Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 589218 times)

Bhishma Kukreti

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Mutthi Boti ke Rakh: Poetry Collection by Narendra Singh Negi
 
        इन्द्रेश मैखुरी
( Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-95)
 Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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 नरेंद्र सिंह नेगी  गढ़वाली गीत-संगीत के अप्रतिम रचनाकार हैं। वह गायक हैं, गीतकार हैं, संगीतकार हैं और कवि भी हैं। पिछले चालीस वर्षों से निरंतर उत्तराखंडी गीत-संगीत में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वह एक व्यावसायिक कलाकार हैं पर उनकी व्यावसायिकता उनके जनसरोकारों पर हावी नहीं है। पहाड़ी जीवन का लगभग हर रंग उनके गीतों में दिखता है। सुबह होने से लेकर शाम होने तक बारिश से लेकर बाघ के आतंक तक का पहाड़ का हर रंग नेगी के गीतों में दर्ज है।
सूर्योदय के दृश्य का वर्णन करता हुआ उनका गीत है :
चम्, चम् चम्, चम्, चम्, चमकी घाम कांठ्यों मां, हिंवाली कांठी चांदी की बणीगैनी,
ठंडो-मठू चढ़ी घाम फूलों की पाख्यों मा, लगी कुथ्ग्यली तौं कि नांगी काख्यों मा
खित्त हैंसिनी फूल डाळ्यों मा, भौंरा-पोतला रंगमत्त बणीगैनी,
डांडी-कांठी बिजाली पौंछी घाम गौं मा, सुनिंद पोड़ीं छै बेटी-ब्वारी ड्यरों मा,
झम झौल लगी आंख्यों मा, मायादार आंख्यों का सुपिन्या उड़ी गैनी

(चम, चम, चम चमकी धूप पहाड़ों पर /बर्फ से लकदक पहाडिय़ां चांदी जैसी हो गईं/धीरे-धीरे धूप फूलों से भरे पहाड़ी ढाल पर चढ़ी, फूलों के नंगे बदन पर धूप ने गुदगुदी की/ फूल खिलखिला कर हंस पड़े और भौंरे-पतंगे उन्मत्त हो गए, पहाड़ी चोटियों को जगा कर धूप पहुंची गांव में, बहु-बेटियां गहरी नींद में सोयी थीं जहां घरों में/ धूप की आंच आंखों में पड़ी और उनकी प्रेम भरी आंखों के सपने उड़ गए।)

पहाड़ में शाम होने का नजारा नरेंद्र सिंह नेगी के यहां ऐसा है :

डांडा-धारूं मां घाम अछे गे, पोंछी कुजाणी कै दूर मुलुक
पोड़े रुमुक,
गोर-गौचरू का घर बौड़ा ह्वेनी, पंछी अगासू का घोलू पैटीनी,
ऊज्याला अड़ेथी आई अंध्यारु, चोर बिराली सी सूर-सुरुक
बौण लखड़वैनी-घसेनी रगर्यांदा, हे दीदी-हे भूली झट काटा-बांधा,
उनी दूध्या नौनियाल, सासू रिसाड़, जिकुड़ी मां येडिय़ों की धूक-धूक
पोड़े रुमुक

(पहाड़ी चोटियों और ढलानों पर ढली धूप, जाने वो किस दूर के मुल्क पहुंच गई/सांझ ढल गई/ गौचरों में चरने गए पशु घर लौट रहे हैं, आकाश में उड़ते पंछी भी घोसलों में पहुंचने की तैयारी में हैं/ उजाले को धकेल कर अंधेरा दबे पांव चोर बिल्ली की तरह आ पहुंचा है/ सांझ ढल गई है/ जंगल में लकड़ी-घास लेने गई महिलाएं हड़बड़ी में हैं, अरी बहनों फटाफट काटो और बांधो/ घर में दुधमुंहा बच्चा है और सास गुसैल, दिल में धुकधुकी लगी है/ सांझ ढल गई है। )

चरवाहा अपनी भेड़-बकरियां गुम होने के किस्से को जिस मासूमियत से बयां करता है उससे कुछ हास्य भी पैदा होता है:

ढेबरा हर्ची गैनी, मेरी बखरा हर्ची गैनी मेरा,
हे भुल्यों, हे घसैन्यु, हे दीद्यूं-हे पंधेन्यू, हे कका तिल देखीनी, हे चुचों कख फूकेनी
खाडू नर्सिंगा का नौ को छौ सिरायुं धर्मा कोंको, नागराजा खुज्यौ त्वी, तेरो लागोठ्या लीगी क्वी
पटवरी जी की पुजै भोल, बुगठ्या दिख्यो ह्वेगे गोल

(भेड़ें गुम हो गईं मेरी बकरियां लापता/हे भुल्यों (छोटी बहनों)-घसियारिनो, हे दीदियो-पनिहारिनो, अरे काका तूने देखि, अरे लोगो कहां मर गईं / नरसिंह देवता की नाम का खाडू (भेड़) रखवाया था धर्मा ने, नागराजा तू ही खोज तेरी बलि के लिए रखे हुए को ले गया कौन/ पटवारी जी की पूजा कल और बकरा हो गया गोल)

ये पहाड़ की विडंबना है कि कठिन और विकट जीवन स्थितियों में पहाड़ी गीतों में दुख भी हास्य के रूप में फूटता है। इसलिए पहाड़ में कहावत है कि बड़े दुख की बड़ी हंसी।

एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर भले ही बाघ बचाने की बड़ी-बड़ी चिंताएं हों लेकिन पहाड़ में तो बाघ आतंक का ही पर्याय है, जो आए दिन पालतू पशुओं से लेकर मनुष्यों पर हमलावर है। नेगी एक लडकी जिसकी मंगनी होने वाली है की मंगनी कहानी सुनाते हैं जो बाघ का निवाला बन चुकी है --
सुमा हे निहोंण्यां सुमा डांडा ना जा, सुमा हे खड्यौंणा सुमा डांडा ना जा,
लाडा की ब्यटूली सुमा डांडा ना जा, यखुली-यखुली सुमा डांडा ना जा,
दोबदो-दोबदो बाघ डांडा ना जा, तेरी घांटी बिलकी सुमा डांडा ना जा
तेरी चिरीं लती-कपड़ी डांडा ना जा, घसेन्यून पछ्याणी सुमा डांडा ना जा
अध्खाईं तेरी लास देखि सैरा गौं का रवेनि सुमा डांडा ना जा

(सुमा अरी ओ नादान सुमा पहाड़ पे मत जा/सुमा ओ लाडली सुमा पहाड़ पे मत जा, अकेली-अकेली सुमा पहाड़ पे मत जा / दबे पांव आया बाघ और तुझपे झपट गया, पहाड़ पे मत जा/ तेरे चीथड़े हो चुके कपड़े घस्यारिनों ने पहचाने, पहाड़ पे मत जा / तेरी आधी खाई लाश देख कर सारे गांव वाले रोये, पहाड़ पे मत जा।

नोट: इस गीत में बाघ का निवाला बन चुकी सुमा को संबोधित करते हुए बाघ द्वारा उसे मारे जाने की कथा बयान की गई है। अनुवाद करने के लिहाज से टेक के रूप में प्रयुक्त पंक्तियां हटा दी गई हैं। )

बाघ का आतंक इतना भारी है पहाड़ पर कि जब नब्बे के दशक में उत्तराखंडी मूल के निशानेबाज जसपाल राणा की ख्याति हुई तो उनसे भी बाघ मरने कि प्रार्थना करते  हैं
बंदुक्या जसपाल राणा सिस्त साधी दे, निसणु साधी दे
उत्तराखंड मा बाघ लग्युं, बाघ मारी दे, मनस्वाग मारी दे
नथूल्यों गले कि तोई सोना का मेडल द्युंला
बच्यां रौंला जब तलक, राणा तेरो नाम ल्युंला
आतंकबादी ये बाघे की सेक्की झाड़ दे

(बंदूकधारी जसपाल राणा निशाना साध ले/ उत्तराखंड में बाघ लगा हुआ है, बाघ मार दे, आदमखोर को मार दे/ नथें गला कर तुझे हम सोने के मेडल देंगे/ जब तक जिंदा रहेंगे, राणा तेरा गुणगान करेंगे/ आतंकवादी इस बाघ की हेकड़ी उतार दे)

नवविवाहिताओं की चहल चुहल का नजार देखिये -

स्त्री: हे जी कैबै ना करा, मठू-मठू जौंला, नयु-नयु ब्यो च मिठी-मिठी छ्वीं लगोंला,
पुरुष: हिट ले दी घमाघमी, सरासरी जौंला, फुक तौं लोळी छुयुं डेरै मा लागौला

(स्त्री: ऐ जी अकबक मत करो, हौले-हौले चलेंगे, नई-नई शादी है, मीठी-मीठी बातें करेंगे।
पुरुष : लंबे-लंबे डग भर, फटाफट जाएंगे, रहने दे उन कमबख्त बातों को घर में ही करेंगे। )

लेकिन उसी पहाड़ी स्त्री का पति जब नौकरी के लिए पहाड़ से पलायन पर कविता देखिये –
,
देवर: नारंगी की दाणी हो, क्यान सूखी होलो बौजी मुखड़ी को पाणी हो
बौजी: खोळी को गणेशा हो, जुग बीती गैनी द्यूरा स्वामी परदेसा हो
देवर: धीरज चएंदा हो, खैरी का ये दिन बौजी सदानि नी रएंदा हो
बौजी: त्वे मा क्या लगौण हो, दिन बौडी ऐ भी जाला ज्वनी क्खे ल्योंण हो

(देवर: क्यों सूख गया भाभी तुम्हारे चेहरे का पानी/ भाभी: वर्षों बीत गए देवर स्वामी परदेस ही हैं। / और गीत के अंत में जब देवर भाभी को सांत्वना देते हुए कहता है कि / धीरज रखना चाहिए भाभी, दुख के दिन हमेशा नहीं रहेंगे/ तो पहाड़ की तकलीफों से टकराते-टकराते अपना सब कुछ पहाड़ में ये दफन करने वाली स्त्री की पीड़ा भी उभरती है जब वह कहती है कि/ दिन तो बहुर भी जाएंगे पर जो युवावस्था कष्टों को झेलते-झेलते बीत गई वो कहां से लौटेगी।

नोट: टेक के रूप में इस्तेमाल पंक्तियों का अनुवाद नहीं किया गया है। )

प्रेम पर तो नेगी के कई गीत हैं।  हर बार वह नए बिंबों, नए रूपकों के साथ प्रेम गीत रचते हैं, जिनमें फिल्मी छिछोरापन नहीं है बल्कि प्रेम की शालीनता और गरिमा उभरती है। एक नमूना देखिए:

बंडी दिनों मा दिखे आज, दिन आजा को जुगराज,
फल्यान-फूल्यां वो पाखा, वो पैंडा, हैरा-भैरा रयां पुंग्डय़ूं का मेंडा
जौं सारयूं बीच हिटी की तू ऐई, तौं सारयूं खारयूं हो नाज

(प्रेमिका के मिलने पर प्रेमी कह रहा है:

बहुत दिनों में दिखी आज, आज का दिन दीर्घजीवी हो/ फलें-फूलें वो पहाड़ी ढालें, हरे-भरे रहें वो खेतों की मेड़ें / जिन खेतों से चल के तू आई, उनमें हो मनों अनाज )

प्रेमिका के मिलन पर ऐसी उत्पादक कामना अद्भुत ही नहीं है बल्कि दुर्लभ भी है।

शुरुआत के गीतों में देखें तो गढ़वाल की वंदना, गढ़वाल की प्रकृति की सुंदरता की प्रशंसा नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में खूब दिखती है। लेकिन धीरे-धीरे पहाड़ की समस्याएं उनके गीतों में उभर कर सामने आने लगीं :

कख लगाण छ्वीं , कैमा लगाण छ्वीं,

ये पहाड़ की, कुमौं-गढ़वाल की,
रीता कूड़ों की, तीसा भांडों की,
बगदा मनख्यूं की, रड़दा डांडों की

(कहां कहें बात, किससे कहें बात, /इस पहाड़ की, कुमाऊं -गढ़वाल की/ खाली मकानों की, / प्यासे बर्तनों की, बहते मनुष्यों की, लुढ़कते पहाड़ों की। )

ये पहाड़ से लगातार पलायन की पीड़ा है, लेकिन चूंकि नीति-नियंताओं को इस पलायन और खाली होते पहाड़ के गांवों से कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए आम पहाड़ी आदमी की पीड़ा भी इसमें है कि कहां कहें और किससे कहें।

जनविरोधी विकास या विकास के नाम पर हो रहे विनाश की ओर भी नरेंद्र सिंह नेगी आम आदमी का ध्यान खींचते हैं :

नौ फरें विकास का, विनाश कैन कैरी यूं पहाड़ों को, /खोजा वे सणी, पछ्याणा, वे सणी
(विकास के नाम पर विनाश किसने किया इन पहाड़ों का, /खोजो उसे, पहचानो उसे।)

उत्तराखंड आंदोलन के दौर में तो आंदोलन के गीतों का एक पूरा कैसेट ही नेगी ने निकाला। 1994 के प्रचंड जनांदोलन में उत्तराखंडियों को जागने का संदेश देते हुए उन्होंने लिखा:

उठा जागा उत्तराखंडियों, सौं उठाणो बक्त ऐगे,
उत्तराखंड का मान सम्मान बचाणो बक्त ऐगे,
भोळ तेरा भला दिनों का खातिर जौं कुल्वे सड़क्यं मा बौगी,
ऊं शहीदों कू कर्ज त्वे पर अब चुकाणो बगत ऐगे

(उठो, जागो, उत्तराखंडियो शपथ लेने का वक्त आ गया है/ उत्तराखंड का मान सम्मान बचाने का वक्त आ गया है/ कल तेरे उज्ज्वल भविष्य के लिए, जिनका लहू सड़कों पर बहा/ उन शहीदों का कर्ज चुकाने का वक्त आ गया।)

2 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली में प्रदर्शन करने जा रहे आंदोलनकारियों पर उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव और मायावती की गठबंधन सरकार ने मुजफ्फरनगर में बर्बर दमन ढाया। गुंडों की तरह नौजवानों की हत्याएं और महिलाओं के साथ दुराचार मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने किया। इस बर्बर और शर्मनाक दमन के खिलाफ नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने गीत में प्रतिरोध दर्ज किया:

तेरा जुल्म कू हिसाब चुकौला एक दिन, लाठी-गोली को जवाब द्यौला एक दिन,
वो दिन-बार औंण, विकास का रतब्योंण तक,
अलख जगीं राली ये उत्तराखंड मा, लड़ै लगीं राली ये उत्तराखंड मा

(तेरे जुल्म का हिसाब चुकाएंगे एक दिन, लाठी-गोली का जवाब देंगे एक दिन/वो दिन-वो वक्त आने तक, विकास का उजाला होने तक/ अलख जगी रहेगी इस उत्तराखंड में, लड़ाई जारी रहेगी इस उत्तराखंड में।)

