Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 3753 times)

Bhishma Kukreti

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स्वेदकर्म का  १३  प्रकार
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद  ३९  बिटेन  ४२ - तक
  अनुवाद भाग -  १११
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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स्वेदकर्म का १३ प्रकार -
१- संकर
२- प्रस्तर
३-नाड़ी
४- परिषेक
५- अवगाहन
६-जेंताक
७- अस्मघन
८-कर्षु
९-कुटी
१०- भू
११- कुम्भिक
१२- कूप
१३-होलाक
अब यूं  तेरों  तै एक एक कौरी बुल्दु। ३९-४०।
संकर स्वेद -
तिल , मांस आदि पदार्थों ढिंढी  बणैक  वस्त्र म या बिन  वस्त्र क लपेटी गरम करी स्वेद तै संकर स्वेद बुल्दन।  . ४१। 
प्रस्तर स्वेद -
शोक धान्य (ग्यूं -चौंळ   अदि ) शमी धान्य (दाल ) , पुलाक चौल रहित अनाज , मावा -खोया ,कृशरा , टिल उड़दै बणी यवागू , उड़दै पुवा , आदि गरम करी पत्थर या कड़ी वस्तु म फ़ैलाइक , रेशम या कमुळ  या अरंडी ाक क पत्तों पर औषध लगैक फिर सरा बदन पर  स्नेह लेप करि यूं  मा  पोड़ /लेट जावो अर  स्वेद लिए जाय तो यु प्रस्तर स्वेद हूंद।  ४२। 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १७८  बिटेन  १७८   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद


Bhishma Kukreti

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नाड़ीस्वेद , परिषेक आदि भाप दीण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद  ४३  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  ११२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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नाड़ीस्वेद - पैल  बताये  गे स्वेदन द्रव्यों -मूल , फल , पत्ता, कलियाँ , पशु-पक्षी मांश ,शिर ,पांच आदि उष्णस्वभावयुक्त या यथायोग्य अम्ल , लवण ,अर स्नेहयुक्त , आठों प्रकारौ मूत्र ,गौड़ी आदि दूध ,अर मस्तु एक घड़ा म बंद करी  घड़ा मुख बंद कर दीण , ये घौड़म शर , ईपीक क नळी ये द्वारा वातहर तेल से स्नेहित करी व्यक्ति तै स्वेद दीण  चयेंद।  नळि  क   स्वरूप  सरकंडा   अगला भाग पत्ता , बांस पत्ता , करंज का पत्ता ,ाक क पता से नळि  बणाये जै  सक्यांद। नळी  हाथी सूंड जन ंथी म्वाट अर  तौळ  पतलो मुख  व गोळ   ह्वावो अर लम्बाई  द्वी हाथ लम्बो ह्वावो ,आधा व्याम गोळ (व्यास ), जड़ म आधा व्योम को घेरा ह्वावो।  नाड़ी पर जथगा भी छेद  ह्वावन  सि वातनाशी अरंड  का जन पत्तों से ढक दिए जावो। अर  फिर नळी  से व्यक्ति तै वास्प दीण  चयेंद।  इन  ध्यान दीण  कि  भाप त्वचा नि जळाओ (नळी  मुख उब उन्द करण चयेंद)।  ४३। 
परिषेक स्वेद (परिषेक भाप ) -वातनाशक विशेष रूप से त्रिदोष नाशक द्रव्यों मूल , फूल, पत्ता  , शुंग ,आदि तै सुखदायक क्वाथ इथ्गा गरम करण  कि  रोगी सहन कार साको , क्वाथ तै एक सछिद्र बर्तन क  ढक्क्न धरी स्नेहित बदन पर वास्प दीण  चयेंद।  मनुष्य  सरैल तै  पूरी तरां कपड़ा से ढकी वाष्प दीण  चयेंद। ४४।
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १७९   बिटेन  १७९   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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Bhishma Kukreti

