Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515427 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली

कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली
ना तोड़ा दीदा,ना इन यूँ कटा ,यूँ डलियुं …… २

बरखा नि पौडी बल देबता रुस्युं चा
ऐ बार पाणि बिस्युं चा बल देबता रुस्युं चा
बांज पौड़ी धरती बल देबता रुस्युं चा
अपरू घार अपरू देश तिसालु बल देबता रुस्युं चा

नि मानी मिल मेर गलती बल देबता रुस्युं चा
बस मेर च ये हलगर्जि बल देबता रुस्युं चा
बस चल ल मेर यख मर्जी बल देबता रुस्युं चा
बस मि छों और्री कोई ना बल देबता रुस्युं चा

बल चेत जा रे अभी कख देबता रुस्युं चा
तेर निकल जाल रे सब गरमा कख देबता रुस्युं चा
जब तिसलु व्है जाली ये धरती कख देबता रुस्युं चा
बस मोरी जालू तब प्राणी कख देबता रुस्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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चिफळि ढुंगी मा.....

जिंदगी यनि लगणि,
बैठ्युं छौं जन मैं,
कब रड़ि जौ,
जन चिफळि ढुंगी मा.....हिंट आप सब्‍यौं का खातिर।

मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा अपणा मन की बात बतावा कुछ लैन कविता की बणैक। गढ़वाळि भाषा का प्रति आपकु प्रेम भी झलकलु अनुभूति का माध्‍यम सी।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 7.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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वरिष्‍ठ गढ़वाळि कवि अर साहित्‍यकार, व्‍यंगकार श्री नरेन्‍द्र कठैत जी की रचना:-

कमीनौं पर चार पंग्ति....

द्वी मनख्यूं कि छ्वीं-बत्वा बीच जै तिसरा मनखी बात होंदि, वू वूंकि नजर मा कमीना होंदू। यां सि यि पता चल्दू कि दुन्या मा हरेक तिसरु मनखी कमीना होंदू। ये हिसाब से त दुन्या मा भला मनखी जादा अर कमीना कम होण चहेणा छा। पर बात स्या नी। दरसल वू तिसरु जु हमारि नजर मा भलू मनखी गिण्ये जांदू , वू बि चुप नी रौंदू। वू वूंकि बुरै, कै हैंका कन्दूड़ू मा भ्वनू रोंदू।

कविवर प्रणाम,

कमीनौं कू ख्‍याल किलै,
आपका मन मा आई,
क्‍या कै कमीनान आपकु मन दुखाई,
कमीनौं की मार सी सबक सिखिक,
हम्‍न सदानि कदम अग्‍नै बढ़ाई,
कमीना त कमीना होन्‍दन,
जौनं सदानि मनख्‍यौं की मवासी,
धार लगाई गाड बगाई.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
मेरा कविमन कू कबलाट
5.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Semwal Bhagat Ram
19 hrs

अलग हुँया हम थैंई, ह्वेगीं साल पन्दरेक /
क्या पाया हमाल ए बीच, गैणै द्या उपलब्धि एक //
कांग्रेस-बीजेपी अदला बदली कै, सरकार बणाणा छीन /
जनता बिचरी तणि-तणि मोरणि, यो ऐश उडाणा छीन //
अलग राज्य लीणू खुणि, कतिग्यूँ ल खून पसीना बोगाया /
नौणा की गुन्दकि कोपणि खाणू, वूँ बिचरूँ ल क्य पाया //
यो कुछ करलो मुछ्याळ ब्वाडा फर, सब्यूँ की नजर टिकी छै /
पर राजनीति का ये खेल म, वे की जड़ काटिगीं वे कै भै //
अरे नेतौ, राजनीतिज्ञों तुम खुणि ता, शरम भी हरचा /
जै कोष लुटणा छवा, जनता को च वो, वे थैं अँक्वेकी खरचा //
बदरी केदार की पावन धरती थैं, किलै बदनाम करणा छवा /
गंगा-जमुना की पावन धरती थैं, डामुल किलै डमणा छवा //
सरकार-जनता मिलि कैकि, कुछ उद्योग धंदा लगान्दा /
त पुटिग्यूँ की खातिर लोग, परदेशूँ किलै जान्दा //
घ्वीड़ थैं त चाँतो प्यारु, वे थैं बगड़ नि सुहान्दा /
ह्वेली क्वी मजबूरी वे कि, जो वो बगड़ूँ छोड़ आन्दा //
अबी भी बिगडु क्या च, अब ता सँभिळि जावा /
बड़ा न सै, छोटा-मोटै कल कारखाना लगावा //
पलायन इनी हूणू रालो त पाड़ ल खाली ह्वे जाणा /
तुमुल तब क्य रिख-बाग-स्याळ अर बन्दुरू की सरकार चलाणा ?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जिम कार्बेट पार्काक् शेर ......

तु दिन भयी
और मैं रात
जब ले मिलां
" उज्याव् " है पड़ौ ।

यो बाट्
कयीं त जालै सही
आपणिं मंजिल
आब् तुयी देख् ।

गाड़
बगनै रुँछ
" संगम "
आफि है जांछ् ।

फटक्
मांरण छ त
जिंदगी में
" ताल " ले बँणौं ।

त्यार्
म्यार् बीच
जमान् जै
कां बटि आ कूँछा ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 सुनील थपल्याल घंजीर

काला न ग्वारा न
लाटा न काला न
ठ्यकम ठ्यका रै ! ठ्यकम ठ्यका रै....
लाठा न मुंगरा
कांडा न दथड़ा
ठ्यकम ठ्यका रे ! ठ्यकम ठ्यका रे....
चुल्ली न सग्वड़ी
भात न धबड़ी
ठ्यकम ठ्यका रे ! ठ्यकम ठ्यका रे....