9 नवंबर,  2000 को अलग उत्तराखंड राज्य बना, लेकिन ये जनता के सपनों का राज्य नहीं था। लूट और झूठ की कांग्रेसी-भाजपाई राजनीति का उत्तराखंड था, ठेकेदार और माफियाओं का उत्तराखंड था। नेगी के भीतर के गीतकार और गायक ने इस छलावे को जल्दी ही पहचान लिया। जहां राज्य बनने से पूर्व के गीतों में वह विकास के नाम पर विनाश करने वालों को खोजने और पहचानने को कहते हैं, वहीं राज्य बनने के बाद के गीतों में वह लूट की ताकतों और उनके शिखर पुरुषों की न केवल शिनाख्त करते हैं बल्कि खुल कर उन पर उंगली उठाते हैं, उनका नाम लेते हैं। उनके कारनामों को गीतों के जरिये जनता के सामने लाते हैं। कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को केंद्र करके नेगी जी द्वारा लिखा और गाया गीत-नौछम्मी नारैण (बहुरुपिया नारायण) ऐसा ही गीत है, जो नारायण दत्त तिवारी द्वारा सरकारी खजाने की लूट पर तीखा हमला बोलता है। वह यहीं नहीं रुकते, भाजपा की सरकार बनने के बाद वह मुख्यमंत्री ‘निशंक’ पर निशाना साधते हुए गीत लिखते हैं – ‘अब कथ्गा खैल्यो’ (अब कितना खाएगा)। जिस समय ‘निशंक’ के भ्रष्टाचार का दौर चरम पर था, नेगी का यह गीत जैसे सीधा मुख्यमंत्री से सवाल कर रहा था कि भाई बता अब और कितना खाएगा। जहां ‘नौछम्मी नारैण’ में नेगी ने राज्य की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के निकम्मेपन पर भी व्यंग्य किया वहीं ‘अब कथ्गा खैल्यो’ में वह घोटालों की सरताज केंद्र की कांग्रेस सरकार पर भी प्रहार करते हैं, राष्ट्रमंडल खेल, टू-जी घोटाला, काले धन जैसे मसलों को भी इस गीत में उन्होंने छुआ है।

चुनाव में कांग्रेस-भाजपा जैसी पार्टियों द्वारा अपनाए जा रहे हथकंडों पर नरेंद्र सिंह नेगी का गीत देखिए:

हातान हस्की पिलाई फूलन पिलायो रम ,
छोटा दली-निरदली दिदोंन कच्ची मा टरकायां हम,
ऐंसू चुनौ मा मजा ही मजा, दारु भी रुप्या भी ठमठम
सुबेर पैग पे घडी दगडी, दिन का पैग सैकिल मा चढ़ी,
ब्याखुनी कुर्सी मा लम्तम पड़ी, राती को हाती मा बैठी की तड़ी
ऐंसू चुनौ मा ठाठ ही ठाठ, प्रत्याशी पैदल अर, घोड़ा मा हम।

(हाथ (कांग्रेस) ने व्हिस्की पिलाई, फूल (भाजपा) ने पिलाया रम/ छोटे दलों, निर्दलीय भाइयों ने कच्ची में टरकाये हम/ इस चुनाव में तो मजा ही मजा, दारू भी और नोट भी खटाखट/ सुबह का पैग घड़ी (एन.सी.पी.) के साथ, दिन का पैग साइकिल (सपा) में चढ़ा/ शाम को कुर्सी (उत्तराखंड क्रांति दल) में लंबलेट हुए/ रात को हाथी (बसपा) में बैठ के तड़ी/ इस चुनाव में तो ठाठ ही ठाठ हैं, प्रत्याशी पैदल और घोड़े में हैं हम)

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले इस देश में चुनाव अब तो पैसा बांटने और शराब पिलाने की प्रतियोगिता ही तो बन गए हैं।

टिहरी बांध ने तकरीबन दस हजार परिवारों को विस्थापित कर दिया, टिहरी शहर और कई गांव डूब गए। टिहरी बांध पर अस्सी के दशक में लिखे अपने गीत की भूमिका में नेगी कहते हैं कि विकास के इतिहास में इनका त्याग अमर रहेगा। इस गीत में एक बूढ़ा बाप अपनी मिट्टी से हमेशा के लिए बिछडऩे का दर्द अपने बेटे को चिट्ठी में लिखते हुए कहता है:
अबारी दां तू लंबी छूटी लेके ऐई, ऐगे बगत आखीर,
टीरी डूबण लग्युं चा बेटा डाम का खातीर

(इस बार तू लंबी छुट्टी लेके आना, आखिरी समय आ गया है/ टिहरी डूब रहा है बेटा, बांध की खातिर।)

लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद यहां सैकड़ों के तादाद में निर्मित, निर्माणाधीन और प्रस्तावित परियोजनाओं को देख कर नेगी भी समझते हैं कि ये विकास का नहीं संसाधनों की लूट का मामला है। इसलिए वह कहते हैं:

देवभूमि को नौ बदली, बिजली भूमि कैरयाली जी,
उत्तराखंड की धरती योंन डामून डाम्याली जी,
हमरी कूड़ी, पुन्गड़ी, बणों मा बिजलीघर बणाली जी,
जनता बेघरबार होली, सरकार रुप्या कमाली जी।

(देवभूमि का नाम बदल कर बिजली भूमि कर दिया जी/ उत्तराखंड की धरती को इन्होंने बांधों से लहूलुहान कर दिया जी/ हमारे मकान, खेतों, वनों में बिजलीघर बनाएगी/जनता बेघरबार होगी, सरकार तिजोरियां भरेगी जी।)

उत्तराखंड राज्य की मांग के साथ ही राजधानी का सवाल महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा रहा है। जनता की मांग रही है कि गैरसैण राजधानी बने। देहरादून में अस्थायी राजधानी के नाम पर सरकार के जमने के खिलाफ लिखे गए गढ़वाली कवि वीरेंद्र पंवार के गीत को नेगी जी ने स्वर दिया :

सब्बी धाणी देरादूण, हूणी-खाणी देरादूण
परजा पिते धार-खाल, राजा राणी देरादूण
सबन बोली गैरसैण, तौंन सूणी देरादूण

(सभी काम देहरादून, विकास के काम देहरादून/ प्रजा खटती रही पहाड़ों पर, राजा-रानी देहरादून/ सबने कहा गैरसैण, उन्होंने सुना देहरादून)

जब उत्तराखंड में स्थायी राजधानी के चयन के लिए बने वीरेंद्र दीक्षित आयोग ने नौ साल में ग्यारह विस्तार पाने और तकरीबन पैंसठ लाख रुपए खर्चने के बाद देहरादून को ही राजधानी बनाने की संस्तुति की तो नरेंद्र सिंह नेगी ने दीक्षित आयोग के साथ ही कांग्रेस, भाजपा और उत्तराखंड क्रांति दल को गैरसैण का मामला लटकाने के लिए कठघरे में खड़ा किया, साथ ही गैरसैण के लिए लड़ाई जारी रखने का आह्वान भी किया:

तुम भी सूणा, मिन सूण्याली, गढ़वाल ना कूमौं जाली
उत्तराखंडे राजधानी बल देरादूणी मा राली, दीक्षित आयोगन बोल्याली,
ऊन बोलण छौ, बोल्याली, हमन् सूणन् छौ, सूण्याली
या भी लड़ै लगीं राली
नौ सालम से कि जागी, धन्य हो पंड्डा जी पैलागी,
पैंसठ लाख रूप्या खर्ची की, देरादूण अब खोज साकी,
जनता का पैंसों की छरळी
या भी …
कांग्रेस-भाजपा नी रैनी कभी गैरसैण का हक्क मा,
सड़कूं मा भी सत्ता मा भी, यू.के.डी. जकबक मा

(तुम भी सुनो, मैंने सुन लिया, गढ़वाल ना कुमाऊं जाएगी/ उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ही रहेगी, दीक्षित साहब ने कह दिया है/ उन्होंने कहना था कह लिया, हमने सुनना था सुन लिया/ ये लड़ाई भी जारी रहेगी/ नौ साल में सो के जागे, पंडित जी (दीक्षित) तुम्हें प्रणाम/ पैंसठ लाख रुपए खर्च करके, देहरादून अब खोज सके / जनता के पैसे की ये खुलमखुल्ला लूट/ ये भी लड़ाई…/ कांग्रेस, भाजपा नहीं रहे कभी गैरसैण के हक में/ सड़कों में रहें कि सत्ता के साथ यू.के.डी.संशय में।)

नरेंद्र सिंह नेगी सत्ता की लूट पर सीधी चोट करते हैं। अपने एक गीत में वह कहते हैं:

बिना पाणी का घूळी गैनी, यों मा कनि सार च, यूं को च दोस नी यों कि सरकार च

(बिना पानी का हजम कर गए, इनको कैसा अभ्यास है, इनका कोई दोष नहीं है, इनकी सरकार है।)

इस तरह देखें तो पहाड़ का हर रंग, हर शेड नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में है। पीले फ्योंली के फूल हों या लाल बुरांस (बुरुंश), बर्फ से लकदक चोटियों से लेकर गहरी घाटियों तक का सुंदर वर्णन नेगी के गीतों में है। प्रकृति की सुरम्यता के साथ ही पहाड़ के भोले-भाले लोगों और उनके पहाड़ जैसे ही कष्टों का अंदाजा भी नेगी के गीतों से होता है। पहाड़ की प्राकृतिक सुरम्यता, प्रेम और सौंदर्य का ये गायक, गीतकार मजबूती से ना केवल जनता के पक्ष के गीत रचता और गाता है बल्कि आंदोलनों में हिस्सेदार भी बनता है। ‘नौछम्मी नारैण’ लिखते समय नरेंद्र सिंह नेगी उत्तराखंड सरकार की सेवा में थे, लेकिन एन.डी.तिवारी के भ्रष्ट राज के खिलाफ ये गीत गाने के लिए उन्होंने सरकारी सेवा से वी.आर.एस.ले लिया, ऐसा दूसरा उदाहरण शायद ही कोई और हो कि एक गीत गाने के लिए किसी गायक ने सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया हो।

जैसा कि जनता के पक्ष में खड़ी कला और कलाकार एक बेहतर दुनिया के सपने के साथ हमेशा खड़े होते हैं, वैसा ही नरेंद्र सिंह नेगी भी अपने गीत में कहते हैं:

द्वी दिनै की हौर छिन ई खैरी, मुठ बोटी कि रख
तेरी हिकमत आजमाणू बैरी, मुठ बोटी कि रख,
ईं घणा डाळौं बीच छिर्की आलो घाम ये रौला मा भी
सेक्की पाळै द्वी घडी हौर छिन, मुठ बोटी कि रखा

(दो दिनों का और है ये कष्ट, मुट्ठी ताने रख/ तेरी हिम्मत आजमा रहा है बैरी, मुट्ठी ताने रख/इन घने पेड़ों के अंधेरे को चीर कर भी आएगा उजाला/ पाले (तुषार) की हेकड़ी दो वक्त की और है, मुट्ठी ताने रख।)

निश्चित ही लूट-झूठ के राज को मिटाने के लिए तो लडऩा पड़ेगा, खपना पड़ेगा और इस लड़ाई में हमारी मुट्ठी तनी रहे, इसके लिए नरेंद्र सिंह नेगी अपने गीतों के साथ खड़े हैं, डटे हैं।

@ सर्वाधिकार इन्द्रेश मैखुरी

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  स्वच्छ भारत ; स्वच्छ भारत ; समर्थ गढ़वाल
 

Bhishma Kukreti

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 श्री नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में सामयिकता

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-95
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti


                         विश्लेषकों के अनुसार महान भारतीय गायक नरेंद्र नेगी के उत्तराखंडी समाज में चमकने या पैठ बनाने में कई कारण हैं .गढ़वाली गीतों के महान गायक श्री जीत सिंह नेगी का पार्श्व में जाना , श्री नरेंद्र सिंह नेगीका मुंबई -दिल्ली जैसे महानगरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना , गले में मिठास जैसे मुख्य कारण हैं। भारत के महान गीतकार नेगी जी के प्रसिद्ध होने में उनकी संगीत शिक्षा का भी बड़ा हाथ है। संगीत सिक्षा से नेगी जी अपनी गायकी में ली का पूरा ध्यान रख सके और आज भी उनके गीतों में संगीत के नियमो का भरपूर पालन होता है . भारत के महान गायकों में से एक गायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी की धुनें कर्णप्रिय ही नही अपितु अपनी वैसिष्ठ्य भी लिए होती हैं .
 
                       जब भारत के महान गायक नेगी जी उभर रहे थे तो उसी समय टेप रिकोर्डिंग या ऑडियो कैसेट उद्यम में भी क्रान्ति आयी और जो गढ़वाली संगीत उद्यम गढ़वालियों के इधर उधर विखर जाने के कारण संगीत वितरण की समस्या से जूझ रहा था ऑडियो कैसेट उद्यम के विकास ने गढ़वाली संगीत वितरण समस्या को हल कर दिया और भारत में अलग अलग स्थानों में बसे गढ़वालियों को श्री नरेंद्र नेगी सरीखे गायकों के गीतों को सुनने के अवसर मिल गये। ऑडियो केसेट उद्यम विकास ने गढ़वाली गायकी में प्रतियोगिता बढ़ाई और जैसे कि होता है कि प्रतियोगिता में हीरे की जीत होती है . श्री नरेंद्र सिंह नेगी इस प्रतियोगिता के दौरान गायकों के सिरमौर बन के उभर गये .
 
