Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 579653 times)

Bhishma Kukreti

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लड़कियों की  फीलिंग का गीत (गढ़वाळी में )
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Garhwali Lyric By Shailendra Joshi
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हे जी कुतग्यली लगांदा
मेरी जिकुड़ी मा
तुमरि हँसी छुयीं जी
मि फ्योंली छो
भीटा कि जी
सट तोड़ चुंडी नि दिंया जी
मेरी सांची माया कु सच पहछाणी
मि बाला छो कुंगली
चल गया ज्यु सात छोड़ी
मरी जल्लू रोयी रोयी कि
मेरु भरोसु तोड़ी साथ न छोड़ी
बिस्वास का डांडा न तोड़ी
न जैयी साथ छोड़ी
तुमरि चिफली छुयीं सुणी
खुट्टू रड़ीगे यीं ज्वानि मा
तू हाथ पकड़ी फिर न छोड़ी
दगड़ू दगड़िया
माया कु निभाणु रैयी
मेरी जुकड़ी ध्ये सुणी
गैल्या मेरु साथ न छोड़ी
इन्नु बि क्या देखी
 तुमन मैमा 
मैकू पिरेम जोगण बणयालि
भरी पूरी ज्वानि मा
ज्यु बि च अब
साथ छोड़ी नि जैंया।।
                     रचना ........शैलेन्द्र जोशी

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Bhishma Kukreti

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 म्यारा ब्वै-बब्बा
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Garhwali Poem by Payash Pokhara
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रिटैर सि सिपै-चौकीदार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ।
खंद्वर्या कूड़ियूं का पैरादार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

पिनसिनी कि फसल-पात हुणीं च
मैना का मैना ।
लैंणा, कटेणां कु तैयार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

लैगी, बरमूडा, कैप्रि, जीन्स का जमना
मा घुमुणुं छौं ।
दरदरा पट्टदार सुलार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

ब्वै का मुर्खला बब्बा की मुरखी बेचिं
दीं मिल वै दिन ।
जै दिन बटैकि बिमार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

जाण न पछ्याण क्वी सारु दिदंरु
भि नि राइ युंकू ।
द्वि अदम्यु कु परिवार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

नौना-बाळौ दगड़ हैंसि-खेलि मा
सदनि रंगमत्या रौं ।
दुख-दैनि का असगार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

क्य कन, बूढ़-बुढ्यौं कु पापी पराण
भि त नि मनदू ॥
अपणै छ्वारौं कु छुछकार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

रोज-रोज गेड़ मारि-मारिक गंठेणु
च दानू सरैल ।
खटुला का सड़यूं निवार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

नाति-नतणों कु ळाळ चटणा कु ज्यू ब्वळ्द आज भि ।
दुदिबाळा कु बुखार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

हां, ह्वालु सोरग ब्वै-बाबुका खुटौं मा "पयाश" पर ।
एक लपाग कु लाचार ह्वैगीं,
म्यारा ब्वै-बब्बा ॥