एक लाजवाब प्रस्तुति एक लंबे इंतजार के बाद ....
कम मगर स्टीक शब्दो मे पहाड़ की विकराल पीड़ा को समेटा और पाठक को शुरू से अंत तक जोड़ने की बेजोड़ क्षमता है आपकी कविता मे...
मै इसे धरोहर भी कह सकता हूं...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Payash Pokhra
January 6, 1980 ·
·

मनिखि मनस्वॉग किळै ??(गज़ल)

ज़िकुड़ि मा लगिं झैळ,
आँख्युं मा आग किळै चा !
म्यारा गाँवां कु वैख,
बण्युं मनस्वॉग किळै चा !!
क्वी जौ-जख्यर्या न,
हथग्वळ्युं थैं क्वी काम !
मनिखि म्यार गाँवां कु,
इतगा निरभाग किळै चा !!
मि त ग्वाया लगाणु रौं,
सौं-समाळिकि गौं-गळ्या मा !
बूण/परदेस भजणा कु,
बस द्वि लतड़ाग किळै चा !!
आँखि उगाड़िक जौंल,
द्यखिन दिन-राति का स्वीणा !
आज युं निसिण्यां आँख्युं मा,
निंद की झपाग किळै चा !!
खैरि-खैड़ा खाले छक्वैकि,
हे ! प्वखड़ा का "पयाश" !
कैळ भि त नि पुछणुं त्वैथैं,
त्यारु इनो ज्वाग किळै चा !!
ज़िकुड़ि मा लगिं झैळ,
आँख्युं मा आग किळै चा !!!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सिकासैर न कैर
गीत ऊंथै ल्यखंण दे
तु ढोल पुजै कैर !
दलेदर दा उवाच.
March 16 ·

१६/०३/१५

बिरंणा बाटा डैर
सैंणा सैन्वरों खैर
सासु ,ब्वारि खुणैं जैर !
इनै का पाड़ी उनै का पाड़ी
भारी भारी कु बैर !

यख श्याम न सुबेर
हथ बेबस फेर भि कुछ कैर
गिच्चा फर म्वाला अर
लत्यांणा छन कि चैर ?

मशाल उंका हथ मा
क्वी काम हूंदो नि ऊंका बगैर
मोरि गे दुनिया कैरी कैरी उंकी
सिकासैर !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Payash Pokhra
March 26 ·

"कु" छे रे !
मि छौं
हाँ ! मि छौं,
ब्वना, मि छौं
पर मि "कु" ?
मि छौं भै मि,
ब्वै का सौं,
मवसौं कु,
कुमवसु छौं,
अर तू ?
तू टक छे,
मि कुटक छौं !
तू नेथ छे,
मि कुनेथ छौं !
तू पत छे,
मि कुपत छौं !
तू गत छे,
मि कुगत छौं !
तू बगत छे,
मि कुबगत छौं !
तू नागर छे,
मि कनागर छौं !
तू जगा छे,
मि कुजगा छौं !
तू सज छे,
मि कुसज छौं !
तू सग्वर्या छे,
मि कुसग्वर्या छौं !
तू सवदि छे,
मि कुसवदि छौं !
तू सल्ली छे,
मि कुसल्ली छौं !
तू नस छे,
मि कुनस छौं !!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Payash Pokhra
March 23 ·

कैबरि-कैबरि भुयां भि नज़र भारे !!

द झणि किलै, क्यांकु इतगा तिड़्याण भुल्ला !
पैलि नि देखि कै फर इतगा टिमट्याण भुल्ला !!
पखुली, कमळि, खंतिड़ि फुक्कै गीं बड़ि-बड़ी मौ की !
पर तेरि नकप्वड़ि ल नि सूंघी कुतर्याण
भुल्ला !!
ललंगि चिफ़ळपट्ट नै-नै दाणी लय्या
की !
क्वळ्हड़ू रिटदंरों थैं पूछ कन लगांद पिर्याण भुल्ला !!
द क्य ब्वन त्यारा लटुलों की झट्टाक
कु !
जर-जरा मिथैं भि इनै आणि च किर्याण भुल्ला !!
अब त क्वलण-कुमच्यरों जाणा कु ढब कै मा रै ग्याई !
अब त्वी बतौ कनै बटेकि आणि चिर्याण भुल्ला !!
ल्हे दे कै पितर्वड़ा की यकुलि पक्वड़ि बचिं चा !
कै-कै थैं जि दीण अर को-को जि तिर्याण भुल्ला !!
अजकाल त कौंणि दगड़ झुंगरु मंडणा कु रिवाज़ चा !
कैल भि कनक्वै इकै दाणि कै कि बिर्राण
भुल्ला !!
कीसा भ्वर-भिवरिक लैची-चाणा बंटणा कु जमनु ग्याई !
अब त सिपै दादा ल दारु सर्या गौं मा पुर्याण भुल्ला !!
नाक-मुक फर गलाबन्द भलि कै रसकै दे रे लाटा !
हाँ, अब त अपणा-पर्या फर भि आणि सड़्यांण भुल्ला !!

 

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