Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515427 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सोरयाली में एक मतला व शेर ---------------

हुक्का तमाक पानी बहुते याद ऊछी
नानि रात ठुली कहानी बहुते याद ऊछी

राते छाकाला ब्याल जतारा में पीसी रूथी
हमरी भूख इजा की परानी बहुते याद ऊछी

गुमनाम पिथौरागढ़ी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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"ओ इज" कूण में जो भाव ऊनी,
"माई मदर" में ऊ भाव काँ छ।
अंग्रेजी बोलौ, उर्दू बोलौ,
दुदबोलि में जो रूंछौ मिठास,
अमृत में ले मिठास काँ छौ?
लखनऊ बसौ, बम्बई बसौ,
ये बात कैं तुम कभै नि भूलौ,
परदेश को स्वर्ग ले छौ कुलाड़ो।
आपण देइ को कुकुर लाड़ो॥
("पहरू" अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित नरेन्द्र नाथ पंत ज्यू कि कविता)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमाउँनी साहित्त्य-जगत में शेरसिंह बिष्ट "अनपढ़" (शेरदा अनपढ़) ज्यू शिरमौर छीं। उनर स्थान अद्वितीय छी। उनर योगदान कें कभणी नै भुली जै सकीन। उनूकें याद करते हुए "पहरू" मई 2015 अंक में ग्राम-माट (डीनापानी) जि. अल्मोड़ा निवासी श्री सुंदर सिंह मेहता ज्यूक द्वारा व्यक्त करियाँ उद्गार "शेरदाकि नरै" शीर्षकल लेखीं कविता में कुछ यो परकारल छैं-
"घुङुर जाँठिक बजूनै हो, शेरदा लै चणी गाय।
सुणौ जब निधन उनर, सबै जाणी रणी गाय।
हँसूणै बहार छि उ, धत्यूण में लै अघिल छी।
अबूदक बखत में लै, शेरदा भौतै रंगिल छी।
बरस दिन है गो नसी, फिरि लै उसी तुमरि नरै।
नेफा-लद्दाख कहानि, ऐल आँखों सामणि ऐरै।
कुमूँक कालिदास तुम, याँक लिजी बणी भाय।
सुणौ जब निधन उनर, सबै जाणी रणी गाय।....."

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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यीं कुडी क मौ दीदों
दिल्ली बंबई चलगेन
छानी पटली बेची
गोर कसयूं तै देगेन
हपार नीमदरी द्याखो
कन बीरान हुयीं च
लर भैर सुखांण छोडीक
अफु बंबई बसीं च
द्वार मोर अधखुली छोडी
जंदरी टवटकां पडीं च
देवी दयवतों क आल पर कन
मकडजली लगीं च
गौर से द्याखो कुडी दीदों
धै लगांणी च
उरख्यली गंज्यली मेरी
दीदी भूल्युं तै खुज्यांणी च
यीं कुडी क मौ दीदो.
दिल्ली बंबई चलगेन...
कल्चवंणी की तौली
बारह दुंण की दबली
छंचल्या अर पर्या
दही की डखुली हर्ची ग्यायी
यीं कुडी क मौ दीदों
दिल्ली बंबई.........
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)फोटो साभार प्रदीप बिष्ट जी भडेत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुरच्याट देखी क लगणां यन
दुनिया यै ग्या जन दिल्ली मा
मैट्रो की सौल दुंली आज
मीन भी देख्याल दिल्ली मां
राजीव चौक बिटी
भितरी भितर
कखन कख
पौंछी ग्यो मी दिल्ली मा
कुरच्याट देखी क लगंणा यन
दुनिया यै ग्या जन दिल्ली मा
मैट्रो की भीड मा
सीट मिली
जन संजीवनी बुटी
मिली ग्या दिल्ली मा
अफु चलदी सीढी
रिंग यैगै देखी दिल्ली मा
कुरच्याट देखी लगणा यन
दुनिया यै ग्या......
रात मा भी घाम जन
लग्युं ह्वा यीं दिल्ली मा
कबरी स्यांद हंवाल भग्यान लोग
यी डयबलपमेंट दिल्ली मा
सुबेर बिटी ब्याखन तक
रिटदी रै ग्यों दिल्ली मा
सौल सी कन घिर्यों
भितरी भितर दिल्ली मां
कुरच्याट देखी क लगणा यन
दुनिया यैग्या जन......
लिख्वार@सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता नं-28
___________

