Garhwali Poems by Dr.Pritam Apachhyan
डा . प्रीतम अप्छ्याण कि 45 गढवाली कविताएँ
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-160 Literature Historian: Bhishma Kukreti
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१०१
गजब कर्याले लाला जी, टूटि नि बर्खै धार
भैर भितर बी कन कै जौं, लुतपुत ह्वेगे सुलार
(मौसम ने गजब कर दिया लाला जी, बारिश की धार नहीं टूटी है. अब अंदर बाहर जाना भी मुश्किल हो गया, सुलार पजामा भीग कर लुतपुत हो गया है)
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१०२
गुरौ सि सळ्के उमर मेरी, द्यो जनु बदळे रूप
ज्वानि चौमास्या घाम सी, जीवन चीणा सि झूंप
(मेरी उम्र सांप जैसी सरसराती निकल गई और आसमान के मिजाज सा रूप बदलता रहा. यौवन तो बरसात की धूप जैसा अल्प था. पूरा जीवन ही चीणा (झंगोरे जैसा एक अनाज) की बाल सा लटकता ही रहा)
१०३
कखड़ी झ्यालों गैणि छा, राळि करौ द्वी चार
ग्वेर छुळदुमी चोरि खै, देखि नि बार तिवार
(ककड़ी की बेलों पर दो चार छोटे फूल (करौ या मादा पुष्प) गिने थे. बड़ी उम्मीद थी कि ये बड़े होंगे पर नटखट ग्वालों ने पहले ही, चोरी से खा दिए, बार त्योहारों का ध्यान भी नहीं रखा)
१०४
तीड़ि कपाळ जमीन बी, रुसै छयो जब घाम
रगड़ बगड़ अब मेघों की, पाणि का ऐड़ा डाम
(उस वक्त जब सूरज गुस्साया था तो प्राणियों के सर व भूमि तक फटने लगी थी. अब बादलों के गुस्से ने तोड़फोड़ मचाई है. पानी के ठंडे डाम(धातु से शरीर को दागना जो सामान्यत: गर्म होता है) से जीवन दागा जा रहा है. हे ईश्वर ऐसा क्यों?)
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१०५
च्यापति चीनी मांगि की, च्याइ बणौंदो साब
कख बिटि आलो दूध पर, गौं कमचूस खराब
(साहब लोगो आप आए, स्वागत है. चायपत्ती और चीनी मांग कर आपके लिए चाय तो बना देता पर...क्या करूं साहब! दूध कहां से लाऊं? आप नहीं जानते कि यह गाँव बड़ा खराब व कंजूस है. अब आप ही कहिए चाय कैसे पिलाऊं? (इस रूपक में साहब वोटर हैं, कंजूस विपक्ष है और कहने वाला सरकार है))
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१०६
मन्खि बड़ो विद्वान बल, खड़ु ह्वे चैन न लेटि
दैजा मा फुक्दो ब्वारि तैं, गर्भ गळौंदो बेटि
(सुना है कि मनुष्य बड़ा विद्वान होता है पर लगता नहीं. उसे तो किसी तरह चैन नहीं, न खड़े होकर न लेटकर. ऐसा आदमी खाक विद्वान है जो दहेज में बहू को जला देता है और गर्भ में बेटियों को गला देता है?(यहां आदमी माने स्त्री-पुरुष दोनों हैं जो ऐसा करते हैं))
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१०७
जब भी देखा व्यस्त छ, तेरो मुबाइल फोन
गळाकंठी कू क्वोच वो, बतौ त झर्क नि रौन
(जब भी देखता हूं, तेरा मोबाइल हमेशा व्यस्त रहता है. तेरा ऐसा गले का हार वह है कौन? एक बार उसके बारे में बता दे तो भ्रम-शक सब दूर हो जाएं, झर्क मिट जाए)
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१०८
उमर ढळकणी ब्वौल धौं, सच तेरि मंशा क्याच
कैकि जग्वाळ्या बैठिं छ, बाळि माया को ल्याज
(हे रूपसी! उम्र ढलने लगी है, सच सच बता तेरी मंशा क्या है? बचपन के प्रेम का लिहाज करके तू किसके इंतजार में बैठी है?)
