Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 2136 times)

Bhishma Kukreti

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जुगुप्सा भाव अभिनय: जुगुप्सा भावौ पाठ खिलण

Performing Disgust Sentiment

 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -25
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
नासाप्रIच्छादनेनेह  गात्रसंकोचनेन च I
उद्वेजनै: सहल्लेखैर्जुगुप्सामभिनिर्देशेत् I 7.26
जुगुप्सा कु पाठ खिलणो कुण नाक ढकण, अंगों तैं संकुचित करण, मनम  उच्चाट दर्शाण, अर जिकुड़ी पीड़ा दिखाण  जन करतब करण चएंदन II
गढवाली लोक नाटकों में जुगप्सा   भाव

-
यह नाटक चैट महीने में लांग महीने में बादियों ने जसपुर (मल्ला ढांगू , पौड़ी गढ़वाल ) में खेला था।
एक  बादी - अजकाल अपण तबियत भारी चलणि च , आज मीन बळिण्ड इ बळिण्ड हौग।
दूसरा बादी - मेरि बि हालात ठीक नी च।  आज बकर्वळ ही बकर्वळ हौग।
तीसरा बादी - मेरी नब्बे सालक ब्वेक हालात त भौत खराब च दस्त ही दस्त हगदि अर भुलमार मा वा दस्तुं तै तेल समजिक मुख पर लपोड़ दींदी।
------------------------
एक और बादी स्वांग में बादियों का वार्तालाप का आनन्द लीजिये
एक जनानी - हे भुलि आज क्या रसोई बणाइ ?
दुसर जनानी - बासमूती चौंळ  (यहाँ पर बासमती को बासी पेशाब कहा गया है ) अर तीन ?
पैली -मीन आज हगण दाळ बणाइ ! (यहाँ पर हरड़ की जगह हगण कहा गया है )
-
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
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Bhishma Kukreti

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विस्मय भाव अभिनय:विस्मय भावौ पाठ खिलण

 Performance of Surprise Sentiment
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -26
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती 
-
तस्य नयनविस्तारानिमेषप्रेक्षितभ्रूक्षेपरमहर्षणशिर:
कम्पसाधुवादादिभिरनभावैरभिनय: I
 (7 . 26 का परवर्तिका कारिका )
विस्मय कु पाठ  खिलणो कुण आँख चौड़ करे जांदन , बिनआँख बज्यां एक तक दिखण से , भौं पसारण , रोमांचित हूण , मुंड हलैक ,  खौंळेक , प्रशंसामूलक वचन बुलण जन करतबों से हूंद। 
 गढ़वाली लोक नाटकों म विस्मय भाव
एक - ब्याळि मि धार मा  गैणा देखिक रतखुनि से पैल  इ  ग्वाठ  बिटेन भद्वाड़  बाणो  द्वी बल्द लेकि  ग्यों।  मीन अन्ध्यर म इ बल्द  जुतिन अर चार पांच  पुंगड़ खळ -खळ  बाइ  देन।  सुबेर ह्वे त म्यार चंक चल गेन , म्यार आँख खुला का खुला रै  गेन।  गिच्च बि खुल्याक खुलि  रै गे।  म्यार पुटुक म च्याळ  बि  अर     ...
दुसर - ह्यां  सुबेर क्या हवाई ?
पौलो - अरे मि क्या दिखदो बल मीन अन्ध्यर म एक बाग़ अर  एक रिक  जोति दे अर अन्ध्यर म इ  चार पांच  पुंगड़  बायीं देन। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
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33 व्यभिचारी भाव

The Mutable  Sentiments   
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 27
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)

भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
-
 निर्वेदग्लानिशंकाख्यास्तथासूया  मद : श्रम: I
...
...
...
त्रयस्त्रिंशदमी  भाव: समाख्यातास्तु  नामत:।  भ  न शा 6 , 18 , 21 । 
निर्वेद
ग्लानि
शंका
असूया
मद
श्रम
आलस्य
दैन्य
चिंता
मोह
स्मृति
धृति
ब्रीड़ा
चपलता
हर्ष
आवेग
जड़ता
गर्व
विषाद
औत्सुक्य
निद्रा
अपस्मार
सुप्त
विवोध
अमर्ष
अवहित्थ
उग्रता
मति
व्याधि
उन्माद
मरण
त्रास
वितर्क
नामौ  33 भाव व्यभिचारी भाव का  नाम से जणे  जांदन।
व्यभिचारी भाव
वि अभि इत्येतावुपसर्गौ। 
चर इति गत्यर्थो। 7 , 27  कु परवर्ती गद्य  । 
विविधमाभिमुख्येत  रसेसु चरन्तीति  व्याभिचारिणी: । 
वाङ्गसत्त्वोपेता: प्रयोगे रसान्नयन्तीति व्यभिचारिण :।6 , 31 कु  परवर्ती गद्य। 
वि अर अभि  का संजोग 'चर्' नामक मूल धातु से हूण से व्यभिचारि  शब्द की रचना ह्वे।  यांको अर्थ च बल प्रत्येक संबंधित तथ्य को रस की ओर लिजाण।  यी वाणी , सत्त्व, अर आंगिक चेष्टाओं द्वारा रस की ओर अभिमुख हूणा रौंदन , इलै  इ  व्यभिचारी बुले जांदन। 