श्री नरेंद्र सिंह नेगी के उत्तराखंडी गायन में महराजा बनने के पीछे श्री नेगी का कवि होने का भी बड़ा हाथ है। गायकी का शास्त्रीय ज्ञान व कविता का पूर्ण ज्ञान नेगी जी की गायन शैली के लिए एक संबल रहा है।
श्री नरेंद्र सिंह नेगी के सबसे बड़ी विशेषता है कि उनके गीतों में सामयिकता का होना। सामयिकता गायक को समाज से जोड़ने में सबसे बड़ा सहयाक गुण है।
 
जब श्री नेगी जी गढ़वाली गायकी में नये नये ही थे तो उनका गाया 'उचा निसा डाँडो माँ टेढा टेढ़ा बाटों मा चलि भै मोटर चलि ...'उस समय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का बुरा हाल था, लोगों में भी मोटर यात्रा के अपने अपने नियम ही थे तब भारत के महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी का यह गीत गढ़वाल ही नही भारत के कोने कोने में बसे उत्तराखंडियों मध्य सामयिकता के कारण एकछुटी /एकदम प्रसिद्ध हो गया . जिन्होंने भी उस समय की भारत या खासकर गढ़वाल के ट्रांसपोर्ट व्यवस्था का कडुवा अनुभव किया होगा वह जम्बूद्वीप के महान गायक नेगी जी द्वारा गाया इस गीत से स्वत: ही आज भी जुड़ जाएगा। इस गीत में सुनने वालों के मन में वही विम्ब बनता है जो आज भी पहाड़ो में सरकारी या गैरसरकारी बस की यात्रा में असलियत में अनुभव होता है .
सामयिक गायकी से गायक समाज से सीधा जुड़ जाता है और यही कारण है कि हिन्दुतान के मुर्शिकी के महान स्तम्भ श्री नरेंद्र सिंह नेगी के गीत उन प्रवासी युवाओं को भी भा जाते हैं जिन्हें गढ़वाली बोलनी भी नही आती है और इसके गवाह हैं उन प्रवासी युवाओं के मोबाइल में स्थित नेगी जी के गीतों के बोल या संगीत के रिंग टोन।
 
ब्रिटिश काल से ही पहाड़ों के अपने गावों के जंगलों का दोहन हेतु सरकार ने जंगलों का प्रान्तीयकरण करना शुरू कर दिया था और भारतीय सरकारों ने भी ब्रिटिश नीति को आगे बढ़ाया। अपने जंगल जब सरकारी होने लगे तो इस अधिनियम की सबसे बड़ी मार पहाड़ की स्त्रियों को पड़ी जिन्हें घास -लकड़ी -भोजन जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों के लिए नित नया संघर्ष करना पड़ता है . ढाई सौ सालों से पहाड़ों की स्त्रियाँ सरकारी अधिनियमों के कारण आज भी संघर्षरत हैं . इस सामयिक जल-जंगल -जमीन की समस्या को एक संवेदनशील और जन कवि और जन गायक ही समझ सकता है . जगल के पतरोल के रूप में सरकार की असंवेदनशील नियमों को ताना देता यह गीत 'बण भी सरकारी तेरो मन भी सरकारी तिन क्या समझण हम लोगुन की खैरी ...आण नि देन्दि तु सरकारी बौण , गोर भैंस्युं मिन क्या खलाण .." स्वत: ही आम महिलाओं को नेगी जी से जोड़ देता है . समाज के सभी वर्गों में ग्रेट इन्डियन सिंगर की बड़ी पैठ है तो इसका एक मुख्य कारण है कि श्रेष्ठ गायक नरेंद्र जी सामयिक विषयों को संवेदनशील तरह से उठाते हैं .उनके गीत केवल शब्द चातुर्य से भरे नही होते हैं बल्कि उन गीतों में समाज और सामयिकता होती है जो नेगी जी को अन्य गायकों से अलग कर देते हैं . नेगी जी के गीतों के बोलों में सामयिकता मात्रि शक्ति और युवा शक्ति को नेगी जी से जोड़ने में कारगार सिद्ध हुयी है।
गैरसैण का राजधानी बनना , उत्तराखंड के पहाड़ियों के लिए एक भावुकता भरा प्रतीक है और गायकी के शिरोमणी नरेंद्र सिंह नेगी ने -
तुम भि सुणा मिन सुणियालि गढ़वाल ना कुमौं जालि
तुम भि सुणा मिन सुणियालि गढ़वाल ना कुमौं जालि
उत्तरखंडै राजधानी बल देहरादून रालि
दीक्षित आयोगन बोल्यालि
हाँ दीक्षित आयोगन बोल्यालि
.ऊंन बोलण छौ बोल्यालि हमन सुणन छौ सुण्यालि ..
जब ऐसा जैसा सामयिक और जन आन्दोलन का गीत गाया तो महान गायक अपने आप ही जन भावना से जुड़ बैठे . इस तरह के सामयिक गीतों ने श्री नेगी जी को जन गीतकार बनाया .
उत्तराखंड में श्री नारयण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रीत्व काल में श्रृंगार रस की जो नदिया बहीं वह आम जनता को अभी भी याद हैं . आम जनता की हृदय की आवाज को पहचानने में श्री नरेंद्र सिंह नेगी को माहरथ हासिल है और तभी तो 'नौछमी नारयण ' जैसा कालजयी
गीत श्री नेगी ने रचा . इस जनता की आवाज बने गीत ने उस समय की सरकार को झिंझोड़ के रख दिया और इस गीतमाला को बैन भी किया . किन्तु सामयिकता का प्रतिनिधि यह गीत नारयण दत्त तिवारी जी की रसिक प्रिय प्रकृति का भंडाफोड़ क्र चुका था। इस गीत नी रचनाकारों को बताया कि सामयिकता रचना को जनता से जोडती है।
 
आज पहाड़ों से पलायन के कारण पहाड़ी अपनी धरती से दूर हो गये हैं . अपनी धरती से दूर होने के बाद प्रत्येक मनुष्य अपनी जड़ों को खोजता है , अपने इतिहास को खोजना उसकी विडम्बना बन जाती है . इसी जन भावना को श्रीनेगी जी ने समझा और तभी तो उनकी गायकी में ' बावन गढ़ों को देश मेरो गढवाल ' फुट पड़े . आज भी गढ़वाल हो या विशाखापट्टनम आपको प्रवासियों को नेगी जी द्वारा गीत 'बावन गढ़ो का देस , भड़ो का देस ' का गीत सुनते मिल जायेंगे।
किसको नही पता की डा रमेश निशंक के राज में भ्रष्टाचार किस उंचाई पर चढा . जन भावनाओं के प्रति संवेदनशील कवि -गायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी का एल्बम ' अब कथगा खैल्यु " रिलीज हुआ तो राजकीय गलियारों में भूचाल आ गया . जनता खुले आम इस गाने को सुनाकर अपने मन की बात राजनेताओं तक पंहुचाने में सफल हो गयी . और यही है श्री नेगी जी के प्रसिद्ध होने का असली राज - जनता की भावनाओं को समझना और उसकी बोल में गाना लिखना और गीत गाना .
जनता केवल दूसरों की कहनियों में व्यंग्य सुन्ना पसंद नही करती अपितु अपने को भी आयने में देखना पसंद करती है तभी तो श्री नरेंद्र सिंह नेगी का सामयिक गीत ' मुझको पहाड़ी मत बोलो मै देहरादूण वाला हूँ,देहरादूण वाला हूँ ' उतना ही प्रसिद्ध हुआ जितना कि श्री नारयण दत्त व श्री निशंक के राज की खिल्ली उड़ाते गीत। जनता ने अपनी खिल्ली उड़ाने वाले गीतों को भी वही महत्व दिया जो कि उसने दूसरों की खिल्ली वाले गीतों को दिया . और इसका मुख्य कारण है की नेगी जी समय , समाज और सामयिकता को महत्व देते हैं . इसी तरह श्री नेगी जी के दसियों गीत समय की पुकार वाले हैं
मेरी दृष्टी में श्री नरेंद्र सिंह नेगी की गायन प्रसिधी में जितना योगदान उनका सुरीला गला , उनका संगीत में माहरथ , और उनका कवि होने में है उससे कहीं अधिक योगदान श्री नेगी का समाज की नब्ज पहचानने व् गीतों मेंसामयिकता लाने का है . सामयिकता भारत के महान गायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी को समाज से सीधा जोड़ देती है .
 
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    Narendra Singh Negi: The Poet of Varied Subjects and expert in creating Images

(Critical History and Review of Garhwali Poetry Literature- 95)

            Literature Historian: Bhishma Kukreti

           Narendra Singh Negi is world’s finest and famous Folk Singer. World Famous Folk Singer Narendra Singh Negi is also fine poet for Garhwali language.
           World Famous Folk Singer and Garhwali poetry creator Narendra Singh Negi was born in 1950, Pauri village, Nadalsyun, Pauri Garhwal, Uttarakhand , South Asia.  Narendra Negi took formal education in Music and Musicology too.
     World famous Folk Singer Narendra Singh Negi also created poems and lyrics.
There are following Garhwali Poetry collections published by World Famous Folk Singer Narendra Singh Negi –
1-Khuchkandi: A lyric collection of 52 folk songs
2-Gani ki Ganga Syanu ko Samodar : collections of 42 famous lyrics by Narendra Singh Negi
3-Muth Boti ke  Rakh: Mostly there are songs related to separate Uttarakhand Movement
      The subjects of Famous Poet Narendra Singh Negi are varied as society, complex structure in the society and social unrest, pain and happiness, environment, social corruption, corruption in politics, corruption in government administration, love, bravery, awakening and many more. World Famous Folk Singer and renowned Garhwali poet Narendra Singh Negi uses both styles in his verses conventional and newer styles.

   The emotional and artful dimension is found equally in the poems of Negi. The poems of Narendra Singh are more of melodious nature. 
 World Famous Folk Singer and Garhwali poet  Narendra Singh Negi is famous for creating poems on contemporary subjects.
                                        धुंध
Poetry by : नरेन्द्रसिहं नेगी ( 1950, Pauri village, Nandalsyun , Pauri Garhwal)
अजकाल पाडूमा चौदिसु फैलीछ धुंध अंदाधुंद
काळा झंगरणया धुवाॅ कि धुंध
ऑखोंमा अगास मा धुंध
जुकडा मा जीवन मा धुंध
जगदा जंगलून मोसेंदा भविष्यपर धुंध
धुंदळी नी या धुंध
ई घौणि धुंधमा कुछकत नी दिखेणू
न बट्वे न बाटा न मिरग न चाॅठा
जूॅदों छौंपदी अर मोरदौं भड्याॅदि बणागै धुंध
क्या पसु क्या पक्षी क्या डाळा क्य मन्खी
ऐथर आग पैथर छारू अर मत्थी धुंध
धुंध अन्दाधुंध
कुछ नि देख सकणा ये गौंका लाटा
न आज न भोळ न नफा न घाटा
धुंध अन्दाधुंध
कुछ नि देखणू बण विभाग न आग न बाघ
कुछ नि कै सकणी सरकार न उपै न उपचार
एक हैंका पर भगार
कब छंटेलि भै या धुंध अर कब दिखेलो
वो ह्यूँदो हिमालै सि
सफेद सच्च साफ साफ
    South Asian World Famous Folk Singer and poet Narendra Singh Negi is expert of creating perfect images as per subject.
 नेता  (गढ़वाली कविता )


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सीधू सच्चू समझी जौंथैं
जीती बाँगा ह्वेगिनी
सरकार राऊ चाहे जाऊ
पर नेता नाँगा ह्वेगिनी
चुनौ बग्त कोयल जना
सुरीला गीत गैनि जौंन
सत्ता क्या मिली कि सब्या
सबि चिलाँगा ह्वेगिनी
बिकास को हौळ सरासर
लगाला सोचि छौ
अफु त खैकि साँण्ड बण्या
लोग ढाँगा ह्वेगिनी ।

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Modern Garhwali Verses  Songs,     Poems

  बाघ अर चिनखु  (गढ़वाली कविता )

रचना --   कालिका प्रसाद नवानी  ( जन्म  1955,  गवौणी , पट्टी किमगडी गाड , पौड़ी  गढ़वाल  )
Poetry  by - Kalika Prasad Nawani
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 181
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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ये लोकतंत्र मा
चुनौ लड़दरू नेता
चुनौ  आंदैं  बण जांद चिनखु
अर कायकर्ता बण जंदिन बाघ

जितणा बाद
नेता बण जांद बाघ
अर कार्यकर्ता चिनखु

तब नेतौ छैल देखणौ  बि तरसद कार्यकर्ता
वेक अगनै इन हाथ जोड़द
जन कि वो होलु साक्षात बरमा
जनता कु भाग्यविधाता परमेसुर

बाघ चिनखु कु यो किस्सा
सर्या हिंदुस्तान म छ

लोकतंत्र का ये भस्मासुर
जनता कु आसिरवाद लेकि
जनता तैं ही लुटणा छन
तबि त आम लोग
शिवजी की तरीं
जान बचाणौ भजणा छन 

(Ref-Angwal,2013)
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any
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Bhishma Kukreti

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नौवुं बुलेटिन
Garhwali Poetry by Satish Kaleshwari
डा.सतीश कालेश्वरी।
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सुण्दा रावा खा़स ख़बरौं,
सिलसिला अबि ज़ारी चा।
// दिल्ली बटि लगगि 'धाद',
‘हिटो गैरसैण’ भुला।
एक हौरी क्रान्ति खुणि,
ल्वेकू दान देण भुला।
निचैंदु इन राज जख, धोका च मक्कारी चा।
सुण्दा रावा खा़स ख़बरौं,सिलसिला अबि ज़ारी चा।
// कोश्यारी, खण्डूड़ी, निशंक,
लैन मा छन खड़ा आज।
कैन देखि होला कखि,
खाडूसि लापता ‘माराज’।
बौड़ि जावा, ‘हरदा’ पाछ, तुम्हरि ही त बारी चा।
सुण्दा रावा खा़स ख़बरौं,सिलसिला अबि ज़ारी चा।
// कांग्रेस,बसपा,बीजेपी,
कबि थामि, कबि छोड़ि।
'बागियु़ं, थैं चयेंद सदनि,
कखि न कखि लैंदी गौड़ि।
घ्यु दूद चट्ट पचदु, पुटगी यो सौकारी चा।
सुण्दा रावा खा़स ख़बरौं,सिलसिला अबि ज़ारी चा।
// भारी-भरकम फिल्म बोर्ड,
सरकारला बणै द्याई।
बिन्डी बिराल़ौ बीच बोला,
मूसू क्वी बि मरयाई।
फिल्मुं भलु हो न हो पर मेम्बरुं पौ बारी चा।
सुण्दा रावा खा़स ख़बरौं,सिलसिला अबि ज़ारी चा।
★★★★★★★★★
नौवुं बुलेटिन: समाप्तम् -01.9.2016
सर्वाधिकार सुरक्षित
डा.सतीश कालेश्वरी।
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Garhwali Poetries by Rakesh Mohan Thapliyal

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –- 307
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
Modern Garhwali Verses  Songs,     Poems

-  (गढ़वाली कविता )

रचना --    राकेश  मोहन थपलियाल ( जन्म 1953 , टिहरी  गढ़वाल  )
Poetry  by – Rakesh Mohan Thapliyal
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती

