझदिन
अफु तै इत्गा मोर्डेन समझदिन
कबि किटी पार्टी त कभि ब्यूटीपार्लर खुटी रंदीन
स्येंदी दा बि लिपस्टिक पतोडी स्येदीन
म्येरा छोरा तै बि उत्तराखंड मा आकाल छो पडियु
ज्यू ब्वारी निहोणया दिल्ली मा खुजे
चला फण्डफुका दीदी भूलियो हौर छवी लांदा
दिल्ली ब्वारियु तै दिल्ली छोड़ा
अर घाम तापा ..............................................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
. अपंणचित ....

डिल्ली गै छौ अपंणचित् ! ..चिपगंणौ
मयलु मिलंणसार जंणकरौं का सारौं ,
मुखड़ी कैकी वख पछण्यांई नी ......
बैंरग लौटी औं ।


देरादूंण उतरू अपंणचित इलाजी कु ...
हिल्यां हडकौं फर ठंगरा लगांणा कु ,
कुगता करै यौं , तुमम् क्य लगौं
बीमरी त् द्वी ही छाई .... चार हौरी नैई
ये खरमुंड बोकी ल्हैयौं !

दारू छोड़ी अपंणचित फोड़ी बोतल
छुट्टी ऐन गौंमा फौजी पांच टोटल ,
लुकुंणु बि कख छायो फेमस जि छौं
पंच्यों दगड़ जर जरसि गिलसी ताल एक एक
समाजिक आदिमौ दग्ड़्या फर्ज निभै औं !

.
.
सुनील थपल्याल घंजीर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Netra Aswal

दुष्यंत कुमार की मशहूर हिंदी ग.ज.ल 'हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए' का गढ.वाली रूपांतर :
******************************************

ह्वे गए परबत कनी, या पीड. गल़णी चैंद भै
ये हिमाला से कुई गंगा निकल़णी चैंद भै ।

आज मत्थे पाल़ परदौं की तरौं हलणा लगे
शर्त लेकिन छै कि मूडे. पौउ हलणी चैंद भै ।

हर सड.क फर, हर गल़ी मा हर नगर हर गौंउ मा
हाथ झटगांदा झटग, हर लाश चलणी चैंद भै ।

सिर्फ हफरोल़ो लगाणो ही मेरो मकसद नि छा
मेरी कोशिश छा कि या बघबौल़ मिटणी चैंद भै ।

मेरा जिकुडा. मा नि ह्वा त, तेरा जिकुडा. मा सही
ह्वा कखी भी आग लेकिन आग जगणी चैंद भै ।

(गढ.वाली रूपांतर : नेत्रसिंह असवाल )
***********************************

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Darshan Singh
September 16 at 11:15am

उदास घिंडुडु

ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Darshan Singh
September 9 at 9:32am ·

मुर्गा कनै गै? (चौथु अर आखरी भाग)

चार साल बटि वू जेल म छाया, सरकरि चिठि ऐगे।
चिठि म ल्यख्यूं छाई चरि च्वरों की सजा खतम ह्वैगे।

सजा खतम ह्वे, घार म वूंका खुशी मनाणा छाय।
घ्यपळी काका कु क्य जी ह्वालु गौं वळा डरणा छाय।

घ्यपळी काका अर चर्या चोर स्वारा भाई छाई।
घ्यपळी काका अर चरि चोरों की कूड़ी मिली छाई।।

चोरों का घर्वला गाडि बुक कैरिक माणा पौंछि गैं।
अपणा घार लिजाओ यूथै जेलरल हाथ जोड़ी दीं।।

अस्वाल बाडा ल वूथैं द्याख, भीड़ु पर बिलक्यां छाई।
हैलि हैलिक एक हैंक पर वू थ्वबडा ल मरणा छाई।।

जेल बटि ल्याकी वू चर्यूं थै गाडि म बैठा द्याई।
गाडि म बैठदी चरि चोरों थै कौंप हूणी छाई।।

भरमपाल डरैबरल अब गाड़ी चलै द्याई।
घरघरसूणिकि चर्या चोर सीट मूड जाणा छाई।

गौं पौंछिकि बालबचा भै बंध कैथै नि पछ्यणा छाई।
जनि ल्वखु थैं द्यखणा छाई वू झस झस डरणा छाई।। ।
पखडिकि गौं वळूं ल वूथैं घरौं म पौंछा दे।
अधा राती मा चरि चोरों कू कुकडू कू ह्वैगे।।