 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
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ग्लानि भाव अभिनय : ग्लानि भावौ  पाठ खिलण

Performing Remorse sentiment in a Drama    
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 28
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती   
-
क्षामवाक्यनयनकपोलोदरमंदपदोत्क्षेपणवेपनानुत्साह -
तनुगात्रवैवर्ण्यस्वर  भेदादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य: । 
( 7 , 30 का परवर्ती कारिका )
ग्लानि अभिनय (पाठ खिलण ) कुण हीन स्वर, कांतिहीन आँखि,मलिन गल्वड़, हीन पुटुक, मंद गति , कम्पन , अनुत्साह ,  हीन अंग,
विवर्णता अर स्वर भेद आदि प्रयोग करण  चयेंद। 
गढ़वाली लोक कथा  चोळी बण  गए जैमा  चोळी पैलाक जन्म म एक नौनी छे अर लोभ अर अळ गसौ कारण वीं से एक बलद मर जांद तो श्राप वस् व चोळी बणद।  कथा सुणाण  वल ग्लानि भाव को बढ़िया वर्णन करदो जब व नौनी चोळी जिंदगी म रौंदी। 
-

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
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शङ्का भाव  अभिनय : शका भावौ पाठ खिलण

 Performing Apprehension sentiment 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 29
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
-
मुहुर्मुहुरवलोकनावकुण्ठनमुखशोषणजिह्वापरिलेह-
नमुखवैववर्ण्यस्वर  भेदवेपथु-शुष्कौष्ठकण्ठायास -
साध्यर्म्यादिभिरनुभावैरभिनय: पर्योक्तव्य: II  7 , 32 II
गढ़वाली अनुवाद
 शंका भावौ पाठ खिलणौ  कुण  पल पलम  इना-उना  दिखण,  किटीं  (संकुचित)  आंख्युं करण, मूक सूखण दिखाणो जीबन मुक चटण, विवर्णता, स्वर भेद, कमण , कृषक ऊंठ अर  गौळ  सुकणो  करतब करण पोड़द।   
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असूया भावाभिनय : इर्ष्याण  भावौ पाठ  खिलण

 Performing Envy Sentiment in a  Drama 
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 30
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
परिषदि  दोषप्रख्यापनगुणोपघातेर्ष्याचक्षु: प्रदानाधोमुखभ्रुकुटीक्रियाव
 ज्ञानकुत्सनादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य।
 (7 , 35 का परवर्ती कारिका )
गढ़वाली अनुवाद -
असूया /इर्ष्याण भावौ पाठ खिलणो कुण बैठक म दूसरों  दोष दिखलाण , गुणो तिरस्कार करण , जळथमारो भाव दिखाण , आँखिचमकाण , तौळ मुख करण , भौं अळग लिजाण , तिराण/अवहेलना करण  , अर  अपमान करण  जन  करतबों से करे जांद।
गढ़वाली  लक नाटकों म  असूया भाव उदाहरण -
सौतिया डाह को भौत ही सुंदर वर्णन च तौळौ  लोक गाथा म
  कद्रू और बिनता की लोकगाथा का एक अंश
मूल -डा गोविन्द चातक   
 कद्रू का नाग ह्वेन, बिनता का गरुड़
कद्रू बनिता द्वी ह्वेली सौत
सूती डाह छै  तौमा
कद्रू बोल्दि तब -
हे भूली बिनता तेरो बेटा भानपंखी
रंद सूर्या का लोक मा
सूर्य भगवान को रथ चलौंद
बोल दौं हे भुलि
सूर्य को रथ कै रंग को होलो?
तब बिनता बोलदे
सूर्य को स्वेत  रथ होलो
तब नागु की माता कना बैन बोदे -
आज भुलि तेरा मेरा बीच
कौल होई जाला
मै सणि तू भुलि धरम दियाल
सूर्य को सुफेद रथ होलो
तब मै तेरी दासी होई जौलो
अर  काळो   रथ होलो तब तू
मेरी दासी बणी जाली।
तब कॉल करार करिगे नागु की माता , रौंदड़ा लगौंदी तब छुयेड़ा चारदे
मन मारिक अपणा काल्गिरी नाग ......   
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
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मद  भाव अभिनय: मद  भावौ  पाठ खिलण   