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१०९
झौड़ बर्खा की धीड़ु का, अब ह्वे चिटमिट सर्ग
शाळि पंदेरा दनकणा, मिटी आज का झर्क
(सुबह से लगातार बारिश की झड़ियों के झड़ पड़े पर अभी आसमान जरा चिटमिट होकर थमा है. इसी बीच दौड़ दौड़कर फटाफट सब लोग गौशाला व पानी के धारों का काम निबटा आए. अब आज के सारे झर्क (चिंताएं) मिट गए हैं)
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११०
अपणी डिनर पार्ट्युं मा, मैकडॉवल का पैक
पेण त प्या या भाड़म् जा, तुम डेनिस का लैख
(सरकार ने गजब कर दिया है बोडा, अपनी डिनर पार्टियों व होटलों में तो इनके मैकडॉवल के पैक चलते हैं. हमें कह रहे हैं कि तुम लोग (माने जनता) डेनिस के लायक ही हो, पीना हो तो पियो वर्ना भाड़ में जाओ. ये भी कोई बात हुई.....
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१११
जल थल नभ चर अचर अब, प्रभू! त्यारै सार
मंशा सबुकी पूरि हो, तरि जौ सब संसार
(हे बाबा केदार! जल, थल, आकाश में रहने वाले सभी चर व अचर अब तुम्हारे ही भरोसे हैं, तुम्हारे ही सहारे जीते हैं. सबकी मनोकामना पूर्ण हो और यह संसार तर जाए, यही कामना है)
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११२
दिवा प्रेम को झपझप, कन कै ठोसूं गुल्ल
प्रभू! हर ले डर पिड़ा, जरा हैंसण दे मुल्ल
(प्रेम का दिया तो रात दिन झपझप कर रहा है, अब बुझा कि तब बुझा. उस दिए का गुल्ल (कार्बन) भी कैसे हिलाऊं? हे भगवन! मन से डर और पीड़ा को हर लीजिए तो थोड़ा सा मैं भी मुस्कुरा लूंगा)
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११३
परसि हैंसि ब्याळी बच्यै, आज घुस्ये की काख
भोळ कुजाण लबारुं को, ज्यान बचै की राख
(परसों हँसी थी, कल बात की और आज सरक सरक कर बगल में बैठ गई है. हे सीधे सरल नायक! कल को ये लबार (बेशर्म) क्या करेंगी, पता नहीं. इसलिए तू संभल जा और अपनी जान बचा कर रख)
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११४
जब बिटि नेता ह्वे दिदा, बौजी दूण च शिफ्ट
पितरकूड़ि तैं मीलिग्या, सगत ताळा कू गिफ्ट
(जी हां साहब! यह सच है कि जिस दिन से बड़े भाई नेता हुए हैं, उसी दिन से भाभीजी देहरादून शिफ्ट हो गई हैं. बाल बच्चों सहित सब वहीं चले गए. वहां से गांव के पित्रगृह को मिला है - एक बड़े ताले का उपहार)
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११५
वी छ तु पैली दां वळो, बोडी रखणू ख्याल
बांदर सूंगर भगौ निथर, ऐंसू फोड़लु कपाळ
(ओहो! अरे बेटा नेता! तू वही है ना पिछली बार वाला. तब तो बड़ी बड़ी हांक रहा था. बोडी (ताई जी) मेरा खयाल जरूर रखना, मैं सारे कष्ट दूर कर दूंगा. पर तू कान खोल के सुन ले! इन बंदरों व सूअरों को यहां से भगा वर्ना इस बार के चुनाव में मैं तेरा सर तोड़ दूंगी (कतई वोट नहीं दूंगी))
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११६
कळ्त कळ्त कतोळिगे, प्रेम कु पाणि पराण
ज्वानि जुटाये जोति ज्यू, जीति जगत क्या लाण
(मन, प्रेम के जल को कळ्त कळ्त (हाथों से पानी हिलाने की ध्वनि) हिला गया. इस जीवन में यौवन जुटाकर, प्राण रूपी बैलों को जोतकर सारा संसार जीत लिया. अब इन बातों को कहां तक बताऊं!)