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अवगाह , जेंताक  अर कटघर स्वेदन विधि
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )  ४५  पद   बिटेन  ४६  - तक
  अनुवाद भाग -  ११३
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अवगाह  स्वेद - वात्त नाशक द्रव्यों क्वाथ , घी , तेल ,मांस रस ,ग्राम पाणी बणैक मनिख तै  काठो कुठार म बंद करी  स्नानौ  कुण   अवगाह स्वेद बुल्दन। ४५।
१ -जेंताक स्वेद -जेंताक स्वेद करणों इच्छा करण /सलाह दीण वळ  वैद्य तै भवन का उत्तर या पूर्व दिशा म जु भूमि भली ह्वावो ,काळ या पील माट  वळी ह्वावो ,तलाव बावड़ी क किनार म  दक्षिण म ह्वावो , भूमि सामान ह्वावो ,
२ कूटगार निर्माण - इखम पाणी से साथ आठ हथ जलाशय क पछ्मी छोर पर पूर्वाभिमुख या जलाशय क दखिन किनारा पर उत्तराभिमुख कूटगार निर्माण करण  चयेंद।  यु कूटगार ऊंचाई म १६ हाथ अर  चौड़ाई म १६ हाथ , चरी तरफ बिटेन  गोळ , भौत  सा दूज्यळ  (रोशनदान ) वळ निर्माण करण  चयेंद, लिप्युं , पुत्युं , साफ़ सुथरा  हूण  चएंद । ये घर क भितर दिवारक चारों तरफ  किवाड़ तक एक हाथ भर चबूतरा हूण चयेंद। मध्यम चार हथ  लम्बो संदूक आकर व दुंळ  वळ  अंगार कोष्ठ स्तम्भ हूण चयेंद जैमा  ढकण  बि हूण चयेंद। 
३- स्वेदन  विधि -  ये स्तम्भ /अंगीठी म खैर ,धाक क लखड़ जळाइक , धुंवा बंद ह्वे जावो तो स्वेद /पसीना दीण ;लैक  ह्वे जांद  तो  पुरुष पर तेल को स्नेह लग्यूं ह्वाओ ,कपड़ा से ढक्यां पुरुष तै स्वदन का वास्ता प्रवेश कराये जाय।  प्रवेश से पैल  व्यक्ति तै समजाण  चयेंद कि सौम्यता , आरोग्यता व मंगल व कल्याण  वास्ता घर म  प्रवेश  कारो अर चबूतरा मक मथि सुख से पोड़ों लेटो  ,अर पसीना आण पर बि , व्याकुल हूण पर बि चबूतरा नि छुड़न , जब सब तरह का छिद्रों  से पसीना आयी जाय , सब छिद्र खुल जावन सरैल हळको  ह्वे  जाय ,मल बंध जड़ता ,स्पर्श ज्ञान आभाव पीड़ा खत्म ह्वे जावो तब चबूतरा क साथ साथ चली द्वार तक आयी जावो अर आँखों पर एकदम ठंडो जल नि डळण , जब थकन , गर्मी , शीतलता आदि खतम ह्वे  जावो तबि  मंतततो पाणी म नयाण चयेंद।  ४६। 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १८०    बिटेन  १८१   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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Bhishma Kukreti

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अश्मन स्वेदन , कर्षू  स्वेदन  ,  कुटी स्वेदन 
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद  ४७   बिटेन  -५४  तक
  अनुवाद भाग -  ११४
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अश्मन स्वेदार्थ -
व्यक्ति पोड़ साको ,इथगा बड़ी पथरा पटाळ , बलशाली तै देवदारु जन वात नाशक लकड़ी जळैक गरम कारो। पटाळ  गरम हूण पर सब क्वीला हटाइ दीण, फिर पटाळ  ंथी पाणि  छिड़कण । तब सब अंगों पर अब व्यक्ति तै तेल लेप करी ,सूत  का चादर  या कमुळ  पुटुक  लिपटैक  पड़ाळ   द्यावो अर  स्वेद द्यावो।  अब  कर्षू    स्वेद की जानकारी दिए जाली । ४७- ४९ ।
कर्षू स्वेद विधि -
स्थान विज्ञा वैद्य खटला  /शया तौळ  एक खड्डा बणाओ , खड्डा पुटुक  धुंवारहित जळदा  क्वीला  से भरे जाय ,  ये मथि  खाट म सीण  से सुखकारी पसीना आंद। ५०-५१।
कुटीस्वेद  विधि -
न  भौत ऊंचो न भौत  चौड़ गोळाकार , दुज्यळ  हीन  (रोशनदान हीन ) मोटि  दीवाल वळ  कुठड़ी  चिणनो उपरान्त   घर भितर कुष्ठ आदि उष्णवीर्य दत्वों से लीपिक  मध्य म वैद्य एक चौड़ी शय्या बणाए अर शया क चरी तरफ  जळदी  अंगेठी धरे जाय फिर बाघक खलड़ ,मृगौ खलड़ ,रेशम कमुळ  बिछैक , शरीर पर स्नेह लगैक व्यक्ति पसीना ल्यावो।  इनमा  सुखपूर्वक स्वेदन  ह्वे  जांद ५२-५४।
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १८२    बिटेन   १८३  तक
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कुम्भ , कूप , होला  अग्नि आधारित  स्वेदन

