Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515427 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता नंबर-27
_____________

यार लोग छुंवी सरायेंगे हमारी
तुम सुद्दि-सुद्दि धै मत लगाना,
मैं गारी चुलाऊंगा सुरुक अर्
तुम खलबट् रौल जने ऐ जाना...

फज्ज्लेकि मैं तुम्हारा बाटा देखूंगा
ज़रा बेचैन नैनों को दर्शन दे जाना,
मैं अपना फुट्यूं कनस्तर बजाऊंगा
तुम गगरी लेके सीधे पंन्ध्यर ऐ जाना...

मैं जाऊंगा गोर चराने जिस भी डाँड़
तुम भी घास काटने उधर ही ऐ जाना,
मैं सुल्कण बजाऊंगा धार मा बटेकि
अर् तुम रौल बटे खुदेड़ गीत लगाना...

दोफरी में तुम्हारे ख्वाल जने आऊंगा
तुम ज़रा छज्जा छ्वाड़ में ऐ जाना,
मैं सुद्दि इधर-उधर रगरर्यट्ट करूँगा
मगर तुम मन्द-मन्द मुस्कुरा जाना...

और ब्यखुनि बगत तुम टक्क लगाके
घ्यपुलु करों के खल्याँण जने ऐ जाना,
मैं हैड़के बॉल चुलाउंगा तुम्हारी साइड
तुम बस अपने नैनों के तीर चलाना...

फिर रुमुक पोड़ जायेगी घड़ेक में
होगा बड़ा मुश्किल तुम बिन रै पाना,
सो जाऊंगा मैं तुम्हें याद कर-करके
तुम भी ढिकंण लेके टुप्प पोड़ जाना...

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत
ग्राम- सुन्दरखाल, ब्लॉक- बीरोंखाल
जिला-पौड़ी गढ़वाल-246169.

03.10.2015

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-धन्यखाल..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रचना नं-23

सिकासैरि (देखा-देखी)
_________________

बाल उड़िगी जब बटे शैम्पू लगाई।
आँखा फुट्टिगी जब बटे नेट चलाई।।

फेशा कु भि भलिके बिणांस ह्वाई।
बन-बनिकि क्रीम-पौडर जु लगाई।।

व्यसनों कि लत कलेजु फूकी ग्याई।
यु जिकुडु भि अब कामा कु नि राई।।

फ़ास्ट फ़ूड खै-खैकि अंदड़ा सड़ाई।
हड़गों मा बगतल हि कीर्तन कराई।।

रुपय्या-पैंसा त तिल खूब कमाई।
पर सब डॉक्टरों जुगता हि ह्वाई।।

शुद्ध पांणि पेकि बड़ु गालू उबाई।
पेप्सी-कोक ला खूब तीस बुझाई।।

घारा कु खाँणा मा स्वाद हि नि पाई।
भैरा कु बासि-तिबासि खूब पचाई।।

घरर्या नुस्खों कि क्वी कदर नि काई।
इलैई रे आज त्यारू यु कुहाल ह्वाई।।

सिकासैरियों मा तिल कन मौ गंवाई।
तन मन अर् धन कु सत्यानाश काई।।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
09.09.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता नं-22

फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...
________________________

कि अपिड़ि हि बाड़ खैगे अपुडु हि उज्याड़,
अर् तुम कुल सुंगर-बांदर हि अटगांण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

प्रधनगिरी मा हि खड़ि ह्वै ग्या तौं कि कोठि,
अर् तुम स्यु दारु-मुर्गा मा हि बिकंण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

पूरु बजट सफाचट कैगि तुम्हरा हि प्रतिनिधि,
अर् तुम घ्वाड़ा बेचि-बाचिक घुर्रण हि फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

पुल बंणण से पैलि डाकरिगि नेता-अधिकारी,
अर् तुम बिचरा अपुडु सुलार हि बिटांण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

राशना कु साबुत ट्रक हि ह्वैगे वख अंडरग्राउंड,
अर् तुम स्यु अज्जि भि लैन हि लगांण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

विज्ञप्ति निकलण से पैलि हि धैरयेलि अपड़ा,
अर् तुम बस पेपर फर् पेपर हि दींण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

सर्र्या मुल्का कु विकास ह्वैगे बल कागजों मा,
अर् तुम अपड़ि हि चुनीं सरकार कोसंण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

मि त मोर्रि ग्युं यख कविता लेखदा-लेखदा,
अर् तुम फगत वाह-वाह हि करंण फर् लग्यां छो,
फूका भै सभि जगह वी धंधा छि...

©® सर्वाधिकार सुरक्षित: धर्मपाल रावत
ग्राम- सुन्दरखाल, ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
04.09.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dharampal Rawat 
September 3 ·

हम त्यारा गौं म अयाँ छों., मुसाफिर की तराह...-2
सिर्फ एक कट्टा मुंगरी अर् द्वी-चार ग्वदिड़ि-कखड़ी दे दे....

तेरी सगोड़ी है कहाँ.....तेरी पतोड़ी है कहाँ ...2
फूका द्वी-चार खिरबोज और चचिंडा ही दे दे.....