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११७
दलबदलूं बिस्वास्युं का, टकम भर्यां छन पेट
वोट का ऐंसू ब्वाला दिदा, क्या हूण चैंदा रेट
(इस राज्य में दलबदलुओं और विश्वास देने वालों (१८ मार्च के बाद), दोनों के पेट (जेब) खांच खांच कर भर गए हैं. दाज्यू! आप बताओ, इस बार "वोट" के रेट (जैसे फ्लोर टेस्ट के थे) क्या होने चाहिए? फ्री में देकर कोई फायदा है क्या......)
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११८
अंताज्यूं छौ तेरो मी, या फिर ह्वे संजोग
आणिकारि की छ्वीं किलै, लाणा गौं का लोग
(तुमने मुझे पहले से अंदाजा (ताड़ कर रखा) था या फिर हमारा मिलना मात्र संयोग की बात थी? ये गांव के लोग इस तरह की अनहोनी बातें क्यों सुना रहे हैं?)
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११९
ज्यूड़ा तोड़ि की मुचि गयां, कनकै ठेकेला बागि
अजक्यालूं गळाकंठि छन, कुर्च्यूं गुसैं नि जागि
(हरी भरी सार (सत्ता भी हो सकती है) देखकर 'बागी' यानि भैंसे अपनी रस्सियां तोड़कर भाग रहे हैं. ये बिना नकेल के किस प्रकार रोके जाएंगे? आजकल ये किसी के (पार्टी भी संभव) गले के हार बने हैं पर....पिछला मालिक (सत्ताधीश भी संभव) बेचारा इनकी मनमानी मार से अभी तक उबर नहीं पाया है)
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१२०
टुप्प बुरांसी फूलों मा, छ्युंतमेल्यों का बीच
उड़े गगन बगि छीड़ौं मा, बचपन जनु क्वी नी च
(कभी बुरांस के फूलों में, तो कभी चीड़ के बीज(दाम या ग्वदाम) खोजने में लगा रहता है. कभी उड़कर गगनमंडल पहुंच जाता है तो कभी ऊंचे झरनों में बहने लगता है. अहा! मेरे बचपन तेरे जैसा कोई नहीं, कोई नहीं!)
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१२१
आँखि मिलै की आँखि ढकी, बौग सरैगे आँखि
कळछणि वा छ्वीं पुछदरी, रयीं च सौदी आँखि
(आँखें मिला कर फिर ढक दी और फिर उन्हीं आँखों ने किनारा कर लिया. फिर भी घनी काली व तमाम बातों को पूछने वाली वे आँखे, अभी भी एकदम ताजी ताजी हैं)
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१२२
डांड गंगाड़ों धार धरूं, मन मन मा हो प्रीत
खेल बच्यां रौ नौनु का, अर होठूं का गीत
(पर्वतों व गंगाघाटियों में, कहीं भी हों, हर मन में प्रेम व अपनत्व हो. बच्चों के खेल कौतुक जिन्दा रहें व प्रत्येक होठों पर गीत थिरकते रहें. ईश्वर से ऐसी ही कामना करता हूं.)