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         सवाद
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Garhwali Poetry by: Rakesh Mohan Thapliyal
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कब्बी बिटिन नि बुकाईन बुख़णा,
तिल अर, भंगजीर मिल्यां॰
चाखी नी पिन्ना कु साग,
नि खाई पाड़ी पालिंगा की काफली॰
राई की भुज्जी अर तोर की दाल,
जख्या म छौंक्यां पिंडालु दगड़ी,भुटीं लाल मर्च ॰
अर किनगोड,हिंसर,काफल कि त
स्याणी भी केक करण यख ?॰
अब यूं कु समझाऊ कि, मेरा मुलक म,
आट्टा अर बासी रोट्टयों कु भी बणदु थौ साग॰
वनु त यख ,खोजण पर, कै हैक्का नौ से, मिल जाँदु, कोदु, झंगोरू, गैथ अर कई धाणी॰
पर नि औंदु गैल्या वु स्वाद, वा पहाड़ी रसाण ,
बाबाजी का सौं, मैन तुम म झूठ किलै बोलण ?
मैन एकदिन पुछि दुनिया का मशहूर बाबर्ची ----- से,
हे बेटा, बूढेंदी बखत क्या मनखी कु गिच्चू खराब व्हेजाँदु होलु ?
मेरा नौन्याल भी बोलदान,पता नी बाबाजी कनु पकौंदा था तुमारी भी सदानी रैगिन यई छुईं ?
वै लठ्याला खानसामा न बोलि, चचा बुरु नि मान्यान,
सवाद गिच्चा की गैली, माटा अर पाणी से भी औंदु ?
(वैकु बाबा भी घरन लैक,जब कखी हैकी जागा पकौंदु थौ, तब वै भी
वख वु स्वाद नि औंदु थौ)
***************
हे मेरा गौं
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Garhwali Poetry by: Rakesh Mohan Thapliyal
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हे मेरा गौं, मै तेरा सौं, मैंन तू नि भुलाई
कुई यनु दिन क्या होलु, जब तू याद नि आई.
रोटटी-पाणी खैक जब लटकदौं बिछौणा मै तेरी खोज म फिर आफु म भटकदौं .
मन का आँखा खोलदा,स्मृतियों कु किवाड़, सपनों का बिना दिखेंदु, पुराणु संसार.
तिबारी म बैठयूं बाबा, पेणु छ तमाखु. गुठयारा म बई लगीं, सोरन पर मोळ .
डिंडयाला म बैठिं भुलि, काटणी छ भुज्जी, धौला-बुल्ला रिंग्ताणा छन, तै खाडू देखीक.
बाखडा भैंसा कु मचायूं छ अडाडोट, बखत घास कु व्हेगी, भूक लगीं भूख.
गोसा कु धुवां उठीक, पहुंचीगे अकाश, सूरज नारैण न पकड़ी डांडों की बाट
खल्याण म छोरों की मची धमा चौकड़ी, डाला मति पोथलों भी फुटी बरडोट.
जा बेटी तू पाणिक जा, मै आट्टू ओलदु रुमक पड़गी छोरी,कबरी पकौलु ?
रोटटयों गैली माँ की चुड्यों कु छमणाट,
अब कुछ नि रई बाकी, रैगि खाली याद.
हे मेरा गौं, मै तेरा सौं, मैंन तू नि भुलाई,,,,,
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फिर पाई नि वो स्वाद
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Garhwali Poetry by: Rakesh Mohan Thapliyal
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वू कोदा-झंगोरा का दिन
अर सौंण की खीर जनि रात,
रुपया त बतेेरा कमेंन जिन्दगी
पर अब नि रै वा बात ?
उकाळ- ऊँध्यार पर भी
थकदा नि था खुट्टा,
अब मोटरु म बैठिक
भी सुन्न पड़दु गात ?
थौला -मेलों की पकोड़ी,
जलेबी की रैगी याद,
बड़ी दुकान्यों पर भी
फिर पाई नि वो स्वाद।
वु पाथलों कु भात,
पुड़खों से चूँदु साग ।
काखड़ी-मुंगरर्यों कु
लगी होलु शराप
*******************
मैं डांडा कु बथों, तू चौमासा की गाड
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Garhwali Poetry by: Rakesh Mohan Thapliyal
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मैं डांडा कु बथों,तू चौमासा की गाड,मै भी बग्यों, तू भी बगि,यन्नी छ रिवाज.
मैं रो्डदू कोदा कू,तू गोंद्की नौण की ,हम भी रई जांदा जु,दुई रलि-मिलि.
मैं खडखडू बांज तू सपसपी कुळईं ,दुई जगि गेन,,जब बण लगी बडांक.
तू घुघूती घुरांदी,मै कफुआ-हिलांस, तू भी छ उदास,मै भी थौ उदास.
तू जोनि कु उजालु,मै दोफ़रा कु घाम, तेरु - मेरु मेल, सौंगु नि थौ काम.
तू धारा की पन्यारी ,मै ग्वैरु म कु ग्वैर,त्वैक व्हे अबेर,मैक भि अबेर.
XXXXXX
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Garhwali Poetry by: Rakesh Mohan Thapliyal
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Critical and Chronological History of Asian Modern Garhwali Songs,  Poets   ; Critical and Chronological History of Modern Garhwali Verses,  Poets ; Critical and Chronological History of Asian Modern Poetries,  Poets  ; Poems Contemporary Poetries,  Poets  ; Contemporary Poetries from Garhwal; Development of Modern Garhwali Verses; Poems  ; Critical and Chronological History of South Asian    Modern Garhwali Verses  ; Modern Poetries ,  Poets  ; Contemporary Poetries,  Poets  ; Contemporary Poetries Poems  from Pauri Garhwal; Modern Garhwali Songs; Modern Garhwali Verses  ; Poems,  Poets   ; Modern Poetries  ; Contemporary Poetries  ; Contemporary Poetries from Chamoli Garhwal  ; Critical and Chronological History of Asian Modern Garhwali Verses ; Modern Garhwali Verses,  Poets   ; Poems,  Poets  ; Critical and Chronological History of Asian  Modern Poetries; Contemporary Poetries , Poems Poetries from Rudraprayag Garhwal Asia,  Poets   ; Modern Garhwali Songs,  Poets    ; Critical and Chronological History of Asian Modern Garhwali Verses  ; Modern Poetries  ; Contemporary Poetries,  Poets   ; Contemporary Poetries from Tehri Garhwal; Asia  ; Poems  ;  Inspirational and Modern Garhwali Verses ; Asian Modern Garhwali Verses  ; Modern Poetries; Contemporary Poetries; Contemporary Poetries from Uttarkashi Garhwal  ;  Modern Garhwali Songs; Modern Garhwali Verses  ; Poems  ; Asian Modern Poetries  ; Critical and Chronological History of Asian Poems  ; Asian Contemporary Poetries; Contemporary Poetries Poems from Dehradun Garhwal; Famous Asian Poets  ;  Famous South Asian Poet ; Famous SAARC Countries Poet  ; Critical and Chronological History of Famous Asian Poets of Modern Time  ;
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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली , कविता ; चमोली  गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; 
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  स्वच्छ भारत ; स्वच्छ भारत ; समर्थ गढ़वाल





Bhishma Kukreti

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         D .D. Sundariyal: A Garhwali Poet of Varied Subjects and Images

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-96
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti


              A Garhwali Poet and drama Activist D.D Sundariyal was born in 1950, in Kui village of Kimgadi Gad of Pauri Garhwal, Uttarakhand, and South Asia.
  He had been publishing his poems here and there and in 2015 he published his Garhwali poetry collection. 
 Sundariyal creates Garhwali poetries in three styles –
Lyrical poems
Gazal
Conventional poems
  The subject of Garhwali Poetry of Deen Dayal Sundariyal are varies ranging from village images, migration, corruption, migration and changing social styles.
 He uses symbols of Garhwal for illustrating poem and creating demanded images.

      'बिसर्याँ  बाटा बिर्ड्यां मनिख ' कविता खौळ (  संग्रह )

        दीनदयाल सुन्दरियाल जी चंडीगढ़ मा एक सांस्कृतिक अर सामजिक हस्ती छन।  बिना फोकट की अपणी पब्लिसिटी का सुन्दरियाल जी चंडीगढ़ मा गढ़वळि नाटकुं मंचन मा व्यस्त रैन अर भौत सा नाटक मंचन करैन।  चंडीगढ़ मा गढ़वाली साहित्य वर्धन अर संबालण मा सुंदरियाल जीक योगदान अविस्मरणीय च।
       सुन्दरियाल जी भौत सालों से कविता गंठ्याणा रैन पर कविता खौळ (संग्रह ) छपाणो मौक़ा अब पायी।  स्वतंत्रता उपरान्त गढ़वळि पद्य मा सकारात्मक शैलीगत बदलाव ऐन अर आज गढ़वाली कविता शैली का हिसाब से अंतर्राष्ट्रीय थौळ मा खड़ी ह्वे सकदी।  सुन्दरियाल जीक कविता संग्रह मा बि कविता तीन प्रकार की कविता छन -छंदमय कविता ,गीत अर गजल जु सिद्ध करदन कि दीनदयाल जी गढ़वळि कविता तैं अंतराष्ट्रीय स्तर तक लिजाणो आतुर छन।
'बिसर्याँ  बाटा बिर्ड्यां मनिख ' कविता खौळ (  संग्रह ) की   कविता , गीत या गजल का विषय सब मानवता, पहाड़  अर गढ़वाल से संबंधित छन अर संग्रह बतांदो कि कवि स्वांत  सुखाय का वास्ता नि लिखणु च अपितु कवि को उद्देश्य मानवता च। 
            कवि सबसे पैल अपणी कविता सीमाप्रहरी रक्षकों तै समर्पित करदो अर देशप्रेम की सूचना दीन्दो। संग्रह  मा भौं भौं विषय छन जन कि -प्रकृति अर पर्यावरण अलग अलग नि छन (म्यरो भै ), गढ़वाल की जनान्युं योगदान अर उनको योगदान (मीकू तो नि बदले अादि कविता ), पलायन से गढ़वाल की बुरी स्थिति (ब्वे आदि ) , धार्मिक अंधविश्वास (राम कि नाउ की अठ्वाड़ ) , राजनैतिक उठापटक। जातिगत बैमनश्य -छुवा छूत , भ्रष्टाचार,   आदि जन ज्वलंत विषयों से कविता भर्यां  च अर  शीर्षक कखि ना कखि विषयों सूचना दे दींदन।
कवि का पद्य विषय प्रेम , वीरता , भौगोलिक , प्रकृति वर्णन से अछूतों नी च। याने कि कविन जीवन का सबि क्षेत्र सामजिक , राजनैतिक , आर्थिक , धार्मिक , प्रकृति चित्रण , प्रेम व अन्य भँवनाएं , आध्यात्मिक क्षेत्रों मा अपण सजग दृष्टि से दिखणो बाद  शब्द चित्रों तैं कल्पना से सहज चित्रित करणो भौत सुंदर प्रयास कार ।
हम सब जाणदा छंवां कि कविता कवि की हृदय की भावनाओं कलात्मक संहाविका हूंदी।  कवि एक सामजिक प्राणी हूंद अर वु समाज का एक विशेष जागरूक व्यक्ति हूंद तो समाज मा परिवर्तन अर परिवर्तन से जु बि अच्छो -बुरो हूणु च वै पर कवि की नजर फटाक से पड़दि।  कवि सुन्दरियाल का यु सामाजिक पक्ष कविता संग्रह मा अधिक सजग ह्वेक आयीं छन। पहाड़ का गांवुं असली भार उखाकि स्त्री उठान्दन अर ऊँ जनान्युं दुःख /पीड़ा का सामयिक, सही , स्वाभाविक चित्रण तबि ह्वे सकद जब कविना या पीड़ा देखि हो और हृदय से अनुभव करी हो अर तब जन्मिन्दन 'खैरी की बिठगी अर ब्वे श्रीका कविता -
तुम लिखदा रैग्यों 
पहाड़ै जनानी कथा
तुम रैग्यों नाउ छपाण पर
तुम रैग्यों पैसा कमाण पर
कबि जाण छ वीं जनानी s व्यथा।
 सरा भारत मा विद्रूपताएं , बिड़ंबनाये भरीं छन अर यूँ मादे एक च छुवा छूत को कोढ़,भ्रस्टाचार कु कैंसर,  दारु पीणो चमळा ।  कोढ़ , कैंसर अर चमळा कविता मा कवि सजग करदो कि यदि यी बिमारी नि जाली तो विकास असल मा विकास नि रै जालो।
कवि रूढ़िवादी कृत्यों पर वैज्ञानिक दृष्टि मारदन अर फिर 'राम की नाउ की अठ्वाड़ ' मा चकड़ैतों द्वारा राम पूजा पर ही प्रश्न चिन्ह लगै दींदन।
बिडम्ब्नाओं पर व्यंग्य की चोट करण मा कवि पैथर नि हटद जन 'नेता ' कविता मा -
ब्याळि तक
हथ ज्वड़ना रैनि
चुनौ जीति
चुसणा बथै गैनि
'कुळबुळाणु च प्राण म्यरो ',  गीत पंक्ति ,   "ज्यु त ब्वनु चा  यखि ऐ जौं" जन गजल की पंक्ति सब जीवंत अर सजीव छन।
विषय गांवका छन अर अनुभवगत छन।
 कविता संग्रह मा सामाजिक यथार्थ , स्थानीयता , जनपक्ष अर प्रगतिशीलता को अच्छो मिळवाक् हुंयुँ च।   शोषण , शोषण पद्धतियों अर शोषण का प्रतीकों पर विरोध साफ़ दिखेंद।
कवि की खसियत च कि  कवितौं मा कविता खतम हूणों बाद कविता का  अहसास अपणी समग्रता मा घनीभूत ह्वे जांद।   
गीतों  का कवित्व प्रभाव शब्दों से ही ना बल्कण मा ध्वनियों से बि ब्यंजित हूंदन।
संग्रह की सबि रचनाओ की भाषा , मुहावरा , प्रतीक जण्या पछयण्या लगदन अर पाठक तै झकजोरण मा कमि नि करदन।
भाषा बड़ी सरल छन जु आम पाठकों कि जिकुड़ि भितर बैठँण मा सशक्त छन।
कविता , गीत या गजल सब आम पाठको का न्याड़ ध्वार की छन अर अवश्य ही कविता संग्रह गढ़वाली साहित्य पाठक बढ़ाण मा सहायक होला।
मेरी शुभकामना कि जल्दी ही दीन दयाल जी को दुसर कविता संग्रह बी छप्याओ !

 
 पुस्तक प्राप्ति - समय साक्ष्य , देहरादून
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 Garhwali Poems by Payash Pokhara  part-1
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-308
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti

