Author Topic: Articles By Parashar Gaur On Uttarakhand - पराशर गौर जी के उत्तराखंड पर लेख  (Read 40731 times)

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Wah Sir kya rangeen mijaji Holi likhi hai aapne.

umeshbani

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हेम पन्त

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हा! हा! हा! सर ऐसी गलतफहमी होली के रंग (या भंग?) में हो ही जाती है. कविता बहुत अच्छी लगी...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हिन्दी राइटर्स गिल्ड द्वारा दो काव्य संकलनों का लोकार्पण
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रबाब - जसबीर कालरवि “उकाल-उंदार” - पाराशर गौड़

२१ फरवरी,२००९ – हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने मिसीसागा में आज अपने दो सदस्यों की पुस्तकों का लोकार्पण किया। जसबीर कालरवि (रबाब) मूलतः पंजाबी के लेखक हैं। रबाब उनका पहला हिन्दी कविताओं का काव्य संग्रह है। दूसरे लेखक पाराशर गौड़ की पुस्तक “उकाल-उंदार” का लोकार्पण किया गया। “उकाल-उंदार” गढ़वाली की कविताओं और उनके हिन्दी अनुवाद का द्विभाषीय संकलन है; और इसी कारण से यह अनूठी पुस्तक है क्योंकि अभी तक भारत से बाहर प्रकाशित इस शैली की यह पहली पुस्तक है।

 
२१ फरवरी महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी का जन्मदिवस भी है। कार्यक्रम का आरम्भ भुवनेश्वरी पांडे ने निराला द्वारा रचित सरस्वती वंदना के गायन से आरम्भ किया। डॉ. शैलजा सक्सेना ने निराला जी के जन्मदिवस को रेखांकित करते हुए निराला की कविता “राम की शक्ति पूजा” का एक अंश का पाठ किया। उन्होंने संतोष और प्रसन्नता भी व्यक्त की ऐसे शुभ दिन हिन्दी राइटर्स गिल्ड पहली बार पुस्तकों का लोकार्पण कर रही है।

हिन्दी राइटर्स गिल्ड एक प्रगतिशील पंजीकृत लाभ-निरपेक्ष संस्था है। प्रगतिशील परंपरा को कायम रखते हुए डॉ. शैलजा सक्सेना ने दोनों कवियों को आमन्त्रित किया की वह स्वयं अपनी पुस्तकों का लोकार्पण करें जो कि परम्परागत किसी अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा किया जाता है। पुस्तकों के लोकार्पण के पश्चात कवियों को फूल की भेंट की बजाय गिल्ड के दो सदस्यों अरुण बर्मन और राज महेश्वरी ने पुस्तकें भेंट में दीं।

पाराशर गौड़ ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड को इस नये प्रयास की नींव डालने के लिए धन्यवाद और बधाई दी। उन्होंने कहा कि लोक भाषा को जिस तरह से विदेश में मान मिला है वैसा तो भारत में भी नहीं मिलता। इसके पश्चात उन्होंने अपनी पुस्तक में से चार कविताओं का पाठ किया।

सुमन कुमार घई ने पुस्तक के विषय में बोलते हुए बताया कि इस पुस्तक के लेखन का काल १९६५ से १९७५ है। इस पुस्तक की अधिकतर कविताएँ उतरांचल की माँग के जनान्दोलन से उत्पन्न हुई हैं। कविताओं में आंचलिक आक्रोश, कुंठा और विवशता की अभिव्यक्ति है। पाराशर गौड़ का कवि के रूप में एक अपरिचित रूप है क्योंकि इस समय वह व्यंग्य-हास्य और कोमल भाव की कविताओं के लिए जाने जाते हैं।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा कि इन कविताओं में व्यक्त आक्रोश केवल उत्तरांचल का आक्रोश नहीं अपितु उस काल के हर युवा का आक्रोश है। राजनैतिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से कुंठित समाज का आक्रोश है। उन्होंने पाराशर जी को धन्यवाद दिया कि हिन्दी कविता में आंचलिक शब्दों के प्रयोग से उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है।