@पयाश पोखड़ा ।


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गढ़वाली कवि श्री धर्मेंद्र नेगी के अपने  बारे में  कुछ विचार (लिखाभेंट /इंटरव्यू द्वारा )
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नाम- धर्मेन्द्रसिंह नेगी
गाँव- चुराणी, रिखणीखाळ
पट्टी- इड़ियाकोट मल्ला
जिला- पौड़ी गढ़वाल
वर्तमान पता- स.अ., रा.पू.मा.वि.- जगदेई, पत्रालय- गौलीखाळ, नैनीडांडा पौड़ी गढ़वाल
जन्मतिथि- 19-06-1975
जन्मस्थान -ग्राम चुराणी, Rithakhal Pauri Garhwal
[     साहित्यिक ब्योरा- मेरी अज्यूं तक एक बाल उपयोगी पुस्तक कथा- चित्र- गीत "सिकासेरी" प्रकाशित ह्वेयीं छ अर कथा -चित्र -गीत  "तीलू बाखरी " अर "वीर बाळातीलू रौतेळी " व छ्वट्टी छ्वट्टी बाल कविताओं की बाल पोथी प्रकाशनाधीन छन /
यांका अलावा कविता, कहानी, नाटक ,एकांकी आदि भी लिखीं छन / कुछ नाटकों को मंचन विद्यार्थियों द्वारा स्कूल का समारोह मा करेगे / कई पत्र पत्रिकाओं मा लेख अर कविता छपेणी रौन्दन /
सौभाग्य से उत्तराखण्ड का प्रतिष्ठित साहित्यकारों का दगड़ी मंचों मा कविता पाठ को सुअवसर भी मिलणूं रैन्द /                       
      : समीक्षकों की राय- मेरा लेख अर कविताओं तैं जौं भी पाठकौं न पैढ़ी अर सूणी सब्यूंन भली भली सलाह देनी अर पीठ भी थपथपैइ / जब भी क्वी वरिष्ठ साहित्यकार अपणी सौसलाह देन्दन ता भौत भलु लगद अर भौत कुछ सिखणा को भी मिलद / नै छ्वाळी का लिख्वारों का वास्ता अड़ंदरौं का रूप मा वरिष्ठ साहित्यकारों को होणू भौत जरूरी छ /                       
             : कविता क्षेत्र मा आणौ कारण -  स्कुल्या दिनौ मा ही पिताजी का दगड़ा गढ़वाली साहित्य पढ़णौ चस्का लगिगे छौ | आकाशवाणी नजीवाबाद अर लखनऊ बिटि प्रसारित होण वला गढ़वाली अर कुमाऊंनी कार्यक्रमों का हम नियमित श्रोता छया | स्कुल्या दिनों मा ही लिखणौ  शौक लगिगे छौ | कौप्यूं का पिछनै का पेज मा लेखिकी दगड़्यों तैं सुणाई वाहवाई लूटी अर फिर फाड़िकी फेंकी दे |  नौकरी पर आणा बाद ब्यो ह्वेगे अपणी नै -नै ब्योली तैं भी अपणी कविता सुणैनी |वीन बोली जब तुम लिखदा छयॉ ता यूंको संकलन किलै नि करदा | मिन बोली संकलन कौरि मिन क्या करण ? कौन से मिन क्वी किताब छपवाण | वीन स्वयं मेरी रचनाओं तैं संकलन करणौ जिम्मा ले | एक बार विभागीय प्रशिक्षणा दौरान डायट चड़ीगाँव मा भैजी गिरीश सुन्दरियाल जी अर हरीश जुयाल जी से भेंट ह्वे साहित्यिक चर्चा परिचर्चा  दौरान मिन भी अपणी रचना वूंतैं सुणैनी | वून रचनाओं की तारीफ कैरी अर लिखदा रैणा की अर रचनाओं तैं संकलित करणै सलाह दे | बस वी मेरो जीवनौ टर्निंग प्वाइन्ट छयो | आज अपणी रचनाओं तैं जब सोशियल मीडिया पर पोस्ट करदू ता पाठकों द्वारा भौत भला भला सुझाव ,  कमेन्ट्स अर लाइक मिलदन त औरि लिखणै हिकमत मिलदा |                       
                  रचनाओं पर कव्यूं को प्रभाव- मेरी रचनाओं पर कौं कव्यूं को प्रभाव छ यु त मि नि बतै सकदू हाँ मेरी रचनाओं का पाठक अर श्रोता जरूर यीं बात तैं बींगि सकदन अर  बतै सकदन |
  जख तक गढ़वाली साहित्यकारों का साहित्यै बात छ मितैं कन्हैयालाल डंडरियाल जी , निर्मोही जी, गोविन्द चातक जी , सायर साहब, अयाळ जी,ललित केसवान जी ,नरेन्द्रसिंह नेगी जी, देवेन्द्र जोशी जी, छिपड़ु दा ,नेत्रसिंह असवाल जी, भीष्म कुकरेती जी(सोशियल मीडिया पर), मदनमोहन डुकलाण जी, नरेन्द्र कठैत जी,वीरेन्द्र पंवार जी , गणी भैजी,  गिरीश सुन्दरियाल जी, हरीश जुयाल जी , जगमोहन बिष्ट जी को गढ़वाली मा लिख्यूं साहित्य भौत उत्कृष्ट अर  प्रेरक लगदा | कती बार पैढ़ी की भी ज्यू नि भुरेन्दो | यूंका साहित्य की जरा भी लसाक मैमा ऐजाव ता मी अपणो धनभाग  समझुलु  |                         भौतिक संसाधनों को महत्व - टेबल,  खुर्सी को त मैं ज्यादा महत्व नी समझदो | हाँ  पेन , नोटबुक अर इकुलांसौ  साहित्यकारा जीवन मा भौत महत्व छ |
परिस्थिति का अनुसार लिखणा का वास्ता पेन, पेन्सिल , मोबाइल या कम्प्यूटरौ इस्तेमाल करदो |
कागज कनी भी मिलजो लेखिदिन्दो | हाँ रफ कॉपी मा लिखणमा भौत आनन्द औन्द | लेखा अर पसन्द नी औ त कागज चीरीकी  फुन्ड धोलिद्यो  |
शिक्षक होणा कारण अब पेन अर पॉकेट डायरी जेब मा रखणै आदत सी ह्वेगे |

