Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 579752 times)

Bhishma Kukreti

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 गढवाळीअ वरिष्ठ कवि अर समीक्षक वीरेंद्र पंवार औ दगड भीष्म कुकरेतीअ लिखाभेंट
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 121

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti



भीषमौ सवाल : आप कविता क्षेत्र मा किलै ऐन ?
पंवारो जबाब-- मिन पहाड़ी जीवन का दुःख सुख अर संघर्ष बहोत्त नजिक बट्टी माँ -बैन्यु
दगड़ा देख्यां भोग्यंअ छन्न,इल्लै जबरी बी मी कुछ लिख्दु जादातर वू
कविता का रूपमा भैर औंद
सवाल: आपकी कविता पर कौं कौं कवियुं प्रभाव च ?सवाल : आप कविता क्षेत्र मा किलै ऐन ?
जबाब--असर गढ़वाली का तकरीब सब्बी वरिस्थ कब्यु को च,पर मेरी कविता जादातर
गढ़वाली का स्वनामधन्य कवि अबोध बंधु बहुगुणा अर नरेन्द्रसिंग नेगी से
प्रभावित छन ! कविता संवेदनो से जुडी चीज छ,शैत मीतै कविता भौत पसंद
छन ! कविता का छेत्र मा औणो एक कारण ई बी व्हे सक्दो !
सवाल : आपका लेखन मा भौतिक वातावरण याने लिखणो टेबल, खुर्सी, पेन,इकुलास, आदि को कथगा महत्व च ?
जबाब--कवी जादा मोल नि, पर एकांतमा लिखनो ज्यू बिंडी करदो ,इल्लै एकांतमा जादा
लिखेंदु बी छ! पर लिखना वास्ता हमेसा एकांत चयेनु हो ,इन् जरुरी नि !
सवाल: आप पेन से लिख्दान या पेन्सिल से या कम्पुटर मा ? कन टाइप का कागज़आप तैं सूट करदन मतबल कनु कागज आप तैं कविता लिखण मा माफिक आन्दन?

जबाब--जादातर पेन से लिखदो ! कम्पुटर मा अब्बी ढब्ब नि आई १मि सुफेद कागज़मा हल बिंडी लिखदो!
सवाल: आप अपण कविता तैं कथगा दें रिवीज करदां ?
जबाब--कबी कबी कविता एक ही बारमा पूरी व्हेजंद !पर हर बार इन्नु नि होन्द!कत्गाई बेर ता भौत दें देखण पोडदू !
सवाल: आपन कविता गढ़णो बान क्वी औपचारिक (formal ) प्रशिक्षण ल़े च ?
जबाब--कविता ल्यखना वास्ता कवी खास प्रसिक्षण नि ले !बस मनमा भाव औंदन अर लिख देंदो !

सवाल : आपका लेखन मा भौतिक वातावरण याने लिखनो टेबल, खुर्सी, पेन, इकुलास, आदि को कथगा महत्व च ?

जबाब--लिखणअ वास्ता कुर्सी मेज की जादा जर्वत नि पड़दी ! पर हाँ एकुलांस
लिखणअ वास्ता बहोत्त माफिक आन्द ! पर इन्नु बी नि च की हर बार लिखणअ
वास्ता एकुलांस ही खोजे जावु ! क्वी बी रचना कबि बी अर कखि बी उपज सकदी!
सवाल: जब आप अपण डेस्क या टेबले से दूर रौंदा अर क्वी विषय दिमाग मा ऐ जाओ त क्या आप क्वी नॉट बुक दगड मा रखदां ?
जबाब--बिचार औंदा जांदा रान्दन !पर इन्नामा भौत मुस्किल होन्द ! कन्न क्या
च ? ! अब मोबाइल ऐगनी ,इल्लै कबी इन्नमा मोबाइल का मेसेजमा टाइप कर
देन्दु !

सवाल: माना की कैबरी आप का दिमाग मा क्वी खास विचार ऐ जवान अर वै बगत आप उन विचारूं तैं लेखी नि सकद्वां त आप पर क्या बितदी ? अर फिर क्या करदा ?
जबाब-- इन्नी हालतमा स्वीली पीड़ा सी बहोत्त बुरी बीतदि ,पर करे क्या सकेंदो! बहोत्त बार वे अया बिचार तै दुबारा याद कन्नै कोसिस करदो पर याद नि आई ता तबरी बी भौत इ बुरी बीतदि !

सवाल: क्या कबि आपन कविता वर्कशॉप क बारा मा बि स्वाच? नई छिंवाळ तैं गढवाळी कविता गढ़णो को प्रासिक्ष्ण बारा मा क्या हूण चएंद /

जबाब--प्रसिक्षण का बारमा सोची छैंच !एक बार सन २००५ मा इस्कूल स्तर पर हमुन एक बाल
कवि सम्मलेन शिक्षा विभाग का सहयोग से पौड़ीमा कर्वे छौ !मिन मैसुस करी
नै पीडी तै कविता अर खास कैकि गढ़वाली गढ़वाली कवितअ अर गढ़वाली समाज
का सांस्कृतिक सरोकार का बारामा जानकारी दिए जाणी जरुरी छ ! जबरी तक
अपणा संस्कारू का बारामा पता नि होलू , क्वी बी सार्थक रचना लिखे नि
सकेन्दन ! लिखेली बी ता वो साफ़ बनावटी सी लग्दन ! इल्लै नै छ्वाल तै
रचना का वास्ता मूल वातावरण का बारामा बताये जानू जरुरी छ ! वे तै अपणा
लोक से जुड्नो जरुरी छ !
सवाल: हिंदी साहित्यिक आलोचना से आप की कवितौं या कवित्व पर क्या प्रभौ च .
जबाब-- भौत असर छ !असलमा जबरी तक हम लिखवार भैरै कविता अर भैरा साहित्य तै नि
पड़ला तबरी तक हम लिखवार नया ट्रेंड का बारामा कंक्वे जाण सकदा ! समकालीन
लेखन का संपर्कमा रैनू जरुरी छ !
सवाल: क्वी उदहारण ?
जबाब--मेरी एक कविता फ्यूली अर बुरांस, आन्तुरीमा पहाड़ जनि कविता मीतै
भौत अछि लगदी !इन्नी हौरि कविता बी छन्