अगले चरण में जसबीर कालरवि ने अपनी लोकार्पित पुस्तक “रबाब” में से दो रचनाएँ सुनाईं और दो नई कविताएँ सुनाईं। कैनेडा के हिन्दी साहित्य जगत में जसबीर कालरवि का नाम नया है। उनकी कविताओं में एक नई ताज़गी है और क्योंकि वह मूलतः पंजाबी के कवि हैं; तो उनकी कविता में पंजाबी का रंग आ जाना स्वाभाविक ही है और इससे उनका लेखन हिन्दी साहित्य के जानकारों को सुखद विस्मय की अनुभूति देता है।

पुस्तक में ग़ज़लें भी हैं इसलिए विजय विक्रान्त ने उर्दू में पुस्तक के बारे बोलते हुए कुछ ग़ज़लों के भावों की नज़ाकत की चर्चा की। भुवनेश्वरी पांडे ने कहा कि पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद वह उसे पूरा पढ़े बिन नहीं छोड़ पाईं। उन्होंने विशेष रूप से जसबीर की कोमल भाव वाली कविताओं की चर्चा करते हुए एक लम्बी कविता की बात करते हुए टिप्पणी की कि शायद जसबीर इसमें अपनी ही बात कर रहे हैं।

सुमन कुमार घई ने विस्तार से काव्य संकलन की बात करते हुए जसबीर की कविता के कई पक्षों के उदाहरण दिए। डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहा कि कवि ने बहुत गहराई से जीवन का हर स्वर सुना है और उसका विश्लेषण किया है।

हिन्दी राइटर्स गिल्ड पुनः इन दो कवियों को बधाई देते हुए आशा करती है कि भविष्य में भी एक कार्यक्रमों के आयोजन सम्भव हो पाएँगे।

http://www.sahityakunj.net/SAMACHAR/Canada/HWG/rabab_ukal_undar_vimochan.htm

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Many-2 Congratulation to Paur Ji on Releasing his book "“उकाल-उंदार” - पाराशर गौड़ "

अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली  मुख्य पृष्ठ
03.17.2009
 
हिन्दी राइटर्स गिल्ड की कहानी कार्यशाला - 2
समाचार
 
 फरवरी, २००९ – कार्यक्रम का अगला चरण कहानी कार्यशाला का था। भगवत शरण जी ने अपनी कविता “तुम्हारी छवि” का पाठ किया। पाराशर गौड़ ने अपनी कहानी अधूरे सपने की चर्चा करते हुए कहा कि कहानी आकाश से नहीं उतरती अपितु अपने आस-पास घट रहा है वही कहानी है। भुवनेश्वरी पांडे ने अपने बचपन में पढ़ी हुई कहानियों को याद किया। राकेश तिवारी जो कि हिन्दी टाइम्स साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रकाशक व संपादक हैं ने कहा कहानी वस्तुतः स्थिति का बयान है। उन्होंने हाल में ही हुई घटना जिसमें मिसीसागा में तिरंगे का अपमान हुआ उसकी चर्चा करते हुए कहा कि कहानी तो उस दिन भी घटी है। आचार्य संदीप त्यागी ने कहा साहित्य शास्त्रियों का कहना है कि कविता की कसौटी गद्य होता है। कहानी में कहानी के उद्देश्य की पूर्ति होना आवश्यक है। उन्होंने प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की कहानियों को अपनी प्रिय कहानियाँ बताया। उन्होंने उदाहरण स्वरूप अपनी कविता “जवां भिखारिन” का पाठ करते हुए कविता के मूल में कहानी का होना प्रमाणित किया। डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहानी की चर्चा करते हुए निर्मल सिद्धू की कहानी “अस्थि कलश” की विस्तार से समीक्षा की। उन्होंने हिन्दी राइटर्स गिल्ड के ई-सदस्य अमरेन्द्र कुमार के ब्लॉग पर कहानी पर लिखे हुए आलेख की भी चर्चा की और उपस्थित सदस्यों को प्रोत्साहित किया कि वह अमरेन्द्र के ब्लॉग पर जाकर अमरेन्द्र का कहानी के विषय में लिखा आलेख अवश्य पढ़ें। राज महेश्वरी ने कहा “कहानी वही अच्छी होती है जो अच्छी लगती है।“ उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक मानव कहानी लिख सकता है और उन्होंने हँसते हुए बताया कि उनकी नातिन की कहानी सारा-सारा दिन ख़त्म ही नहीं होती। आशा बर्मन कहा कि कहानियों से हमारा परिचय तो बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों में पात्र के अनुसार भाषा की विविधता की प्रशंसा की। उन्होंने आगे बचपन का संस्मरण सुनाते हुए बताया कि कैसे उनके दादा जी को भी प्रेमचंद की कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता है। कहानी लिखने के विषय में बोलते हुए उन्होंने बताया कि बचपन में जब घर-मोहल्ले के बच्चे जब उनके पिता जी को घेर कर कहानी सुनाने का आग्रह करते थे तो पिता जी कहानी शुरू तो करते थे पर उस कहानी के हर चरण को बच्चों द्वारा ही आगे बढ़वाते हुए एक सार्थक अंत करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपने जीवन के अनुभवों के विषय में ही लिखना चाहिए। निर्मल सिद्धू ने अपनी कहानी की समीक्षा के लिए डॉ. शैलजा सक्सेना का धन्यवाद किया और उन्होंने कहा कि कहानी केवल किसी समस्या की चर्चा ही नहीं करे बल्कि उसका समाधान भी सुझाए। उन्होंने अपने विद्यार्थी काल में पढ़े चंद्रधर शर्मा गुलेरी को अपना प्रिय लेखक बताया। सरन घई ने अपनी नई पत्रिका के प्रकाशन की घोषणा की और एक लघुकथा सुनाते हुए कहा कि इस कहानी में पात्रों का परिचय नहीं देने की आवश्यकता नहीं बल्कि हर पात्र का परिचय स्वतः होता चला जाता ही। कार्यशाला का अन्त सुमन कुमार घई ने किया।