कैबेरी क्वी विचार मन मा ऐ जाव अर नोट करणा को ज्यू नी ब्वनों ता मोबाइल मा वूं पंगत्यों तैं रिकॉर्ड कैरी देन्दो अर घौर मा ऐकी फुरसत से फिर फेयर कैरी देन्दो /
हाँ कतगै दौं भौत ज्यादा अलगस ह्वे जान्द अर मन मा अयॉ विचारों तैं ना ता नोट करेन्दो अर ना रिकॉर्ड / मन बोद कनु नी रालु घौर पौंछद पौंछद तक  याद अर घौर मा ऐकी जब पंगती याद नी औन्दी ता अफु फरै भौत गुस्सा औन्द तब /                       
      : अपणी रचनाओं तैं रिवाइज करणै जखतक बात छ मैं तैं अपणी  कविता याद ता ह्वे जान्द पर व ज्यादा दिनों तक याद नी रौन्दी | यां मामला मा मिन गिरीश सुन्दरियाल भैजी से ज्यादा याद रखण वलो क्वी नी देखी वूंतैं अपणी त ह्वे ह्वे वांका अलावा सब्बि प्रसिद्ध गढ़वाली साहित्यकारों की रचना भी याद रैन्दन |                       
    कविता की वर्कशॉप - मेरो मनणो यो छ की कविता जिकुड़ा बिटि उपजद , पर हाँ जु भी हम लिखदा छां वु अगर एक फौरमेट मा हो ता औरि भी दमदार अर मजेदार ह्वे जान्द | इलैई नै छ्वाळी  लिख्वारों  वास्ता कविता ही ना साहित्यै  हर विधा की वर्कशॉप आयोजित करे जाण चैन्दी | जैमा वरिष्ठ साहित्यकारो तैं ऐक्सपर्ट अर मास्टर ट्रेनर का रूप मा आमन्त्रित करे जाण चैन्द |  अब तक लिख्यूं सब्बी उत्तराखण्डी भाषाओं साहित्य वख उपलब्ध होण चयेन्द |
 मैंतै भी अज्यूं तक यनि वर्कशॉप मा शामिल हूणौ सुअवसर नि मिली अगर भविष्य मा कभी  मिललो ता मी जरूर शामिल होणौ प्रयास करलो |
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एक गज़ल खळ्याण जनै
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Gazhals by Payash Pokara
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उगाड़ी रखदा छाया जब कूड़ों का द्वार खळ्याण जनै ।
हैंसि-खुसि कि भि लगीं रैंदि छाई लंग्यार खळ्याण जनै ॥
तिबरि-डंड्यळि खालि ह्वैगीं अब यख  क्वी नि रैन्दु ।
बिना मनख्यूं का घर-कूड़ा हुयां खन्द्वार खळ्याण जनै ॥
अब त जिकुड़ों फर भि बड़-बड़ा डाम दिखेणा छन ।
झणि कब बटैकि नि आई यूंफरै मौळ्यार खळ्याण जनै ॥
ब्वै थैं चलि गैन चारा अर बुब्बा थैं सन्निपात हुयूंच ।
भयूं ल झगड़ों मा जब चीण द्याई दिवार खळ्याण जनै ॥
कख हर्चिगीं वो छज्जा चौक अर गुठ्यार म्यारा गांव का ।
ख्वजणा छवां थड्या चौंफ्ळा लाड-प्यार खळ्याण जनै ॥
अब ठुंगणा कु भि किलै नि आंदि घुघूति- घिंडुड़ि आज ।
सेरेक कौणि झुंगरु छिटक तू वार-प्वार खळ्याण जनै ॥
बूण-परदेस घूळि गैन म्यारा गौं-गळ्या अर ख्वाळौं थैं ।
"पयाश" नीना प्याट ल्हिण लग्यूं डंकार खळ्याण जनै ॥