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१२३
जीवन की ईं चक्कि मा, मिन पीसे दिन रात
ल्वे छौंकी की दाळ अर, आँसु उमाळी भात
(जीवन की इस चक्की में मैंने दिनों व रातों को बारीक करके पीसा है. यह आटा दिन-रातों से बना है. यहां तक कि खून का छौंक लगाकर दाल बनाई है और आँसूं उबाल उबाल कर भात पकाना पड़ा है. )
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१२४
गोरो रंग तू ऐंठि ना, उदास ना हो काळु
चाम का चारै दिन होंदा, गुण बीजांदो उज्याळु
(हे गोरा रंग! तू अधिक घमंड मत कर और हे काले, तू इतना उदास मत हो. चमड़ी का रंग चार ही दिन रहता है प्यारे, चमकदार उजाले को तो गुण ही जगाते हैं और संसार में उगाते हैं)
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१२५
बर्त का दिन दे गयां सबी, अल्लु गोभि की ढेरि
जै दिन भूकन् कबलायूं, वे दिन कैन नि हेरि
(समय की कैसी बलिहारी है कि जिस दिन मेरा व्रत था, उस दिन सभी लोग मुझे आलू-गोभी (खाने की) ढेरियां थमा गए. जिस दिन में भूख से बिलबिलाता रहा, उस दिन कोई देखने तक नहीं आया)
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गढ़वाळि भाषा कि बधाणि अन्वार देखा शैबो......
ठिक्क कै रे द्याळ अैगा
दिल्लि मु बल घ्याळ ह्वेगा
का च मिलणी नौकरी आब
भान मज्यैकी काळ ह्वेगा
ह्वेइ जौलौ कुछ न कुछ ता
पुंगाडा मेनत वाळ ह्वेगा
च्या पकोला भुजि उगोला
गोर भल दुद्याळ ह्वेगा
छ: मौऊ जमीन कुछ नी
किलै हाम देश्वाळ ह्वेगा
गंगसार्या बौ भल किसाण
बाल बच्चूं वाळ ह्वेगा
भात माछौं ह्वोटल चल
मछरदैनी जाळ ह्वेगा
ताबै हामूं घ्यप्सु ब्वना
गौं मा बस डुट्याळ रैगा
(C) डॉ. प्रीतम अपछ्यांण
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१२६
भलु करि दगड़्या त्वैन बी, टोड़ि हमारी आस
कोरि कोरि की खायो मी, जाणी चलमलो गास
(अच्छा किया ऐ दोस्त, हमारी आशाओं को नष्ट करके तुमने अच्छा किया. तुमने मुझे स्वादिष्ट ग्रास समझ कर, खोद खोद कर खाया, अच्छा किया)
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१२७
लोग ब्वदिन तौं कांठौं मा, अंछर्यों को बल नाच
सासु मैंस की फूकिं क्वी, ताल डुबाईं क्वा च
(लोग तो बहुतेरे कहते रहते हैं कि उन पर्वतों में बल, वन परियां नाचती रहती हैं. पर मुझे लगता है पता नहीं बेचारी कौन होंगी? सास-पति द्वारा जलाई गई या गंगा-तालों में डुबाई गई कोई अभागन!!!)
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१२८
झौड़ सकणसट्ट ज्वानि मा, बर्खिनि भादो सौण
धीत ले माया फेर कबी, ईं ज्वानीन् नि औण
(यौवन में जबरदस्त झड़ी पड़ी तो लगा कि सारे सावन भादो बरस पड़े हैं. मित्र! इस प्रेम को तृप्त होकर पी लो, इस यौवन ने फिर दुबारा नहीं आना है..)
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१२९
लप्प लप्प लपल्याण लग्या, टिगट पाण कू जूंक
मिन त जाण विधानसभा, तू अपणो घर फूंक
(वैसे ही चौमास लगा है, और वैसे ही टिकट पाने की मारामारी में जोंक लपलपाने लगी हैं. सबकी एक ही इच्छा है, मैं तो विधानसभा जाऊंगा और तुम अपना घर फूंक कर भी मुझे पहुंचाओगे)
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१३०
म्यारा उत्तराखंड त्वे, हाईकमाना जौर
अब्बि नि छोड़्या त्वैन इ, कखी नि मिलणी ठौर
(हे मेरे उत्तराखंड! तुझे हाईकमान रूपी बुखार चढ़ गया है. बिना हाईकमान के ऑर्डर के तू सांस भी नहीं ले पा रहा है. यदि तूने अभी भी ये हाईकमान वाले नहीं छोड़े, तो समझ ले कहीं ठौर ठिकाना नहीं मिलने वाला है)
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आजादी
लोक की वाणी में चिंता भी, गुस्सा भी, धाद भी...