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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद  ५५   बिटेन  - ६३ तक
  अनुवाद भाग -  ११५
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कुम्भ स्वेद विधि -
घौड़  उन्द  देवदारु  क्वाथ  से भरी आधा या त्यायि भाग खड़्यार  दीण।  यांक मथि खटला बिछायी दीण। फिर लोखरा  ग्वाळा या पथरों ग्वाळा  खूब  गरम करी  क्वाथ पुटुक  अर खड्डा म घौड़ चारो और धृ द्यावो। फिर खड्डा मथि खटला म स्नेह लेप लग्युं  अर  कपड़ा से लिपट्यूं  व्यक्ति तै  पड़ाळ  द्यावो अर सुखपूर्वक स्वेदन कराओ।  ५६-५८। 
कूप स्वेदन -
जथगा म खटला हूंद  उथगा  चौड़ लम्बो खड्डा ख्वादो। खड्डा क गहराई दुगुण हूण  चयेंद।  ये कुवा तै वायु रहित कोरी लीप द्यावो।  ये खड्डाम हाथी ,घ्वाड़ों   सूखो मोळ जळाओ।  जब धुंवा आण  बंद ह्वे जाय तब खड्डा मथि  बिछौना वळ खाट बिछाई द्यावो।   व्यक्ति तै वात्त हरी तेल लगाइक बाघ चरम या अन्य से ढकी सुखपूर्वक  स्वेदन द्यावो।  ५९-६०।
होलाक स्वेद -
हाथी , घ्वाड़ा गाय , गधा सुख्युं  मोळ  तै चिता जन सजाओ , आग लगाओ अर जब  धुंवा आण  बंद ह्वे  जावो त शय्या बिछाइक , व्यक्ति पर तेल को लेप करी ढिकाण देखी शय्या म पडाळिक  स्वेदन द्यावो।  यी अग्नि वळ तेरा प्रकारा स्वेदन ह्वे गेन जन  महर्षि न उदेश दिनी। ६१ -६३।

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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १८३   बिटेन १८४    तक
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स्वेद अध्याय समापन अंश

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौदवां , स्वेद अध्याय    )   पद ६४   बिटेन  -७१  तक
  अनुवाद भाग -  ११६
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अग्नि बिन स्वेद- व्यायाम , उष्ण सदन (हवा व ठंड बिहीन तहखाना ) , कमुळ जन भारी ढिकाण , भूख , बहुपान (गरम पाणि  , शराबौ बिंडी पीण  ) , क्रोध , भय,पुलटिस , युद्ध ,धूप ,यि दस बिन आगक बि स्वेद पैदा करदन। ६४।
ये हिसाबन  द्वी प्रकारौ  स्वेद बुले गे; अग्नि गुण वळ , बिन अग्नि गुण वळ ,एकांग स्वेदा अर सर्वांग स्वेद , स्निग्ध स्वेद अर रुक्ष स्वेद ,ये हिसाबन तीन प्रकारा दु दु  स्वेद बुले गेन ,स्निग्ध मनिख तै स्वेदन चिकित्सा करण चयेंद। स्वेदन का दिन पथ्य वळ भोजन करण  चयेंद अर  वैदिन  व्यायाम नि करण  चयेंद। ६५-६७।
कै प्रकारन स्वेद काम कर सकद ,कौं कुण उपयोगी च ,कै प्रकार ,कैं जगा ,कै प्रकारै रक्छा करण ,सम्यक , स्निग्द्ध , अतिस्वेदक लक्छण , अतिस्वेदै चिकत्सा ,अयोग्य व स्वद क योग्य ,स्वेदन द्रव्य , तरह प्रकारौ स्वेद , बिन  आगाक  दस प्रकारौ स्वेद , संक्छिप्त म छह स्वेद - यी सब स्वेदाध्याय म बुले गेन।  स्वेद अधिकार म जु बि बताण  छौ सि महर्षिन बताई येन। शिष्यों तै ठीक से समजण  चयेंद कि उपदेशक महर्षि पुनर्वसु छन।  ६८ -७१।
स्वेद अध्याय समापन। 