भगवतशरण श्रीवास्तव, पाराशर गौड़, सोहनी गौड़, डॉ. शैलजा सक्सेना पीछे विजय विक्रान्त

Parashar Gaur

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सौगात

कई सालो के बाद
गया था भारत  - सोचा
कुछ रेस्ट करूंगा
मिलकर पुराने मित्रो से
पुरानी यादे ताजा करूंगा !

उन दिनों वहा
शादियों का था मौसम
बातावरण सुवाहने थे
ऐसे में हमको शादियों में सम्मलित होने
इनविटेशनो पे इनविटेशनो आ रहे थे !

एक शादी में तो हमको
विषेशरूप से था बुलवाया गया
ये है विदेश से  .......
इनका विशेष ख्याल रखा जाया
एसा सब से कहा गया !

दोस्तों .............
वो शादी येसी हुई
जिसमे सब कुछ गडबडा गया
हम - हम ना रहे .......
हमारा थोबडा तक बिगड़ गया !

जैसे पहुंचे वहा
बोले सब आओ आओ
अम्मा बहुत दिनों के बाद आये हो
शादी का लुफ्त उठाओ !

पाच बजे से पहले तक
मिल रहे है थे एक दूजे से गले
कुसल छेम पूछ पूछ कर
नहीं  वो थकते  थे
है कितनी चिंता उनको उनकी
येसा प्रेम जता ते थे   

जैसे ही सूरज ढला
बाराती बोले.......
अरे .., कहा है दुल्हे का बाप 
पूछो उससे कहा है इंतजाम   
कहा है .... बोत्तले  !

बैठक में था खाने-पिने का
आयोज़म  ......
रंग-बिरंगी बोत्तालो के साथ
था रखा तरह तरह के ब्यंजन !

ढकन उखड़े ...
बोत्तले खुली
पैग पर पैग चले
मुर्गी की टाँगे हिल्ली !

एक दो पैग तक तो
सब ठीक थे ....
दो चार के बाद तो
कोइ आडा ,  तो कोइ  तिरछे हो रहे  थे
 
कि, तभी ...
जाने बातो बातो में  क्या बात होई
बाक युद्ध होते होते
हात्ता पाई  सुरों हो गयी
देखते देखते ....
बैठक बन गयी अखाडा
किसीने किसी कि तोडी बहे
तो किसीने किसीका जबडा उखाडा !

पैंट पतलून और कुरते कि
हालत देखते बनती थी
किसीका कालर गायब
तो किसी कि बाहा फट्टी थी !

कही चावल बिखरा था
तो कही बिखरी थी दही
ऐसे में कुर्ता कुर्ता न रहा
पतलून पतलून न रही !