@पयाश पोखड़ा
=

एक गज़ल "बगत" फर
******************
यो बगत भि कन चट-चटाक ह्वै जांद |
पैदा हूंण से पैलि पोट-पटाग ह्वै जांद ||
अज़ाण अपछ्याण उपुरि सि मेमान बणिकै |
पछ्यणकुल से पैलि यो झट-झटाक ह्वै जांद ||
मुण्ड फर बड़-बड़ा गुरमुळा दे ग्याइ यो बगत |
झणि कबरि यो खैड़ा कि कट-कटाग ह्वै जांद ||
भुक्करा पिळचीं त रुवै-बुथै भि ग्याइ यो बगत |
उछिण्डू बिळ्कैकि दूधकि घट-घटाग ह्वै जांद ||
मि जणदु छौं बगत आज त्यारु मुण्ड मलसणु चा |
भोळ-परबात बगत की कनि चोट-भटाग ह्वै जांद ||
अपणि खैरि कु पस्यौ कभि सुखणि नि देई तू |
छैल बैठदै हि यो बगत भि लट-लटाक ह्वै जांद ||
सर्या दुन्यां की आळि-झाळि नि कैर तू "पयाश" |
बगत का दगड़ा ज़िन्दगि झट-झटाग ह्वै जांद ||
@ पयाश पोखड़ा |
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  "त्वी बिंगौ अब"
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Garhwali Poems by Dharmendra Negi

दिन द्वफरि
दिखयाँ
तेरा स्वीणा
अर
माया मा
तेरी करीं
सौं - करारौं
तैं भलि कै
खरोळि- खराळी
छीटि-फटकी
अर
रकरै- बतै की
देखियाल मिन
सब उनि
बुसिला छन
जन कोन्ना पेट
मूसा ठुन्ग्याँ सट्टि
छूड़ु भुखु
अब
त्वी बिंगौ मैतैं
यूं
बुसिला स्वीणों
अर
सौं- करारौं
का सारा
कनक्वे ठ्यलण
मिन अपणी
या सैरी जिन्दगी

सर्वाधिकार सुरक्षित -:

            धर्मेन्द्र नेगी
       चुराणी, रिखणीखाळ
            पौड़ी गढ़वाळ



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वीरेंद्र जुयाल 'अजनवी ' की गढ़वाली  कविताएं
-
Garhwali Poems by Virendra Juyal
-