अब त ख्वलणै पोड़ाला गिचों का ताळा
अब त ख्वजणै पोड़ाला कुछ उज्याळा
ईं काणी अजादी मा ईं ल्वेलिती व्यवस्था मा
गुजारु नी, न आज न भोळ
गरीब गुरबौं कि मवासि गोळ....
भांति भांति की रीत भांति का लोग
हम मिलि जुली क रौंदा त छा
भांति भांति का डाळा भांति का फूल
यख, चटकिला खिलौंदा त छा
मिलिजुली अजादि पाई पर गुलाम हथूं देद्याई
अब त करणै पोड़ालो कुछ उयार
अब त बगौणै पोड़ली नै बयार
ईं काणी अजादी मा.......
बनबनी का बौण बनबनी को पाणि
चुचौ, भलि सांजोळ गंगा जि छै
बनबनी की थाति जाति बंडि रिवाज
लोग, भली धाण पाण धंधा भि छै
ल्वे बगै गरदन कटै पर देश अब यु देश नि रै
अब त म्यळौणै पोड़ालो फेर मेळाग
अब त पुजौणै पोड़ाली नै नवाण
ईं काणी अजादी मा........
डॉ. प्रीतम अपछ्यांण, दूनागिरी, अल्मोड़ा
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१३१
धर्ति हिमालै थामि द्यूं, उड़दी बग्दि बयाळ
थामि नि साकू पर कबी, जरा सि मनौ उमाळ
(मैं संपूर्ण धरती, हिमालय व यहां तक कि उड़ते व बहते बयाळों व हवाओं तक को पकड़ सकता हूं. पर कभी भी यदि किसी को नहीं रोक सका, बस में नहीं रख सका तो वह मेरे 'मन की भावनाएं' थी. मन रोकने पर भी नहीं रोक सका)
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१३२
नेता जीतणा घमाघम, हाय! हारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशा, क्वो सुलझालो मेस
(इस प्रदेश व देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हाय! देश व जनता हारती जा रही है. ऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगी? कौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३२
नेता जीतणा घमाघम, हाय! हारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशा, क्वो सुलझालो मेस
(इस प्रदेश व देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हाय! देश व जनता हारती जा रही है. ऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगी? कौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३३
मंत्री रुप्या पद गनर, त्वे क्या चैंद तु बोल
त्वी छ म्यारू पाड़ि भुला, थाम सत्ता कू घोल
(मंत्री बना दूं, रुपये, मालदार विभाग, गनर, घोड़ा, बंगला, तू बोल तो सही जो मांगेगा दे दूंगा. तू मेरा प्रिय पहाड़ी भुला है, हे विधायक जी बस मेरी सत्ता के घोंसले को पकड़ कर रखना.)
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१३४
बेटि ह्वयां को हर्ष चा, दिशा खुलीगे प्यारि
दैणि हुये माँ नंदा तू, सुखि रख बेटी ब्वारि
(बेटी होने का यह कितना महान सुख है कि सारी दिशाएं खुल गई है. जिनकी बेटी नहीं, उनके लिए सारी दिशाएं बंद हो जाती हैं. हे माता नंदा! तुम हमेशा इनके दाहिने रहकर सभी बेटी-बहुओं को सुखी रखना)
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१३५
राजनीति का पर्दा यी, नकटा हूंदन भारि
यकी डोर मा कस्यां भितर, भैर चुटौंदन गारि
(ये राजनीति के 'पर्दे' बहुत ही बेशरम व नकटे होते हैं. अन्दर ही अन्दर ये एक ही डोरी से कसे होते हैं पर बाहर जनता के लिए पत्थर बरसाते रहते हैं.