Performing Intoxication Sentiment in  a  Drama
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 31
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली
अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
स्खलिताघूर्णितनयन: स्रस्तव्याकुलितबाहुविक्षेप:। 
कुटिलव्याविद्ध  गतिर्मध्यमदो मध्यमप्रकृति .।  । 
  मद अभिनय  कु  (पाठ खिलणौ कुण ) प्रदर्शनौ    तौळ हुयां  अर  घुमदा आँख,  थक्यां भारी भुजाउं अस्त व्यस्त चलण , लड़खड़ाती चाल अर उल्टा -सुल्टा  चलदा खुट  पड़नों क्रिया प्रयोग से करे जांद। 
(7 , 42 )
  गढ़वाली अनुवाद -   
मद अभिनय  कु  (पाठ खिलणौ कुण ) प्रदर्शनौ    तौळ हुयां  अर  घुमदा आँख,  थक्यां भारी भुजाउं अस्त व्यस्त चलण , लड़खड़ाती चाल अर उल्टा -सुल्टा  चलदा खुट  पड़नों क्रिया प्रयोग से करे जांद। 
 
 उदाहरण गढ़वाली लोक नाटक -
एक  दैं  भंडारी बाग देहरादून म हमनन एक कार्यक्रम म एक नाटक कोरी छौ।  नाटकों नाम छौ 'ए ब्वे मि  तै दारु पिलै दे '
इखम डवोली  (डबराल स्यूं , पौड़ी ) का प्रवासी   सम्पूर्ण सिंह  बिष्टन  शराबी का शराब पिं यी हालत म अभिनय कौर छौ। -
गीता  बोल  छा -
ए  ब्वे  मी तै दारु पिलै  दे।
डक्खुन बि  पे   रिख्वान बि  पे
रुंदान बि पे , हंसदान बि पे पर मीन नि  पे .
 ए ब्वे  तू मि  तै दारु पिलै  दे  .
सम्पूर्ण सिंह का अभिनय कुछ कुछ जागते रहो का मोती लाल को उ  गीत ' जिंदगी ख्वाब है , ख्वाब में   ... ' जन ही छौ .
लडख़ड़ाद  खुट , बंद हूंद  आँख  लगणु  छौ  बिष्टन खूब पियीं च। 
xxx
इनि  मित्रग्राम (ढांगू ) म राम लीला म  मित्रग्रम का इ  जय राम  जखमोला न बि  'जागते रो 'को मोतीलाल की नकल करी छौ।
द्वी कलाकारों द्वारा मद अभिनय सफल अभिनय छौ। 

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव
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श्रम भाव अभिनय : श्रम भावौ  पाठ खिलण 

(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )   

  Performing Fatigue Sentiment in Drama

 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 32
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
-
 गात्रपरिमर्दनसंवाहनि:श्वसितविजृम्भितमंद -
पदोत्क्षेंणनयनवदन विकूण नसीत्कारा -
दिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य: ।
 ( 7 , 46 की परवर्ती कारिका )
  गढ़वाली अनुवाद -   
श्रम या थकौटौ  पाठ खिलणौ  कुण धीमी चाल  से चलण , आँख व मुख  पर अलस  भाव से कि ट्याण , मध्य मध्य म सीत्कार करण  आदि जन करतब करण  चयेंद।
   गढ़वाली म  भाव  उदाहरण -
  राम लीला नाटक खिलद  दैं  जब सीता स्वयंबर हूंद  तो रावण या  धनुष उठाण  वळ अन्य   प्रतियोगी  धनुष उठाणो  प्रयत्न करदन  अर तब  श्रम भाव का भौत सुंदर अभिनय करदन जन कि मुख पर   स्वेद पुंछण , सालस का करतब दिखान्दन।   
 