••••=55.
जो खांदु छूँ
वो पचदु नि।
जो कमांदु छूँ
वो बचदु नि।।
जो पैरुंद छूँ
वो मि
जचदु नि।
जै थैई
हेरदु छूँ
वो मि जनै
द्यखदु नि ।।
जो ब्वलदु छूँ
वो क्वी सुणदु नि।
जो बच्यांदु छूँ
वो क्वी बिंगदु नि।।
जो च्वोरि
करद
वो बचदु नि।
जो सच ब्वल्द
वो डरुदू नि।।
फिर बि वुं लोखुं
क गिच्चा कैल
पकडणै ?
जो ब्वल्दी यो
"अजनबी"
जुयाल कुछ कर्दु नि ।।
••••=56.
सुख क
बाटु बथाण वोला
यख बटि चलिगिंई
मि बि बाटु खुज्याणुं छूँ।
चौछोडि मनख्यूँ क
थुपडा लग्यां पर मि
अफ्थैं यकुलि चिताणुं छूँ।।
मनख्यूँ क चबलट्या
रंग ढंग द्येखिक छाल
फरि बैठि खिसाणुं छूँ।
भाग मा म्यार विधाता क
यकुलि ल्यख्यूं इलै त
मि नि रुसाणुं छूँ।।
जो बथौं बणिक
उकलि लैगि मि
वुंकी गाथा गाणूं छूँ।
जो उंदरि क बाटा
सौंगू बथाणा मि वुंका
वचन छटयांणुं छूँ।।
स्याणी गाणी क पैथर
यकतरा हुंयां छी लोग
पर मि शुरुक शुरुक कै
सबथैं धै लगाणुं छूँ।
सदनि अपडि भाषा मा
ल्यख्णूं बच्याणूं अपडा
मन थैई मि बि बुथ्याणुं छूँ।।
=
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई..............
---
ताजमहल कु नै नियम बथाणु कौफ्णी
धर्मनिरपेक्ष देश मा यो रंग की धौंकणि।
नै सरकार बि देखि क अजक्यै खै चौंकणी
विदेशी ब्वोलिक मीडिया बि मनी च टौंखिणी।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई........................
कश्मीरी मा ढुँगा ध्वल्दरा खूब हुंयां छी
यो त कतगै आर्मी क बाढ मा बचैयां छी
यो चलन सर्या देश से गद्दारी कु चा ।
ये घौ थैई मोदी जी बगतल खत्म कारा
अब बगत इतिहास मा नै पारी कु चा।।
इन ह्वैग्याई त...............................
घाटी मा राजनीति कु गठजोड हटावा।
माटी का गद्दारूँ क नामो निशान मिटावा।।
लगणु संसद मा लूला लंगडा बच्याणा छी
वो ढुंगौं ल फौजी ना देश थैं कच्याणा छी।
अब आसार राष्ट्रपति शासन का लगणा छी।।
इन ह्वैग्याई त.................................
सोनू निगम लाउडस्पीकर हटवाणा
निन्द अर जंता बि अजान से परेशान चा।
मौलवी मुंड सफाचट कु फतवा सुणाणा
फतवा सूणिक लोकतंत्र हुयुँ हैरान चा।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई...........................
दिल्ली मा एमसीडी खुणि वोटिंग ह्वै
मीडिया सर्वै मोदीजी थै जिताणा छी।
लगणु चा गोवा पंजाब जन यख बि
सरजी कटगडा चाणा बुखाणा छी।।
इन ह्वैग्याई त.....................................
दिल्ली मा एयरफोर्स क अफसर पिटैई
यैमा कैथै बुरै नजर नि आणी चा।
लोकतंत्र कि आड मा जंता यो कनु चरखा चलाणी चा।।
ब्यालि सुकमा क नक्सली घटना ह्वै कर्युं बडु यो आघात चा।
मोदीजी अब दिखावा दम नथर यो त बडी शर्म की बात चा।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई.............................
हज्जि ऐथर****

