Author Topic: Rangwali Pichhoda, famous Costume Kumaon, Uttarakhand-रंगीली पिछोड़ी एक पहनावा  (Read 10815 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,
 
Rangeeli (Rangwali) pichhoda is a famous Costume work by women in kumaon region of Uttarakhand during special occasions. This is very attractive & beautiful costume which has yellow background and red dotted colour design.

We will post detailed information and some photographs of Rangeeli Pichhoda here.


रंगवाली का पिछौड़ा !
 
 एक दुल्हन के लिए कुमाऊं में पिछौड़े का वही महत्व है जो एक विवाहित महिला के लिए पंजाब में फुलकारी का, लद्दाखी महिला के लिए पेराक या फिर एक हैदराबादी के लिए दुपट्टे का है। यह एक शादीशुदा मांगलिक महिला के सुहाग का प्रतीक है और परम्परा के अनुसार, उत्सव तथा सामाजिक समारोहों और धार्मिक अवसरों पर प्रायः पहना जाता है। कई परिवारों में इसे विवाह के अवसर पर वधुपक्ष या फिर वर पक्ष द्वारा प्रदान किया जाता है।
 
 पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षां से सुहागिन महिलाओं द्वारा मांगलिक अवसरों पर गहरे पीले रंग की सतह पर लाल रंग से बनी बूटेदार ओढ़नी पहनने का प्रचलन है। इस ओढ़नी को रंगोली का पिछौड़ा या रंगवाली का पिछौड़ा कहते हैं। विवाह, नामकरण, त्योेहार, पूजन-अर्चन जैसे मांगलिक अवसरों पर बिना किसी बंधन के विवाहित महिलायें इसका प्रयोग करती हैं। अल्मोड़ा में वर्तमान में भी अनेक परिवार ऐसे हंै जिनमें परम्परागत रूप से हाथ से कलात्मक पिछौड़ा बनाने का काम होता है। लगभग 35 साल से हाथ से पिछौड़ा बनाने के काम में लगी श्रीमती शीला साह कहती हैं-सस्ते बाजारू पिछौ़ेडे के बावजूद हाथ से बने पिछौड़े का आकर्षण आज भी इतना अधिक है कि अल्मोड़ा, बागेश्वर, चम्पावत तथा पिथौरागढ़ जैसे पर्वतीय जनपदों के अतिरिक्त भी दिल्ली, मुंबई, लखनऊ तथा विदेशों में रहने वाले पर्वतीय परिवारों में इनकी खरीददारी भारी मात्रा में होती है। बारातों के सीजन में एक-एक कलाकार हजार-बारह सौ तक पिछौड़े बना लेता है जिसकी कीमत भी कपड़े की कीमत के अनुसार नौ सौ रूपयों तक है। कुछ समय पहले तक घर-घर में हाथ से पिछौड़ा रंगने का प्रचलन था। लेकिन अब कई परिवार परम्परा के रूप में मंदिर के लिए कपड़े के टुकड़े में शगुन कर लेते हैं। मायके वाले विवाह के अवसर पर अपनी पुत्री को यह पिछौड़ा पहना कर ही विदा करते थे। पर्वतीय समाज में पिछौड़ा इस हद तक रचा बसा है कि किसी भी मांगलिक अवसर पर घर की महिलायें इसे अनिवार्य रूप से पहन कर ही रस्म पूरी करती हैं। सुहागिन महिला की तो अन्तिम यात्रा में भी उस पर पिछौड़ा जरूर डाला जाता है।
 
 पिछौड़ा बनाने के लिए वाइल या चिकन का कपड़ा काम में लिया जाता है। पौने तीन अथवा तीन मीटर लम्बा तथा सवा मीटर तक चैड़ा सफेद कपड़ा लेकर उसे गहरे पीले रंग में रंग लिया जाता है। आजकल रंगाई के लिए सिंथेटिक रंगों का प्रचलन है लेकिन जब परम्परागत रंगों से इसकी रंगाई की जाती थी तब किलमो़डे की जड़ को पीसकर अथवा हल्दी से रंग तैयार किया जाता है। रंगने के बाद इसको छाया में सुखाया लिया जाता है। इसी तरह लाल रंग बनाने के लिए कच्ची हल्दी में नींबू निचोड़ कर सुहागा डाल कर तांबे के बर्तन में रात के अंद्देरे में रखकर सुबह इस सामग्री को नींबू के रस में पका लिया जाता है। रंगाकन के लिए कपड़े के बीच में केन्द्र स्थापित कर खोरिया अथवा स्वास्तिक बनाया जाता है। इसके चारों कोनों पर सूर्य, चन्द्रमा, शंख, घंटी आदि बनायी जाती है। महिलायें सिक्के पर कपड़ा लपेट कर रंगाकन करती है।
 