सवाल : आप का कवित्व जीवन मा रचनात्मक सुखो बि आई होलो त वै रचनात्मक सुखा तैं ख़तम करणों आपन क्या कौर ?
जबाब--रचनात्मक सूखो तै ख़तम कनम आपन(भीष्म कुकरेती जिन )लिखणो भौत प्रेरित करी ,यका वास्ता मी आपो भौत कर्जदार छू !
सवाल: कविता घड़याण मा, गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत आप तैं कथगा हूंद ?
जबाब--कविता रीवाइज कन्नमा इन्नी कवी ख़ास जरुरत ता नि होंद पर एकुलांसमा रचना अछि तरो से लिखे जन्दन ,पर हर बार एकुलांस या भीड़ -भाड़ ही चयेनी हो इन्नु जरुरी नि होंदु

सवाल-इकुलासी मनोगति से आपक काम (कार्यालय ) पर कथगा फ़रक पोडद
जबाब--फरक ता पोडदू चा,अछू बी अर बुरो बी. एकुलंसी मनोगति से अपना काममा फरक नि पोडदू, काम अर कविता या रचनाकर्म तै अलग रखनो जरुरी चा,कामम़ा फरक पोड्ल्लू ता रोजी रोटी कंक्वे चालली ! लूण-तेलों जुगाड़ ता पैली कन्न पोडदू
सवाल : गढवळी समालोचना से बि आपको कवित्व पर फ़रक पोडद ?
बिलकुल पोडदू चा ! मी गढ़वाली म़ा होरी लिख्वार्वी समालोचना करदो
!इल्लै मी जबरी बी अफु कविता लिख्दौ ता इन्नु ध्यान ता रैंदु चा की
कविता या क्वी बी रचना हो मी अछी से अछि लिखने कोसिस करू ! रचना करदी
बेर मी सिर्फ एक लिखवार रैन्दो! तबरी ता बस रचना दिमागमा रैंदी !

सवाल: भारत मा गैर हिंदी भाषाओं वर्तमान काव्य की जानकारी बान आप क्या करदवां ? या, आप यां से बेफिक्र रौंदवां!
जबाब--गैर हिंदी भाषाओ का बारामा बी चित्वळ रैण पड़दो निथर मालूम बी नि
होंदु की नया दौर का साहित्य मा क्या ट्रेंड चलन्णु छ !
सवाल : अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी बान क्या करदवां आप?
जबाब-- कबी कबी इन्टरनेट पर देख्दो !
सवाल: भैर देसूं गैर अंगरेजी क वर्तमान साहित्य की जानकारी क बान क्या करदवां ?
जबाब-- भौत कुछ नि करदो ,पर कबी अनुवाद की क्वी किताब वगैरा
मिलगी ता खरीद लेन्दो !
सवाल: आप को को शब्दकोश अपण दगड रख्दां ?
जबाब--गढ़वाली की मेमू मास्टर जयलाल वर्मा की डिक्सनरी छ ! अंग्रेजी की छ !
गढ़वाली का लोक शब्दू को काम जादातर मि पुराणी किताबु से लेन्दो !

सवाल: आपन बचपन मा को को वाद्य यंत्र बजैन ?
जबाब-- हारमोनियम पर अंगुला चलाई छा, पर बजानो नि आई

सवाल: आप संस्कृत , हिंदी, अंग्रेजी, भारतीय भाषाओँ क, होरी भासों क कौं कौं कवितौं क अनुवाद गढवाळी मा करण चैल्या ?
जबाब-- मेतै दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल भौत पसंद छन् ,इल्लै छंद आलो तावूँको अनुवाद कण चांदो !
कुकरेती जी इथगा बढ़िया बढ़िया सवाल पुछणअ वास्ता आपको भौत भौत धन्यवाद !
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ललित केशवान दगड़s वीरेन्द्र पंवार की लिखाभेंट

