Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 2913 times)

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
चिंता भाव अभिनय:  चिंता  भावौ पाठ खिलण

Performing Anxiety Sentiment in Dramas   
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 35
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद शास्त्री  – भीष्म कुकरेती
-
तामभिनयेन्नि: श्वसितोच्छ्वसितसंतापध्यानाधोमुखचिंतनतनुकाश्यार्दिभिरनुभावै।  7 , 49  परवर्ती कारक । 
गढ़वाली अनुवाद - -
चिंता भावौ पाठ खिलणौ कुण निश्वास , उछ्वास (दुससि ) , संताप, ध्यान /एक टक  लगैक तौळ  दिखण  , मुख लटकाण, चिंतित दिख्याण , अर सरैलो दुर्बलता आदि करतबों प्रयोग हूंद। 
द्रव्य नष्ट हूण पर प्रिय वस्तु।/प्रिय जन को नाश हूण पर ज्वा  चित्तवृत्ति उतपन्न हूंद  वै  भाव तै चिंता भाव बुल्दन। 
 गढ़वाली म चिंता  भाव  उदाहरण - - 
Anxiety Sentiment in Abhimanyu Baja dance and song
अभिमन्यु मृत्यु पर चिंता भाव
अभिमन्यु बाजा- नृत्य-गीत मा  चिंता भाव
 
तुम रौंदा होला राजा जयंती ध्रिग्पल
तुम होला राजा छत्रसाल भौर
कपटी कौरवों न राजा कुचालू रचेली
जौन रचे राजा सात द्वारों की लड़ाई
जयंती राज भंज राजा सणि पत्री देंदा
जती रंदा पांडो तुम जीती राज मान
तुम आवा पंडो अब सात द्वारों की लड़ाई
जयंती मा ह्व़े ग्याई झोंळी झंकार
सीली त ओबरी राजा झिली ह्वेगे खाट
राजा अर्जुन जायुं च दक्खन का देस
साथ छ वैका किरसण सारथी
घर मा रयुं च बालो अभिमन्यु
मी जौंलो पिता रण भूमि -लड़ाई
छै किलों की कथा मैन मा का पेट मा सुणयाले
 जब माता सुभद्रा तैं लगी छै पेट की वेद
अर्जुन न लगाई छै द्वारों की कथा
चक्रव्यूह तोड्नो कु जान्दो छ बालो घंडयाळ 
बीरता से दंग रेने पापी कौरव
चालो कौरिक तौं मारे बालो अभिमन्यु
 
स्रोत्र डा. पुरुषोतम डोभाल
सन्दर्भ डा. शिवा नन्द नौटियाल 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  चिंता ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  चिंता भाव , गढ़वाली गद्य म  चिंता  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  चिंता  भाव
Raptures, Sentiments in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Anxiety Sentiment   in Garhwali Poetries,   Anxiety Sentiments  in Garhwali  Proses



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
--

मोह भाव अभिनय: मोह  भावौ पाठ खिलण
Performing Delusion  Sentiment
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 36
  । 7 , 51    की प्रवर्तिका  कारिका । 
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती

निश्चैतन्यभ्रमणपतनाघूर्णनादर्शनादिभिरनुभावैरभिनय : प्रयोक्तव्य:   
गढ़वाली अनुवाद - -
मोह  भावौ  पाठ खिलणौ कुण  सरैल तैं अचेत दिखाण , चक्कर खाण कबि कबि 
भ्यूं पड़ण , रंगताट करण , स्पष्ट नि दिखण  आदि करतब करे जांदन। 
 गढ़वाली  लोक नाटकों म मोह  भाव  उदाहरण - - 
रामलीला बी अब गढ़वाल का लोक नाटकों म सम्मलित ह्वे  इ गेन।  मित्रग्राम (ढांगू , पौड़ी गढ़वाल ) म  जयराम जखमोला  दशरथौ   जब राम बौण  चल गेन  तो  मृत्यु से पैलाक  पाठ खिलद  छा तो दर्शक कोण आँख म अंसधरी ऐ  जांद छा।  मोह को पाठ खिलणम जय राम जखमोला सर्वोत्तम कलाकार सिद्ध ह्वे . बार बार भ्यूं पड़ण , जयराम का  लड़खड़ाण , अस्पष्ट दिखणो पाठ खिलण   
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  भाव
Raptures, Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Sentiments   in Garhwali Poetries ,  Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
 