••••=59.
°°°°°°°°◆◆◆◆◆°°°°°°°°
मि बि गढवली छूँ भैजी।
वीर चंद्र सिंह नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
नरेंद्र सिंह नेगी नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
अजित डोभाल नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
विपिन रावत नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
अजय भट्ट नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
योगी आदित्यनाथ नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी पत्रकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी गितार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी चित्रकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी गद्दार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी फनकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
मि क्वी बेकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
भले मि 'अजनबी' छूँ भैजी।।
•••••=60.
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
तु सदनि अफ्थैं बडु से बडुु चिताणु रै भुला।
तिल भित्रक बिरणा बणैई भैर अपणौं खुणि खुदेणु रै भुला।।
अब्बि तक तिल अपडै नि पछयाणा नातों थै छटयाणुं रै भुला।
मुख समिणी लाटू बणिक पिछनै बटि लथ्याणु रै भुला।।
तिडयणि की ठांठी अल्झै कै हथुंल टैट मस्काणुं रै भुला।
अपडि खुशि मा अपड़ों क बुरु सोचि पापी मनथै बुथ्याणुं रै भुला।।
जो त्वथै आंदा जांदा ख्यालों मा बिसरि नि सकणा तु वुं जनै मुच्छयलु नपाणु रै भुला।
तु अपडै हथुंल छैंदा रिश्तों क कन गालु किटर्णु रै भुला।।
एक घडि मा छ्वीं नि पुरेंदि लाटा तु त अपडि धुन लगाणु रै भुला।
रिश्तों की ग्येड चौबट्ट मा खोलिक तु अपडों की हैंस अफि उडाणु रै भुला।।
==
•••••=61.
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
हे हम्हर उत्तराखण्ड क्या छो अर क्या ह्वैग्या देखिल्या।
कन स्वाणी रौनक रैंदि छै कै जमन अब त वो बगत नि रैग्या देखिल्या।।
शहीदुं ल कुर्बानी दे राज्य क बान अर राज त नेतों क हथ लगि देखिल्या।
आज त हर चुलखंदि मा राजनीति थडकिणी तब्बि त राज्य क गैराल ह्वैगि देखिल्या।।
वुंल स्वाचु छो कि अलग राज्य बणिक हम्हरू त भलु ह्वालु ।
पर राज्य कु त चौछोडि भलिकै खगिन बिगन ह्वैग्या देखिल्या।।
बर्सु बटि नै राज्य क बान कूणा कुमच्यरों बटि धै धवडि लगणि छै ।
अब धौ सनिकै मिल त कना कुहाल हुंयां छी देखिल्या।।
छै ज्वा देवभूमि कब्बि द्यब्तौं क सिर्वणु आज बणिच वा दारु क ठेकादरुं क मैत देखिल्या।
जि धर्ति मा जाडा ब्वाटों कि बयार रैंदि छै वख ब्वगणि च आज दारु की नयार देखिल्या।।
भै भै कु जख एक हि रस्वडु हूंद छो आज वै रस्वोडा मा चकडैतूं कि हुईंच मौज बहार देखिल्या।
जै मुल्क क हवा पाणि क कर्जदार छो हम वैकु चुकोला कनक्वै उधार देखिल्या।।

==
*****छ्वीं•••••=62.
★★★★★
ये रुप्या ! बिचरा सब त्यारै बान
अटगणा भटगणा छी दाना ज्वान
त्येरि अदंलि लगंद सर्या दुन्या
त्वै पैथर माखा सि रिटणा छी इंसान
ये पापी कलजुग मा सचै सब
भगवान पुज्येण्या त्यारै बान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान.........
त्यारा चेला भगत यख इंसान
उठदा बैठदा चलदा फिरदा लोग
खैरि खाणा छी त्यारै बान
हूणूँ त्वै पाणा क प्रपंच तमान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान .........
सींदा खांदा आंदा जांदा
फजल ब्यखुनि त्यार हि गुणगान
त्वै पैथर लदवडि् तडम लगद
भूक बि लगि जांद मुकदान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान ..........
त्वै पिछनै ना क्वी ग्वारु कालु
कुबरणी लौबाणि सब एक समान
त्वै पिछनै अब हूण लग्यूँ चा
रिश्ता नातों मा भलिकै फुकान
त्वी छै श्रद्धा, त्वी छै मान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान .......
त्वी छै अब फौंदारी शान
खुमसेणा रैंदि सब त्यारै बान
त्यारु गुलाम ह्वैग्या इंसान
वुन सर्या मुंडरु हुंयुं रैंद
रोज रोज सिर्फ त्यारै बान।।
=
काम काज करण वोला सब्या डुट्याल नि हूंदा रै।
तड तड बच्याण वोला सब्या छुंयाल नि हूंदा रै।।
कब्बि कब्बि लोग टौंखिणी मारिक सुद्दि नि रुंदा रै।
ई दुन्या मा कतगै मनिखि सिर्फ नौ कै ज्यूँदा रै।।
अब नि दिख्येंदा कखि ना धम्येला ना लटकण्या फूंदा रै।
छुछौ हर्चिग्या अब बीच कपलि कि स्यूंदा रै।।
म्वडब्वका काम लाटा कब्बि भला नि हूंदा रै।
कुलौं की डाल्यूँ फर त निक्वाल नि हूंदा रै।।
छ्वीं बथौं मा सदनि सवाल जबाब नि हूंदा रै।
बिना फट्ला रड्या का कब्बि धुरपला नि च्वुंदा रै।।
बिना पाणी क सूखा शंख पाणी च त सब ज्यूँदा रै।
सुद्दि बिरणों थैई बि दोष क्य दीण 'जुयाल'
जब भितरा कै अपडा नि हूंदा रै।।

