Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 284348 times)

Bhishma Kukreti

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समलौण'

Garhwali Poet: वीरेंद्र जुयाल 'उपिरि'
Garhwali Poem on Memoir of village
-

लीणी दीणी पैंणू पिठै जमनु अब कख्वै ।
ढ़ांकरै खटै मिठै ल्याणी खाणी अब कख्वै ।।
चुला जंदरौं उरखेलों छनि पंदेरों छ्वीं बात ।
जिकुड़ा चिरोडेगीं त भै भयात अब कख्वै ।।
बालौं का दाना ग्वेर सजुडु चिलम चकटिडाम ।
सिजेरियन वलुं खुणि स्वीलुघाम अब कख्वै ।।
कौथिग जाजकाम मा मंगलेर ना भौणेर छन ।
नथुलि बुलाक सीरामुकोट दुकल्या बरात अब कख्वै ।।
ठेकी पर्या लैंदी गौड़ि भैंसी सेठ सौकार गौं पदान ।
चिर्यां गतडा थ्यग्ला धर्यां मंगत्या फिक्वाल अब कख्वै ।।
भडुलि पराज उल्यरु पराण अर कौंकल्या खुद ।
कफू हिलांस घुघूती चिट्ठी पत्री रैबार अब कख्वै ।।
हैल लाट तिबरी डंडयलि मा लैगि द्वरढ़क्कि ।
यो जो 'उपिरि' बताणु वा समलौण अब कख्वै ।।
Copyright@ वीरेंद्र जुयाल 'उपिरि'

Bhishma Kukreti

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तेरी छुयाँल आँखि

श्रृंगार रस की गढवाली कविता
कवि:  रमाकांत ध्यानी

तेरी छुयाँल आँखि,
छुईं लगाणी छन,
कबि सर इनै,
कबि सर उनै?
मेरी मयळी आँखि,
त्वै खुज्याणी छन,
कबि झळ इनै,
कबि झळ उनै?
सर्रवाधिकार @ माकांत ध्यानी

Bhishma Kukreti

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चन्द्रनगर,

कवि: नन्द राणा ‘नवल ‘
Chandranagar’

A Garhwali Poem by Nandan Rana ‘Naval
-

थाति कार्तिक स्वामी की सजदू चन्द्रनगर,
छैल चंदण्याँ भगवान कू हुन्दु चंद्रनगर।
मयळा मनख्यूँ की रौंत्यळि धरती मेरु मुल्क।
आसिरबाद माँ भगवती कु मिलदू चंद्रनगर।
बाँजै जड़्यूँ कु मिठ्ठू पाणी हमारा गौं,
तपदा ज्यौठ मा ससराँदू सुरसुर्या बथौं,
फ्यूँली-बुराँस करदा पुण्य भूमि कु श्रृंगार,
तुम भि कभी ऐ जा बाटु हैरदू चंद्रनगर।
ली जा शुद्ध हवा तू मेरा मुल्क की समौंण च,
घणा बणूँ सुणैंदी चखुलौं की कनि भौंण च।
मन्दाकिनी की आवाज गूँजदी क्यूँजा घाटी मा,
माँ-बैंण्यूँ कू मान बढ़ौंदू मेरु चंद्रनगर।
सिद्धवा-नगैला का जागर कातिग-चैत मा,
कछड़ी लगौंदी धियाँण दगड्यूँ दगड़ी मैत मा,
पण्डौं का पँवाडा छन बगड्वाळ कु नाच यखी।
होरी की हुड़दंग अर बग्वाळी का गीत गाँदू चंद्रनगर।
अल्लु,सट्टि कोदू झंगोरू नाजै कन रस्याँण च,
दूध,साग,भुज्जी हेल-मेल हमारि पच्छ्याँण च।
मीत-म्यळाग,मौ-मदद अभि भि हमारा गौं मा च,
अपड़ी संस्कृति से अभि भि जुड़्यूँ च चंद्रनगर।
केड़ा,किणझाणि,रावा,डुंगरी,कोन्था,तेबड़ी,मोली च,
काँदी,बाड़ब,कालईं,जाबरी,भणज,मचकंडी,अखोड़ी च।
सभी गौं कि जिकुड़ी धड़कदी रौंत्यळि काँठयूँ मा,
मेरू मुल्क सबसे अच्छू स्वर्ग से प्यारू चंद्रनगर।
©सर्वाधिकार सुरक्षित®-नन्दन राणा


