Author Topic: Lets Recall Our Childhood Memories - आइये अपना बचपन याद करें  (Read 41428 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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बचपन के दिन भी कितने अच्छे थे
तब तो सिर्फ खिलोने टूटा करते थे
वो खुशियाँ भी क्या खुशियाँ थी
तितली को पकड़कर उछला करते थे
बारिश के पानी में पाँव मार कर
खुद को भिगोया करते थे
अब तो एक आंसू भी रुसवा कर जाता है
बचपन में तो दिल खोल के रोया करते थे..






Devbhoomi,Uttarakhand

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कितना सुहाना था वो साथ बचपन 
 यादों की मुट्ठी में बंद हमराज़ बचपन 
 तुम जो थे हमसाया तब हमारे 
 वो सखा हर बात बाटता , कभी समझाता 
 कीचड़ बरसात का खेल ,तेरे कदम निशा पर चलना 
 हमेशा रास आए हमे 
 आज भी बूँद बूँद पानी में चलते हुए 
 महसूस कर लेती हूँ वही आभास वही कशिश 
 ढूँढती हूँ नज़दीक अपने बार बार 
 गर कोई जादू हो मिल जाए वापस 
वो गुजरा बचपन वो बारिश…. वो गुजरा बचपन वो बारिश


Lalit Mohan Pandey

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मै भी कुछ sunata hu, बहुत dinu से सोच रहा था की सुनाने की आज टाइम मिला है
वैसे मै bachpan मै बहुत सांत बच्चा हुआ करता था, इसलिए मेरा नाम भी मुन्ना रख दिया था. मेरा cousin आज भी मुझे चिडाता है और कहता है की बचपन मै जब इसको कहो की "मार्लो हा तोस" तो कहता था "क्याकि मारला, की करिछ मैले, के गलती हो गैछी मेरा कया"
पर फ़िर भी कुछ सरारत की किस्से याद आते है, हमारे पड़ोस मै एक लड़का रहता था वो मेरे से २ साल बड़ा था, उसकी और हमारी (मेरी एंड मेरे भाई की ) लड़ाई होती रहती थी, लेकिन हम दोनु भाई उससे डरते थे मै ज्यादा ही darpook था वैसे आज भी हु, इसलिए हम उस से लड़ाई avoid करते थे, लेकिन kabhi शहर (पिथोरागढ़ main city se) मेरा cousin आता था तो हम उसकी आड़ मै लड़ाई करते थे उससे, although मुझे डर लगी ही रहती थी, तो एक बार cousin आया हुआ था, हमने लड़ाई करने का प्लान बनाया और उसके लिए लाल मिर्च का powder बनाया, जैसे ही लड़ाई शुरू हुए झट से मैंने उसकी eyes की तरह पाउडर उछाल दिया, डरा हुआ तो था ही मै, मेरा निशाना चूक गया, और पूरा पाउडर उसकी कमीज मै गिर गया और पाउडर की थैली भी मेरे हाथ से गिर गई, ये कर के हम अपने घर की तरफ़ को भागे और वो अपने घर की तरफ़ को, हमने उसको भागते हुए देख के राहत की सास लियी, और हमें लगा की वो हम से डर गया है बड़े खुश हुए, पर हमारी खुशी की उमर ज्यादा नही थी, तब तक पीछे से देखता हु की वो हाथ मै बड़ी से बन्याश (तलवार type ki ) ले के मेरी तरथ ही आ रहा था, उसके बाद तो जो हम टीनू ने अपने घर की तरह को दौड़ लगायी है , घर पहुच के ही रुका.
आज सोचता हु अगर उस दिन उसकी आंखू मै मिर्च पाउडर पड़ गया होता तो ना जाने क्या हो जाता, या उसके हाथ हम पड़ गए होते तो पता नही zinda भी होते या नही, तब मेडिकल facilities भी तो इतनी ज्यादा नही हुआ करती थी.  लास्ट मै सबको बता दू की आज वो मेरा अच्छा दोस्त है, wiase रिश्ते मै मेरा काका (चाचा) लगता है वो, pithoragarh mai Dainik jargarn new paper mai reporter hai (Shri Bhakt Darsan Pandey)

पंकज सिंह महर

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बची ग्या लल्दा, बंण्यांश और वो भी बच्चे के हाथ में कुछ भी अनर्थ हो सकता था।

Devbhoomi,Uttarakhand

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bilkul sahi kaha mehar ji apne bachhe to bachhe hote hain wo ye nahin nahin sochte hain ki aage kya hoga

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Daju,

School ke din taaja ho gaye hai. I studied in fashion in my native place.