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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १८४  बिटेन  १८५   तक
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उपकल्पनीय अध्याय की भूमिका

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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंदरवां  अध्याय  (उपकल्पनीय  अध्याय )   पद  १  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  ११७
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अब उपकल्पनीय अध्यायौ  छ्वीं लगल। जन भगवान आत्रेयन बोली छौ।  १, २ ।
ये लोकम राजा अथवा राजा जन ठाट बाट वळ  या भौत सा चरक वळ  धनी पुरुष तै वमन या विरेचन दीण  वळ वैद  तै औषधि पिलाण  से पैल इ  सब  आवश्यक वस्तु कट्ठा  कर लीण  चयेंद।  किलैकि यदि औषधि काम कर गे  त  समान पुनः प्रयोग ह्वाल ,यदि प्रयोग म तकलीफ ह्वावो  त समान दिखाइक प्रतिकार ह्वे सकद। यदि सब समान निकट नि  हो त  जरूरत म समान लाण कठिन हूंद। तो सब समान क पैली संग्रह सही च। ३। 
इन बुल्द अग्निवेश न भगवान आत्रेय कुण  बोलि -भगवन ! ज्ञानवान वैद्य तै पैली चयेंद बल संशोधन दीण  से पैली इ रोगी क बल , आयु , सहनशीलता ,सकी , क्षेत्र , समय काल ,दोषक  बलाबल ,प्रकृति आदि बथों पर विचार कौरि योग्य मात्रा म औषधि पिलाव।  जाँसे कि औषध दीण पर या औषध गुणकारी सिद्ध ह्वे जाव। किलैकि सब कार्यों तै सही तरह से प्रयोग अवश्य ही सफल हूंदन। यदि ज्ञानपूर्वक  कर्युं कार्य उचित या अनुचित रूप से करण पर कभी सिद्ध ह्वे जांद  कभि सिद्ध नि  हूंद  तो ज्ञान अज्ञान क बरोबर इ च। पढ़ण नि पढ़ण  बरोबर हि  ह्वे जांद। ४। 
 भगवान आत्रेय न अग्निवेश से बोली - ए अग्निवेश ! औषध दीण पर निश्चय ही सफल ह्वाल इन औषधापचार  करण हम या हम जन तपोबली द्वारा रजस , तमस से निर्मुक्त हुयां पुरुष से इ संभव च अर इन प्रयोगक सफलता क पूरा क पूरा उपदेश दी णो क्वी तयार नी।  इनि क्वी  बि इन शिष्य नी जु प्रयोग तै यथावत समज साको अर जाणि प्रयोग ठीक से कार साको इन  बि क्वी नी , किलैकि प्रत्येक पुरुष म दोष , औषध देस समय ,बल , शरीर,भोजन ,साम्य , सत्व ,प्रकृति अर आयु यूंकि  स्थिति प्रतिक्षण बदलणि रौंदि। यूं  दोष आदि की सूक्ष्म विवेचना निर्मल व विशारद बूढी वळक बुद्धि बि चकरै  जांद। त अल्पबुद्धि वळक ले क्या। इले थोड़ा बुद्धि वळ मनिख की बुद्धि व्याकुल करणो कारण द्वी बातो (औषधि प्रयोग व प्रयोग म मिथ्या  योग ) उत्प्प्न आपत्तियों तै सिद्ध स्थानम बुलला।  ५। 
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आदर्श चिकित्सालय  के लक्षण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंदरवां  अध्याय  (उपकल्पनीय  अध्याय )   पद   ६ बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  ११८