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 121

(ललित केशवाण गढ़वाळी काब्य जगत कि इन्नी हस्ती छन जौंन गढ़वाळी कवितामा हास्य -ब्यंग को इनो रल़ो-मिसो करि बल गढ़वाळी कवितामा ललित केशवान एक बिगळि/ अलग पछ्याण बण गेनी. अबारी ये दौरमा वु गढ़वाळी का यकुला इन्ना कव्युं मधे छन जौंन गढ़वाळी कि तीन साख्युं /पीढ़ी का लिख्वारू दगडा कविता का अनुभव साझा करनी .पैलि पीडीमा अबोध बन्धु बहुगुणा, कन्हयालाल डंडरियालजी,दुसरिमा नेत्रसिंह असवाल,नरेन्द्र सिंह नेगी अर तिसरि साखी मा गणेश खुग्साल,वीरेन्द्र पंवार. नयी साखी . नवाडी साखी तै वूंसे भोत कुछ सिखणो मिली . श्री केशवान गढ़वाली कविता मंचू का लोकप्रिय कव्युं मधे छन.गढ़वाळी काव्यमा द्वि-अर्थ वल़ा(double meaning) शब्दु कि पवाण कखि न कखि केशवान जीन हि लगाई.
अबी तक वूंका खिल्दा फूल हंसदा पात,दिख्याँ दिन तप्यां घाम, दिवा व्हेजा दैणी, सब मिलिकी रौला हम ( सब्बि काव्य), हरी हिंदवाण,गंगू रमोला ( नाटक ),जय बद्री नारेण( पांच एकांकी )प्रकाशित व्हेगेनी .यांका अलावा वूंकी भोत पुस्तक हिंदी मा प्रकाशित छन. )
वीरेंद्र पंवार ... आप तै मुंबई मा अर्जुन सिंह गुसाईं पुरस्कार मिलण पर भौत भौत बधाई.अबारी कनु चिताणा छाँ ?
ललित केशवान - भलो लगणु च अर वा बि अर्जुन सिंग जी क कर्मस्थली मा पुरूस्कार मिलणो च. यो मेरो सौभ्याग्य च.
वी.पं -.आपन गढ़वाळी काव्यमा हास्य-ब्यंग कि ज्व़ा बिजवाड़ बूति,ईं बिजवाडै बिजवाड़-डाळी आपतै कख बटी अर कैका सगोड़ा बटी मिलि ?
ल.के.--इन च बल बाळा पन से मेरो रुझान गीत, संगीत, स्वान्गु म ह्वे गे छौ याने कि परबिर्ति को हिसाबन काव्य को तरफ झुकाव छयो. मीन बारा साल मा अभिमन्यु स्वांग मा उत्तरा को पाठ ख्याल जैमा उत्तरा पाठ मा एक गाणा छयो अर मीन गाणा गाई छौ.
याने कि कवित्व मेरो सुभाव मा छौ . जख तख हंसणो अर हंसोड्या बाण को सवाल च मी छ्वट s बिटेन अपण गौंका जुपुलू भै क हंसोड्या प्रविरती से प्रभावित छौ. जुप्लू भै अपण दुःख ब्यथा तै बि हंसोड्या भौण अर शब्दों मा गीत बणैक सुणै देंदो छौ. वां से मी पर लोगूँ दगड हंसोड्या भौण मा बचळयाणो या हंसोण्या शब्दों इस्तेमाल करणो ढब पोड़ी गे. ट मी माणदो छौं हंसी जुप्लू डा कि मेहरबानी च.
जख तलक गढ़वळी मा हंसोड्या, चखन्योर्या , चबोड्या साहित्य या गढवळी साहित्य को सवाल च मी कन्हैयालाल डंडरियाल जी से प्रभावित हों. एक कवि सम्मेलन मा जब मीन पाई कि सुणदरा डंडरियाल जी कि कविता क बाद ' वन्स मोर '
बुलणा रैन त मी ऊंको भक्त सि ह्व़े गेऊं.
वी.पं ...प्रवासमा अपड़ा मुल्क पर क्वी बी रचना कनु कतगा सोंगु या असौंग होंदु ?
ल'के.-' म्यरो हिसाब से प्रवास मा अपण मुलक पर रचना करण सौंग च .
वी.पं- ...परदेश्मा जब अपड़ा ओर- पोर क्वीबी अपड़ी भाषामा बोल्दु बच्यान्दो नि ,तब कनु लाग्दो?
ल.के.-- जब क्वी बि अपणि बोली, भाषा मा नि बच्याळो त जिकुड़ी झुरदि च
वी. पं . प्रवासमा बल अपड़ा 'मुल्कै खुद' लेखक तै लिखोणो बान प्रेरित करदी ,आप क्या बोल्दा?
ल.के.- आप सोळ आना सच बुलणा छन.
वी.पं ...आपा समै का कव्युंमा केवल डंडरियालजी हि हास्य लिखदा छा,आपै कवितोंमा ब्यंग कि ज्व़ा धार छ, आप क्या समजदन वे दौरमा पड़दारा -सुणदरोंन कत्गा पसंद करनी ?
ल.के. -जख तलक हंसोण्या, चबोड्या कवितों सवाल च डंडरियाल जुग या ये समौ मा डंडरियाल जी, जया नन्द खुगसाल 'बौळया', अबोध जी, कंकाल जी , प्रेम लाल भट्ट अर मी सौब हंसोड्या, चखन्योर्या कविता बि रचदा छ्या. फिर सिंग सतसई, न्रिमोही जीक हिलांस मा बि चरचरा -बरबरा व्यंग्यात्मक कविता छन हाँ ! बात जग जाहिर च कि डंडरियाल जी हंसोण्या, चबोड्या कवितों सिरमौर छ्या.
आपक दुसरो सवाल को जबाब च - जब गींतुं/काव्य थौळु मतबल काव्य समेलनो मा सुणदेर मेरा च्बोड्या/व्यंग्यात्मक कवतौं पर ताळी बजान्दा छाया त यांको सीधो अर्थ च बल सुणदेर अर बंचनेर मेरो चाबोड्या, चखन्योर्या कवितौं तै खूब पसंद करदा छ्या. आज बि जवान पीढ़ी का सुणदेर मेरी कवितौं पर खूब ताळी बजान्दन अर याँ से मी इथगा सालुं से यीं विधा म जम्यूं छौं.असला मा मी माणदो बल हमर गढ़वळी लोकुं/ सुणदेरूं की चबोड़ या व्यंग्य समजणै समज साहित्यकारों से जादा च .
वी.पं. ... आप इन्ना भगयान( honourable) कवि छाँ कि आपन गढ़वाळी काव्य कि तीन प्रतिनिधि पीड़यूँ दगडा काव्य-सृजन को मौका पाए,कनु लगणू छ ?
ल.के.- जी, जी नागरजा, नरसिंग , भैरों अर पितरूं आशीर्वाद च कि मी तै गढ़वाळी साहित्यकारूं तीन साखी दिखणो सौभाग्य मील.
वी.पं - ...आप तै अज्काल अर अबोध जी का समौ रचनो मा कथगा भेद/फरक मैसुस होंदो?
ल.के. - यू भौत बड़ो जटिल सवाल च अर लम्बो उत्तर होलू .
जख तलक शहर अर गाँवूं का भेद छौ आज गढ़वळी मा गांवू मा या पौड़ी जन कसबौं मा डिल्ली जन शहरूं से जादा कवि छन अर यी गाँव या कस्बों कवि विषय को हिसाब से नयापन लाणा इ छन.
