कुमाउँनी साहित्त्य-जगत में शेरसिंह बिष्ट "अनपढ़" (शेरदा अनपढ़) ज्यू शिरमौर छीं। उनर स्थान अद्वितीय छी। उनर योगदान कें कभणी नै भुली जै सकीन। उनूकें याद करते हुए "पहरू" मई 2015 अंक में ग्राम-माट (डीनापानी) जि. अल्मोड़ा निवासी श्री सुंदर सिंह मेहता ज्यूक द्वारा व्यक्त करियाँ उद्गार "शेरदाकि नरै" शीर्षकल लेखीं कविता में कुछ यो परकारल छैं-
"घुङुर जाँठिक बजूनै हो, शेरदा लै चणी गाय।
सुणौ जब निधन उनर, सबै जाणी रणी गाय।
हँसूणै बहार छि उ, धत्यूण में लै अघिल छी।
अबूदक बखत में लै, शेरदा भौतै रंगिल छी।
बरस दिन है गो नसी, फिरि लै उसी तुमरि नरै।
नेफा-लद्दाख कहानि, ऐल आँखों सामणि ऐरै।
कुमूँक कालिदास तुम, याँक लिजी बणी भाय।
सुणौ जब निधन उनर, सबै जाणी रणी गाय।....."