सैर्या गौं का लोग मिटीन, कनु असुुगुनुु ह्वैगे।
अधराती म एक न यख त चर-चर बांसी गे।।

हात मुख ध्वैक फजलेक लोग नवर्या म पौंछीगे।
हमरू गौं म हे भगबानो कनु असुगुनु ह्वे गे।।

नवर्या ल ब्वाल चार साल पैलीजु मुर्गा घळका द्याई।
वै मुर्गा म पांच पीढि पैल्यकु तुमरू पुरण्या छाई।।

अब इनु कैरो यूं चरि चोरों थैं हरिद्वार ली जाण।
अपुणु पुरण्य अर वै मुर्गा कि नारैण बलि कैरि आण।।

एक सूना की एक चांदी की द्वी मूरत बणाओ।
गंगा म ब्वगैक यूंथै मनखी की जूनिम ल्याओ।।

नवै ध्ववै क राजि खुशि सबी हरिद्वार बटि ऐगीं।
वीं ही राती म चरि चोर फीरि बांग दीण लैगीं।।

हैंकी राती मालिक जण्या झणि क्या जी ह्वैगे।
एकी रातिम --चर्या चोर तडम लैगे।।

थाणादार कुकरेती झट गौं म पौंछीगे।
डंडा द्यखैक ल्वखु खुणि ब्वाल यूँ थै क्या जी ह्वै।

अस्वाल बाडाल ब्वाल कुकरेती जी स्वैनफ्लू ह्वैगे।
तबीत गौं वलौं ल चर्यूं थै खड्वलुंद दबै दे।

अस्वाल बाडा अर कुकरेती जी ल ब्वाल ऊँ शांतिः,
प्याट ई प्याट ब्वाल भलु ह्वैगे।
भौत बण्या रैंद छाई नपकनाथ ई,
अब हम खुणि निझरक ह्वैगे, ऊँ शांति शांति।।
नवर्या -पुछ्यरु या बक्या।

नाम, जगा, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक :-09/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
Darshan Singh
September 7 at 7:57am ·

मुर्गा कनै गै? (तिसरु भाग)

लतगि प्वडण छैं कुकरेती जी की सैर्या गौं मा सुणेगे।
अस्वाल बाडा ल राजीनामाकू काका मनै दे।।

तिसरु द्वफरी राजीनामा कू द्वी पौंछिगैं थाणा।
वख पौंछिकि पता लग चोर त पौंछिगैं जेल माणा।।

अस्वाल बाडा ल सिरडे ब्वाल चल भै अब घौर जाण।
कख रैगे थाणा कख रैगे माणा कनै कनै जी जाण।।

मैणा द्वीए म जमानत कू द्वी फीरि माणा गैं।
जेल कि सड्यणिल भैर बिटैक वूंथै द्यखणा रैं।।

तीन चोर त अधम्वरा छाई छ्वटु जंदरी घुमाणू छाई।
धुमाकोट कु लुहारुकु नौनू वूंथै खाणु खवाणू छाई।।

अस्वाल बाडा थैं देखीक वूंल खुटौं म मुंड टेकि दे।
घ्यपळी काका खुणि माफ कैदे ब्वाल बीडी पिलै दे।

घ्यपळी काका मयल्दु बिचरू बीडी माचिस दे दे।
बीडी जलैक माचिस द्याख त वूंकू ऐडाट ह्वैगे।।

ऐडाट वूंकु सूंणिकी बाडा अस्वाल भी अजके गे।
जेलर चटग लगैक चुप रैणाकू धमका गे।।

अस्वाल बाडा ल मिठु कै पूछ निरभग्यो क्य ह्वै।
माचिस की डब्बी द्यखा वूंल मुर्गा की फोटो छै।।

मुर्गा च्वरों कु इनु बण मुर्गा कि वांग से भि डरणा छैं।
मुर्गा कु फोटो देखिक वूंकी हडगी कंपणा छैं।।

किस्मत फ्वाड मुर्गा ल वूंकी अब त टक टूटी गे।
आज तलक वूं चरि चोरों कू घर बौडू नि ह्वे।।

जगा,नाम, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक :-07/09/3015

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22