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ये अध्याय म संशोधन का  बनि   बनि  उपयोगी  उपकरणों का संक्छिप्त म  चर्चा होली। सबसे पैल कूड़ चिणन वळ  ओड इन  मजबूत  कूड़  चीणो जैम खुली हवा समिण  से नि  आवो  बल्कि पैथर बटे  आवो।  जखम रोगी आराम से घूम फिर साको , पाड़  या तराई म नि  बण्यु  ह्वावो , घाम अर  धूळ नि  ऐ  साको ,मन बांछित विरोधी शब्द, स्पर्श , गंध  नि  आई  सौकन। पाणी घौड़ , उरख्यळ -गंज्य ळ , झाड़ा करणो सुविधा , रुस्वड़ , स्नानघर  दगड़ी हो।  ६।
यांक उपरान्त पवित्र शुद्ध स्वभाव , निर्मल आचरण वळ , रोगी से प्रेम से बात करण वळ ,कर्मकुशल , सेवा कर्म कुशल ,अपण अपण कर्म म प्रशिक्षित , रुस्वै पकाण म कुशल रुसाळ ,नवांण वळ ,मालिश वळ , रोगी तै खड़ करण वळ -बिठाण वळ ,औषध दवा पिसण  वळ ,सब कर्मों म कुशल सेवक , गाणा गाणम कुशल ,स्तुति पाठ करण  वळ ,श्लोक -गाथा -कथा -आख्याकिका -बातचीत -इतिहाद -पुराण  आदि सुणाण वळ ,इशारों से बात समजण  वळ ,मालिकौ मन की बात समजण वळ ,जगह , काल तै समजण  वळ मित्र  , समाजक आदिम उख रौण  चएंदन। इनि बटेर कबड़ा , खरगोश ,हिरण ,काळो हिरण ,बनि बनि हिरण , मेढ़ा यूं  सब तै कट्ठा करण  चयेंद। दूध दीण वळि , स्वस्थ बछर वळि, संत स्वभाव की   गौड़ी रखे जाय ,यीं  गौड़ी कुण रौण , घास पाणी इंतजाम हूण  चयेंद।  छुट  भांड , आचमनी भांड ,मटका घड़ा , मजबूत कलसा ,कुंडा , उकोरा , थाळी , कड़ै ,ढक्क्न , कड़छी , बड़ो घौड़ ,चटाई , तेल पकाणो कड़ै , रई , साफ़ वस्त्र , सूट कपास , सुई ,रुई ,ऊन , खाट व सिरवण वळ दिसाण ,पास म गंगासागर , पीकदान ,सफेद चदर ,सिर वण वळ  पलंग , गदा , आराम कुर्सी , स्नेहन , स्वेदन , अभ्यंग ,प्रलेप ,नयाणो , अनुलेपन ,वमन , विरेचन ,आस्थापन ,अनुवासन , शिरोविरेचन ,पिशाबघर ,संडास ,तै उत्तम व साधन युक्त बणाए जावन।  शुद्ध , धुईं , चिपिळि ,खुरदरी ,मध्यम रूप की  पठळि  (पत्थर शिला )  (सिलवट ) ,  कैंची ,फाळु ,गंडासा , दरांती , आदि शस्त्र धरे जावन।  धूमनलिका ,उत्तर बस्ति  नलिका , झाड़ू , तराजू , द्रव मपण वळ यंत्र , घी तेल ,वसा , मज्जा ,मधु , राब ,नमक , लखड़ , पाणी , मधु , सीधु ,सुरा , कांजी ,तुषोदक , मैरेय ,दही ,दै क पाणी , छाछ , धान्य , कांजी ,आठ प्रकारौ मूत , हेमंत धान्य , साटि चौंळ , मूंग , उड़द ,जौ , तिल ,गहथ ,बेर , किशमिश ,फालसा , हरड़ , बयड़ , औंळा , बनि बनि स्नेह ,स्वेदन साधन ,वमन , विरेचन  पदार्थ , संग्रहणीय ,दीपनीय ,पचनीय ,शामक , वातननाशक गण की ,दवै ,अर जु जु  आवश्यक पदार्थ  आपत्ति दूर करण वळ पदार्थ होवन।  यूं  सब तै कट्ठा करण  चयेंद।  ७। 
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*संवैधानिक चेतावनी: चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १८७    बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चकांजी रक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , चरक संहिता अनुसार आदर्श चिकित्सालय , आदर्श औषधालय