आज का कवि जादा पढया लिख्यां अर नया नया माध्यमों से रूबरू छन त ऊंको ज्ञान मा पैलो बनिस्पत भौत फ़रक च अर याँ से कविता मा फरक दिख्यांद च. जानानी कवित्री आज समुचित ना सै पण आण इ बिसे गेन याँ से बि बदलाव आन्द.
काव्य भाषा संरचना मा -व्याकरणीय, शैल्पिक संरचना अर आंतरिक संरचना मा भारी बदलौ दिखे सक्यांद . विशेषणों क प्रयोग मा भारी बदलाव ऐ गे . आज का कवि क्या सबि साहित्यकार गढवाळी क कारक छोडिक हिंदी का नजीक चली गेन. खासकर अब साहित्यकारुन हिंदी का कारकों तै पूरी तरां से अंगीकार इ कौरी याल. जन कर्म कारक , सम्प्रदान समंध कारको आज फरक च
अलंकारों या प्रतीकुं मा नया प्रयोग दिखया णा छन जन हम पैल 'चिलंग' प्रयोग करदा छ्या त आजौ मदन डुक्लाण हवाई जाज प्रयोग करद दिख्यांद. इनी अंगरेजी का शब्द भौत इस्तेमाल होणा छन. अर यांसे बिम्ब मा भी बदलाव च .
असलियत वाद को तरफ झुकाव च आज.
आज परम्परित , शाश्त्रीय लय मा कमी ऐ गे अर गढवळी कवतौं मा मुक्त लय को फवारा छूटणा छन.
विरोधाभास अर विडम्बना मा बि आज नया प्रयोग होणा छन.
वी. पं .....आपै नजर मा पूरण पंत, नेत्रसिंह असवाल , जी कि पीड़ी कि कविता अर हमारा(वीरेन्द्र पंवार ) दौर तक कवितामा कुछ फर्क आये कि जान्यो-तन्नी छ?
ल.के. आपौ जबाब मीन पैलि दे आल.हाँ आजै पीढ़ी का कवि जन आप , मधु सुदन थपलियाल, शान्ति प्रकाश जिज्ञासु, हरीश जुयाल, जयपाल रावत या बिलकुल नवाडी कवि गीतेश नेगी पूरण पंत , असवाल या हमारी पीढ़ी क काम तै अग्वाड़ी बढ़ाणा चं वां
मधुसुदन थपलियाल जी को गजल तै अंगीकार करण मा, गणेश 'गणी' अर आपक हाइकु कवितौं क रचना करण, हरीश जुयाल को जागर शैली को आधुनिकीकरण या अंग्रेजी शब्दों तै गढवळी मा लाण , जयपाल रावत को छिपड़ जन कीड़ो या जानवरो तैं प्रतीक बणांण. शान्ति प्रकाश जिज्ञासु कि छ्वटि छ्वटि कविता, मदन डुकलाण को नया बिम्ब पैदा करण, वीणा बेंजवाल अर नीता कुकरेती क नयो ब्युंत मा प्रकृत वर्णन, चिन्मय सायर को दर्शन तै नै जामा पैनाण गीतेश नेगी को विश्व प्रसिद्ध कवियूँ कवितौं गढवळी मा अनुवाद करण jani बात दर्शांदी बल हर जुग मा कवि अपण हिसाब से विकाश करणो
वी.पं. .....तबारी अर अबारी का काव्यम हास्य-ब्यंग मा कत्गा फरक आये ?
ल.के. भौत फ़रक च. आज विडम्बना अर विसंगती, अनाचार , अत्याचार , भ्रष्टाचार, कि खबर जादा मिल्दन या यि विसंगती बढना छन त व्यंग्य या हौंस का साहित्य मा संख्यात्मक अर गुणात्मक रूप मा बि बढ़ोतरी होणि च
वी.पं ... आपा दौरमा कव्युंमा एक बनी सामाजिक झिजक रैंदी छाई बल कि इन्नु नि लिखणो , तन्न नि लिखणो,सची बात छ?
ल.के.- ना इन बात नी च. हाँ वै बगतां गां गौळ (समाज) मा साहित्य मा स्व अनुशाशन जादा छौ.
वी.पं .. देशकाल का हिसाब से आपो समै अच्छो छौ कि अबारी को ?
ल.के.- प्रगति क दगड दगड समस्या बढ़णि छन अर जटिल होणा छन. आज हमारो गढ़वळी साहित्य जादा समृधी क तर्फां ढळक्याणो च. जनि जनि समाज /गाँ गौळ मा संकट बढ़णो च या समस्या जटिल हुणा छन तनि तनि गढ़वळी साहित्य मा एक्श्क्लूजिव साहित्य याने हरेक विधा मा विकास हुणो च .
वी.पं ...गढ़वाळी काव्यमा द्वि अर्थ वाल़ा शब्द आपै रचनो बटी मिल्दन , यांकी प्रेरणा आपतै कख बटी मिली ?
ल.के. मी समजदु बल या शैली हमारो गाँ गौळ मा परम्परागत इ च .मोती ढांगू लोक गीत तै आप क्या नाम देल्या?
वी.पं....अबारी का लिख्वारूमा आप अपणि जनि रचनो कि अन्वार कौ - कौं लिख्वारै रचनो मा देखदान ?
ल.के.-थ्वडा थ्वडा मेरी स्टाइल की लौंस त सबि चबोड्या कवियों मा च.
वी.पं- ... आपै नजर मा अबारी का कु लिखवार अच्छो लिखणा छन ?
ल.के. चिन्मय सायर, मदन डुकलाण, हरीश जुयाल, गेतेश नेगी, वीरेंद्र पंवार, त्रिभुवन उनियाल, विमल नेगी, नरेंद्र सिंग नेगी, नरेंद्र कठैत, शांति प्रकाश, पाराशर गौड़, शैलेन्द्र रावत, प्रकश मणि धष्माना, वीना बेंजवाल, नीता कुकरेती, वीना कंडारी,भीष्म कुकरेती, प्रीतम अप्छ्याण , डा ढौंडियाल, पूरण पन्त , दिनेश ध्यानी, ब्रजेन्द्र नेगी, बालेन्दु बडोला, ओम प्रकाश सेमवाल, , देवेश जोशी, कुंजविहारी मुडेपी, नीलाम्बर, आदि खूब लिखणा छन.
वी.पं ....गढ़वाळी काव्यमा हास्य -ब्यंग कि कत्गा संभावना छन ?
जथगा जादा विसंगति वळा परिवर्तन तथ्गा जादा संभावना
वी.पं..... अबारी का गढ़वाळी काव्य -लेखन से आप कतगा संतुस्ट छन?
ल.के. आज हरेक विधा इख तक कि समीक्षा कि किताब छपेणि छन ट बोली सक्यांद कि गढवळी कविता विकास की सीढ़ी चढ़णि च
वी.पं. .....नया प्रवासी कवि गढ़वाळी कविता का निब्त कत्गा गंभीर छन?
ल.के.- यि लोग शिल्प मा जादा ध्यान दीणा छन .
वी.पं ...... आपै नजरमा गढ़वाळी कविता को भविष्य क्या छ?
ल.के. -गढ़वाळी कविता को भविष्य उज्वल च अर अब कुछ बि ह्वाओ उत्तराखंड संस्कृति विभाग या भाषा संस्थान कुछ ना कुछ कंळदारी मिळवाक दीणा छन त प्रकाशन मा ब्रिधि होली इ