     आदिम
         ******
मनख्यूं की घिमसांण मा कख हरचणु च आदिम ।
यखुळ्या-यखुलि अफु थैं अफि ख्वजणु च
आदिम ॥
गौं-गळ्या मा त्वैथै फुलफुल देळि किळै
दिखेण ।
फुलदेई की कुंगळि जैड़्यूं थै उपड़णु च
आदिम ॥
अब चखुलों का च्युचांण फर भि चिरड़ै जांद ।
तबि त कन्दुड़ु अपणा अंगुळा क्वचणु च आदिम ॥
बाघ बांदर सुंगर चौका खळ्याण म छन रिटणा ।
अपणा यूं दगड़्यौं दगड़ क्य ब्वलणु च आदिम ॥
अफु से जादा चंट चालाक कैथै च नि चिताणु ।
तबि त दुख दलेदरा का थौला ब्वकणु च
आदिम ॥
हैंसि खुसि घड़ेक अपणि धणैत लगै ले
'पयाश' ।
कन ह्यळि गडि गडिक रुंदरौ थै द्यखणु च
आदिम ॥
@ पयाश पोखड़ा ॥
त्वै उज्यळा दीणा का बाना
***********************
उमाळ जिकुड़ि कु सुदि त नि
खत्याई होलु ।
कुछ न कुछ वींल त्वैथैं कन नि
बताई होलु ॥
रामि बौराणि सि वा जरुर पुंगड़ि
ग्वडणि रै होलि।
तबि त तिल अपरि कपळि रंगुड़ु
लगाई होलु ॥
इन लगद कि तिल अपणि खुटि
जादै अळगै दीं ।
तबि त तिल सबसे पैलि यो सरग
लिमाई होलु ॥
आंख्यूं मा तेरि लाज सरम त
लुकईं त रै होलि ।
तबि त से झुठन्दरा ल अपणु मुक
फरकाई होलु ॥
सर्या जिदंगि चखुलों का फंखुड़ु
छिनरणा रै जो।
अब क्य जो बुढैण दां क्वी फत्यलु
बचाई होलु ॥
'पयाश' नि बोल कि य आग वीकीं
पिळचईं होलि ।
त्वै उज्यळा दीणा का बाना जिकुड़ु
जळाई होलु ॥
@पयाश पोखड़ा ॥
बाटा, जो आज भि त्वै जग्वाळ कना छन
*************-*********************
ढुंगा गारौं थैं किटदा-किटदा बाटा ।
ठण्डु मठु कै हिटदा-हिटदा बाटा ॥
मोळ-माटल भलिकै लप्वण्यां बाटा ।
चुना-कम्यड़ल छक्वै छप्वण्यां बाटा ॥
द्यप्तों मा दुर्बा आसीस मंगदा बाटा ।
माद्यौ-मंदिर की देळि भ्यटदा बाटा ॥
पाटि-ब्वळ्ख्या बस्ता ब्वक्दा बाटा । इसक्वळ्या छ्वारों थैं ट्वक्दा बाटा ॥
धर्या-धार उचा-निसा डांडो का बाटा ।
नवळि पंद्यरिम अग्यर्या भांडो का बाटा ॥
घास लखुड़ु की बिठिगि बिसौण्यां बाटा ।
ख्वींडी दाथि थमळि थैं पळ्यौण्यां बाटा॥
दगड़्यों को दगुड़ु ख्वज्दा-ख्वज्दा बाटा।
सौंजड़्यों का दगड़ रुज्दा-रुज्दा बाटा॥
तेरि खुदेड़ खुद का समळ्यौण्यां बाटा।
बिसरीं छुवीं बातु का बिसरौण्यां बाटा॥
पुरणा बाटों जनै वी नज़र पुर्यांदा बाटा ।
खाळा-म्याळों मा वी खिर्तू उर्यांदा बाटा॥
औडळ बथौं मा भलिकै भतड़ेदां बाटा ।
हैंस्दा-ख्यल्दा कुरचेन्दा पतड़ेदां बाटा ॥
कमर टुटीं डुण्डि सि उकळि का बाटा।
घुण्डों की खपचईं सि उंधरि का बाटा॥
थक्यां-थक्यां म्वरण्यां-म्वरण्या बाटा।
चिगैं चिंग्वात चिरण्यां-चिरण्यां बाटा॥
पैटगीं इखरु सांस ल्हिदां-ल्हिदां बाटा।
बैठगीं रस्तम तमखू पींदा-पींदा बाटा ॥
डुण्डा ब्यगड़ा तिर्वण्यां मर्वण्यां बाटा।
मुर्क्या भड़क्यां चिर्यां चिर्वण्यां बाटा ॥
खैड़-कत्यार छील-छींजा उकरदा बाटा।
ज्यूंदा-म्वर्यां थैं कांधिम लिखरदा बाटा॥
कै दगड़ भि आणि न जाणि करदा बाटा।
यकुंलास मा भि यखुलि नि डरदा बाटा॥
अब त तुमरा चौकम बिसयां छन बाटा। द्वरढक्कि देखिकि खिसयां छन बाटा॥
दुबट्टा तिबट्टा अर चौबट्टा बाटा ।
झणि कनै लिजाला इ घंघत्वळ्या बाटा॥
घूम-घामिक ये रिटदा-रिटदा बाटा ।
कै गौं जाणा ह्वाला ये हिटदा बाटा ॥
ठ्यलेंदा रस्ता अर सरकदा बाटा ।
द्यख्दै-द्यख्दा सर्र-सर हरचदा बाटा ॥
रोज़ तेरि लब्बी लपग्यूं थैं गैंणदा बाटा ।
रोज़ अपणि जिकुड़ि थैं खैंणदा बाटा ॥
हां, तुमरि जग्वाळ करदा-करदा बाटा ।
से गीं अपणि निंद मरदा-मरदा बाटा ॥
@पयाश पोखड़ा ॥
काश........!!!
*************
मि वल छाल अर तू पल छाल नि हूदुं ।
काश ! हमरा बीचम यो पहाड़ नि हूदुं ॥
हमत तुमथैं सानि कैकि भि न्युति दींदा ।
काश ! आंख्यूं बीचम यो पहाड़ नि हूदुं ॥
जिंदगि मा सदनि मौत थैं ख्वजणा रवां ।
काश ! मौत कु मैती यो पहाड़ नि हूदुं ॥
हमरा गिच्च फर तुमरि छुवीं नि आंदी ।
काश ! हुंग्रा पुर्याणु यो पहाड़ नि हूदुं ॥
मि अपणि लगांदु त तुमरि भि सुणुदु ।
काश ! रुसयूं-खिसयूं यो पहाड़ नि हूदुं॥
खौळ्यां सि चौका-खल्याणा का बीच मा।
काश ! चौंफ्ळा ख्यळ्दु यो पहाड़ नि हूदुं॥
'पयाश' दगड़ तुमरा गौं हम भि आंदा ।
काश ! मुख ऐथर खड़ु यो पहाड़ नि हूदुं॥
@ पयाश पोखड़ा ।
"कुछ त बोलि जैई"
****************
आख्यूं-आंख्यूं मा कबरि-कबरि कुछ त बोलि जैई ।
छुयूं-छुयूं मा अपणि गठ्यईं गेड़ खळ्ळ खोलि जैई ॥
सच्चि-झूटी भलि-बुरि सबि छुवीं म्यारा बांठ धैरिगे ।
आंदा-जांदा कबरि अपणि खुचिलि भि टटोळि जैई ॥
जौं छुवीं सुणि-सुणिक दुख्यरि जिकुड़ि होलि कैकि ।
सच्ची भि होलि ता, बोलि ना, प्वारम धोळि जैई ॥
भ्यलि कि डैळि सि मिठ्ठि होलि तेरि छुयांळ गैळि ।
पर घुघुति कफु हिंलास का दगड़ा दगड़ि
तोलि जैई ॥
कभि न कभि क्वी, कन नि आलु , द्वार उगाड़ि राखि ।
अपणि मयळ्दु माया कि मंदिरि कूणि मा बिटोळि जैई ॥
बिरणा ह्वैकि भि अपणा आंसु किळै लुकंया छन ।
'पयाश' की खालि खुचिलि मा द्वि बूंद फोळि जैई ॥
@पयाश पोखड़ा ॥
"वो क्वी हौरि ह्वाला"
********************
हे बगत ! मि सड़म हिट नि सकदु
त्वै बरोबर ।
वो क्वी हैरि ह्वाला जु त्वै अधमिरा
बाटों मा छौंपला ॥
हे डौंड्यां ! मि द्यप्ता नि ह्वै सकुदु
त्वै बरोबर ।
वो क्वी हौरि ह्वाला जु द्यप्तुळ मा
द्यप्ता सि कौंपला ॥
हे ढुंगेर ! मि नि घण्टे सकुदु डाळि
त्वै बरोबर ।
वो क्वी हौरि ह्वाला जु लंगलंगि
भौक्यूं थैं लौंपला ॥
हे मायादार ! मि नि ह्वै सकुदु मयळ्दु
त्वै बरोबर ।
वो क्वी हौरि ह्वाला जु जिकुड़ि थैं
'पयाश' म सौंपला ॥
@पयाश पोखड़ा ॥
आजादी......? Kavita
---------
पाड़ बटैकि आजादी ....?
पाड़ भ्यटैकि आ जादी ॥
पाड़ छोड़िक आजादी ....?
पाड़ बौड़िक आ जादी ॥
पाड़ मुक फरकाणा कि आजादी ....?
पाड़ कु मुक द्यखणा कु आ जादी ॥
पाड़ जनि छैं च सिनै आजादी ....?
पाड़ कि ज्वनि पाड़ जनै आ जादी ॥
@पयाश पोखड़ा ॥
जो सदनि हैंका कि कूड़ि-पुंगड़ि थैं हत्याणा रैं
---
जो सदनि हैंका कि कूड़ि-पुंगड़ि थैं हत्याणा रैं ।
वो भग्यान अफु खुण अफि खड्वळु खत्याणा रैं ॥
मुण्ड नवै, धुपणु दिवै, करणा रैं डौण्ड्या का ठाउ मा ।
पर वो द्यप्ता पुजै मा भि सदनि अपणो थैं
घत्याणा रैं ॥
अपणा-पर्यो फर प्वणि भारी बिपत देखि-
सुणिकि भि ।
छपछिपी प्वाड़ जिकुड़ि मा जौंकि वो पीठ थमथ्याणा रैं ॥
गुर्रौ अपणु कांचळ निखोळिक अफार वे
द्वळणा बैठ्यूं चा ।
अर ये लकीरा का फक़ीर कोरी कांचळ थथ्याणा रैं ॥
मीनत, मजूरि कैकि जाड़ा बैठ्यां लोग टुक्कू पौंछिगीं ।
ये बड़आदिम बिरणि पीठि मा अफुथैं पत्याणा रैं ॥
छांछ छोळि-छाळिक वो गुन्दकि नौणि कि घूळि गैन ।
ये कपळि फर रंगुड़ु लपोड़िक भाग थैं लत्याणा रैं ॥
बाटा बिरड़ा छाया जु सुबेर, रुम्कां घार बौड़ जाला ।
यो थारम दे-देकि "पयाश" पापी पराण बुथ्याणा रैं ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"वो"
*******
घुट्ट-घुट्ट भडूळ्यं मा 'वो'
इन ब्वना छन ।
कि उंका हाल भि ऐन-सैन
मि जना छन ॥
उळ्यरु पराण, हरचीं जिकुड़ि,
ख्वजदेर आंखि ।
झणि कैका खयालु मा 'वो'
कै जनै ह्यना छन ॥
बल मुखड़ि मनखि कि भौत
कुछ बतै दींद ।
तबि त 'वो' करळि नज़र इनै-
उनै धना छन ॥
दिनम पोतळ, राति जोगण अब
मेरि दगड़्या ह्वैगीं ।
पर जून-गैंणौं दगड़ अब 'वो'
क्य कना छन ॥
घुंघट्या की ढण्डी से गैरी
मेरि जिकुड़ि चा ।
'वो' बल भक्कम फाळ मरणा कु
सांसु कना छन ॥
हे घुघती, कफू, हिंलास आ
म्यारा खळ्याण मा ।
तुमरि बोलि सुणि लगद जन
'वो' ब्वना छन ॥
भारी चलेतर, चबौड़्या, चुकलेर
ह्वै ग्या हवा भि ।
तबि त 'वो' बन्द भितरों का
द्वार ख्वना छन ॥
म्यारा खुदेड़ गीत, गज़ल थैं
पैड़ि-सुणि की ।
'वो' अपणि मयल्दु माया खुण
"पयाश" ब्वना छन ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"ढुगौं का ठप्पकौण्यां"
********************
कत्गा रौला-बौला त उनि छप्पत्वळै कि
तैर ग्या वो ।
पर हम खुणै त ढुगौं का ठप ठप्पकौण्यां
धैर ग्या वो ॥
जाणिकि भि अजाण बणिकै वैका काख-
धाड़ बैठु मि ।
द लाटु अपणि जगा छोडिकि सर्र फुण्डै
सैर ग्या वो ॥
क्युंकळि, किसळि, कादै अर जिकुड़ि मा
भटुळि सि लगैकि ।
आंख्यूं-आंख्यूं मा झणि क्य-क्या सानि
कैर ग्या वो ॥
तिसळा पराणा की छम्वट्या तीस भि
तिसळि रै ग्याइ ।
म्यारा रुफ़ड़ांदा सरैल देखिकि जणि
डैर ग्या वो ॥
दुन्यां का समणि गिच्चु उफरणा की
हिकमत नि छे ।
ब्वन-बच्याणा कु कभि भितर त कभि
भैर ग्या वो ॥
दीनद्वफरि का चुड़ापट्टि का घाम मा
ठण्डू छैल सि ।
जांदा-जांदा अचाणचक "पयाश" खुणै
ठैर ग्या वो ॥
पर हम खुणै त ढुगौं का ठप ठप्पकौण्यां
धैर ग्या वो ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"जिकुड़ि का मोर-संगाड़"
**********************
इत्गा भि यखुल्या-यखुलि कभि नि राया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ।
कभि त क्वी,संगुळु बजालु,तरसणा छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
द ब्वाला, अब कैमा लगाणै अपणि,
खैरि-बिपदा, सुख-दुख ।
अब त गौं मा भि कैका नि उगड़्यां छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
अपणु-पर्याअ, दाइ-दुसमन, वाडा सरै
अर उज्याड़ खवै ।
सर्या रुड़ी-बसगाळ भलिकै सैड़िगे छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
पल ख्वाळा का बूथा दाजि ब्वना छाया,
अपणा नाती-नतण्यूं मा ।
वे जमन मा दिन-रात खुल्यां रैंदा छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
एक जमनु इन भि अयूं च अचकाळ,
म्यार गौं का वार-प्वार ।
भिचोळि-भिचोळिक भि नि खोलि पाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
मिल त अपणि छुवीं-बत्था सदनि,
दिल का भित्नै लुकाणु रौं ।
पर दिवल्युं का भि कच्चा कंदुड़ छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
ल्हेलु भि त कनकै ल्हेलु अपणि
जागा-जमीनि की फ़रद ।
घूसखवा पट्वर्री का पट बन्द कर्यां छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
कोठि,बग्लां, कार, फून हौरि झणि
क्य-क्या झमकयूं चा ।
फेरि भि खन्द्वार सि किळै दिखेणा छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
कभि न कभि, क्वी न क्वी, कन नि आलु
म्यारा भि ध्वार-धरम ।
तुमरा भर्वंसा "पयाश" का ख्वल्यां छाया,
जिकुड़ि का मोर-संगाड़ ॥
@ पयाश पोखड़ा ।
हम भि कै जमन"
****************
बरखा का दीड़ों मा भिज्दा छाया,
हम भि कै जमन ।
सौणा का स्वीणों मा रुज्दा छाया,
हम भि कै जमन ॥
सर्र कुएड़ि सि लौकेन्दि छे,
जब-जब जिकुड़ि मा ।
तुमरा सौं तुमथैं त ख्वज्दा छाया,
हम भि कै जमन ॥
आंखि-आंख्यूं मा मायादार,
छुवीं-बत्था बिंगै कि ।
छुयांळ आंख्यूं कि छुवीं लुच्छ्दा छाया,
हम भि कै जमन ॥
पोतळ सि कभि ईं धार वोर त,
कभि वीं धार पोर ।
झणि किळै तुमरा पैथर भज्दा छाया,
हम भि कै जमन ॥
बुलबुल पलोसिक अर कैदि,
स्युदिं-पाटी कटोरिक ।
तुमर बान बैख जन सज्दा छाया,
हम भि कै जमन ॥
@पयाश पोखड़ा ।

अस्तित्व की विडम्बना" फर द्वि गढ़वळि शेर ----
बूंद बणिकै चुप्प बैठ्यूं रौ,
आंख्यूं का कुण्यूं मा ।
भैर ढळक्येळि त आंसु सि,
हर्चि जैलु गळ्वड़्यूं मा ॥ (१)
ब्याळि तक जो मवस्यूं का
मुच्छ्यळा मुंजाणा रैं ।
लोग उंथैं आज धुपणूं
दीणा कु खुज्याणा रैं ॥ (२)
@पयाश पोखड़ा ।