Bhishma Kukreti

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खबरदार
-
By: सुशील पुखर्याल़



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अफार जु मौलाना
बखणा अण्ड - बण्ड
डराणा मुसल्टौं थैं
देशनिकाला ह्वे जालु
अन्यौ हूंणु हम दगड़ि
खतरम् च् संविधान
संविधान बचावा
देश बचावा
खतरम् च् इस्लाम
त्वी समझा यूंथैं
हे अल्ला, हे भगवान
कनि मति मरि यूंकि
क्या मचयुं घपरोल़
बण्यां खौंबाग
लगीं बगबौल़
छद्म बुद्धिजीवी
कना यूंथैं सपोर्ट
जाल़ी - परपंची नेता
द्यखणा अपणु भोट
हतमा ल्हैकि तिरंगा
मनमा भारि खोट
पगलेट बणि ढुंगा चुटाणा
अफुथैं गांधीवादी बताणा
चौतरफै कैरि फुकान
गाडी, मकान, दुकान
लगै द्याइ आग
कुकरमि निरभाग
कतगौं कि करि मौमार
घोर अत्याचार
धिक्कार! धिक्कार! धिक्कार!
इस्लाम थैं कना बदनाम
ल्हैकि धरम की आड़
लाइलाह इल्लल्लाह ब्वना
अफ खुणि सेक्युलर ब्वना
हे हजरत! हे नबी!
हे पैगम्बर! समझा यूंथैं
कैर बुद्धि - शुद्धिकरण
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
नथर यूंल इन्नि म्वरण
आतंक्यूं कि भाषा ब्वना
वांकिदा शांतिप्रिय ब्वना
क्य ब्वना, क्य कना
दुबगलि बात कना
संविधान को नौ ल्हैकि
दंगा मौमार कना
सच्चा मुसलमान भारत का
यूंथैं समझाणै कोशिश कना
यूंका कंदूड़ रुवा कोच्यूं
एड़िके अजाण बण्यां
गौंका सीदा मनख्युं
ठगाणा भरमाणा
क्याप - क्याप ब्वना
नफरत फैलाणा
खबरदार! खबरदार!
देश त्वड़णै कोशिश
कामयाब नि हूंणी
झूट बोलि तुमरि
भल्यार नि हूणी
बग्त च् अबि भि
चेत् जावा, सुधर जावा
खबरदार! अबट न जावा
##############
@ सुशील पुखर्याल़

Bhishma Kukreti

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मातृशक्ति का खुटों म

पयास पोखड़ा
A Garhwali Poem about Women’s Power
By: Payas Pokhra


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बगैर जननि ब्यठुलों का क्या च संग्सार मा |
पिड़ा कळकळि खुण जगा नि रैंदि घार मा ||
मयळ्दु छुवीं-बतौं थैं भि क्वी कनकै लगांदु |
अपणों को आणु जाणु भि नि हूंदु ड्यार मा ||
गीत गज़ल भि कै खुणै ल्यख्दा ये लिख्वार |
अजाण सि रैंदा सदनि जिकुड़ि का प्यार मा ||
सुरम्यळि आंखि,घुंघर्यळि लटुल्यूं कु लपेटा |
गोरि गल्वड़ि की छुवीं को लगांदु बजार मा ||
न क्वी कैमा अपणि खैरि,विपदा,दरद ल्यांदु |
अर माया किलै बिकांदु क्वी कैका प्यार मा ||
न खांदा लिपेंदा न आग घुघरांदि चुल्लो मा |
धण्यां प्वदिना भि नि हैंसदा चौक क्यार मा ||
ह्यूंदण्या रात्यूं की कछड़ि भि कनकै लगदि |
छुयूं को रमछोळ नि हूंदु कभि वार प्वार मा ||
बेटि,ब्वारि,भैण,भणजी,सौंजड़्या न दगड़्या |
न आबत न अस्नौ क्वी मितर आंदु घार मा ||
ब्यठुलों कै भ्वार त चलणि च या सर्या दुन्या |
हां "पयाश" तू भि कनकै आंदु ये संग्सार मा ||
@ पयाश पोखड़ा |