कितना सुहाना था वो साथ बचपन 
 यादों की मुट्ठी में बंद हमराज़ बचपन 
 तुम जो थे हमसाया तब हमारे 
 वो सखा हर बात बाटता , कभी समझाता 
 कीचड़ बरसात का खेल ,तेरे कदम निशा पर चलना 
 हमेशा रास आए हमे 
 आज भी बूँद बूँद पानी में चलते हुए 
 महसूस कर लेती हूँ वही आभास वही कशिश 
 ढूँढती हूँ नज़दीक अपने बार बार 
 गर कोई जादू हो मिल जाए वापस 
वो गुजरा बचपन वो बारिश…. वो गुजरा बचपन वो बारिश



हेम पन्त

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Bhakt Darshan ji ko main bhi janata hoon.  ab wo ek safal patrakar ban chuke hain...

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umeshbani

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बचपन की बातें हो तो मास्टर जी की बात न हो ऐसा संभवा नहीं .........
प्रायमरी स्कुल राममंदिर में पढ़ता था में कक्षा चार में .. कक्षा ४ और ५ कि कक्षा एक साथ लगती थी ... चोकीदार तो होता नहीं था घंटी भी  खुद ही लगानी होती थी एक बार मास्टर जी ने बोला हाफ टाइम कि घंटी लगा दो मै और कक्षा पांचः का एक लड़का भागे घंटी के और वो पहले पहुँच गया और घंटी लगाने लगा उसे बड़ा मजा आ रहा था और बहुत देर ता घंटी बजाता रहा  फिर क्या था मास्टर जी को गुसा आ गया और उन्होंने घंटी को उसके बैग मै रख दी और बोलने लगे घंटी बजाने का बहुत सोक है न तुजे इसे ले जा और घर में जब इजा को बुलाना हो तो एक घंटी और पापा को बुलाना हो तो दो घंटी और कुछ मांगना हो तो फिर घंटी ........ लड़का घंटी निकाले मास्टर जी जबरदस्ती घंटी उसके बैग में रख दे काफी देर तक जब लड़का रोता रहा तब जा के मास्टर जी मने............
एक मास्टर जी थे गुप्ता जी कही बाहर  के  बोलते थे मार बैठेंगे .........  हम पीछे से बोलते थे बाहर बैठेंगे ...........
बड़े अच्छे दिन होते है बचपन कोई टेंशन नहीं .......... लकिन अब काफी बदल गया है आज का बालक ज्यादा समजदार हो गया है ............ बस पढाई ......  पढाई ........  कि चिंता रहती है

Lalit Mohan Pandey

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Ha hem bhai sahi kaha ab wo safal patrakar hai or ek achha insan bhi ban gaya hai, per nanchhana bahut saitan bhoyo, hamara rukh hai jatuk naring (orange) kha sakolo utuk khanya bhoyo, baki gadda khodi beri khada hali din bhoyo. ha ha ha....Apne mera ghar to dekha hi hoga gudauli mai, Raju ka ke ghar ko jate hue jo raste mai Pani ki tenki padti hai, uksi ke neeche jo ghar dikhta hai wo hamara ghar hua
Bhakt Darshan ji ko main bhi janata hoon.  ab wo ek safal patrakar ban chuke hain...

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Lalit Mohan Pandey

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Umesh bhai apne mashap ki achhi yaad dila diyi, Hamare Mashap to 1 baje hi ghar chale jate the or hamse kahte the, Poor thul dhung (pathar) mai sel aalo to ghar le jaya, or hamne kaha rukna tha thul dhung mai sel ane tak, mashap jaise hi thodi dor pahuche darwaje lagaye or jangal ke raste mashap se pahle ghar.
बचपन की बातें हो तो मास्टर जी की बात न हो ऐसा संभवा नहीं .........
प्रायमरी स्कुल राममंदिर में पढ़ता था में कक्षा चार में .. कक्षा ४ और ५ कि कक्षा एक साथ लगती थी ... चोकीदार तो होता नहीं था घंटी भी  खुद ही लगानी होती थी एक बार मास्टर जी ने बोला हाफ टाइम कि घंटी लगा दो मै और कक्षा पांचः का एक लड़का भागे घंटी के और वो पहले पहुँच गया और घंटी लगाने लगा उसे बड़ा मजा आ रहा था और बहुत देर ता घंटी बजाता रहा  फिर क्या था मास्टर जी को गुसा आ गया और उन्होंने घंटी को उसके बैग मै रख दी और बोलने लगे घंटी बजाने का बहुत सोक है न तुजे इसे ले जा और घर में जब इजा को बुलाना हो तो एक घंटी और पापा को बुलाना हो तो दो घंटी और कुछ मांगना हो तो फिर घंटी ........ लड़का घंटी निकाले मास्टर जी जबरदस्ती घंटी उसके बैग में रख दे काफी देर तक जब लड़का रोता रहा तब जा के मास्टर जी मने............
एक मास्टर जी थे गुप्ता जी कही बाहर  के  बोलते थे मार बैठेंगे .........  हम पीछे से बोलते थे बाहर बैठेंगे ...........
बड़े अच्छे दिन होते है बचपन कोई टेंशन नहीं .......... लकिन अब काफी बदल गया है आज का बालक ज्यादा समजदार हो गया है ............ बस पढाई ......  पढाई ........  कि चिंता रहती है

 

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