नि दिखेन्दी"
************
क्वी घिंडुड़ि न घुघुति,
सटुलि नि दिखेन्दी।
चौका तिर्वळि अब क्वी,
चखुलि नि दिखेन्दी ॥
क्वी खाळा न म्याळा,
कौथिग नि उरेन्दा ।
लाल जल्यबि दगड़ क्वी,
बंसुळि नि दिखेन्दी ॥
सरम ल्याज़ का दगड़ा,
सूनू चन्दी भि हरचा ।
दादी का गाळुन्द अब क्वी,
हंसुळि नि दिखेन्दी ॥
मासा, चौमासा मा हैरि-
मौळ्यार धौ दिखेन्दा ।
पर कखड़ि-ग्वदड़ि की,
लगुलि नि दिखेन्दी ॥
पैड़ि-लेखि गैन लोग,
अब गळद्यवा नि राया ।
गौं मा कैकि डाळा लगीं,
झगुलि नि दिखेन्दी ॥
सैड़िकि कुयड़ु-कुयड़ु सि,
ह्वै ग्याइ वा डाळि ।
झपन्याळ पात सि वींकी,
भिंटुलि नि दिखेन्दी ॥
जनै द्याखा "पयाश" उनै,
जिकुड़्यूं का चोर छन ।
क्वी पराज़ न खुद,
भटुळि नि दिखेन्दी ॥
@पयाश पोखड़ा ।
झूटु च आदिम"
***************
सेरेक सच्चु अर पाथेक झूटु च आदिम।
तबि त थांता मसकुटौल कूटु च आदिम॥
जमादरि कबि त थ्वकदरि सि दिख्याई।
तबि त कत्गौले भलिकै लूटु च आदिम॥

ल्वैखाळ ह्वैकि ल्वै का छंछ्वड़ा लगैन।
तबि त कत्गै दा फट्ट फूटु च आदिम॥
सदनि लूण मरचा की मुट भ्वरीं राखा।
तबि त सबुल भूटंण सि भूटु च आदिम॥
तकणा तकण हुईं राया दिन राता की।
तबि त सुख्यूं क्याडु सि टूटु च आदिम॥
कबि गिच्चा बटैकि भला बाग नि छूटा।
तबि त कड़ु गिळै सि घूटु च आदिम ॥
सदनि दपकाणु राया अपणा पर्यो थैं ।
तबि त बिछी गुर्रो सि चूटु च आदिम ॥
आंखि मनिख्यूं थैं ख्वज्याणि च "पयाश"।
तबि त अदम्यूं दगड़ छूटु च आदिम ॥
@ पयाश पोखड़ा ।


Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016
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Bhishma Kukreti

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Garhwali Poetries by Payash Pokhara Part 2-
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-308
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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"जिंदगि घण्डाघोड़ हुईं चा"
************************
स्याम-सुबेरा कि उठा-पोड़ हुईं चा ।
जिंदगि वल छोड़ पल छोड़ हुईं चा ॥
छि: भै या कनि घुवांरोळ करीं चा ।
जिंदगि जन तमखू की सोड़ हुईं चा ॥
बगैर दवै-दारु का कणाट-रुणाट चा ।
जिंदगि जैर-मुण्डरा की तोड़ हुईं चा ॥
ब्यखुनि-फज़ल जिंदगि थैं बुलाणा रवां।
जिंदगि ऐड़िकै कि पल्या छोड़ हुईं चा ॥
धौ संदकै नांगा गात थैं ढकाणा रवां।
जिंदगि मा सदनि जंक-जोड़ हुईं चा ॥
त्यारा-म्यारा भाग कु कैल लुछी साक।
जिंदगि मा मुण्ड फ्वड़ा-फोड़ हुईं चा॥
दैं पाळि का बैं पाळि नि ठस्कै साका।
जिंदगि हैळा का दुदन्तु बोड़ हुईं चा ॥
चल एकदां फेरि हथ थामिकि हिट ले ।
जिंदगि चिफळि सड़कि कु मोड़ हुईं चा॥
बगैर बरखा चाल चमकणि च "पयाश" ।
जिंदगि पिरुळु बीच घण्डाघोड़ हुईं चा ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"वो क्य समझणू चा"
******************
खन्द्वार हुयां कूड़ो थैं घार समझणू चा ।
उड्यार हुयां म्वारों थैं द्वार समझणू चा ॥
जणेक घूम फर जो छट्ट छोड़ जंदनि ।
वो यूं सड़कि बाटों थैं यार समझणू चा॥
ब्यखुनि-फज़ल बड़ि-बड़ी छुवीं लगांद।
बड़अदम्यू का वार-ध्वार समझणू चा॥
एक्सपोर्ट का लारा-झुल्ला गति लगैकि।
लेविस की जीन्स थैं सुलार समझणू चा॥
दुन्यादारि सिख्दा-सिख्दा दानु ह्वै ग्याइ।
अभि तक द्वि जमा द्वि चार समझणू चा ॥
अंध्यरा मा लै गीं वो सर्या फसल-पात ।
वो जौंथैं वो सळौं की डार समझणू चा ॥
वो त वैका दादा कु मन्यौडर अयूं छाई ।
जैथै वो वैका बब्बा कु तार समझणू चा ॥
सोचि-समझिक भ्यटेंई वैथै तू "पयाश" ।
द्वि फांग्यूं ल्हेकि थोकदार समझणू चा ॥
कत्गै खुद खड्यईं छन खुदेड़ माटा मा।
वो मिथैं मटगळा की धार समझणू चा ॥
@ पयाश पोखड़ा ।
रुमुक सतपुळि नयरि छाल की
****************************
थड़्या-चौंफळा सि लगाणि च रुमुक ।
जन जून भ्यटणा को जाणि च रुमुक ॥
मेळु-पंया-सकिन्या का पल्वस्यां फूल ।
अफु पिंग्ळि पोतळ चिताणि च रुमुक ॥
कुबरण्यां-डुबरण्यां कळचुण्ड़्या आंखि।
फर्र-फर्र ड्यब्ळि फरकाणि च रुमुक ॥
समळ्यौण्यां खुद थैं बटि-बाटा लगैकि ।
बिंदरि गौड़ि सि कन रमाणि च रुमुक ॥
पिंग्ळु दुसला कु मुण्ड्यड़ू बांधिकि ।
कणट करदा-करदा जाणि च रुमुक ॥
दिनमनि की हैंसि ठट्ठा छोडि-छाडिक ।
यखुल्या यखुलि रुफणाणि च रुमुक ॥
झणि कै का सोचुम पोड़िक "पयाश" ।
खुट्यूं ऐथर-ऐथर सरकाणि च रुमुक ॥
@पयाश पोखड़ा ।
जु धार पोर यखुलि कुळैं डाळि नि हूंदी
****************************