Bhishma Kukreti

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फूलदेई त्यौहार

गढवाली कविता
कवि - विवेका  नन्द जखमोला
( गटकोट Gatkot) 
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लय्या-पय्यां,माल़ु ग्वीराल़,
बुरांश अर फ्योंली।
बनि-बनि का फूल खिल्यां,
धरति बणीं ब्योंली।
चैतऽकि संग्रांद घरु-घरूं,
लगाणि धैई।
मुबारक ह्वयां सबुकु,
भयूं फूलदेई।
मुबारक ह्वयां सबुकु,
भुल्यूं फूलदेई।
सकीन, सूंदण फूल्यां,
मेल़ु, सिराल़ा, ढांक।
बसिंगु खिलपत बण्यूं,
अर फुल्यान आंक।
रंग रंगीली बणीं धरति,
रंगिला फुलूं सैई।
मुबारक ह्वयां सबुकु,
भै-बैण्यूं फूलदेई।।
 garhwali poem from Gatkot, Garhwali Poem from Mandula , Garhwali poem from Dhangu , Garhwali Poem from Dwarkhal block,

Bhishma Kukreti

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बगैर बातै मुण्ड फ्वड़ै
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(चटका लगाते , चांटा मारती एक गढवाली कविता )
कवि धर्मेंद्र  नेगी
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बगैर बातै मुण्ड फ्वड़ै हुयीं छ
वख अजकाल ल्वड़ै हुयीं छ
छुर्रा घोंपि जाणां पीठ पिछनै
मुख ऐथर हथ ज्वड़ै हुयीं छ
सब्यूंम बटेण जस - अपजसन
भीना दियीं दगड़ि छ्वड़ै हुयीं छ
गौंऽ -मुलुकौऽ सुख -चैन छोड़ी
दिन - रात कमर त्वड़ै हुयीं छ
बांजि पोड़ींऽ निकज्जौं पुंगड़ि
जिमदारोंऽ निरैऽ-ग्वड़ै हुयीं छ
हमारि निन्द - भूख हर्चीं 'धरम'
वूंकि द्वफरिम तक प्वड़ै हुयीं छ
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ


Bhishma Kukreti

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       एक गढवाली मुक्तक

कवि –जय पाल सिंह रावत ‘छिपड दा

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रात खुली ग्याइ दिदौ,आलकस नि कैरो।
जरा सी रयूंच अबा,पिछनयी नि हेरो।।
गैरसैंण राजधानि, परमsनैंट कारा,
मौकs नी छुड़्याँउ जमै,अब विकास कैरो।
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सर्वाधिकार – जय पाल सिंह रावत 2020

Bhishma Kukreti

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        फूलदेई

Garhwali Poet: वीरेंद्र जुयाल 'उपिरि'
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अटगदा भटगदा ननातिना भीटा पाखौं जाणा छन ।
ईष्ट पित्रों सुमिरण कैरि फुळारी गीत गाणा छन ।।
चौछ्वडि् द्याखा हैंसणा ऋतुराज धर्ति श्रृंगार कैरि ।
भौंरा प्वतळा रंगमत ह्वे डाळ्यूं -डाळ्यूं भ्यटणा छन ।।
लैय्या पैंयां फ्योंली बुरांस हवा दगड अंग्वाळ ब्वटणा ।
हैंसदा ख्यळ्दा नौन्याल फूल द्यखणा टिपणा छन ।।
देळि देळ्युंमा पौ बार आंदा जांदा खुट्टा रुकणा छन ।
स्वाळा पक्वडि् भ्यळि ठौपरिंद शुभ संग्रांद ब्वळ्णा छन ।।
हे ऋतुराज ! यख सदनि इनि आणा जाणा रैंयां ।
जो 'उपिरि' मुलुक संग्रांद मनाणा वूँ खुणि भि दैंणा हुंयां ।।
सर्वाधिकार – वीरेंद्र जुयाल

Bhishma Kukreti

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   फुलदेई

रचना....यतेन्द्र गौड 'यति'
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फूल रंगिलोफुल्यारि रंगिलो
हैर्याळि रितु मा फुलदेई रंगिलो
बारा बनि फूलूं को डोला सजिलो
ल्हे आइ सब्यूं खुणि भाग सुकिलो
लिपिं चौक डिंड्यळि चम चमकिलो
देळ्यूं देळ्यूं मा ऐपणा सजिलो
म्वोर सिंगाड चौक दिख्यालो
चौ दिसु चौबार रंगिलो छबीलो
कुंजा फूल फ्योंलि लालबुरांशन
दैणा द्वारफूलो क संग संज्यान
द्यो द्यब्ताक थान फूल सज्यान
हळ्दी चौंळ पिठै स्वाळ भूडा चढ्यान
रचना....यतेन्द्र गौड 'यति'


 

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