थे सराबी छुम रहे थे सब
चडा नासा था गाडा.....
एक हाथ से  थामे गिलास
तो दुसरे से पकडे  नाडा !   

खैर .................
जैसे तैसे बरात चली
होते होते मोहला- गली-गली !

पहुँचते ही दुल्हन के घर
फिर शराबी फ़ैल पड़े
मार  मार के भडके
एक दुसरे पर टूट पड़े !   

हाथ जोड़ दुहाले का बोला बाप
अर्र रे .. ये क्या हो रहा है
कुछ तो शर्म करो
क्यूँ हमारी इज्ज़त का तुम
सर आम फलूदा बना रहे हो  !

रुको रुको ये भाई ....
हम बदनाम होजायेगे
रुके बात हमारी मान जाइए
तभी एक शराबी बोला
.".अछा.............. "
ये बात है तो हमें
एक पावा दो हम चोप होजायेगे !

किसी तरह मामला सुलझा
सब सुस्ता ये
पाणिग्राहन के समय
कोइ सज्जन हमें अंदर ले आये  ! 

बैठे थे चुपचाप सभी
कि  अचानक ..
एक आवाज़ आई तभी
" कोई हमें छेड रहा है "
बाराती कोइ शरारत कर रहा है !

इतना कहना था कि ...
दुल्हन्वाले बारातियो पर टूट पड़े
जिस को जो मिल्ला वो
उसी पर पिल पड़े
हम भी लपेट में आये
घुसे  लात भाया ...
खूब बरसे- खूब खाये !

मै -- बोला भाई
ज़रा छमा करो
हम विदेश से आये है
तिनिक रहम करो !

मारके घुसा हमें दबोच लीया
मचाके शोर कहने लगा ..
किथी जिसने शरारत 
पकड लिया... पद लिया !

हमें दे कितनी सफाई
पर वो एक न माने
जो भी आता हमें
धुन के जाते  !

किसी तरह हम
बच बच्चा के वहा से निकले थे
मुह पर हाथ लगाया तो
ओंठ फटा , दो दांत गायब  थे

भारतीय शादी का लुफ्त
गए थे किसी तरह झूटे
टूटे दांतों कि सौगात लेकर
भया वाह से लौटे  !

hem

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शराब जो न करे वह कम है. अफ़सोस कि उत्तराखंड इस बुराई से निजात नहीं  पा रहा है. 

Parashar Gaur

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Parashar Gaur

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भूख

जब कोइ मुझ से पूछता है कि,
क्या,    तुमने . कभी
नियति को देखा है ?
तो,
न जाने क्यूँ तब
मेरी निगाहें बरबस
मेरी हथेलियों कि रेखाओ पर जाकर टिक जाती है
और
ढ़ुढ़ने लगती है उन रेखाओ के बीच फसे
मेरे मुक्कदर को ...

सुना है रेखाए भाग्य की
प्रतिबिम्ब होती है 
जिसमे छुपा होता है हर एक का कल !

कल किसने देखा है
आज जिंदा रहूंगा तो कल देखूंगा ना
अगर बच गया  तो,
फिरसे सारे सब्द , नियति ,सयम ,परितार्नाये 
रचने लगेगे अपने अपने चकबयूह 
मुझे घेरने का  !

इससे अछा तो मै
अपनी हथेलियों को बांध करदू
ना बजेगी बांस , ना बजेगी बांसुरी
आज फसर के सो जाता हूँ
कल की कल देखेंगे
नियति से कल निपट लेगे !

पराशर 
 

Parashar Gaur

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जन्म दिन

तुम सबने मिलकर
मेरे ५०वे साल ग्रह पर
एक षड़यंत्र रचा
मुझ को बूडा करने का --

ताकि,   मै
हमेशा ------
आज के बाद बार बार 
पीछे  देखा करूंगा
अपने भबिष्य में
तरसता रहूंगा ....
अपने बचपन और जवानी के दिनों को 
कि
हाय .. क्या दिन थे  वे  ?

अरे -- निर्दियो ....
थोडा तरस तो खाते
मेरी इस ठलती जवानी पर !

बूढा तो हो ही रहा हूँ
और हो भी जाउंगा
परन्तु ,
तुमारे बाप का क्या जाता
अगर तुम मुझ को ----
जवानी के भ्र्हम में
कुछ और दिन  जीने देते  !


पराशर गौड़

 

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