मी से अब हौरि हाळि-झाळि नि हूंदी ।
सच्चे मी से अब आळि-टाळि नि हूंदी ॥
निसिणि जि किळै कैरु मि कैका बाना ।
न भै, मी से अपणि रात काळि नि हूंदी ॥
जत्गा खतुदु उत्गा हौरि भ्वरे जांदा । मयळ्दु खुचिलि कभ्भी खाळि नि हूंदी ॥
जलमजात कु गळद्यवा छे, दे ले छक्वै ।
पर मी खुणै तेरि गाळि, गाळि नि हूंदी ॥
सदनि लुण्यां-काजोळ आंसु ब्वगणा रैं ।
मेरि खुदेड़ आंखि कभि छाळि नि हूंदी ॥
जु जिकुड़ा का भीतर च, वी भैर भि चा ।
भला आदिम से कतै इंद्रजाळि नि हूंदी ॥
आज म्यारु गौं सोरग से कम नि हूंदु ।
जु द्वार-मोर-संगडु फर ताळि नि हूंदी॥
गौं का द्यप्ता गौं मै रैंदा, सरत लगैले ।
नेतौं का हथुम जु डौंरि-थाळि नि हूंदी ॥
कन जि नि द्यख्दा भय्यूं का सुख-दुख ।
जु द्विया भितरौं का बीच पाळि नि हूंदी ॥
यो मोळ कु माद्यौ सदनि मोळ रै जांदु ।
जु अंध्यरा मा तिल बत्ती बाळि नि हूंदी ॥
समळौण्यां खुद थैं, को समळांदु 'पयाश'?
जु धार पोर यखुलि कुळैं डाळि नि हूंदी ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"आंसू"
*******
रुंदा-रुंदा इतगा रुणपित ह्वैगीं आंसु ।
मेरि आंख्यूं मा सदनि खुण से गीं आंसु ॥
धौ-संदकै जनि मिल बिजळिं इ आंसु ।
तनि फेरि खुचलिम मुण्ड नवै गीं आंसु ॥
धुयां-धुयां लगणा छन इ काजोळ आंसु ।
आंसु थैं आंसुल भलिकै ध्वै गीं आंसु ॥
दिन-रात मेरि सीणी की निसिणी काया ।
मी दगड़ सर्या राति बिज्जी रैगीं आंसु ॥
सर्या साल आंसु कि फसल लैणा रवां ।
तैळ्या-मैळ्या सार्यूं छक्वै ह्वैगीं आंसु ॥
मुण्डम धैरिकि कर्जा कि सि फंच्ची ।
बिना बिसौण की जिदंगि कै गीं आंसु ॥
खौळ्यूं-खौळ्यूं, बौळ्यूं सि च "पयाश" ।
लोग वैका गळ्वड़ों मा तरकै गीं आंसु ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"प्लीज़"
*******
त्वैकु हथ ज्वड़्या छन घड़ेक
चुपरौ प्लीज़ ।
ल्वैखाळ ज़िकुड़ा मा लूण नि
बुबरौ प्लीज़ ॥
पसेण फर लग्यान म्यारा छाळा-
फुफ़रा ।
अपणु लप्यता थैं मी जनै नि
हपरौ प्लीज़ ॥
म्यारु मिज़ाज हौरु से ज़रसि
करळु चा ।
मी थैं जना-कनौं फर कतै नि
सबरौ प्लीज़ ॥
भ्यटेले जतगा भ्यटेणी छे जै
दगड़ भि ।
पर मेरि अंग्वळि का बाना नि
टपरौ प्लीज़ ॥
"पयाश" त खरड़ि धारम भि छैल
खोज़ि द्यालु ।
चुड़ापट्टि कु घाम हूण चैंद दिन-
द्वफरौ प्लीज़ ॥
@पयाश पोखड़ा ।
भाई विनोद रावत जी को सप्रेम समर्पित-
***********************************
मि हिटणु रौं, मि हिटणु रौं,
मि हिटणु रौं ।
खुट्यूं का छाळौ थैं किटणु रौं,
मि किटणु रौं ॥
निंद मलसणि राया मुण्ड,
सर्या-सर्या उमर,
अदनिंदळ्या मा भि स्वीणा द्यखणु रौं,
मि द्यखणु रौं ॥
म्यारा भाग मा हि छे या,
निरभागा की भताग ।
छारु लग्यां भाग थैं छिटणु रौं,
मि छिटणु रौं ॥
मेरि लपग्यूं फर यो गंगल्वड़ा,
को बांधि ग्याइ ।
कीला कु सि गोर रिटणु रौं,
मि रिटणु रौं ॥
मील त ग्याइ मत्थि दाजी थैं,
बुबाजि की चिट्ठी ।
किळै पोस्टमैन दादा थैं बिटमणु रौं,
मि बिटमणु रौं ॥
कन कट्या आंख्यूं-आंख्यूं मा,
सर्या रात "पयाश" ।
भदळुन्द कु छन्छ्या सि खिटणु रौं,
मि खिटणु रौं ॥
यो क्य लेखिगे आंसुल जिकुड़ि की
पाटी मा ।
बगैर फुज्यां अफि-अफि मिटणु रौं,
मि मिटणु रौं ॥
@पयाश पोखड़ा
त्यारा गौं मा
************
भितरौं-भितरौं म्वाड़ा म्वर्यां ह्वाला, ब्वलेंद त्यारा गौं मा ।
चौछ्वड़ि काण्डा-क्याड़ा धर्यां ह्वाला,
ब्वलेंद त्यारा गौं मा ॥
आस छे, उज्यळु छ्याई, हैंसि-खुसि छे ब्याळि तक ।
आज निरसा अंध्यरा भ्वर्यां ह्वाला, ब्वलेंद त्यारा गौं मा ॥
मेरि दीदी, तेरि भुलि, काकि-बोडी अर पिठल्वठ्या भै ।
बाटाउंद रिस्ता-नाता स्वर्यां ह्वाला,
ब्वलेंद त्यारा गौं मा ॥
तेरि आख्यूं मा पाणि बूंद अब किळै
नि चिफळेन्दी ।
"पयाश" देखिकि आंसु डर्यां ह्वाला, ब्वलेंद त्यारा गौं मा ॥
मुछ्यळा मुंजिगीं सबि मवस्यूं का पर धुवांरोळ हुईं चा ।
सबुका चौदा करम कर्यां ह्वाला,
ब्वलेंद त्यारा गौं मा ॥
@पयाश पोखड़ा
म्यारा ब्वै-बब्बा
**************
रिटैर सि सिपै-चौकीदार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ।
खंद्वर्या कूड़ियूं का पैरादार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
पिनसिनी कि फसल-पात हुणीं च
मैना का मैना ।
लैंणा, कटेणां कु तैयार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
लैगी, बरमूडा, कैप्रि, जीन्स का जमना
मा घुमुणुं छौं ।
दरदरा पट्टदार सुलार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
ब्वै का मुर्खला बब्बा की मुरखी बेचिं
दीं मिल वै दिन ।
जै दिन बटैकि बिमार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
जाण न पछ्याण क्वी सारु दिदंरु
भि नि राइ युंकू ।
द्वि अदम्यु कु परिवार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
नौना-बाळौ दगड़ हैंसि-खेलि मा
सदनि रंगमत्या रौं ।
दुख-दैनि का असगार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
क्य कन, बूढ़-बुढ्यौं कु पापी पराण
भि त नि मनदू ॥
अपणै छ्वारौं कु छुछकार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
रोज-रोज गेड़ मारि-मारिक गंठेणु
च दानू सरैल ।
खटुला का सड़यूं निवार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
नाति-नतणों कु ळाळ चटणा कु ज्यू ब्वळ्द आज भि ।
दुदिबाळा कु बुखार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
हां, ह्वालु सोरग ब्वै-बाबुका खुटौं मा "पयाश" पर ।
एक लपाग कु लाचार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"सड़क"
********
बट्या-बाट ठिट्ट झणि कख जि जाणि
च य सड़क ।
रस्तम अयां मनिख्यूं थैं कख जि लिजाणि च य सड़क ॥
न भै न, कभि लटंगौं का बाना भि सड़क गौं तक आई ?
हां, पड़्यां-लिख्यौं थैं डिल्लि धौ लिजाणि च य सड़क ॥
दिनमनि उज्यळौ मा कत्गौं फर उत्यड़ा लगणा छन ।
पर राति अंध्यरा मा सीदा घारम लिजाणि च य सड़क ॥
सड़कि का घूम सि मरोड़ि याल तुमुल भि य ज़िंदगि ।
कभि त्यारु ल्वै अर म्यारु पस्यौ लिजाणि च य सड़क ॥
क्वादू-झुंगरू-कौंणि का डाळा द्यखणा का बाना ।
कभि-कभि नाति-नतणों थैं गौं लिजाणि च य सड़क ॥
एकदां चिफ्ळै गैन जु चिफ्ळपट्ट द्विया पौ "पयाश" का ।
अग्नै भि चिफ्ळैणा कि डैर चा इन बताणि च य सड़क ॥
@पयाश पोखड़ा ।
मौसम
******
यो रुज्यूं-रुज्यूं सि भिज्यूं मौसम ।
यो भिज्यू-भिज्यूं सि रुज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि कुएड़ि लौंकै जांद,
यो मनस्वाग बाग सि गिज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि सुपिन्यां खोलि जांद,
यो सर्या रातिकु सि बिज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि खुद लगै जांद,
यो जण्यूं-पछ्यण्यूं सि दिख्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि माया पैड़ जांद,
यो लिख्यूं-पड़्यूं सि सिख्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि झैळ लगै जांद,
यो काचु अमलटु सि मुज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि दपगा मारि जांद,
यो नांगा हथ-खुटौं सि छिज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि कनै भाजि जांद,
यो टिमरु कु ट्यक्वा सि टिक्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि मोल-भौ कै जांद,
यो हत-हथ्यूं मा सि बिक्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि दौंळि बांधि जांद,
यो लैन्दी गौड़ि सि पिज्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि याद दिलै जांद,
यो आंख्यूं मा आंसु सि रुक्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि जिकुड़ि भैर आंद,
यो गाळ मा क्यूंकळि सि लुक्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि आंखि भीजि जांद,
यो छारु-माटु-गारु सि सुख्यूं मौसम ॥
बेरी-बेरी फेरि कीच-कीच कै जांद,
यो "पयाश"देखिकि खिज्यूं मौसम ॥
@पयाश पोखड़ा ।
सौंगु च फांस खाणु ।
***
कठण च ठ्यलिणि जिदंगि यख,
पर सौंगु च फांस खाणु ।
जन-कनौ कि बसै बात नि भुला,
ख्वळु-ख्वळु भांडा मंजाणु ॥
ब्वनि च त ब्वन दे तू दुन्यां थैं,
कैकु गिच्चू कैल थामा ।
कबरि तक जि रैलु तू ढौळ पुर्या,
स्यूं बिग्च्यां द्यप्तों नचाणुं ॥
बट्या-बाट जु अबट्टा गैन,
वो क्य बाटु बताला,
चौबट्टा मा छुट्यूं मनिखि कु,
सौंगु नि हूंदु घार आणु ॥
त्यारा गांवा का सच ब्वल्दरा भि,
झणि कै वुभरा लुक्यान ।
हां, झूट धौ राई रातदिन गौं मा,
कांसि कु कट्वरा नचाणु ॥
जेठ-बैसाक कतल कै रूझिगीं,
ऐंसु का साल रूड़्यूं मा ।
भलि कै छपत्वळ्ये ग्याइ "पयाश",
ह्यूंदम को जि यख आणु ॥
@@
" फ्वळ्यै ग्याइ "
***************
दळिम्यां की मेलि सि,
एक बूंद आंसु कि,
गळ्वड़्यूं मा उत्तड़ैकि,
चर्यौ सि फ्वळ्यै ग्याइ ॥
बर्खा कि बणदरि सि,
एक धारि आंसु कि,
आंख्यूं कि पतन्यर्यूं मा,
पाणि सि रळ्यै ग्याइ ॥
बसगळ्या दीड़ौ सि,
एक छ्वाया आंसु सि,
जिकुड़ि फोड़ि-फाड़िक,
खुद सि छ्वळ्यै ग्याइ ॥
लुण्यां-अलुण्यां मनतति सि,
एक तौलि आंसु कि,
हथ-खुट्यूं का पराज़,
स्यळ्यै कि हळ्यै ग्याइ ॥
काळि कळचुण्डि कुएड़ि सि,
काज़ोळ सि आंख्यूं मा,
एक गुरमुळि माया कि,
बिनै कि कळ्यै ग्याइ ॥
चर्यौ सि फ्वळ्यै ग्याइ ॥
@ पयाश पोखड़ा ।
"आंसू"
*******
भारी-भरसक कैकि आंख्यूं हैंसाणु
रौं मि सदनि ।
युं खुदेड़ आंख्यूं मा आंसु लुकाणु
रौं मि सदनि॥
आंख्यूं मा जन दणमण-दणमण
चौमस्या बरखा,
तरकण्यां गळ्वड़युं का आंसु सुखाणु
रौं मि सदनि ॥
काज़ोळ आंख्यूं का छाळा आंसु
थम्दा-थम्दा,
नै इगसि-बग्वळि तक आंसु पुर्याणु
रौं मि सदनि ॥
बस कैर, हैंस्दा-हैंस्दा कखि रुणुं नि
ऐ जाव मिथैं,
रैड़ नि जैं आंसु इलै आंख्यूं झुकाणु
रौं मि सदनि ॥
मेरि आंख्यूं का पाणि को क्य मोल-
तोल लगांदि,
खाळा-म्याळों मा अपणा आंसु बिकाणु
रौं मि सदनि ॥
स्वीणा बणि कै कभि आला त वो
मेरि आंख्यूं मा,
ह्यरदा-ह्यरदा अपणा आंसु बुथ्याणु
रौं मि सदनि ॥
त्वै याद करदा-करदा जनि मेरि
जिकुड़ि स्यळ्याई,
तनि सुख्यां आंसु मा आग लगाणु
रौं मि सदनि ॥
तेरि खुदेड़ माया की तुलबुल तामि
भोरि-भारिक,
'पयाश' का पुरणा पैंछा आंसु चुकाणु
रौं मि सदनि ॥
@पयाश पोखड़ा ।
एक गज़ल गंज्यळि दलेदर ब्वाडा का नौ
***********************************
द बब्बा ! धौ संदकै बच्यूं छौं,
अभि तलक ।
जैर-मुण्डरळ छक्वै तच्यूं छौं,
अभि तलक ॥
हैड़-हैड़ दुखणा छन,
हडकि बिनाणि छन ।
ग्वाठक मुंग्रल सि छक्वै थिच्यूं छौं,
अभि तलक ॥
चुनमंडि पींदा-पींदा,
गाळु उबै ग्याइ ।
माछौं कु सुर्रा पीणु गिज्यूं छौं,
अभि तलक ॥
फलगट झाड़िक,
लीसू निचोड़िक चलगीं ।
सरकरि कुळैं सि लिच्छ्यूं छौं,
अभि तलक ॥
सर्या दिनमान खंतिड़ि-रजै
पुटुग फग्वसै ग्यौं ।
पस्यौ मा कतल कैकि भिज्यूं छौं,
अभि तलक ॥
अब त खुटा भि
खटुला से भैर ह्वैगीं ।
पलासटिका पल्यूड़ सि खिच्यूं छौं,
अभि तलक ॥
द्विया खुटि तिथांण म
रंगुणु चटणि छन ।
पर ग्वेर छ्वारों जन बिग्च्यूं छौं,
अभि तलक ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"बीड्यो साब"(BDO SAHEB)
*************************
कैका भि नि छन यख भला हाल-
बीड्यो साब ।
सबुका हुयां छन यख बुरा हाल-
बीड्यो साब ॥
सफेद कुरता-सुलार पैरिक,
कभि त आला ।
द्यप्तों थैं कना छवां यख जग्वाळ-
बीड्यो साब ॥
भूकल पुटिगि पट्ट पीठि फर,
चप्प चिप्कीं चा ।
फेरि भि हम छवां यख प्यटपाल-
बीड्यो साब ॥
अपणि अग्यार कभि आलि कि
नि आलि कुजाण ।
बैठ्यां छवां यख चौका का तिर्वाळ-
बीड्यो साब ॥
कपळि हथ लगैकि रस्ता-बाटा
ह्यरणा छवां ।
बिकासा कु कब तड़्यालु तिरपाल-
बीड्यो साब ॥
सकळा मन ल्हेकि उकळि वुभु
लग्यां छवां ।
कभि कटेलि भि या तड़तड़ि उकाळ-
बीड्यो साब ॥
अफु नि उठि सकणा छवां त फेरि
को उठालु ।
बांजा पुंगड़ा सूखा सग्वड़ों कु सवाल-
बीड्यो साब ॥
जींस-सरट इसपोर्ट सू ब्यल्ट कमर
रसकैकि ।
मौरनिंग वाक फर आज हमर छाल-
बीड्यो साब ॥
ईं निगुसैं सरकारा का तुमी त छवा
सैंगुसैं ।
बाकि भग्यनु ल ता नौकिरि धंग्वाल-
बीड्यो साब ॥
कारा न, कुछ त कारा कुछ त
ह्वालु हतम ।
तुम भि त नि छवा सरकरि फिक्वाळ-
बीड्यो साब ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"खुज्यावा त सै"
***************
डाळि-बोट्यूं कु कख च छैल,
खुज्यावा त सै ।
दैन-दुसमन्यां कि कख च झैळ,
मुंज्यावा त सै ॥
निरपण्यां सि आंखि अब त,
रुणु भि बिसिरि गैन ।
मुण्ड टिकैकि कांधमा कैकि गात,
रुझ्यावा त सै ॥
भोटु का ळिक्वाळ रुंगड़िक,
रिकद्वळण्युं पणसै गैन जो ।
स्यूं भोट बिट्वळ्दरों थैं कठगौंल,
घुच्यावा त सै ॥
छोरि-छ्वारा, गोर-भैंसा सबि,
भूक-तीसल बिबलाट कना छन ।
बीजा का खिरबोज, मुंगरा तौलुन्द,
उज्यावा त सै ॥
गाळ्यूंकि कनि परचतन हुईं च,
त्यारा गळद्यवा गौं मा ।
तबि सुणेलि तेरि बात, पैलि गिच्चू,
बुज्यावा त सै ॥
मीज़रनामा ल्यख्वार त सबि,
ह्वै जंदि पंचैति की पंचैत मा ।
पैलि फैड़्यूं मा बैठिकि स्यूंण-धागु
कुच्यावा त सै ॥
मनख्यूं कि घिमसाण मा भि,
यखुलि सि बिरणा दिखेंणा छवा ।
कभि अपणों दगड़ अपणों घार,
खुज्यावा त सै ॥
@पयाश पोखड़ा ।

-
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016
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पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली , कविता ; चमोली  गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; 
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Bhishma Kukreti