वी.पं ..... अर गढ़वाळी भाषा को भवेस्य क्या छ?
ल.क. गढ़वाळी भाषा को भविष्य विकास्नुमुखी इ च मि माणदो जब लोक सभा मा छ्वीं लगणि च त माने सक्यांद यीं भाषा का समर्थक भौत छन .
वीरेन्द्र पंवार
lमुंबई मा ललित केशवान तै अर्जुनसिंह गुसाईं पुरस्कार मिलण पर (27 मई 2012)



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Virendra Panwar: A Poet and Social Activist
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 121

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
      Those inhabitants of Mumbai, who have been there in “First Ever Gadhwali Kumauni Kavi Sammelan in Mumbai” convened by Uttaranchal Vichar Manch Mumbai , will definitely remember Veerendra Panwar and his ghughati ghraili poem in Garhwali . In Garhwal, his name attracts the audience for Garhwali Kavi Sammelan
    He is one of the creative who have been supportive to local Garhwali fortnight news paper Uttrakhand Khabar Saar , Pauri published by Professor Vimal Negi. He was also supportive figure in publishing and editing “ Chhunyal” a Garhwali language periodical.
     Veerendra Panwar is also social activist and convened “ Makraini Kauthig” at Parsundakhal, Pauri garhwal every year from 1994-1999. Panwar was also involved in Uttarakhand movement .
   Panwar is not famous for his Garhwali poetries of varied subjects and modern styles as gazals, gadyatmak kavita muktak, khsankayen , haiku etc but he is one gem of the Nau Ratna of  Garhwali Samalochana  as cited by brilliant Garhwali language critic Abodh Bandhu Bahuguna in an interview with this author and is published in Chitthi Pattri after the death of Abodh Bandhu Bahuguna
Let us enjoy his Garhwali Gazal
Haath -khuta chhal dya
Dyu dhupana bal dya
Gham aige dhar ma
Pani thain bijal dya
Jaunka naku mol cha
Unka nam dhunyal dya
Jhutth-sach kattha hwege
Loon march ral dya
Ghuseye -ghusey ghusegi bhitarai
Jogi thain naikal dya
Bauhadan dev divta
Manikh thai siwal dya

Birth Date: 26 November, 1962
Place: Kendra, Chardhar, Idwalsyun, Pauri Garhwal
Education: Diploma in  Pharmacy, M A (Sociology)
Published works : more than hundred poems and more than fifty articles published in various periodicals
Published collection of Garhwali poems, Inma Kankai An Vasant by Dhad Prakashan, Dehradun

   असूज मा बौगी पौड़   (गढ़वाली कविता )




सौंण भादौं बरखी नी  धार खाऴ चयाँ चौड़

पुटगा गारा आँखा खौड़ असूज मा बौगी पौड़



कोदो झंगोरु बंजे सार

सट्टी न बुसे कुठार

दाऴ गौथ घास खौड़

असूज मा बौगी पौड़



पौंछी नी छ मनयाडर

नौनु जुदा व्हे बिमार

लैंदी गौड़ी भेऴ रौंड़

असूज मा बौगी पौड़

पैली चिठ्ठी भेजी तार

फेर टेलीफून कार

कुजाणी कख धौं बैंहौड़

असूज मा बौगी पौड़
देश जैकी भुलगे

रैबार भी घूऴगे

फजल ब्यखुनी उठापोड़

असूज मा बौगी पौड़

ढोल दमौ बैण्ड बाजा

पॉप डिस्को छाजा छाजा

कितला अर गुरौ की सौर

असूज मा बौगी पौड़

अपणा गीत बीराणु राग

हल्लरोऴ बैठी बाच

ऊणा कूणा ओड़ छोड

असूज मा बौगी पौड़
बोण रौं की घौ र जौं

घौर जौं त खौं क्या खौं

बस हुई च दौड़ा दौड़

असूज मा बौगी पौड़

Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai, 2016

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Modern Garhwali Verses  Songs,     Poems

ज्वै पर ब्वै  (गढ़वाली कविता )

रचना --    रणबीर दत्त शास्त्री ( जन्म  1974,  गुरफळी, ढ़ौढियालस्यूं ,  गढ़वाल  )
Poetry  by - Ranbir Datt Shastri
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 204
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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अचकाल बिगड्युं राहु
दुःख बिमरि त लग्युं  धंदा
धरी ढकई बि गै पर , बीसा उन्नीस नि ह्वे

पुछयरुंन बोलि पितररुं दोष लग्युं
उच्याणा परखणा कैकि , एक ह्फ़्तौं छेको लगै
निश्चित दिनम जगरि बुलै
वैन पैलि त घुट्टी पे , तब डौंरु घुर्कै
मेरि ज्वै पर धम्म मेरि ब्वै नाचि गे
ब्वाडन बोले धुपण कौर
मिन बोले कत्तै नि कनालो
तैबरि हैंको दिब्ता नाचि गे
बल तिल हमरि चाल -चुगल कयाल।

जगरिन बोले -मेरि बात टक्क लगै सुण्याल
ब्यटा ! ईं जिद्द छोड्याल
ब्वै की पूजा अर , ज्वै को भलो कयाल।

मिन बोले कि मेरि ब्वै ! तु दैणि ह्वे जै
तेरी खाणि  मंगणि   सब्बि द्यूंलु
पर अमणि बटि मेरि ज्वै पर नि ऐ       

(Ref-Angwal,2013)
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Bhishma Kukreti

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लोकमंगलs  धड्वै कवि डा. सत्या नन्द बडोनी   
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 122 A

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti


                                     
 