जन बगुला कि नज़र माछों फर्
बिराला कि नज़र बस मूसों फर्
जन कुकरा कि नज़र हडगों फर्
कांणा कि नज़र रोटि का टुकड़ों फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन गुर्रा कि नज़र बिचरा मिंढकों फर्
छिप्वड़ा कि नज़र कीड़ा-मकड़ों फर्
जन सौला कि नज़र मुंगर्र्यट्ट फर्
स्याला कि नज़र कुल कुखड्यट्ट फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन बाघा कि नज़र चरदु बखरु फर्
गरुड़ा कि नज़र म्वरयुं-मुर्र्युं ढाँगु फर्
जन रिक्का कि नज़र रिक्वाल फर्
सुंगरा कि नज़र कुल ग़िज़ार फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन भूखा कि नज़र एक गफ्फ़ा फर्
बंण्यां कि नज़र बस अपुड़ नफ्फ़ा फर्
जन दरोल्या कि नज़र मुर्गा कि टांग फर्
बांमणा कि नज़र सिर्री अर् रांन फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन सासुकि नज़र ब्वारि कु फैशन फर्
नौंना कि नज़र माता जि कि पेंशन फर्
जन ब्वारि कि नज़र मैता कि खबरों फर्
नात्यों कि नज़र चॉकलेट कुरकुरों फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

नोट:- इस कविता का दादरी कांड (U.P.) से कोई सम्बन्ध नहीं है।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत
ग्राम- सुन्दरखाल, ब्लॉक- बीरोंखाल
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.

05.10.2015

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उत्तराखंड मेरा

उत्तराखंड मेरा उत्तराखंड मेरा
अभिमान मेरा स्वाभिमान मेरा

कुमाऊंनी-गढ़वाली भाषा मेरी
मस्तक पर देश के प्रेम की वो रेखा

हिमालय पहाड़ों की ये श्रेणीयाँ
पहाड़ी सीने में बजती है वो वीणा

पराक्रम की ये भूमि मेरी
शूरवीर की नहीं है यंहा कमी

माधव भंड़री का इतिहास बोलता है
चन्द्रसिंह गढ़वाली चंदा बन डोलता है

सुनते हैं रमी बहूरानी की हम गाथा
कितने सर झुकते हैं बद्री-केदार के द्वार

जाती धर्म यंहा पर अनेक हैं
रहते हैं बन के सदा हम एक यंहा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

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दूर यंहा इस परदेश में

दूर यंहा इस परदेश में
चल आज तुझे अपनों से मिला दूँ
बैठे बैठे आज तुझे मैं
अपने देश पहाड़ से मिला दूँ

मेरे शब्द तब तृप्त होंगे
आँसूं तुम्हारे इन पर जब दिल से बहेंगे
सुनते रहना और सुख पाना
बीते पल जब तुम्हें आ के मिलेंगे

बीच बीच में तुम अब हंस भी लेना
इतना सुन्दर गहना तुम यूँ ना खोना
बनाया खिलाया है इसे अपने पहाड़े ने
प्रति रूप हो बस तुम उस दर्पण के

अंतिम पंक्ति में बस इतना कहना है
सोच तुमने क्या दिया है बस लिया है
देने की भावना जब तक ना जागेगी
व्यर्थ मेरा लिखना तुम्हरा सुनना है

दूर यंहा इस परदेश में ...............

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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मायादार अपणा सुवा देखी देवी दर्शन भि कर सक्दन यनु प्रयोग मेरी कलम बिटि ऐसु का नौराता मा यी रचना मेरी सब्भी मायादारो तै समर्पित चा
देवीकु रूप साकछात भगबती स्वरुप
मनखीयों मा त नि देखी इन्न नौनी
द्यब्तो का मुल्क बिटि ऐ होली स्या छोरी
दरशन विका रूप देखी होदन
सब्भी नौ देवियों का
कभि दिख्दी विका रूप मा शैलपुत्री
कभि दिख्दी विका रूप मा बरमचारणी
कभि दिख्दी विका रूप मा कुस्कमंडका
कभि दिख्दी विका रूप मा स्कंदमाता
कभि दिख्दी विका रूप मा कत्यानी
कभि दिख्दी विका रूप मा कालरात्रि
कभि दिख्दी विका रूप मा महागौरी
कभि दिख्दी विका रूप मा सिद्धधातरी
इन्ना रूपवान गौरा तै
कु शिब होलू दुनि मा
भग्यान छन जौका घौर जल्मी
देबी कु यनु रूप ...................................... शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो”िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे”ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.

 

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