[b]स्मरण भाव अभिनय:  [/b]स्मरण भावौ पाठ खिलण

Performing Recollection Sentiment in Garhwali Literature
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 37
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्रौ  गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तामभिनयेच्छिर:कम्पनावलोकनभूसमुन्नमनादिभिरनुभावै:
। 7 ,53  की परवर्ती कारिका । 
गढ़वाली अनुवाद - -
स्मृति पाठखिलणौ कुण कम्पदमुंड , घूमिक दिखण, भौं
अळग -उन्द करण  जन करतब करण  चयेंद। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - 
लांग वर्ष में चैत महीने में जसपुर में बादी बादणो   नु  एक लोक नाटक खेली छौ जखमा  स्मृति भाव बड़ा ही सुंदर प्रकार से दर्शाये गे  छौ -
एक नौनु (सिवा  लगांद )  - समनिन ददि !
बुडड़ी  (आँख बुजद -खुलद , मुंड कन्यांद )- औ  चरंजी  रौ।  भद्वा क नौनु छे ?
नौनु - ना ना मि। .
  बुडड़ी  ( हथन अपर कपाल जोर से चटकांद  ) औ  तो बनवारी को ?
नौनु - न
  बुडड़ी  (इना  ऊना दिखदी अर अपण  बाळ जोर से झमडांद ) औ  तो गोबर्धनौ  ... 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  भाव
Raptures, Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Sentiments   in Garhwali Poetries ,  Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
धृति  भाव अभिनय: धृति  भावौ पाठ खिलण

Performing  Contentment  Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 38
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तामभिनयेत्प्राप्तनाविषयाणामुपभोगाद्प्राप्तातीतोपहतविनष्टानामननुशौचनादिभिर नुभावै: ।  7 , 55  परवर्ती कारिका । 
गढ़वाली अनुवाद - -
धृति भावो पाठ खिलणो  कुण उपलब्ध विषयों उपभोग, जु  नी  वांक चिंता नि करण , नष्ट हुईं वस्तुओं बाराम नि  सुचण -निगंठ्याण जन आदि करतब करण पोड़दन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - 
गढ़वाली लोक नाट्य गीतों मा  धृति  भाव
Example of Contentment Sentiment in Garhwali Folk Dramas
दुन्या न मरी जाण , धरती अमर I
***** ***** *****
धरणी रीटे सांपिंण , अगास रीटे शीणी I
मणछ भगार लगौंदो, विपदा भगवान् दीणी II
मौत सबुकु औंद , आग स्ब्बुकू जळऔंद I
तिन कायर नि होण , सागर कु पाणि सागर मा समौंद
Collected and edited by Dr Shiva Nand Nautiyal   
डळ या गुरुओं गोपी चंद संबंधी गीत बि  धृति भावो  उदाहरण छन।  जन नरेंद्र सिंह नेगी को गोपीचंद  प्रसिद्ध गीत  धृति को उदाहरण च (यूट्यूब )
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  धृति   भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म धृति  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  धृति  भाव
Raptures, Contentment Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Contentment Sentiments   in Garhwali Poetries ,   Contentment Sentiments  in Garhwali  Proses