=
हलकर्या बौ......
-
भैजि की जिकुडि घडि घडि झूरा।
हलकर्या बौ का त दियूरै दियूरा।।
जण्चारेक ना जिठणा भतिजा बि पूरा।
हलकर्या बौ का त दियूरै दियूरा।।
बौ की छुंयुंमा लपोडे जंदि उत्येड्या दियूरा।
बौ सानि सान्यूं मा ख्यल्द कुश्ती नूरा।।
बौजि थै देखणा कु द्यूरुं क जिकुडा कबलंदि।
कूणा कुमच्यरों बटि 'बौ प्यारी बौ' धैई लगंदि।।
रपचट्या स्वभौ से बौजि नौ प्वड्यूँ च हलकर्या।
छवटा बडा सब रंगतें जंदि बौ बणि च सरकर्या।।
जब जब बौ जनै भैजि ल करलि आंख्यूं ल घूरा।
खति गीं तब घलत्वण्या छुंयुंमा भ्यलि का चूरा।।
=



@

Bhishma Kukreti

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(हमरी आस )
-
Garhwali Poetry by Sunil Maindola

त्वेकुु माया जोडियाल
अर पंखुडी-पुच्छडि बि
लगी गेनी त्वेफर
अब त फुरर उडी जैलु तू
म्यारू लाटा दूर परदेस तू
बणैलि एक नै घोल
बसैलि अपणी छ्वटी सि दुन्या
तु बिअास लेकि
फेर कु पुछद ब्वे- बुबा थै
कु द्यखद पुरण कूडि थै
जैका डिंडयल ,चौक फुण्ड
खितगुणू  हैंसणो रैन्द छै बचपन
यांकु दोष त्यारू बि नीच
इन त  जुग-जुग बिटै
चलणी रीति च
पर,
इतगा त याद रखी
हमरी साँखी छै तू
हमरी अाँखी छै तू
हौर
हमरी जिकुडी काख माया छै तू !
तन कि दूरी भले  जै
पर मन कि दूरी न हूण  दे  तू
याद रखी आज जन तू
अपुण भविष्य बणाणि छै
हमरू बि उनि भविष्य छै तू
बुरा दिनों  कि लाचारी म
हमरी एक आस छै तू
एक सांस छै तू
हमरू मन म हुंयूं च घंघतोल
त्वे कनक्वे बिंगौंला
अपणि मन कि बात
यो माया को पहिय्यां
कतगा तेज घुमणो यल्यूं च
ब्यटा रे ,
भोल जब तू चलि जैलु
अपणि नौकरी फर परदेस
तब हमन
घुघती सी खुदेणू रैण दिन-रात
टपराणी रैलि मयलि आँखी
तेरी सकल-सूरत द्यखण को !
ब्यटा,
जौंकि सच्ची सरधा रैद
अपणा ब्वे-बाबु खुणै
वूंकि अौलाद झुल्दा-फुल्दा हून्द
जा म्यारू लाटा
अपणि नौकरी फर
पर,
ज्वानि कि उमंग मा
भूली न जै हमुथै
अरे एक दिन त्वेन बि
हमुमैं त अाण !!