[s =माने आधी अ ]
                     म्यार हिसाब से अमूनन गढ़वळि  कविता द्वी तरां हूंदन -अबोध बंधु बहुगुणावादी अर कन्हयालाल डंडरियालवादी कविता। बहुगुणावादी कविता  बुद्धिवादी या पौरुषीय कविता ह्वे अर  डंडरियालवादी कविता माने जिकुड़ेळि  कविता या अपौरिषीय कविता । सत्या नन्द  बडोनीs कविता बहुगुणावादी छन।
   अबि तलक सत्या नंद की कविता इनै अखबारोंम छपेणि रैन अर 'ताता दुधै घूँट' ऊंको पैलो कविता-खौळ (संग्रह) च जो गढ़वळि साहित्यौ भंडारों बान एक नायब कविता -गळ (संग्रह ) च.
सरस्वती वन्दना कविता मा जख माँ सरसुती स्तुति च त 'हे माँ शिवा हे' आदि देविक भजन च।
 सत्यानन्द पुलिस की नौकरीम रौंदा बि गुनाही कविता नि गंठ्यान्दन बल्कणम बडोनी की कवितौं मा दर्शन अर अड़ेंदरि (शिक्षादायक अर प्रेरणा दायक) कविता जादा छन।
  कवि बड़ो संवेदनशील होंद, चितळ रौंद  । जब कवि कि नजर आजै बिगड़दि नाजुक स्तिथि पर पड़दि त 'सोने की पोथली' कविता उपजदि।
            दर्शन को अर्थ होंद 'द्रिश्यते अनेन इति दर्शनम' याने कि जु दिख्यांद च वो ही दर्शन च। अनुभव से दिख्युं बथ दर्शन होंद। सत्या नंद बडोनीs अनुभव काबिलेतारीफ च।   पुलिस की नौकरी ना बाळोपनो संस्कार वजै से बडोनीs कलम से दार्शनिक कवितौं छमछ्याट छुटद  अर इनमा  'विधाता की लेख', 'मनखि जीवन', 'तातै दूधै घूँट','अनर्थ', 'बिलमेणै चीज', 'संगत की शोभा', 'मनन करदौं', 'अग्यौ', 'बिराळि','न जाणि किलै', 'बचपन',कुत्तौ पूछ, 'जग्दि लाखड़ि','इंसानी रंग', 'भागै की भताक','बग्वाल',जन दार्शनिक कविता गढ़वाळि साहित्यौ शान बढ़ान्दन। कवि लोकहितैषी होंद अर वो वूं बातों तै बथांदो --दुःख क्या च ? कवि बथांदो क्या  ताज्य च? कवि सुणान्दु दुखो असलि वजै क्या च? कवि दिखांदो बल दुखो अभाव क्या च ? अर फिर आखिरैं कवि अपण जुमेवारी बि समजदो कि वो समाज तै बथाओ बल दुःख निवृति का क्या साधन छन?  अर खौंऴयाणै बात नी च बल दर्शन को भी यो ही काम हूँद -हेय,हेयहेतु,हान हानोपयाय च दर्शनस्य कर्मा। कवि सत्यानंद अपण लोकहेतु कर्म का मामलाम पूरो खरा उतरद। जादातर दर्शनशास्त्री अर दार्शनिक कवि   गूढ़ बथों तै बथांणम जटिल शब्दों इस्तेमाल कौरिक विषयों तै निसमजण लैक बणै दीन्दन पण लोकहितैषी, लोकमंगल को धड्वै कवि सत्यानंद बडोनी की दार्शनिक कविता सरल छन अर जै विषय तै समजाणम संत- महात्मा घंटों लगै दीन्दन वुखि बडोनी द्वी पंक्तिमा अपणि बात बथे दींदो अर वजै च बडोनी को सच्चो अनुभव आधारित कविता सरल शब्दोंम गंठ्याण। हमारा साहित्यौ अंक्याणेर/ सुकट्यों (समालोचकों ) तै त्याग, सच , ग्रहण जन गूढ़ विषयों तै समजाणम ध्वनि(रस), अलंकार , कहावतों सामजस्य वास्ता सत्यानन्द बडोनीक बडै करण इ पोड़ल।
                                             
 गढ़वाल एक खेती पाती देस च अर फिर गढ़वळि कवितौंम अनाज , प्रकृतिs   बात नि  ह्वाओ त वो गढ़वळि कविता-खौळ (संग्रह) इनि लगल जन चटपटो साग बणाणम क्वी लूण डळण बिसरि जावु। प्रकृति अर खेती पाती छ्वीं गढ़वळि कविता-खौळ को एक जरूरी उपादान या अंश  च। सत्या नंद बडोनीs  'चीणा','धन्य हम तैं','हिमवंत देश' जनि कविता  बंचनेरूं मनम गढ़वाळौ भौगौलिक अर मानवीय   प्रकृतिs विम्ब बणाणम पूरा सक्य (समर्थ)  छन।
 
    जनानी अर ब्वे बगैर जानवर, मनिख इ ना पेड़ पौधा बि नि जनम नि ले सकदन। नौनि छ्वटि बि ह्वावो तबि बि स्या ऊर्जा दिंदेर होंद; जनान्युंम वा सहनसक्यात होंद जो ऊं तै कठण से कठण परेशान्युं से लडनो ताकत दींद अर वो परेशानी पार करि दीन्दन।जनानि इन लडै लड़दन जो मर्दों  समजण से भैर होंद।  जनानि बेटि,ब्वारि, ब्वैs जिम्मेदारी बगैर सिखायों निभान्दि। स्त्री त्यागै मूर्ती माने जांद अर पिरथवी रूप हूंद।  कथगा बि , कनि बि सरैलो या मन को बोझ ह्वावो जनानि वै बोझ अऴगाणम पैथर नि रौन्दि। इनि जनान्युं बनि बनिक रूप सत्यानन्द बडोनीs 'गढ़नारी', 'माँ इन कुछ चितैगी', 'माँ', 'धै','रात खुलगि','स्वीलि पिड़ा', 'तेरा न होण का बाद', कवितौंम मिलदन। जनान्युं संबंधी कवितौं मा सत्यानन्द न गढ़वळि प्रतीकों/चिन्हों/निसाण्यु बड़ो बढ़िया प्रयोग कर्युं च। 
 
 'अपणैस' कविता विचारोत्तेजक ढंग से नौनु- अर नौनिम समाजौ दूरंग्या बर्ताव पर दुःख जतांदि।   
   
 जख टीरी डाम दिल्ली अर उत्तर प्रदेश वाळु खुण एक बरदान च उखि  टिहरीs डुबण टीरीवळु कुणि एक दुःख दिन्देरि घटना च। सत्यानन्द बडोनीs टीरीवळुक टीरी से भावनात्मक लगाव की ब्यथा  'टीरी' कविताम  कळकळि भौणम बयान करदि।       
 