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
 
व्रीड़ा भाव अभिनय: व्रीड़ा  भावौ पाठ खिलण

Performing Bashfulness  Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 39
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
निगूढवदनाधोमुखविचिंतनोर्वीलेखनवस्त्रान्गुलीयकस्पर्शनखनिकृन्तनादिभिरनुभावैरभिनयेत्। 7 , 57 की परवर्ती कारिका । 
गढ़वाली अनुवाद - -   
व्रीड़ा पाठ खिलणौ  कुण  मुख लुकाण , तौळ  मुंड करण , सुच्चघर म पोड़िक भ्यूं कुछ लिखण , झुल्ला अर अंगूठा मरोड़न , दांतुन नंग चबाण , आदि जन करतब करे जांदन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - 
एक दैं  हम विद्यार्थयूंन युवापन म एक लोक नाटक खेली छौ।  नाटक म तुमड़ी वळ (नाटक म शिब्बू  जखमोला )  न एक चोर (नाटक म हमर गांवक प्रेम कुकरेती ) पकड़  दे।  प्रेम कुकरेती न वो शर्माणो  भलो  अभिनय करी छौ. प्रेम कुकरेती न इनि  अभिनय करी छौ बल दुष्कृत्य बारा म पश्चाताप हूणु हो अर भौत लज्जा अनुभव हूणु हो। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  भाव
Raptures, Bashfulness Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Bashfulness Sentiments   in Garhwali Poetries, Bashfulness  Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
 
चपलता भाव अभिनय:  चपलता  भावौ पाठ खिलण

Performing Agility   Sentiment in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 40
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तस्याश्च  वाक्पारुष्य निर्भत्र्सनवधबंधसम्प्रहारताडनादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य:। 7 , 59  का  परवर्ती गद्य । 
गढ़वाली अनुवाद - -
चपलता पाठ खिलणौ  कुण कठोर वाणी, काट करण (भर्तसना करण ) , हत्त्या, बंधन, प्रहार करण , ताड़ना, जन करतब करे  जांदन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - 
 गढ़वाली रामलीला जन ग्वील की , मित्रग्रम की राम लीला म जब हनुमान लंका दहन क्र दीन्दो  तो रावण , मेघनाद , रक्ष गणों चपलता भाव दिखण लैक  हूंद। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  भाव
Raptures,  Agility Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Agility Sentiments   in Garhwali Poetries , Agility  Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1

हर्ष भाव अभिनय:  हर्ष  भावौ पाठ खिलण

Performing  Joy  Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 41
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तमभिनयेन्नयनवदनप्रसादप्रियभाषणालिंगनकण्टकितपुलकितास्रस्वेदादिभिरनुभावै:।  7 , 60 । 
गढ़वाली अनुवाद - -
हर्ष पाठ खिलंणो  कुण  आँख अर  मुख पर प्रसन्नता/पुळेणो भाव  , भला प्रिय वचन, अर  स्वेद जन क्रियाओं  क उपयोग हूंद। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - --
भूत काल म जब  बादी  बादण (नाच गाण  वळि  जाति  युगल )   क्वी नाचगाण  से लोकुं  तेन प्रसन्न करदा छा तो लोक प्रसन्नता वश बादी -बादण  तै इनाम  दींदा छा तो बादीबाद  खूब पुळेन्द  छ अर  प्रसन्नता वस् यी गीत गांदा  छ -
समनैन  ठकरो , समनैन  ठकरो ,
तुमर देळी  भरीं  रैन
रुप्यों  की छळाबळी  हूणी  रैन 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,   हर्ष भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म   हर्ष भाव , गढवाली लोक कथाओं म   हर्ष भाव
Raptures,  Joy Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Joy Sentiments   in Garhwali Poetries , Joy   Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
 आवेग भाव अभिनय:  आवेग भावौ पाठ खिलण

Performing  Agitation  Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -  42
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
ताभिनयेत्सर्वांगस्रस्ततावैमनस्यमुखवैवर्ण्यविषादविस्मयादिभि।  7 , 62  को परवर्ती गद्य  । 
गढ़वाली अनुवाद - -
आवेग भावो पाठ खिलणौ  कुण  सबि अंगों तै शिथिल करण , मन म खिन्नता दिखाण, मुखक रंग परिवर्तन करण,  विषाद /दुःख दिखाण अदि जन करतब दिखाण  चएंदन .
 गढ़वाली म   आवेग भाव  उदाहरण - - --
पंडो नृत्य म   अर्जुन वासुदत्ता प्रेमगाथा
 