(सुनील दत्त मैंन्दोला )


Bhishma Kukreti

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   "जणी मी म्वरयूँ छौं"

-

गढ़वाली पोएम बी सुनील भट्ट

-
जैबर्यौं मुख अग्नै,
अंध्यारू छ्यै जांदू ।
सारू भरोसू दिखेंदू नी क्वी,
कुछ बी समझ मा नी आंदू।
दुख विपदा, पीड़ा सैंदू सरैल,
तिसालु पराण टपरांदू ।।
सची दगड़्यौं तब यनु सी लगदु,
कि जणी मी म्वरी ग्यौं।
कर्मौं का फल छन, भ्वगणु छौं।
नरक मा छौं यख भटकणु छौं,
जणी मी म्वरयूँ छौं ।।

जैबर्यौं म्यरा मन की होंदी,
गाती मा छपछपी सी लगदी।
माया की ठंडी नयार ब्वगदी,
जु भी चैंदू  चीज मिलदी।
बगछट्ट ह्वै दिल नाची जांदु,
रंगौं मा लरतर गीत गांदु।
सची दगड़्यौ तब यनु सी लगदु,
जणी मी म्वरी ग्यौं ।
कर्मौं का फल छन, भ्वगणु छौं।
स्वर्ग मा छौं अब यखी रै जौं,
जणी मी म्वरयूँ  छौं ।।

कबर्यौं पितृ द्यव्ता,
स्वीणौ मा म्यरा औंदन,
मुंडु मलासी बात या मीतैं समझौंदन ।
माया का धागौं मा ना अऽलिझी रै तू,
ज्यूंदु छै बुबा रै ज्यूंदु सदानी  रै तू।
स्वर्ग मा बिछांयु रै माया कु जाल,
नरक मा बी माया की चाल।
मनखी छै तू जाणी ले,
सरैल कु मोल पछ्याणी ले।
संत जु तुलसीदास ह्वैनी,
बात या सच्ची बोली गेनी ...कि....

"बड़े भाग मानुष तन पावा।  सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाहे न जेहीं परलोक संवारा"।।

स्वरचित/**सुनील भट्ट**
20/05/17



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Bhishma Kukreti

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एक गज़ल "बगत" फर
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यो बगत भि कन चट-चटाक ह्वै जांद |
पैदा हूंण से पैलि पोट-पटाग ह्वै जांद ||
अज़ाण अपछ्याण उपुरि सि मेमान बणिकै |
पछ्यणकुल से पैलि यो झट-झटाक ह्वै जांद ||
मुण्ड फर बड़-बड़ा गुरमुळा दे ग्याइ यो बगत |
झणि कबरि यो खैड़ा कि कट-कटाग ह्वै जांद ||
भुक्करा पिळचीं त रुवै-बुथै भि ग्याइ यो बगत |
उछिण्डू बिळ्कैकि दूधकि घट-घटाग ह्वै जांद ||
मि जणदु छौं बगत आज त्यारु मुण्ड मलसणु चा |
भोळ-परबात बगत की कनि चोट-भटाग ह्वै जांद ||
अपणि खैरि कु पस्यौ कभि सुखणि नि देई तू |
छैल बैठदै हि यो बगत भि लट-लटाक ह्वै जांद ||
सर्या दुन्यां की आळि-झाळि नि कैर तू "पयाश" |
बगत का दगड़ा ज़िन्दगि झट-झटाग ह्वै जांद ||
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@ पयाश पोखड़ा |


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Bhishma Kukreti

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#बगत.....
Garhwali Poem by Virendra Juyal
बगत छिरकुणुं च लाटा अर तू देख्दै रैग्ये।
बिंगण नि चाणु छै किलै बोल त्वै क्या ह्वैग्ये।।
बगत एक बाटु चा
जैमा हम हिटदा बि छो अर रिटदा बि छो।
बगत एक चिट्ठी चा
जैथै हम ल्यख्दा बि छो अर पढदा बि छो।।
बगत एक मुसु चा
जो खैंडि बि जांद अर चंग्वोरि बि जांद।
बगत एक बसग्याल चा
जैमा सुख क छोया बि फुटदि
अर दुख क ब्वगण बि आंद।।
बगत एक सूड बथौं च जो कुंगला डालौं थै लटकै जांद।
बगत सब्युंक दगुडु करंद जुयाल पर लौटिक कब्बि नि आंद।।
@

 

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