हम त्यारा गौं म अयाँ छों....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रचना नं-21

सभि दगड्यों थैं _/\_हथ जोड़ि प्रणाम अर् सेवा-सौंलि...,
त ल्या आज आपाकि सेवा मा पेश कनु छों कुछ दोहा....
___________________________________

क्वी अचरज न कर्यां, बुरु न मन्यां, न अपुड़ से मुंड रेच्यां ।
कलजुगा कि छुवीं छों लगाणु, भा-रे क्वी ढंडी न पोड्यां ।।

कि छुछों बल अजगर करे न चाकरी, अर् पंछी करे न काम ।
क्वी लूँण-रोटि को तरसे, अर् क्वी पोड़ि-पोड़ि खाये बदाम ।।

घुगुति खुदेंणि च अपड़ा हि मैत मा, ऐश करे कांणा-गरुड़ ।
नैनसिंग लगाणु जपगणि, अर् शेरसिंग लुक्युं खटुला मूड ।।

बुबा अमांणु च भितरा कूँण, ब्वै नि सम्भालि सकणि च तीग ।
अर् सौरसि लि जयां छि टूर फर्, कभि केरल कभि कश्मीर ।।

जैथैं क्वी घूंण खैं न उप्पन तड़कैंइ, इनु हमरु नेता ह्वै जाणु च ।
मि मोर्रि ग्युं ध्याड़ि कैकि, अर् वु 7 पुश्तों तक जोड़ि जाणु च ।।

स्याल त उड़ाणु च गुलछर्रा, अर् बाघा कि हुयिं च भाजम-भाज ।
कोठि-बंगला बण्यां छि, पर पचणू च सिर्फ BPL कु हि अनाज ।।

गढ़वाल रूंणु च गढ़वल्युं खुणे, नेपाल-बंगाल का ह्वैगि पहाड़ि ।
जलम भूमि जने ढुंगु ढोल्यालि, पर स्यकुण्द कनू च बल ध्याड़ि ।।

........ जारी है.....
____________

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
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31.08.2015

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भुल्दा मनखी

जिकोड़ो दियू ये माया संभाले ना
जुनि थे ये बाटा भाये ना …… २

दूर बाटा खूब भागी ये सहेरा कू …… २
मन नि लागि यख अखेरा कू

उड़ दा चखुला बल उड़ा दा जा
तिल संसार कथये न समझी पायो रे

भुल्दा मनखी बल तू भुल्दा जा
तिल अपरू परायु नि जनि पायो रे …… २

द्वि दिना की ये दुनिया रे …… २
फिर बी अक्ल दाढ़ तेरी नि आये रे

बगदा पानी बल बगदी जा
कैल तेथे यख ना समझी पायो रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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नि बिसरलो नि बिसरलो

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

कन बिसरलो कन बिसरलो
मातृ जननी को लाज मेरु खंड

कैल बिसरण देन कैल बिसरण देन
निर्दोष मनखी पर ये अत्त्याचार

ऐग्याई ऐग्याई फिर कलो दिन
जिकडो च सबकु खिन -भिन

नई चेनु हम थे तुमरी शोक सभा
मुलायम मायवती थे तू दिला सजा

नि बिसरलो नि बिसरलो
द्वि अक्टूबर ये मेरु उत्तराखंड

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ईशारा से मैं बुलन्दी

आँखि दगड आँख मटकण दि
ईशारा से मैं ऊ बुलन्दी
औ बांदा ईशारा से मैं बुलन्दी
बता दे ये बांदा तेरु नौ क्या च

कण छुईं लगान्दी दिल लुछी जांदी
माया से भोरी ऐ बोरी
मिल अपरी कंधामा ते सरयाँण
बता दे ये बांदा तेरु गौं क्या च

कण तै पर माया लगाण
कण तै थे आधु बाटू पर अढ़ण
अपरी आप समझे दे मिथे
छुछि अपरू जियु को भेद बता दे

ईशारा से मैं बुलन्दी
हे बांदा मे ईशारा से मैं बुलन्दी
ईशारा से मैं बुलन्दी ……ईशारा से मैं बुलन्दी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरी बात राई में दगडी ..........

मेरी बात राई में दगडी
वहै गे प्रभात देख कै दगडी
कण रात ग्याई मि जंणदू
अपरू दुःख मि अफि सरदु
मेरी बात राई में दगडी ..........

बैठ्युं राई अपरि मि
कोई नि आई यखरि मा मि
कैल नि अब मि ध्यै लगे
दूर भ्तेकी बी वेळ नि बचे
मेरु स्वास में मा राई
में दगडी ही वा यखुली ग्याई
मेरी बात राई में दगडी ..........

ये अंधारु उजाळु को खेल
बिठे नि पाई मि विं दगडी मेल
झुक झुक कैकि दिस ऐई गैई
छूटी ग्याई मेर ज्योंदगी की रेल
सज नि आई या खेल नि पाई
दूर बैठिक मि बस देख्दी राई
मेरी बात राई में दगडी ..........

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देखी छे क्या तिन

देखी छे क्या अ अ अ तिन न न अ
इन मौल्यार कख बी इन उल्यार कख बी
देखी छे क्या तिन

मुखडी विंकी बात कैनी देख,मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
कैल नि बिंगी माया विंकी, मेरु माया कु रगरायट रे
मेरु माया कु रगरायट रे
मैसे ही तो बात कैर मैसे ही तू भेंट कैर
सुबेर सुबेर तू मैसे ही तू सुरवात कैर
देख ना तू कै और्री मेरो आँखा दगडी अपरू आँखा चार कैर

नि राई जियु मेरु पास ,कख लुक्युं हुलु वो आज रे
कख लुक्युं हुलु वो आज रे
उजाली रूप तेरु चाँद जनि ,चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
मि मी नि राई कख हर्ची गयुं मि आज रे
खोजणा मि थे मेरा अपरा पराया
नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे, नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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