 
                 द्रोपती अर्जुन सेयाँ छया
                रातुड़ी होयें थोडं स्वीणा ऐन भौत
                सुपिना मा देखद अर्जुन
                 बाळी वासुदात्ता नागुं कि घियाण ,   
                मन ह्वेगे मोहित , चित्त ह्वेगे चंचल 
                 वींकी ज्वानी मा कं उलार छौ   
                  वींकी आंख्युं  मा माया को रैबार छौ   
                 समळीक मुखड़ी वींकी अर्जुन घड्याण बिसे गे
                 कसु  कैकु जौलू मै तै नागलोक मा
                 तैं नागलोक मा होला नाग डसीला
                मुखड़ी का हँसीला होला, पेट का गसीला
              मद पेंदा हठी होला, सिंगू वाल़ा  खाडू 
                  मरखोड्या  भैसा  होला  मै मारणु आला
                  लोहा कि साबळी होली लाल बणाइ
                 चमकादी तलवार होली उंकी पैळयाँयीं
                 नागूं की चौकी बाड़ होलो पैरा
                 कसु कैकु जौलू मैं तै नागलोक मा
              कमर कसदो अर्जुन तब उसकारो भरदो ,
                अर्जुन तब सुसकारो भरदो
                मैन मरण बचण नागलोक जाण
                रात को बगत छयो , दुरपदा सेइं  छयी   
               वैन कुछ ना बोले चाल्यो , चल दिने नागलोक
               मद्पेंदा हाती वैन चौखाळी चीरेन
               लुवा की साबळी  नंगून तोड़ीन   
                तब गै अर्जुन वासुदत्ता  का पास
                  घाम से घाम, पूनो जसो चाम
                नौणीवालो नाम , जीरी वल़ो पिंड
                सुवर्ण तरूणी छे , चंदन की लता 
                पाई पतन्याळी, आंखी रतन्याळी
                 हीरा की सी जोत , ज़ोन सी उदोत
                 तब गै अर्जुन सोना रूप बणी 
                वासुदत्ता वो उठैकी  बैठाए अर्जुन
                वींको मन मोहित ह्व़े ग्याई
                   तब वीन जाण नी दिने घर वो
                   तू होलो मेरो जीवन संगाती
                  तू होलो भौंर मै होलू गुलाबो फूल
                   तू होलो पाणी मै होलू माछी
                   तू मेरो पराण  छई, त्वे मि जाण न देऊँ   
                    तब तखी रै गे अर्जुन कै दिन तै
                    जैन्तिवार  मा   दुरपदा की निंद खुले ,
                   अर्जुन की सेज देखे वीन कख गये होला नाथ
                     जांदी दुरपदा कोंती  मात का पास
                     हे सासू रौल तुमन अपण बेटा बि देखे
                     तब कोंती माता कनो सवाल दीन्दी
                     काली रूप धरे तीन भक्ष्याले
                         अब मैमू सची होणु आई गए 
                     तब कड़ा बचन सुणीक दुर्पति
                     दणमण रोण लगी गे   
                    तब जांदी दुरपदी बाणो कोठडी
                    बाण मुट्ठी बाण  तुमन अर्जुन बि देखी
                    तब बाण बोदन , हम त सेयान छया
                    हमुन नी देखे , हमुन नी देखे
                    औंदा मनिखी पुछदी दुरपता
                    जांदा पंछियों तुमन अर्जुन बि देखे
                   रुंदी च बरडान्दी तब दुरपदी राणी
                    जिकुड़ी पर जना चीरा धरी ह्वान
                    तीन दिन ह्वेन वीन खाणो नी खायो
                    ल़ाणो नी लायो
                    तब आंदो अर्जुन का सगुनी कागा
                    तेरो स्वामी दुरपति, ज्यूँदो छ जागदो 
                   नागलोक जायुं वासुदत्ता का पास   
                   तब दुरपता को साँस एगी
                    पण वासुदत्ता क नौ सुणीक   वा
                    फूल सी मुरझैगी डाळी सी  अलसेगी 
                   तिबारी रमकदों झामकदों
                        अर्जुन घर ऐगे
स्रोत्र : डा गोविन्द चातक
 सन्दर्भ : डा शिवा नन्द नौटियाल
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  आवेग भाव ; गढ़वाली नाटकों म  आवेग  भाव , गढ़वाली गद्य म  आवेग  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  आवेग  भाव
Raptures,  Agitation Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Agitation Sentiments   in Garhwali Poetries , Agitation Sentiments  in Garhwali  Proses