जु गढ़वाळम जनम्युं ह्वावो पर्यावरणौ बान स्वत: ही  सचेत/चितळ रौंद अर योइ वजै च गढ़वाळि कवितौंम पर्यावरण बचाण एक जरूरी विषय होंद। कवि सत्यानन्द की पर्यावरण संबंधी कविता 'अग्यौ', 'सारु जीवन तुम तैं', 'राजघटौ पाणि', 'डाळि एक लागौऊ'   जन कविता बथान्दन बल कनो एक आम गढवाळि पर्यावरण का प्रति चितळ च , सचेत च।  उन यि कविता अडंदेरि कविता छन। 
 
पलायन गढ़वाळ की एक  भौति बड़ी समस्या च यीं अणसुऴजीं समस्या सूत भेद लॆन्दि कविता छन -जन कि ' टेकण्या बि हर्चेली कविता।   
मनिखम   देशभक्ति एक आवश्यक भावना च अर बडोनीs 'जन्ननी जन्म भूमि',  'ऊं तै सैल्यूट' कविता ज्वानु तै सेनाम भर्ती हूणों अफिक प्रेरणा दींदन।
 कवि समाजौ आइना हूंद अर बडोनीक 'चिट्ठी (उत्ताराखंडै उ . प्र  .तै ), उत्तराखंड मिल गैइ कविता बथांदन बल  कन हम उत्तराखंड बणनम पुळे छया अर फिर 'गिल्ली हम डंडा क्वी' उत्तराखंड की कुदशा  को बिरतांत लगान्द।
जू यखा का छये नी
वीई लोग !
लट्ठा लितैं हम तैं हांकणा
वक्त -बिवक्त हम तै डांट णा
कथगा इ कविता जन कि 'लम्पू', 'गीता', 'कुर्सी'  अदि कविता समाज , राजनीति अर प्रशासन पर व्यंग्यौ  कुलाड़ी चलाणम सक्षम कविता छन।   
'हिमवंत देश', 'गढ़ संस्कृति' गढ़वाल प्रशंसा की कविता छन।
                     
 विषयों मामलाम डा सत्यानन्द बडोनीम विषयों भरपूर भंडार च।
'सरस्वती वन्दना' दोहा रूपम  च त बकै कविता नया रूप याने स्वछन्द कविता छन। कवितौं मिजाज गढ़वाली साहित्य तै आधुनिक  रूप दीणों तरफ च। 
कवितौं भाषा अर गंठ्याँणै कौंळ/ब्यूंत सरल होण से बोझिल विषयूं  कविता बि बोझिल नि छन।     
 
कथ्या कविता ननि कथा रूपम बि  छन जन कि 'बंठा लिजाण या गागर', 'औकात' आदि अर पैथरां  इ कविता बंचनेरूं तै खौंऴयांद बि छन।   
 
 प्रतीकों मनुष्यकरण 'चिट्ठी' कविता माँ भौत भलो हुयूं च। 
हिंदी मुवावरों गढवालीकरण बढिया ढंग से हुंयुं  च  जन कि बंठा लिजाण या गागर कविता माँ 'पेट में चूहे कूदने ' क जगा बडोनीन प्रयोग करी -
वैका  पोटगा म 
भूखा का
मूसौं कू मनाण छौ लगायुं                           
             
कवितौंम  मुहवरा खूब छन जो समुचित चित्र बणाणम सफल छन अर कवितौंम ऊर्जा लांदन।   

 डा सत्यानन्द बडोनी कवितौं  बांचिक अंग्रेज साहित्यौ अंक्यानेर  (समालोचक) हैजलिट का यी शब्द बरबस याद आइ  गेन," कै मार्मिक वस्तु या घटना कु प्रत्यक्षीकरण से सम्मूर्तन प्रक्रिया अर सान्द्र भावानुभूति तै गति शील बणान वळी सम्वेदना से विशेष प्रकारै स्वर-प्रक्रिया अर ध्वनि प्रवाहक  रूपम जन्मण वळि मानसिक प्रक्रिया ही कविता च।"
 
लोकमंगल तै अहमियत दिन्देर कवि डा सत्यानन्द बडोनीक  पैलो कविता-खौळ (संग्रह ) 'ताता दूधै घूंट' पर वधाई अर आशा च कि अग्वाड़ी, डा सत्यानन्द  बडोनी बर्सकुल  कविता-खौळ छ्पाला।   

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Bhishma Kukreti

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Modern Garhwali Verses  Songs,  Spring , imagery     Poems

ऐगे -ऐगे रे बसन्त (गढ़वाली कविता )

रचना --   डा लक्ष्मी भट्ट  ( जन्म 1975 ,  नत्थूवाला , देहरादून गढ़वाल  )
Poetry  by - Dr. Lakshmi Bhatt
 
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 206
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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ऐगे -ऐगे रे बसन्त
छैगे -छैगे रे बसन्त
डांडी  डांडी चौछेड़ी
हरयळि  लैगे रे बसन्त। 

कुंगळा हैरा -भैरा पात
 मौळदी कोंपळयूं का गात
रंगीलू पिंगळु   रे बसंत।
 ऐगे -ऐगे रे बसन्त।
लय्या पय्यां का फूल कन
फ्यूंळी  -बुरांश बि खिल्यां छन
खिल्दु खिल्दु रे बसन्त
 छैगे -छैगे रे बसन्त।   

चौछ्वड़ि फुलार ऐ ग्याई
जिकुड़ि खुदेण लै ग्याई
बौड़ि बौड़ि रे बसन्त
 ऐगे -ऐगे रे बसन्त।

खेला फूलों की होरी
पिचकर्यूं माँ रंग भोरी
 नचदु ख्यलदु बसन्त
 छैगे -छैगे रे बसन्त।   
     

(Ref-Angwal,2013)
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Bhishma Kukreti

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Niranjan Suyal: Expert Poet of Traditional Symbols and creating Images
Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 123

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti

            Famous Poet and Critic Madan Duklan and poet Girish Sundariyal appreciates Niranjan Suyal for using customary symbols for creating traditional images in Garhwali verses.
  Niranjan Suyal was born in 19663 in Apola village, Idiyakot of Pauri Garhwal.
   