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  श्रम   भाव ; गढ़वाली नाटकों म श्रम  भाव , गढ़वाली गद्य म  श्रम  भाव , गढवाली लोक कथाओं म   श्भारम व
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 आलस्य भाव अभिनय  आलस्य भावौ पाठ खिलण  

 Performing Indolence Sentiment in a Drama
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 33
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली
अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
तदभिनयेत्सर्वकर्मानभिलाषशयनासननिद्रातंद्रीसेवनादिभिरनुभावै। 
(7 , 47 की परवर्ती कारिका )
गढ़वाली अनुवाद -
आलस्य भावौ पाठ खिलणौ कुण सबि कार्यों म अरुचि , उदासीनता दिखाण ,
निंद अर बैठ्युं रौणौ इच्छा दिखाण , अर निंद्रा व तंद्रा आदि क्रियाओं करतब करण पड़दन। 
 गढ़वाली म   आलस्य भाव  उदाहरण -
ये लिखवार   तै   जसपुर (ढांगू  पौड़ी ) म बाद्युं खिल्युं एल लघु नाटक याद आंदो।  जख्म द्वी बाद्युण पथ खेली छौ -
एक -त परधान काका बि ऐ गे।  जख हमर परधान  तै दौड़ भाग करण  चयेंद  छे तख हमर परधानौ  ज्यू बुल्यांद बल वैक  बांठा  झाड़ा -पिसाब (टटी -पिशाब ) बि क्वी ऑवर कौर द्यावो।
दुसर - हाँ भै ! कुछ कार्यों बान  परधान  बाडा  म जावो तो वैक आँख बुज्यां  रौंदन  अर जमै  लीणु  रौंद। 


भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म , आलस्य  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  आलस्य भाव , गढ़वाली गद्य म   आलस्य भाव , गढवाली लोक कथाओं म  आलस्य भाव
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दैन्य भाव अभिनय: दैन्य भावौ पाठ खिलण

  Performing Depression Sentiment
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 34
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
-
तस्याधृतिशिरोरोगगात्रगौरवान्यमनस्कतामृजापरिवर्जनादिभिर नुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य:।  7 , 47  का परवर्ती कारिका  । 
गढ़वाली अनुवाद - -
दैन्य पाठ खिलणो कुण  अधीरता (रग बग ), कपाळम  डाउ,  गात म भारीपन , टकटकी लगैक एक स्थान म दिखण, सरैल की चिंता नि करण  आदि करतब करे जांदन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - 
रवाईं गढ़वाल क्षेत्र की एक लोक कथाम दैन्य भाव प्रदर्शन
मथ्या गौंक चन्दन  थें स्वपन ह्वेक कि त्युन रात स्वपन मा एक बड़ो सि नाग देखि रौ , स्यु नाग त्यंका इनै उनै घुमदी रै।  हैंका दिस देखि स्वप्नु कि गौड़ी  पिखाणी
बस एति कथा एति बात। 
(डा जगदीश नौडियाल की रवाई  लोक साहित्य पुस्तक बटें )

रवाईं गढ़वाल क्षेत्र की एक लोक कथा 

एक  मनस्यारो एक गाँव नसी रै।  रात खाब खाणी अर सुति रै।  रात डैण धाग नापण लागे वहीं पर। तब रौ स्यु उजी सातर से , वही पर आपणो इष्ट नाची पड़ी अर डैण नठि रै दूर।  तब न ऐ डैण।  एति कथा एति बात। 
 
गढ़वाली लोक  नाट्य गीतों में  दैन्य भाव -
रामू बल कपास की पूणी
रामू बल खरसूनि गाँव रामू बल नौरता की सूणी
रामू बल परात की घाली
रामू बल नौरता की सूणी रामू बल दीउ दीने बाली
रामू बल कुखड़ा की बाती
रामू बल दीउ देणु  बाली रामू बल गेंहू  बिना हाथी
रामू बल रणाईनी भेई
रामू बल गेंहू  बिना हाथी  रामू बल मोल  ल्याण लाई
टीकाराम सांदण की खिल
टीकाराम बल मोल  ल्याण लाई टीकाराम मोल भीना मील
टीकाराम गिलौरी का गारा
टीकाराम मोल भी ना मिल , ऊँद जाई मानंद का द्वार
महानंद घटलाइ पोला महानंद
थोड़ा दिया गेंहू महानंद भरी देयां चौंल
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  दैन्य  भाव ; गढ़वाली नाटकों म   दैन्य भाव , गढ़वाली गद्य म  दैन्य  भाव , गढवाली लोक कथाओं म   दैन्य भाव
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