भाई ओंकार नेगी जी की रचना.....
कन बिसरि्या हम,
वू कौथिग वा बग्वाळ,
जब करदा छा हम,
पुंगड़ियों मा बैठी जग्वाळ....
रचना पढिक मेरा कविमन कू कबलाट.....
कबरि होन्दि थै,
हमारा मुल्क मा,
रौनक अर बग्वाळ,
आज त होयिं छ,
मनख्यौं की जग्वाळ...
जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 23.9.2015