             Niranjan Suyal published more than 50 Garhwali poems in various periodicals and poetry collections. His subject is mainly of social absurd. He writes humorous and serious poetries both.
  हाथ 

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जीभ /पर जु
ताळां ठ्वके जाला
पीड़ हथगुऴयौंन फुटली
बेशक आँखा बजे जावन
हाथ अंध्यरम्भी
द्यखदा छन   

हूर  ह्वेगे देरादूण    (गढ़वाली कविता )


-
राज ह्वेगे देरादूण , काज ह्वेगे  देरादूण
ब्याळी तैं यु डेरा छौ , आज ह्वेगे  देरादूण।

देख ह्वेगे  देरादूण, लेख ह्वेगे  देरादूण
बारा का बरोबर , एक ह्वेगे  देरादूण।

हूर  ह्वेगे  देरादूण, टूर  ह्वेगे  देरादूण
दिल्ली से बि जादसि , दूर ह्वेगे  देरादूण।

हाम ह्वेगे  देरादूण , लाम ह्वेगे  देरादूण
डाम पड़े टीरी पर , जाम ह्वेगे  देरादूण।

औळ  ह्वेगे  देरादूण , बौळ  ह्वेगे  देरादूण
देखि लम्बा चौडो छौ , गोळ ह्वेगे  देरादूण।

सौत ह्वेगे  देरादूण, मौत ह्वेगे  देरादूण
हौर क्वी नि मिली क्य , भौत ह्वेगे  देरादूण।


( साभार -- अंग्वाळ , 205)

Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai, May 2016
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Bhishma Kukreti

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Modern Garhwali Verses  Songs,  losses by flooding ,    Poems

  हाय रे बरखा !(गढ़वाली कविता )

रचना --   सुरेश स्नेही  ( जन्म  1975 ,  सुणाणा चौरास , किलकेश्वर , टिहरी  गढ़वाल  )
Poetry  by - Suresh Snehi
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Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 207
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साहित्य इतिहास , इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती
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रुमझुम -रूमझुम बरखी बरखा , बढ़गे गाड गदेरौं मा पाणी
कैकी डोखरी , कैकी पुंगड़ी बगगे , पाणी मा आस पुराणी
हाय रे बरखा नी औण पै तू फेर।

सरगै किड़कताळयून डौर लगदी , तबर्यूं  बरखा हौर लगदी     
बीदा द्यो को बजर पोड़िगे , कूड़ी बी देखा खँद्वार ह्वेगे   
हाय रे बरखा नी औण पै तू फेर।

कखी त गौं का गौं बगी गैनी , पीड़ी पिस्त्यान्यूं तक नऊ मिटि गैनी
कैंका गोरु भैंसा नी रैनी , सीबी  पाणी मा रामदी गैनी
हाय रे बरखा नी औण पै तू फेर।

पक्का डांडा बी रौला बणी गैनी , उबाणा मा बि बौला बणि गैनी
कखि त गौं का गौं ह्वेगिन खाली , उजड़ीगे फसल बग गैनी डाळी
हाय रे बरखा नी औण पै तू फेर।

सौण भादो को गिगड़ाट देखा , कूड़ै पठाळयूं को थर्राट देखा
बूड़ बुड्यों को रकर्याट देखा , गाड गदन्यूं को  स्वींसाट देखा
   हाय रे बरखा नी औण पै तू फेर।   

 

(Ref-Angwal,2013)
Poetry Copyright@ Poet
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 पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली , कविता ; चमोली  गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ;उत्तरकाशी गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; देहरादून गढ़वाल, उत्तराखंड  से गढ़वाली पद्य  , कविता ; 
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Regards

Bhishma Kukreti

Bhishma Kukreti

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Dushman: A Shocking Satirical Poem by Madan Duklan

(Review of Poems of ‘Andi Jandi Sans’ a Garhwali Poetry collection by Madan Duklan)

Bhishma Kukreti
[Notes on Shocking Satirical Poems; Shocking Satirical Garhwali Poems; Shocking Satirical Uttarakhandi Poems; Shocking Satirical Mid Himalayan Poems; Shocking Satirical Himalayan Poems; Shocking Satirical North Indian Poems; Shocking Satirical Indian Poems; Shocking Satirical South Asian Poems; Shocking Satirical Asian Poems]

Critics state that the specialty of poems by famous Garhwali poet Madan Duklan is that he seldom repeats the old subject and if he does so there will differences in phrases and methodology of creating images in the mind of readers.
The following poem is an example of providing shocks to the readers by Garhwali satirical poem. The satirical poem does not have any humor but ultimately frightens the readers for the state of humanity.
दुश्मन
***
कवि - मदन डुकलाण
**
मुसौं को दुश्मन
बिरळो
गुरौ को दुश्मन
नेवला
छौना-चिनकों दुश्मन
स्याळ
गोर -बखरों दुश्मन
बाघ
मनिख दुश्मन
मनिख को
Literal Translation----

Cat is rat’s Enemy
Mongoose is snake’s Enemy
Fox is Goat’s Enemy
Fox is sheep’s Enemy
Tiger is Caw’s Enemy
Human is human’s Enemy
Copyright@ Bhishma Kukreti 12/7/2012
Notes on Shocking Satirical Poems; Shocking Satirical Garhwali Poems; Shocking Satirical Uttarakhandi Poems; Shocking Satirical Mid Himalayan Poems; Shocking Satirical Himalayan Poems; Shocking Satirical North Indian Poems; Shocking Satirical Indian Poems; Shocking Satirical South Asian Poems; Shocking Satirical Asian Poems to be continued

Bhishma Kukreti

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आंदी  जांदी   सांस
मदन डुकलाण  की कविता पर   टिप्पणी 

- Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 124

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti

There have been many poets in Garhwali language who created verses of pathos rapture (karun ras).
 'too holi Beera uchi nisi dandyun man ghasiyaryun ka bhes man' created by Jeet Singh Negi in the night roaming Lal Bahadur Road (Agra Road), Bhandup, Mumbai, is our heritage lyric of pathose rapture created in eaarly sixties.
Same way, 'andi-jandi sans' a poem created by Madan Duklan is our heritage among  modern Garhwali poems.
This poem of Madan is also viyog karuna (pathose by separation) as ' tu wheli beera....' of Jeet Singh Negi but with different style, form and situation: ---
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andi-jandi sans chyai too
mera jeeno ko as chyai too
Too mekhuni kya chahyo
ya deen dunya, dyau divta
yun sabse jada  khash chyai too
Ab Jab

meri duniya man ni chhai too
fir bi mera pas chai too
he man kilai udas chai too
kati hi jala khairi ka yee din ...........


 

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