Bhishma Kukreti

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वमन की तीब्रता लक्षण

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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंदरवां  अध्याय  (उपकल्पनीय  अध्याय )   पद  ११  बिटेन  १५  - तक
  अनुवाद भाग -  १२०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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उचित मात्रा म वमन औषध पिलैक एकाग्र चित्त म ध्यानमग्न ह्वेका  जग्वाळ  करण  चयेंद।  जब पसीना ऐक दोष निकळ  जावो , सरैल म रोमांच ह्वावो तब दोष समाप्त ह्वेगे , समजण चयेंद। जब पुटुक म अफरा तफरी ह्वावो त  तब दोष  तै पुटुकम   समजो।  जब वमन इच्छा ह्वावो अर मुख बिटेन  थूक आवो त दोष मथि  आंद समजो।  यांक बाद रोगी तै घुंड उठाइक मिलैक , बैठणो  कुण उत्तम गद्दा, तकिया  वळ खाट द्यावो। वमन करदा रोगी तै पकड़िक सायता दीण  चयेंद। यांकुण  क्वी  मुंड , क्वी पस्सली पकड़ो , क्वी पुटुक दबाये ,क्वी पीठ मलासे।  यांकुण अनुभवी मित्र चएंदन। ११ , १२।
यांक परांत  वैद्य रोगी तै  उपदेश  द्यावो कि  बिंदी जोर से ना तळुक  अर  गौळ खोली साधारण शक्ति से वमन  वेग तै भैर  आणि  द्यावो। यांकुन रोगी तै गौळ , मुख अगनै करण  चयेंद। अर अनुपस्थित वेग तै भैर लाणो खूब अच्छे तरह से नंग विहीन द्वी  अंगुळ्यूं से या कमल डंडी से गौळ पुटुक  सनै सनै  कोमलता से  डाळे अर वमन वेग तै भैर लावे । रोगी वैद्य उपदेश अनुसार कार्य कारो।  याँक उपरान्त वैद्य वमन की जांच कारो।  अनुभवी वैद्य वमन देखि समज जालो कि सम्यक योग च ,आयोग च या अतियोग च। वेग समजण  वळ   चतुर वैद्य  वेग क हिसाब से अतियोग क प्रतिकार भली भाँती समज जांद।  इलै  वैद  वेग तै सावधानी से द्याखौ।  १३ , १४। 
आयोग , सम्यक, योग  अर अतियोग का विशेष लक्षण इन छन - जन विशेष कारण से  (गौळम अंगुळि  डळ ण  से  थोड़ा वमन आण या औषध से केवल भैर आण  )  इ  आयोग का चिन्ह छन। न जल्दी न देर से ठीक समय पर वमन आण , वमन करणम अधिक कष्ट नि हूण ,क्रम से पैल कफ ,फिर पित्त  अर  अंत म वायु दोषुं भैर आण  सम्यक योग क लक्छण छन।  सम्यक योग म  दोषुं  प्रमाण अनुसार तीक्ष्ण , मध्य व मृदु भाग हूंदन। वमन का अतियोग से झागदार , रक्त मिश्रित ,चंद्रिका का आण  अतियोग क लक्छण छन। अतियोग अर आयोग से हूण वळ  उपद्रवों तै समजन चयेंद। अफरा , गुदा जन कटण की पीड़ा हूण , स्राव हूण ,हृदय क भैर आण ,अंगों म वेदना व जकड़न हूण ,रक्त भैर आण ,चक्कर आण /रिंग उठण , शारीरिक जड़ता , थकान , उदासी यी सब आयोग अर  अतियोग क  उपद्रव  छन। १५।

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १९०   बिटेन  १९२   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद