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Excellent Garhwali Poetries by Payash Pokhara Part -3
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-308
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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उलखणि-उलखणि (गज़ल)
************************
कन रुसाई म्यारु दगड्या,
ब्याळि यखुलि छोड़ि ग्याइ ।
निंद बिटोळि-बटाळिक ल्हीग,
खालि-खटुलि छोड़ि ग्याइ ॥
रात-दिन, ब्यखुनि-फज़ल,
सदनि जैंथैं पुजणां रवां ।
जिकुड़ि का बांजा चौक म,
डाळि तुलसी छोड़ि ग्याइ ॥
त्यारा बगैर खुदेड़ दिनुकि,
गणत करदा रै ग्यवां ।
वो नै कलैण्डर टंकणा को,
खालि दिवलि छोड़ि ग्याइ ॥
स्वीणां अंछण्यांटम धैरिक,
बिरणि माया गिंडाणा कु ।
खुद रमठाणा का बाना,
ख्वींडी थमळि छोड़ि ग्याइ ॥
नच्दा-नच्दा द्यप्ता थैं,
भारि भिरिंगी चैड़ि ग्याइ ।
लाल आंख्यूं देखि जगरि,
डौंरि थकुलि छोड़ि ग्याइ ॥
बिजोग प्वाड़ मति फर,
मि त चट्ट बिसिरि जांदु ।
खुद लगाणु कु सिर्वणि ताळ,
अपणि नथुलि छोड़ि ग्याइ ॥
@ पयाश पोखड़ा ।
माया
******
मेरि माया थैं सौंगि सौंग्यार नि समझी ।
देर ह्वेलि पर लब्बी अग्यार नि समझी॥
ऐथर-पैथर रंगमत फूलु की डार ह्वैलि ।
हैरि पत्यूं थैं मयळ्दु मौळ्यार नि समझी॥
मुखड़ि हळ्दण्यां नि ह्वा कैकि खुद मा ।
प्योंलि का दगड़ पुरणु प्यार नि समझी ॥
ह्वेलि तेरि जाण पछ्याण सर्या मुल्क मा।
पर मि गरीब थैं खैड़ कत्यार नि समझी॥
पंगत बणै खड़ा मरचण्यां धुपणुं दिवया ।
आंसु फुंजदरौं की लंग्यार नि समझी ॥
'पयाश' की कांधिमा मुंड धैरि नि रूणुं ।
वीं जिकुड़ि तु सेळि स्यळ्यार नि समझी॥
@पयाश पोखड़ा ।
एक "ग्याड़ू" की गज़ल "लकदक डाळि" भाई गणेश काला जी का नाम समर्पित ।
***********************************
बल ज्व डाळि जत्गा लकदक रैंद ।
ढुंगेरु की वींफरै उत्गा टक रैंद ॥
कैल कै छे या सर्या डाळि खालि ।
सित्गा याद कब कैथै कख रैंद ॥
सर्र बिसर जांद वा पुरणी कचगा ।
नै कुटमणों मा बणि लकझक रैंद ॥
ढुंगा चुटन्दरा को छाई ? कुजाण ।
वींकु सदनि 'पयाश' फर शक रैंद ॥
डाळि जैकि ह्वैलि तैकि ह्वैलि भारे ।
हां, छैलु बैठणा कु त सबुकु हक रैंद ॥
बिसुदि छैल की सुनिंदि मा ख्याल नि ।
डाळि कु लप्यता प्वड़्यूं जख-तख रैंद ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"बागी और बगावत"
******************
उत्तराखण्ड मा बाग्यू कि बक्किबात कि बग्वौत ह्वाई ।
कर्रर कग्वौत-कग्वौतिक सर्या सरकार कग्वौत द्याई ॥
गौं की रामलीला कु सि सीन खट्ट इन बदळ्याई ।
बागी बुगणा दगड़ ह्वैगीं अर खौळ्यूं सि
रौत ह्वाई ॥
अंग्वाळ बोटिक दगड़ा दगड़ि खड़ि छे ब्यालि तलक ।
लाल बिलोज पिंग्ळि साड़ि पैरिक कैकि सौत ह्वाई ॥
आरया आरि कुलड़ा चलै ग्याइ अपणों का जाड़ों फर ।
घ्वाड़ों की बिकरिबट्टम अपणा पाड़ा की मौत ह्वाई ॥
कुणजा का बूना ल सोरी ग्याइ जो कूणा कुणजुखाळा का ।
निरबिजी कै ग्याइ भग्यान बिदानसबा की औत ह्वाई ॥
आज वळ्या ख्वाळ त भोळ पळ्या ख्वाळ सिन नि डब्का ।
धरु-धरु मा नि नचावा लोकतंतर अब मजाक भौत ह्वाई ॥
सरम न ल्याज, इनै कु प्याज उनै भ्याज, यो कनु रिवाज ।
हण्ड-बिभण्ड कैरि उत्तराखण्ड दगड़ कनि ठग्वौत ह्वाई ॥
@पयाश पोखड़ा ।
एक कच्ची-पक्की "कच्ची" फर
***************************
ब्वै-बब्बौ की पिनसनी मा ।
दारू पीणा छन दिनमनी मा ॥
गोरु-बछुरु मुग्दान लगैकि,
कच्ची बणाणा छन छन्नी मा ॥
कन ढंर्गचाळ बिगड़ मवसौं कु,
छ्वारा बिहोस भप्पी ज्वनि मा ॥
ना करणि-धरणि ना कमै-धमै,
हथ पसरणा छन जननी मा ॥
खाणा-पीणाकु भलु सज अयूं च,
मौज-मजा कना छन परधनि मा ॥
खज्यतू अयूं च अर फजितू हुयूं,
गुंग बण्यां छन दाना दिवनी मा ॥
बिना पियां नरग रैण तिल "पयाश",
चित्त ह्वै जैलु तू एक चवन्नी मा ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"खुद"
*******
आज फेरि हथगुळ्यु मा,
किसळि सि लगणि चा ।
आज फेरि क्वी भटुळि,
तिसळि सि लगणि चा ॥
कब बटैकि दिखेणा छवा,
कख छाया तुम ?
आज फेरि तेरि बात,
हिंसळि सि लगणि चा ॥
दगड़्यौंल दगड़्यौं मा,
इसक्वल्या छुईं पुरैना ।
आज फेरि जिकुड़ि मा,
झिसळि सि लगणि चा ॥
बिसर्या दिनु कि खुद,
क्वी ठस ठसोळि ग्याइ ।
आज फेरि दुखदा मा,
ठिसळि सि लगणि चा ॥
कब बटैकि आंख्यूं मा,
आंसु भैर नि आया ।
आज फेरि आंख्यूं मा,
रिसळि सि लगणि चा ॥
वो सुख्यूं सि फूल,
कनै उड़ रे "पयाश" ।
आज मेरि जिकुड़ि,
बिसळि सि लगणि चा ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"निगुसैं करा"
***********
औंस्या रात्यूं मा भि जळ्यूं त छाई ।
पर दूर कखि एक द्यू बळ्यूं त छाई ॥
न वैल बताई, न मिल कुछ चिताई ।
पर वैकु सर्य्या सरैळ कळ्यूं त छाई ॥
गरम-गरम लाल धत्कार भैर बटैकि ।
पर भितनां नौंणि जनु गळ्यूं त छाई ॥
कोच यो ? कैल भि गिच्चु नि ख्वालु ।
पर वो ट्वक्वरा खैकि पळ्यूं त छाई ॥
बिना वीरों की भि जंदरि रिटणी राया ।
पर ग्यूं दगड़ घूण जनु रळ्यूं त छाई ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"आंख्यूं की बोली"(हाइकु)
***********************
आंखा देसि फुकणां,
आंसु गढ़्वळिम रुझणां,
द्विया बीगीं गैन बोलि ॥ (१)
आंखा रुक्यां सि,
स्वीणा दुख्यां सि,
फेरि भि द्यखणां की कै बै ॥ (२)
आंखि पटगाबन्द,
सुपिन्यां चिलांग,
फज़ल रतखुलणिम तक ॥ (३)
आंख्यूं मा उज्यळु,
जिकुड़ि मा मुच्छ्यळु,
घनाघोर चुक्कापट्ट त्वै जनै ॥ (४)
उळ्यरा आंखा,
कल्यरा बाटा,
रुम्कां रुम्कां मैत जनै ॥ (५)
जिकुड़ि कु डाउ,
आंख्यूं मा आंसु,
राउ त कनकै राउ ॥ (६)
दिन-द्वफिरि जुन्यळि,
ग्यूं कि रोटी चुन्यळि,
तू देळिम जून छज्जम ॥ (७)
ब्यौ पल्या ख्वाळा,
अर्सा, भूड़ा, स्वाळा,
मोत्याबिन्द आंख्यूं मा मोती बिन्दु ॥ (८)
फुलफटंगा जून द्याखा,
जम्मा नि झपकाइ आंखा,
कतगा लब्ब्ब्बी खुद ॥ (९)
हर्च्यां आंखा,
जग्वळ्या बण्यान,
कै अपच्छ्यणकुल का ॥ (१०)
खौळ्यां आंखा,
बौळ्या जिन्दगि,
तिल द्याखा, मिल द्याखा ॥ (११)
@पयाश पोखड़ा ।
तुम तबरि तक तमखू भ्वरणां रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
तुम तबरि तक दिनमनि म्वरणां रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
दूध पेकि, परळि चाटिकि,
घ्यू घूळिगीं त्यारा बांठा को ।
तुम तबरि तक भदळि क्वरणां रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
कूल पेकि, सड़क बुखैकि,
डिग्गी सपोड़िगीं त्यारा गांवा की ।
तुम तबरि तक पाणि च्वरणा रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
स्वीणा फर स्वीणा दिखैकि,
त्यारा सबि सुपिन्या सर्र स्यळैगीं ।
तुम तबरि तक स्वीणा स्वरणा रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
धर्ती का द्यप्ता स्वां लापता,
डौंरि-थकुलि यखुलि छोडि-छाडिकि,
तुम तबरि तक कूंणों ख्वजणा रयां,
वो बल आला साल पांचेकम ॥
@पयाश पोखड़ा ।
" त्वै दगड़ को"
*************
हैंसि खितकिड़्यूं मा सब त्वै दगड़ ।
पर आंसु फुंजणा मा त्वै दगड़ को ?
तिल बस एकदां चुळ मि जनै द्याख ।
पर दुन्यां की आंख्यूं मा त्वै दगड़ को ?
तेरि आंख्यूं की हैंस सर्या दुन्यंल द्याख ।
पर आंसु का क्वांसू मा त्वै दगड़ को ?
कन-कना गीत मिसैनि गितरुल त्वैफर ।
पर त्यारा खुदेड़ गीतु मा त्वै दगड़ को ?
सौंजड़्या छे तू मेरि सबुना ब्वाल त्वैकु ।
पर त्यारा दगड़ु कना मा त्वै दगड़ को ?
उंधरियूं हथ धार त्यारा कांधम सबुना ।
पर उकळि का बाटों मा त्वै दगड़ को ?
@पयाश पोखड़ा ।
खाली,खल्टा,खल्लम-खल्ला !
एक दां अपड़ा गांव त चल्ला !!
©©©©©©©©©©©©©©©
काका न ब्वाडा, भैजि न भुल्ला रे,
मेरि डंड्यळि, तेरि तिबरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
गगरि न कस्यरि, लारा न झुल्ला रे,
मेरि नवळि, तेरि पंद्यरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
गोळण न सांगळ, बन्द न खुल्ला रे,
मेरि मंज्युळि, तेरि उबरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
खुम्का न वीरा, घ्याळ न हल्ला रे,
मेरि उर्ख्यळि, तेरि जंदरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
ज्युड़ि न दौळिं, गोठ न पल्ला रे,
मेरि थ्वरिड़ि, तेरि कळ्वड़ि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
दै न दग्ड़्या, पैसा न पल्ला रे,
मेरि सुप्पी, तेरि ठ्वपरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
बूण न घार, हिटा न चल्ला रे,
मेरि जांठि, तेरि छतरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
त्यूंखी न गत्यूड़ि, थ्यग्ळा न टल्ला रे,
मेरि धोति, तेरि चद्दरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
ख्वींडा न अबिंडा, बुरा न भल्ला रे,
मेरि मुण्डळि, तेरि ख्वपरि,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
"पयाश" य यकुलांस, फेरि भेंट कल्ला रे,
जिकुड़ि कि पीड़ा, पोखड़ा का स्वीणा,
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
खल्लम-खल्ला रे, खल्लम-खल्ला रे....
@पयाश पोखड़ा ।
"इनु बि क्या ?"
*************
न चिट्ठी, न पतरि, न क्वी रंत,
न रैबार आंद ।
अब कख क्वी कैका वार-ध्वार,
आंद-जांद ॥
चखुला उडणा छन त उडण दे,
स्यूं बिचरों थैं ।
जख चार बियां ह्वाला घुघुति,
वखि त जांद ॥
खन्द्वार हुईं डण्ड्यळि की कुछ,
सुणि ले जरा ।
तिबरि कु खम्ब बि बगत दगड़ खड़ु,
नि रै पांद ॥
स्यो बन्दुक्या दादा कै फर सिसाद, लगाणु चा ।
क्वी भर्वसु नि गोळ्युंकु कब अफु
जनै आंद ॥
या दुन्यां त अजकाळ भौत छ्वटि सि,
ह्वै ग्याइ ।
पर आबत-अस्नौ, भयात किळै दूर
ह्वै जांद ॥
मिल त कबि कुछ बि नि मांगु छाइ
द्यप्तौं मा ।
पर स्यो "पयाश" किळै भट्ट अंग्वाळ बोटि जांद ॥
@पयाश पोखड़ा
"भारे ! याद राखि"
***************
ग्वेर छ्वारौं दगड़ कबि,
ठट्ठा नि कैरी ।
छ्यूंता-छिलबट दगड़ कबि,
अग्यलुपट्टा नि धैरी ॥
भग्यनि जतन कैकि मिलद,
मयल्दु-माया ।
माया कैका दगड़ कबि,
कट्ठा नि कैरी ॥
ढ्वाया-ढुएर लग्यां छन,
भीड़ा मिसाण फर ।
चौका मा सुपिन्यों कु कबि,
चट्टा नि धैरी ॥
त्यारा बाना कखि क्वी,
जोगी नि बणि जाऊ ।
म्वारा ऐथर टिमरू कु कबि,
लट्ठा नि धैरी ॥
जु कतगौं की मौ-मवसि,
घाम लगै गैन ।
वुं जिवरों का कीसाउन्द कबि,
लगनपट्टा नि धैरी ॥
कखड़ि-ग्वदड़ि फर बि लोग,
सुई लगाणा छन ।
डुट्यळु का पीठिम मूळा कु,
कट्टा नि धैरी ॥
बुढेनदावकि चिगैं चा तू,
बुरु नि मानी "पयाश" ।
लाब-काब बोलिक कैका प्राण,
खट्टा नि कैरी ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"वो इसकोला का दिन"
********************
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ।
निछैंदि मा बि इगास-बग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
चिरीइं कितबि उधड़्यूं बसता,
वा कैपिटल कौपि कख जि ध्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
कख हर्चा वा स्या की टिक्कि,
वेलडन की दवति मा ज्वा छ्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
गुर्रौ कु कांचळ, मोर फंखुड़ू,
दिख्याई, जनि किताब ख्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
मि चोर निछौं, बत्ती कसम,
दगड़्या का अग्वड़ि बसता फ्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
अरे ! पैसौं का सार नि लग,
दे द्यूलु रे तेरि पंजी-दसी भ्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
भ्वाळ बटैकि टक्क लगै पढलु,
सर्या साल इन बोलिक धंग्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
दगड़्या नमान पढ़णा रैनि,
घमतप्पा रौं मि फील्डा तिर्वाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
सुबेरलेकि इसकोल जाण,
ब्वै ल मिथैं सिनक्वळि सिवाळ ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
अ ब स एक समकोण तिरबुज चा,
कंदुड़ु मा बयांदा यो सवाल ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
वो इसकोला का दिन ॥
झणि कख ह्वैलि वो दगड़्या ?
जैल द्या छाई वो रेसमि रूमाल ।
आज बि कना छन जग्वाळ,
आज बि कना छन जग्वाळ,
जग्वाळ, जग्वाळ, जग्वाळ,
वो..............
इसकोला...
का.............
दिन ॥
@पयाश पोखड़ा ।
कनकै ?

*******
अपणि कचकौं थैं, कनकै लुकौउं ?
अपणा गैरा घौ थैं, कनकै सुखौउं ?
आंखा भ्वर-भ्वरिक आंसु पैंछा दे ग्यवा ।
बता त्यारु उधरु, कनकै चुकौउं ?
पाणि-पाणि कैकि चोळि तिसळि राया ।
त्वैकु बूंद दुएक, कनकै पुकौउं ?
जतन कैकि चुलाउंद आग घुघराया ।
ईं खुदेड़ जिकुड़ि, कनकै फुकौउं ?
द्यप्ता जाणिकि पुजिनि जो सर्या जिंदगि।
ढुगौं ऐथर मुण्ड, कनकै झुकौउं ?
मि जणंदू छौं त्यारा अबिण्डो स्वभौ थैं ।
तेरि गिच्चि च्यौलि, कनकै ठुकौउं ?
खौंखाळ त मारि द्या तिल 'पयाश' पर,
ख्वळा गिच्चिल च्यूड़ा, कनकै बुखौउं ?
@पयाश पोखड़ा ।
एक गज़ल तुमरा नौ----
******************
मि त सुदि-सुदि बरैनाम खड़ु कर्यूं छौं ।
म्वाळा कु सि माद्यौ म्वार फर धर्यू छौं ॥
कबरि-कबरि झळ्कां मी जनै भि द्यख्दा ।
द तुमर भांवल मि ज्यूंदु छौं कि म्वर्यूं छौं॥
पोर-परार बटैकि मि हैंसण बिसिर ग्यौं।
गाळ-गाळ तक भारी असंदल भ्वर्यूं छौं॥
खिर्तू द्यखणा से पैलि कुजगा बैठि ग्यौं।
मि अपणै गुठ्यारा की गौ कु मर्यूं छौं ॥
जैं बिसगीं नयरि फट्यळु लगाणा छवा ।
वीं नयरि थैं बसगाळम कत्गै दां तर्यूं छौं॥
गौं कु डबळांदु बाटो आंसु थामि ब्वळ्दा।
नि कुरचदा क्वी, मि भलिकै स्वर्यूं छौं॥
चौपड़-चौसर कौड़ि सदनि जितणु रौं ।
पर जिदंगि कु जुआ 'पयाश' मा हर्यूं छौं॥
@पयाश पोखड़ा ।
"एक मुक्तक उत्तराखण्ड का मुकतक"
*****************★*************
तेरि कच़गौं का मथिफुण्ड,
कड़पत्या चुवै गीं ।
एकदां फेरि त्यारा हर्सू , हर्कू
त्वै रुवै गीं ॥
देवि-द्यप्तौं की धर्ती त्वैकू,
लोग ब्वळदिन ।
त्यारा अज्जू , बिज्जू त्यारू
नौ गुवै गीं ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"द त्यारा भांवल त"
(छोड़ तेरी बला से)
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मि कब साठ साल कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ।
मि कब माट ताळ कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
त्यारा गांवा का बाटों थैं,
कुरचदा- कुरचदा ।
मि कब गौं गाळ कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
तू सदनि मेरि मयळ्दु माया,
म्वळ्याणि रैई ।
मि कब उधार पगाळ कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
सुपिन्यौं का पल्या छाल,
तु भि बैठीं रैंदि ।
मि कब वल्या छाल कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
माया मम्ता पियार पिरेम,
सबि कुछ त त्वैमा ।
मि कब जैर दूधिबाळ कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
तुम बसगळ्या बणदर्यूं मा,
चखुला सि छपत्वळ्यौ ।
मि कब ढाळ पंदाळ कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
'पयाश' गाणि करदा रै ग्याइ,
द्यखणा की ।
मि कब वै तूनाखाल कु ह्वै ग्यौं--
द त्यारा भांवल त ॥
द त्यारा भांवल त ॥
@पयाश पोखड़ा ।

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Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016
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