 लोककला मर्मज्ञ प्रदीप साह के अनुसार पिछौड़ा संपूरिरता का प्रतीक है। प्रतीकात्मक रूप में लाल रंग वैवाहिक जीवन की संयुक्तता, स्वास्थ्य तथासम्पन्नता का प्रतीक है जबकि सुनहरा, पीला रंग भौतिक जगत से जुड़ाव दर्शाता है। सम्पन्न परिवारों में अतिविशिष्ट अवसरों पर मंहगे बनारसी पिछौड़े भी मंगाये जाते हैं। लेकिन हस्तनिर्मित पिछौड़े की सुन्दरता देखकर कहा जा सकता है कि उत्पाद कला की दृष्टि से मंजे हाथों का कमाल है जिस पर संकट धीरे-धीरे आ रहा है। (source http://blog.himvan.com)
M S Mehta
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This is the photo of Indian Cricket Team Captain M S Dhoni's marriage. Dhoni originally hails from Almora District of Uttarakhand. He followed kumaoni tradition during his marriage rituals. His wife Sakshi Dhoni has also worn traditional Rangeeli Pichhoda during the marriage.



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This pic you can see bride has worn traditional Rangeeli Pichhoda.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Women wearing Ghaghara and Rangeeli Pichhoda.


विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]रंगोली पिछौड़ा कुमाऊंनी संस्कृति की पहचान बन गया है। यह सुहाग, शुभ और संस्कृति का प्रतीक है। पिछौड़ा पहनने का मतलब ही खास है। यह बताता है कि जिस परिवार में समारोह है आप उस परिवार से हैं। सारे परिधानों में पिछौड़ा सर्वोच्च है तभी तो तीज त्योहार और शुभ कार्य में देवी को भी चढ़ाया जाता है। शुभ काम में पिछौड़ा गणेश पूजा के दिन से पहना जाता है। इसका मतलब इस दिन पीले रंग से रंगे जाने वाले कपड़ों से है। कुछ साल पहले तक गणेश पूजा के दिन पिछौड़ा घर पर ही बनाया जाता था।
कहते हैं कि दुल्हन तो रंगोली पिछौड़े में निखरती है। तभी तो किसी युवती को शादी के दिन ही पहली बार पिछौड़ा पहनाया जाता है। जानकार बताते हैं कि अतीत में पिछौड़ा दुल्हन को ही पहनाया जाता था। ताकि वह सबसे अलग दिखे। अब शादी से लेकर कोई भी शुभ काम में परिवार की सभी महिलाएं इसे पहनती हैं। समय के साथ-साथ पिछौड़े में भी बदलाव आया है। अब हाथ के बजाय बाजार के प्रिंटेड पिछौड़े ही ज्यादा चलते हैं। मगर कुछ शाह और वर्मा परिवार की महिलाएं हाथ से बना पिछौड़ा ही पहनती है। पिछौड़ा सनील और मदीन के घाघरे के ऊपर ही जमता है। अब साड़ियों में भी इसे पहना जाने लगा है। पिछले कुछ सालों में कुमाऊंनी पिछौड़े ने देश और दुनिया में भी खास जगह बनाई है।
अल्मोड़ा कैंपस में समाजशास्त्र की प्रो. इला शाह बताती हैं कि पिछौड़ा उतना ही पुराना है जितना कि विवाह की परंपरा है। इसमें प्रयोग होने वाली हर चीज का मतलब होता है। यह सफेद कपड़े से बनाया जाता है, सफेद का मतलब शांति और पवित्रता से है। पीले रंग से प्रसन्नता और ज्ञान जुड़ा है जबकि लाल रंग श्रृंगार और वीरता से। खोड़ी में बनने वाले सूर्य से ऊर्जा, फूल से सुगंध और शंख और घंटी से देवताओं का आह्वान किया जाता है। रंगों में प्रयोग होने वाला बतासा कुमाऊं की मिठास घोलता है।
साहित्यकार नवीन बिष्ट कहते हैं कि पिछौड़ा शब्द से ही परम्परा और लोक पक्ष जुड़ा है। इसमें सुहाग और शुभ से संबंधित चीजें उकेरी होती हैं। पिछौड़ा पहनने और इसे बनाने का लिखित तौर पर कुछ नहीं है। यह ऐसी परंपरा है जो हमें विरासत में मिली है। बुजुर्ग महिलाओं के सानिध्य में नई पीढ़ी इस कला को सीखती थी। हाथ से पिछौड़ा बनाना कोई आसान काम नहीं है।
चौक बाजार अल्मोड़ा में सूरज लाल शाह की दुकान में हाथ के बने पिछौड़े मिलते हैं। उनका परिवार भी कई पीढ़ियों से पिछौड़े बना रहा है। शाह पूरे कुमाऊं में हाथ से बने पिछौड़े सप्लाई करते हैं। बताते हैं कि अल्मोड़ा के पिछौड़े ही सबसे अच्छे माने जाते हैं। सहालग में पिछौड़ों की मांग बढ़ जाती है। भले ही बाजार में प्रिटेंड पिछौड़े खूब बिकते हैं पर कुमाऊंनी संस्कृति से लगाव रखने वाले लोग हाथ से बना पिछौड़ा ही पसंद करते हैं।

साभार : अमर उजाला

 

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