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१३६
कैका गिचों पर ताळु नी, कैका कच्छों पर नाड़ु
चुनौ भ्याळ यूं लमडै दे, चौबटा खड्यो गिंदाड़ु
(इस राज्य में कमाल के नमूने हैं. किसी के मुंह पर ताला नहीं, जो मर्जी वही कह दे रहे हैं. किसी के कच्छों पर नाड़ा नहीं है (पाठक समझ रहे होंगे). हे राज्य के वोटर! इस बार इनको चुनाव की घाटी में लुढ़का दे व इनके नाम पर चौराहे में छल पूजने का 'गिंदाड़ू' गाढ़ दे)
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१३७
राजा त्यरा बी चार दिन, कर ल्हे लाठीचार्ज
आलो गरीबूं घत्त बी, वे दिन द्यूंला रिचार्ज
(अरे आजकल के राजा! तेरे भी चार दिन अच्छे चल रहे हैं. कर ले, जिस पर मर्जी लाठीचार्ज करवा ले पर....ध्यान रखना, हम गरीबों का भी समय आयेगा. उसी वोट के दिन तुझे भी रिचार्ज कूपन (

) थमा देंगे)
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१३८
मैंन गंछ्याये गीत यू, मैंन मिसाये भौण
पर ल्हीजा गैल्याणी तू, माणी मेरि समळौण
(हे साथी! यह गीत मैंने बनाया और इसकी धुन भी मैंने ही बनाई. पर तुम इसे ले जाओ. मेरी ओर से तुम्हारे लिए यही यादगार निशानी है)
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१३९
सूनु पैरै की भूलिगे, चांदि पैराईं याद
प्रेमै अर्जी पौंछि कब, झैर घुट्यां का बाद
(यह भी क्या अजब संसार है जहां आदमी उसे भूल जाता है, जिसे सोना पहनाया (विवाहिता) परंतु उसे याद करता है जिसे चाँदी पहनाई (बिना विवाह वाली स्त्री). निर्मोही पुरुष ऐसा कि प्रेम करने भी तब पहुंचा जब जहर निगला जा चुका था)
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१४०
मान कि रक्षा कर्द गै, आजीवन श्रीराम
रूंदौं हैंसाणू कृष्ण रे, जीवन भर निफराम
(श्रीराम आजीवन मान व मर्यादा की रक्षा करते रहे. अपने जीवन से उन्होंने मर्यादा का मानक बनाया और पूरी उम्रभर कृष्ण रोते हुओं को, अत्याचारों से पीड़ित लोगों को हँसाते रहे. ये दोनों हमें जीवन विद्या सिखाने वाले थे.)
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१४१
बर्खा बूंदौं थामि की, पौंछि जि क्वो असमान
मन्खि मरे धरती अमर, कनि माया भगवान
(बारिश की बूंदों को पकड़कर कौन कभी अासमान में चढ़ सका है? यह सब तो ईश्वर की माया है कि उसने कैसी कैसी अद्भुुत रचनाएं की हैं. यही कम अचरज है कि मनुष्य आते व जाते रहते हैं पर धरती अमर रहती है!)
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१४२
राजि रखी नारैण रे, तैं बाँदौ तकधीर
तनि कबि कनि रै छै अहा, मेरि बुढ़ळी तस्वीर
(हे नारायण! उस सुन्दरी के सुखों व भाग्य को कुशल मंगल रखना. एेसी ही तस्वीर कभी, अहा, मेरी बुढ़िया की भी थी पर....)
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१४३
सैणि मैंस की अड़ादड़ी, नौना पुळपुळ रोंद
गर्ब भकोर्दो ज्यान अर, रीस मवासी खोंद
(पति और पत्नी के कलह में सारा दुःख बच्चों को भुगतना पड़ता है. वे हमेशा मन ही मन रोते रहते हैं. इसीलिए विद्वान लोग कह गए हैं कि घमंड व अहंकार प्राणों को खाता है तथा क्रोध अपने ही कुल का विनाश करता है)
Copyright @ Pritam Apachhyan ; 2016
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