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वमन चिकित्साम भोजन नियम
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  प्रामाणिक  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , पंदरवां  अध्याय  (उपकल्पनीय  अध्याय )   पद १६   बिटेन १८  - तक
  अनुवाद भाग -  १२१
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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सम्यक योग न वमन करणो उपरान्त रोगी तै देखि  वैक हथ , खुट ,मुख धुलैक थोड़ा  देर आराम करण  दीण  चयेंद।  तब फिर स्नेहिक , वैरेचनिक या उप शमनीय क्वी एक धूम पिलैक फिर हथ , खुट , मुख ध्वे ल्यावन।  पाणि  से मुक  धूयूं , वमन  कर्युं    व्यक्ति तै सीधी हवा से दूर , पैथर  बिटेन  हवा संचार वळ कमरा /घर म पड़ाळि  द्यावो। अर निम्न आदेश दे द्यावो -
ऊँचा बुलण , भौत देर तक हवा म बैठण , भौत सीण ,भौत चलण -फिरण ,क्रोध , शोक ,ठंड , घाम ,पाळो ,हवा म भौत देर तक बैठण , मैथुन , घ्वाड़ा सवारी ,रात म बिज्युं  रौण , दिनम सीण , अजीर्ण खाणो ,आत्मप्रकृति विरुद्ध ,असमय , कुसमय ,मात्रा से कम , गुरु भारी व विषम  भोजन , उपस्थित वेगों तै रुकण ,अनुपस्थित वेगो तै भैर लाण ,इन विचारों तै मन बि  नि  लाण। सब प्रकारक उचित भोजन करण ,अर रोगी उनी ही कारो। १६ , १७।
यांक बाद रोगी तै स्याम दैं  या दुसर दिन रोगी तै गरम पाणिन नवाण  चयेंद। एक साल पुरण सांठी  चौळ क यवागू पकायिक जब गळ  जा त थोड़ा गरम यवागू मथि मांड तै पैल पे ल्यावो । फिर कम गरम  गाढ़ो यवागू खावो । चौथ  भोजन काल म बि इनि  यवागू , थोड़ा लूण किन्तु स्नेह रहित गरम पाणि  दगड़ खावे (तीन भोजन काल म जल , लूण , स्नेह नि लीण )।  फिर पंचों अर छटो  भोजन काल म चौथो काल क तरां यवागू खाण। सातों भोजन कालम चौंळ द्वी प्रस्तुति लेकि पकाण । यूं  चौंळुं  तैं गरम पाणी  दगड़  थुड़ा सि घी , अर लूण अर मूंग क यूष /रस का दगड़ खलावो। इनि आठों अर नवों कालक भोजन खलावो।  दसों काल म कै पशु , पक्षी मांश रसक दगड़ चौंळ यवागू खलावो। अर मथि बिटेन गरम पाणि पिलावो। ग्यारवां , बारवां काल म इनि  भोजन करावो। सात दिन उपरान्त  स्वाभाविक  भोजन करावो। १८।
यांक सात दिन पैथर मनीखम बल आयी जाय , तब फिर स्नेहन अर स्वेदन कर्म करिक प्रसन्न मन देखि , रात म सुख से सेकि ,पैलो दिनक भोजन पूरो जीर्ण हूण पर अग्निहोत्र , बलि , मंगल जप ,प्रायश्चित करिक पवित्र तिथि ,ग्रह दशा देखि , ब्राह्मणों से  मंगल  पाठ करैक ,विरेचन द्रव्य ,निशोथ क चूर्ण की एक  अक्ष मात्रा म योग्य द्रव्य म  रोगी तै पिलाओ। औषध दींद  दैं दोष, औषध ,मात्रा , देश ,समय , शरीर , आहार ,सात्म्य , सत्व ,प्रवृति , आयु ,अर रोगिक विवेचना कर लीण। सम्यक विरेचन हूण पर वमन क पैथराक  सम्पूर्ण विधि (धूम छोड़ि ) करण। जब तलक सरैल म बल व चमक नि  आयी जा, शरीर स्वाभाविक स्थिति म नि  ऐ जावो तब तक वमनान्तर की विधि करे जाव । जब बल व रंगत ऐ  जाय मन बि  स्वस्थ ह्वे जाव ,तब सुखपूर्वक सुलाइक , खयूं भोजन भली प्रकार से पच जाय ,सम्पूर्ण अंगोंक स्नान करैक ,संदर वस्त्र , आभूषण पैराइक , मित्र , रिश्तेदारों से मिलाओ अर नित्य क आहार, विहार  व्यवहार म छूट दे द्यावो। उपरोक्त विधि से राजा या धनी व्यक्ति ही संसोधन कराई सकद , निर्धन तै रोग ह्वे जावो तो उपकरण छोड़ि दवा पिलाण चयेंद। इन नी कि गरीबों  पर भयंकर रोग नि हूंद किन्तु आपत्ति कालम जो बि औषध , वस्त्र ,खान पान कौर साक स्यु करण चयेंद मलनाशक , रोगनाशक बलवर्धक , क्रान्ति  वर्धक ,  औषध पकी मनिख दीर्घायु हूंद। १९-२४। 
एमा श्लोक छन  बल -राजाओं या धनी पुरुषों का वमन , विरेचन कार्य , उपकरण ,यूं तै कट्ठा करण कारण , मात्रा ,प्रयोग विधि ,आयोग का लक्षण ,योग -अतियोग का दोष , अर उपद्रव ,रोगी तै क्या सेवन करण कन छुड़न ,यी सब बात पुनर्वसु आत्रेय न  'कल्पनाध्याय' म बोली याल
 उपकल्पना अध्याय , पंदरवां आधाय  समाप्त
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श  अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  192   बिटेन  १९४   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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