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1
जड़ता भाव अभिनय:  जड़ता भावौ पाठ खिलण

Performing   Sentiment in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा -  43
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तामभिनयेदकथनविभागभाषणतूष्णीम्भाव्प्रतिभाsनिमेषनिरीक्षणपरवशत्वादिभिरनुभावै।  7 , 62  को परवर्ती गद्य । 
गढ़वाली अनुवाद - -
जड़ता पाठ खिलणम चुप रौण , अपष्टबोलया गुड़बुड़ बोल , एकदम चुप ह्वे जाण , खौंळेक एकटक दिखण  अदि  करतब दिखाए जांदन। 
 गढ़वाली  नाटकों म  भाव  उदाहरण - - --
कत्ति  दैं  कै  पर देवता   आंदो  या भूत  लगद   तो पश्वा अड़गटे  जांद , कड़कड़ो  ह्वेक ेकी जिना  दिखण  बिसे  जांद। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  जड़ता भाव ; गढ़वाली नाटकों म जड़ता  भाव , गढ़वाली गद्य म   जड़ता भाव , गढवाली लोक कथाओं म   जड़ता भाव
Raptures, Stupor Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Stupor Sentiments   in Garhwali Poetries ,  Stupor Sentiments  in Garhwali  Proses

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,044
  • Karma: +22/-1

गर्व भाव अभिनय:  गर्व भावौ पाठ खिलण

Performing Arrogance Sentiment  n Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 44
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तस्यासूयावज्ञाघर्षणनुत्तरदानासम्भाषाणान्गावलोकनविभ्रा मापहसनवाक्पारुष्यगुरुव्यतिक्रमणाधिक्षेपवचनविच्छेदादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य: (7 , 66 परवर्ती गद्य )
गढ़वाली अनुवाद - -
गर्व भावौ पाठ  खिलणो कुण जळथमारी  भाव (ईर्ष्या ) , अणबुल्या भाव, अनादर दिखाण, उत्तर नि दीण , अबच्च  ह्वे जाण , विभ्र्म, तिराण , उपहास करण, कैड़ो बचन बुलण,  गुरुजनों बि  अवहेलना करण,  चबोड़ -चखन्यौ करण, अर  बात कटण  अदि करतब दिखाण  चयेंदन। 
 गढ़वाली म गर्व  भाव  उदाहरण - - --
 गढ़वाल म रामलीला लोक नाटक में मेघनाद का गर्व
लंका धन से पैल  मेघनाद हनुमान से   घमंडम बुल्दु -
हे निर्भागी  बांदर  ! तू म्यार समिण  कुछ बी नि छे . मि छौं अजर -अम्र लंकापति पूत ,  मी ह्वे  सोना की लंका कु राजकुमार अर तू भेळुन्दो बांदर !   
 जिस जमीं पैर रखूंगा भूचाल वहाँ आयेगा जमीं तो जमीं आसमान भी हिल जाएगा
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  भाव ; गढ़वाली नाटकों म भाव , गढ़वाली गद्य म  भाव , गढवाली लोक कथाओं म  भाव
Raptures, Arrogance  Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature
Arrogance  Sentiments   in Garhwali Poetries ,   Arrogance Sentiments  in Garhwali  Proses


 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22